भारत में नशा मुक्ति: दंड से उपचार की ओर एक अनिवार्य बदलाव!
भारत आज दो तरफा नशीली दवाओं की चुनौती के बीच खड़ा है। पश्चिम में स्थित 'गोल्डन क्रिसेंट' और पूर्व में स्थित 'गोल्डन ट्राइएंगल' के बीच भौगोलिक स्थिति ने भारत को तस्करी का एक प्रमुख केंद्र बना दिया है। ड्रोन, डार्कनेट और क्रिप्टोकरेंसी के बढ़ते उपयोग ने इस खतरे को और अधिक जटिल कर दिया है। हालाँकि, इस समस्या का सबसे दुखद पहलू इसका केवल कानूनी और दंडात्मक दृष्टिकोण है। वर्तमान में, हमारी नीति नशीली दवाओं की जब्ती और छोटी-मोटी गिरफ्तारियों पर अधिक केंद्रित है। लेकिन यह 'नशा-विरोधी' अभियान जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। सबसे बड़ी विसंगति यह है कि जहाँ छोटे स्तर पर नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले युवा आपराधिक रिकॉर्ड के कारण अपनी आजीविका खो रहे हैं, वहीं बड़े ड्रग-माफियाओं और अवैध दवा निर्माताओं पर नाममात्र की कार्रवाई हो रही है। नशा मुक्ति के लिए चल रहे मौजूदा प्रयासों में भी गंभीर खामियाँ हैं। अधिकांश पुनर्वास केंद्र शहरी इलाकों में सिमटे हुए हैं, जबकि समस्या का घनत्व ग्रामीण और सीमावर्ती गाँवों में अधिक है। इसके अतिरिक्त, निजी नशा मुक्ति केंद्रों में होने वाली...