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जहानाबाद के पूर्व विधायक सच्चिदानंद यादव का निधन!

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 मगध विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष यादव के निधन से शिक्षा जगत में भी शोक की लहर।  राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद , पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी एवं राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकारी अध्यक्ष सह नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव सहित राजद के अन्य नेताओं ने राजद के वरिष्ठ नेता सह जहानाबाद के पूर्व विधायक सच्चिदानंद यादव के निधन पर गहरी शोक संवेदना प्रकट की है , उनके सम्मान में पार्टी का झंडा आधा झुका दिया।   राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री लालू प्रसाद , पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती राबड़ी देवी, राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष सह नेता प्रतिपक्ष श्री तेजस्वी प्रसाद यादव ,सांसद डॉ मीसा भारती, प्रदेश अध्यक्ष श्री मंगनी लाल मंडल, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री जगदानंद सिंह, श्री उदय नारायण चौधरी,राष्ट्रीय प्रधान महासचिव अब्दुल बारी सिद्दीकी, पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ कांति सिंह,जयप्रकाश नारायण यादव,राष्ट्रीय महासचिव श्री भोला यादव, सैयद फैसल अली, बीनू यादव,राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता प्रो मनोज कुमार झा, सांसद डॉ सुरेंद्र प्रसाद यादव, श्री...

भारत में बढ़ता घरेलू कर्ज: उपभोग, चुनौतियाँ और macroeconomic प्रभाव.

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    भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आँकड़ों के अनुसार, सितंबर 2025 तक भारत का घरेलू कर्ज (household debt) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 45.5% हो गया है, जो जून 2023 में 42% और 2021 में 39.2% था. इस तेज वृद्धि ने नीति निर्माताओं और विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित किया है.   ​बचत में गिरावट: कोविड-19 महामारी के बाद से घरेलू शुद्ध वित्तीय बचत में गिरावट आई है और वित्त वर्ष 2024-25 की पहली छमाही में यह बढ़कर GDP का 6% हो गई है.   ​कर्ज के कारण: असुरक्षित व्यक्तिगत ऋण और डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्मों के कारण कर्ज लेना आसान हो गया है, जिससे उपभोग को अस्थायी बढ़ावा तो मिलता है लेकिन भविष्य की आय गिरवी रखनी पड़ती है.   ​आर्थिक प्रभाव: यदि कर्ज का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य या आवास जैसी संपत्ति-निर्माण (asset-building) गतिविधियों के लिए किया जाए तो यह चिंता का विषय नहीं है; परंतु दैनिक खर्चों को पूरा करने के लिए कर्ज लेना वित्तीय जोखिम पैदा करता है.   ​सरकार और नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना है कि कर्ज तक आसान पहुँच को बेहतर आर्थिक कल्याण मे...

भारत और इफ़्टा (EFTA) समझौता: आर्थिक विकास और तकनीकी सहयोग की नई राह.

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    अक्टूबर 2025 में भारत और यूरोपीय फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA - जिसमें आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड शामिल हैं) के बीच ट्रेड एंड इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (TEPA) लागू हुआ. इस समझौते के तहत भारत ने अपने टैरिफ लाइनों पर महत्वपूर्ण रियायतें दी हैं, जबकि इफ़्टा ने भारत में 15 वर्षों में 100 अरब डॉलर के निवेश और 10 लाख प्रत्यक्ष नौकरियों के सृजन का लक्ष्य रखा है.   ​इस साझेदारी के मुख्य तीन प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं: ​भू-थर्मल ऊर्जा (Geothermal Energy): आइसलैंड के इस क्षेत्र के अनुभव का उपयोग भारत (विशेषकर हिमाचल प्रदेश) में कृषि और शीत भंडारण (cold storage) जैसी सुविधाओं के लिए किया जा रहा है.   ​कार्बन कैप्चर और यूटिलाइजेशन (CCUS): नीति आयोग के अध्ययन और भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से देश में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए तकनीकी रोडमैप तैयार किया गया है.   ​समुद्री अर्थव्यवस्था (Ocean Economy): आइसलैंड की मत्स्य पालन और समुद्री मूल्य-वर्धन (value-added processing) की विशेषज्ञता से भारत को अपनी नीली अर्थ...

पर्यावरण बनाम विकास: अरावली का विनाश और संवैधानिक संकट।

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  अरावली पर्वत श्रृंखला, जो गुजरात से लेकर दिल्ली तक लगभग 700 किलोमीटर के दायरे में फैली हुई है, उत्तर भारत के लिए केवल पहाड़ नहीं बल्कि एक प्राकृतिक ढाल और जीवनरेखा है। यह प्राचीन पर्वत श्रृंखला थार मरुस्थल को आगे बढ़ने से रोकती है, भूजल स्तर को बनाए रखती है और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) को प्रदूषण व जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों से बचाती है। हाल ही में अरावली क्षेत्र में खनन और टेंडर से जुड़े मामलों को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है, जो पर्यावरण संरक्षण के दावों और धरातल पर हो रहे कारनामों के बीच एक बड़ा विरोधाभास पैदा करती है।    क्या यह संविधान के अनुच्छेदों का उल्लंघन है? अरावली के अंधाधुंध दोहन और खनन की अनुमति या टेंडर दिए जाने की प्रक्रिया भारतीय संविधान के कई बुनियादी प्रावधानों और मौलिक अधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन प्रतीत होती है: अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार): उच्चतम न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक फैसलों (जैसे एमसी मेहता वाद) में स्पष्ट किया है कि 'जीने के अधिकार' के अंतर्गत ही स्वच्छ हवा, शुद्ध पानी और प्रदूषणमुक्त पर्यावरण का अधिकार भी शामि...

