सड़क से सन्नाटे तक: महंगाई, जन-आक्रोश और लोकतंत्र में गायब होते सवाल!
"रोको महंगाई, बांधो दाम! नहीं तो होगा जाम।" और "खा गई चीनी, पी गई तेल... यह देखो सरकार का खेल।" एक दौर था जब ये नारे सिर्फ राजनीतिक पार्टियों के पोस्टरों पर नहीं, बल्कि आम जनता की ज़ुबान और सड़कों की हवाओं में गूंजते थे। जब राशन की दुकानों पर बढ़ती कीमतें सीधे संसद को हिला देती थीं। लेकिन आज जब महंगाई के आंकड़े लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं, तब यह राजनीतिक और सामाजिक सन्नाटा कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या जनता अब आवाज़ नहीं उठाती? इस सन्नाटे के पीछे केवल एक वजह नहीं है, बल्कि यह कई सामाजिक और राजनीतिक बदलावों का मिला-जुला नतीजा है: कार्रवाई का डर और 'टैग' लगने की आशंका: आज के दौर में सरकार या उसकी नीतियों पर सवाल उठाना जोखिम भरा मान लिया जाता है। किसी नीतिगत विरोध या महंगाई पर पूछे गए सवाल को अक्सर विचारधारा से जोड़ दिया जाता है। 'देशद्रोही', 'शहरी नक्सल' या 'अराजक' जैसे लेबल चिपका दिए जाने का डर आम नागरिक को पीछे हटने पर मजबूर करता है। सोशल मीडिया और राजनीतिक ध्रुवीकरण: सूचना के इस दौर में वैचारिक विभाजन गहरा हुआ है। एक बड़ा व...