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न्याय और प्रचार के बीच की रेखा: भारतीय पुलिसिंग और मीडिया ब्रीफिंग की चुनौतियाँ।

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     भारत में किसी भी आरोपी को गिरफ्तार करने के बाद हथकड़ी लगाना, पुलिस द्वारा घेरा जाना और कभी-कभी अपराध का तख्तियां लिए घुमाने का चलन सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो जाता है, जो अक्सर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले ही होता है. सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका (PIL) ने इस बात पर सवाल उठाया है कि भारतीय पुलिसिंग में इसके लिए कोई स्पष्ट कानूनी आधार या राष्ट्रव्यापी मीडिया प्रोटोकॉल नहीं है.    आरोपी व्यक्तियों की तस्वीरें प्रकाशित करने की अनुमति देने या रोकने वाला कोई एक विशेष कानून नहीं है, बल्कि यह औपनिवेशिक युग के नियमों और आपराधिक प्रक्रिया के सामान्य ढांचे पर आधारित है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 84 (पूर्व में CrPC की धारा 82) भगोड़ों के लिए अदालत द्वारा उद्घोषणा की अनुमति देती है, लेकिन तस्वीरों के प्रकाशन के बारे में इसमें कुछ नहीं कहा गया है.    अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार और 'दोषी साबित होने तक निर्दोष' (Presumption of innocence) का सिद्धांत सर्वोपरि है. अदालतों ने यह माना है कि आरोप तय होने स...

भारतीय राजनीतिक वित्त पोषण का अंधेरा और सुधार की आवश्यकता।

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  भारतीय राजनीतिक वित्त पोषण की व्यवस्था में एक बड़ा विरोधाभास यह है कि चुनावी लोकतंत्र के मुख्य स्तंभ होने के बावजूद राजनीतिक दल संविधान में विशेष उल्लेख नहीं पाते हैं, सिवाय दसवीं अनुसूची के। इन्हें अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकारों के विस्तार के रूप में 'एसोसिएशन' (संघ) के रूप में देखा जाता है। राजनीतिक दलों के लिए न तो कोई कानूनी ढांचा तय किया गया है और न ही उन्हें कंपनी, ट्रस्ट, फर्म या गैर-लाभकारी संगठन के रूप में ढालने का कोई प्रयास किया गया है। इसके बावजूद, वे बेमिसाल और अभूतपूर्व तरीके से आयकर छूट का लाभ उठाते आ रहे हैं।    एसोशिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट के अनुसार, FY2022-23 में RUPPs की घोषित आय में 223% की वृद्धि हुई। 2,764 RUPPs में से केवल 739 ने चुनाव आयोग (ECI) को अपने वित्तीय रिकॉर्ड जमा किए थे।    वेंकटेश नायक के एक शोध पत्र के अनुसार, 2024 के आम चुनाव के लिए 22 राजनीतिक दलों के पास कुल ₹18,742.31 करोड़ थे, जिसमें चुनाव की घोषणा के समय उनकी झोली में मौजूद धन और उसके बाद जुटाए गए चंदे शामिल हैं।    पिछले एक दशक में,...

अंधेर नगरी: जहाँ मुखिया के घर में ही बिकता है बहू रानी के हाथों कानून का जहर!

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  बहू निकली शराब तस्कर।  बिहार की धरा से एक बार फिर हैरान कर देने वाली और व्यवस्था को झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। मुजफ्फरपुर जिले के मड़वन थाना क्षेत्र की बड़कागांव दक्षिणी पंचायत—जो विकास के दावे करने वाली धुरी होती है—वहाँ से जो सच निकला, उसने लोकतंत्र की नींव पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। जिस पंचायत की कमान मुखिया सुरेश प्रसाद गुप्ता के हाथों में थी, उसी घर के भीतर से उत्पाद विभाग की टीम ने उनकी बहू रानी कुमारी को शराब और बीयर की करीब 10 लीटर अवैध खेप के साथ धर दबोचा। सवाल यह उठता है कि जिस शराबबंदी कानून को सफल बनाने की सबसे बड़ी नैतिक जिम्मेदारी जनप्रतिनिधियों की होती है, यदि वही इसके सौदागर बन बैठें, तो आम जनता से क्या उम्मीद की जा सकती है? मुखिया जी अपनी सफाई में भले ही यह कह रहे हैं कि उनका बेटा असामाजिक तत्वों के दबाव में यह धंधा करता था और उन्होंने इसका हमेशा विरोध किया, लेकिन क्या यह स्वीकार्य है?  जब घर की चौखट के भीतर ही अवैध कारोबार का यह काला साम्राज्य फल-फूल रहा हो, तो मुखिया जी की इस दलील पर विश्वास करना सूरज को दीपक दिखाने जैसा है। शुरुआती ...

