धरातल से दूरी और बंद दरवाजे: क्या अस्तित्व के संकट की ओर बढ़ रही है राजद?- प्रो प्रसिद्ध कुमार।
बिहार की राजनीति में 'राष्ट्रीय जनता दल' (राजद) सिर्फ एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक जन-आंदोलन का प्रतीक रहा है। लेकिन आज की बदलती परिस्थितियों में यह सवाल मौजूं हो गया है कि क्या पार्टी अपनी उस जमीनी विरासत को भूलती जा रही है, जिसने उसे कभी सत्ता के शीर्ष तक पहुँचाया था? विरासत हमेशा सत्ता की गारंटी नहीं होती। यदि समय रहते संगठन और नेतृत्व की कार्यशैली में धरातल स्तर पर सुधार नहीं किया गया, तो अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने में देर नहीं लगेगी। 1. जनप्रतिनिधियों की दुर्लभता और अक्षम संगठन आज राजद के आम कार्यकर्ताओं और जनता की सबसे बड़ी शिकायत उनके प्रतिनिधियों (सांसदों और विधायकों) की अनुपलब्धता है। चुनाव जीतने के बाद जनता के काम तो दूर, नेताओं के दर्शन तक दुर्लभ हो जाते हैं। प्रवक्ताओं का सतही रुख: पार्टी का पक्ष रखने वाले प्रवक्ता अक्सर ठोस तथ्यों की जगह रटे-रटाए बयानों और पुरानी घिसी-पिटी बातों को दोहराते दिखते हैं, जिससे जनता से उनका जुड़ाव फीका पड़ रहा है। अनुभवी नेताओं का मोहभंग: संगठन को धारदार बनाने वाले और जमीन से जुड़े एक-एक अनुभवी नेता किनारे ह...