रीतिकरण से परे: भारतीय उच्च शिक्षा में तार्किकता और अकादमिक स्वतंत्रता की चुनौती।

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     आधुनिक शैक्षणिक संस्थान ज्ञान की खोज, प्रयोग और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के मंदिर होते हैं, न कि अंधभक्ति या कर्मकांड के केंद्र. वर्तमान समय में भारतीय शिक्षा जगत में तार्किकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की जगह धार्मिक अनुष्ठानों और सामंती परंपराओं को बढ़ावा दिया जा रहा है. आईआईटी (IIT) जैसे प्रमुख संस्थानों में दीक्षांत समारोहों के दौरान प्राचीन परंपराओं और प्रतीकों का समावेश अकादमिक स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों के विपरीत है. विश्वविद्यालयों में बढ़ती सरकारी दखलअंदाजी, वैचारिक संकीर्णता और आलोचनात्मक आवाज़ों के दमन से संस्थानों की स्वायत्तता खतरे में पड़ रही है. 'फ्री टू थिंक 2026' की रिपोर्ट के अनुसार भारत में अकादमिक स्वतंत्रता को 'गंभीर रूप से प्रतिबंधित' श्रेणी में रखा गया है. रवींद्रनाथ टैगोर के विचारों के अनुरूप हमें विश्वविद्यालयों को अंधविश्वास और राजनीतिक चापलूसी का अखाड़ा बनने से बचाना होगा, तथा उन्हें स्वतंत्र विचार और लोकतांत्रिक मूल्यों का केंद्र बनाना चाहिए.    #AcademicFreedom #HigherEducation #ScientificTemper #IndianAcademia #CriticalThinking #Fre...

मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा के ओछे बोल और विकृत मानसिकता: संवैधानिक पदों पर बैठकर समाज बांटने की खुली छूट नहीं मिल सकती।

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   खुद जैसे खेत की मूली समझते हो यादव को। ये प्रेम की बाँसुरी बजता है और दुष्टों को नरसंहार करने के लिए सुदर्शन चक्र भी।  ​बिहार की राजनीति में राजनेताओं द्वारा अपनी भाषाई मर्यादा भूलकर अमर्यादित और समाज को खंडित करने वाले बयान देने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला बिहार सरकार के मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा के उस बेहद गैर-जिम्मेदाराना और आपत्तिजनक बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने एक पूरे सम्मानित समाज को निशाना बनाते हुए आपत्तिजनक शब्दावली का इस्तेमाल किया। जब सत्ता के गलियारों में बैठे लोग ही इस तरह की ओछी भाषा का प्रयोग करने लगें, तो यह लोकतंत्र के माथे पर एक गहरा कलंक बन जाता है। ऐसी रुग्ण और संकीर्ण मानसिकता रखने वाले व्यक्ति को एक पल भी मंत्रिमंडल में बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है, और उन्हें अविलंब बर्खास्त किया जाना चाहिए। ​राजनीतिक अवसरवादिता और दोहरे मापदंड ​यह बेहद विडंबनापूर्ण और हास्यास्पद है कि एक तरफ उन्हीं की पार्टियों और गठबंधनों में यादव समाज के नेता अहम पदों पर काबिज हैं—चाहे भाजपा की ओर से नित्यानंद राय और राम कृपाल यादव हों, या जदयू क...

बीमा क्षेत्र की कमजोरियां: गलत प्रथाओं के लिए कोई 'बीमा' नहीं।

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    ​बीमा क्षेत्र में आयोगों  और ओवरराइडिंग कमीशन (ORC) को लेकर नियमों में कई खामियां और ओवरराइडिंग स्ट्रक्चर देखे गए हैं.   ​एग्रीगेटर्स और नए चैनलों के आने से कॉल सेंटर इंसेंटिव बढ़े, जिससे ग्राहकों को बिना मांगे उत्पाद बेचे गए और अवांछित पॉलिसियां थमा दी गईं.   ​IRDAI के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2013 से वित्त वर्ष 2023 के बीच बीमा पेनेट्रेशन 4.1% से गिरकर 3.7% रह गया, जबकि जीवन बीमा पेनेट्रेशन भी 3.1% से घटकर 2.7% हो गया.   ​कराधान अधिकारियों (tax authorities) द्वारा फर्जी बिलों के जरिए कर चोरी (tax fraud) के मामलों की जांच के बाद इस उद्योग में प्रतिष्ठा से जुड़े खतरे भी सामने आए.   ​एक ऐसा उद्योग जो खुद को आत्म-नियमित नहीं करता और उपभोक्ता को प्राथमिकता नहीं देता, उसे आने वाले समय में कड़े सवालों का सामना करना पड़ सकता है.