खाकी के खौफ का नंगा नाच: पुलिसिया बर्बरता के शिकार पीड़ित ने विपक्षी नेता के दरबार में लगाई न्याय की गुहार।

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(पीड़ित की फाइल फोटो)      बिहार के पटना जिले के रानीतलाब थाने से मानवता को शर्मसार कर देने वाली और खाकी की साख पर बट्टा लगाने वाली एक अत्यंत अमानवीय और बर्बर घटना सामने आई है। पीड़ित उपेंद्र कुमार (पिता- सिधनाथ राय, साकिन-  पतुत , थाना- रानीतलाब) के साथ जो कुछ हुआ, वह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यह घटना सिर्फ एक थाने की कार्यशैली पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि राज्य में कानून के राज की पोल खोलती है। इस सम्बन्ध में  मैं थाना अध्यक्ष रानी तालाब से बात करने की कोशिश की तो एक no बक्सर में किसी थाना प्रभारी के पास मौजूद था दूसरा no नहीं लग रहा था। यही दोनों no नेट पर मौजूद है।  क्या है पूरा मामला? प्राप्त विवरण और दस्तावेजी साक्ष्यों के अनुसार, दिनांक 21.09.2026 की रात्रि करीब 1.30 बजे रानीतलाब थाना पुलिस ने बिना किसी वारंट, उचित कारण या महिला पुलिस की मौजूदगी के पीड़ित के घर में जबरन घुसपैठ की। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने महिलाओं के साथ अभद्र टिप्पणी व गाली-गलौज की और जब इसका विरोध किया गया, तो मोबाइल छीन लिया गया। इसके बाद पीड़ित को ...

निर्वाचन आयोग की साख और आंतरिक कलह पर गंभीर सवाल: सुधार जरूरी।

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   भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission) जो 1950 में अपनी स्थापना के बाद से देश की सबसे भरोसेमंद और प्रतिष्ठित संस्थाओं में गिना जाता था, आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। एक मीडिया जांच से यह उजागर हुआ है कि 3 सदस्यीय आयोग के भीतर अभूतपूर्व आंतरिक मतभेद चल रहे हैं, जहाँ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के निर्णयों के खिलाफ आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 आपत्तियां दर्ज कराई हैं।    निर्णय लेने की प्रामाणिकता: रिपोर्ट ने तीन अहम सवाल खड़े किए हैं कि आखिर मुख्य फैसले कौन ले रहा है, मतदाता सूची (electoral roll) पर किसका नियंत्रण है, और किस अधिकार के तहत बड़े बदलाव किए जा रहे हैं?    पारदर्शिता का अभाव: आयोग ने न तो इन आंतरिक ज्ञापनों (memos) को सार्वजनिक किया और न ही यह स्पष्ट किया कि फॉर्म 6 में बदलाव, पश्चिम बंगाल में एसआईआर (SIR) विलोपन अपील दायर करने के निर्देश या गोवा में ईआरओ (EROs) द्वारा मतदाता सूची में संशोधन न कर पाने की स्थिति के लिए किसने अधिकृत किया था।    मतदाताओं के अधिकारों से खिलवाड़: मतदात...

दानापुर स्टेशन के बाहर अवैध वसूली का भंडाफोड़: खगौल पुलिस की बड़ी कार्रवाई।

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    दानापुर स्टेशन के बाहर अवैध वसूली (रंगदारी टैक्स) का एक बड़ा मामला सामने आया है, जहां निजी वाहनों के गुजरने पर भी जबरन पचास रुपये वसूले जाते थे। स्थिति यह थी कि इस रंगदारी टैक्स के डर से कई वाहन खगौल छोड़कर अन्य रास्तों से जाने को मजबूर थे, जिससे आम जनता के बीच एक प्रकार का खौफ पैदा हो गया था।    अवैध वसूली का आतंक: दानापुर स्टेशन के बाहर से गुजरने वाले निजी वाहनों को भी पार्किंग के नाम पर जबरन 50 रुपये देने पड़ते थे।    स्थानीय पुलिस की निष्क्रियता: इस अवैध गतिविधि की सूचना जब स्थानीय थाने को दी गई, तो उनकी ओर से कोई भी ठोस कार्रवाई नहीं की गई। खगौल पुलिस की सराहनीय कार्रवाई: आखिरकार, खगौल पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इस अवैध वसूली का भंडाफोड़ किया और 7 आरोपियों को रंगे हाथ दबोच लिया।    जनता को राहत: इस कार्रवाई से आम चालकों और स्थानीय लोगों को बड़ी राहत मिली है, जो इस अवैध खौफ के साए में सफर कर रहे थे। दानापुर एएसपी और खगौल थाना की इस सफलता और त्वरित एक्शन के लिए उन्हें बहुत-बहुत बधाई, जिन्होंने अपराधियों के इस अवैध नेटवर्क पर लगाम लगा...

लोकतंत्र की नींव पर प्रहार: फर्जी मतदान और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल।

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   पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में छह हजार से अधिक फर्जी मतदाता निकला।  भारतीय लोकतंत्र में चुनाव प्रणाली की पवित्रता ही देश की ताकत है। हाल ही में राहुल गांधी द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों और पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में छह हजार से अधिक फर्जी मतदाताओं के सामने आने जैसे मामलों ने चुनावी व्यवस्था पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।   चुनावी प्रक्रिया पर सवाल: राहुल गांधी द्वारा देश में फर्जी चुनाव होने और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं।    स्थानीय स्तर पर धांधली: पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में छह हजार से अधिक फर्जी मतदाताओं का पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि यह समस्या जड़ तक फैल चुकी है। संविधान पर सीधा हमला: फर्जी वोटों के सहारे चुनाव जीतना लोकतांत्रिक व्यवस्था और देश के संविधान पर एक सीधा हमला है। जमानत जब्ती का प्रावधान: फर्जी वोट या प्रशासनिक धांधली के सहारे जीत हासिल करने वाले उम्मीदवारों की अब हर हाल में जमानत जब्त होनी चाहिए, ताकि ऐसे कृत्यों पर रोक लग सके। पारदर्शिता की बहाली: चुनाव आयोग को अपनी निष्पक्षता साबित कर...