महिलाओं का अधूरा राजनीतिक प्रतिनिधित्व !

    


​भारतीय लोकतंत्र में महिलाएँ सक्रिय मतदाता और सियासी परिवर्तन की वाहक बन चुकी हैं, फिर भी उन्हें राजनीतिक नेतृत्व में जानबूझकर उपेक्षित रखा जाता है। यह स्थिति भारतीय राजनीति के पितृसत्तात्मक स्वरूप को दर्शाती है।

​ प्रमुख आलोचना और समस्याएँ

​चुनावी टिकट में उपेक्षा: राजनीतिक दल महिलाओं को केवल वोट बैंक के रूप में देखते हैं, उन्हें गंभीर प्रत्याशी बनाने से कतराते हैं, जिससे उनका प्रतिनिधित्व कम रहता है।

​असमान प्रतिनिधित्व: महिलाओं की बुनियादी समझ और सरोकारी भाव के बावजूद, उनका नेतृत्वकारी भूमिका से वंचित रहना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है।

​आरक्षण की आवश्यकता: स्थानीय निकायों में आरक्षण ने भागीदारी बढ़ाई है, लेकिन लोकसभा/विधानसभा में आरक्षण की कमी (लागू होने की देरी) के कारण उनका प्रतिनिधित्व असंतोषजनक बना हुआ है।

​ बिहार में प्रतिनिधित्व का परिदृश्य

​बिहार में भी महिला मतदाता पुरुष मतदाताओं से अधिक सक्रिय हैं, लेकिन विधायी निकायों में उनका प्रतिनिधित्व अस्थिर और कम है:

​लोकसभा (40 सीटें):

​2019 में 3 महिला सांसद थीं (7.5%)।

​2024 में यह संख्या बढ़कर 5 हुई (12.5%)।

​विधानसभा (243 सीटें):

​महिला विधायकों की संख्या लगातार घटी है: 2010 में 34 (14.0%) से घटकर 2020 में 26 रह गई (10.7%)।

2025 बिहार विधानसभा चुनाव में लगभग 28 महिला उम्मीदवारों ने चुनाव जीता है।11.52%है।

 महिलाएँ लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रीढ़ हैं, लेकिन राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व आबादी के अनुपात में बहुत कम है। राजनीतिक दलों की इच्छाशक्ति में बदलाव और महिला आरक्षण विधेयक का प्रभावी कार्यान्वयन ही इस अधूरे प्रतिनिधित्व को पूरा कर सकता है।

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