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मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा के ओछे बोल और विकृत मानसिकता: संवैधानिक पदों पर बैठकर समाज बांटने की खुली छूट नहीं मिल सकती।

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   खुद जैसे खेत की मूली समझते हो यादव को। ये प्रेम की बाँसुरी बजता है और दुष्टों को नरसंहार करने के लिए सुदर्शन चक्र भी।  ​बिहार की राजनीति में राजनेताओं द्वारा अपनी भाषाई मर्यादा भूलकर अमर्यादित और समाज को खंडित करने वाले बयान देने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला बिहार सरकार के मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा के उस बेहद गैर-जिम्मेदाराना और आपत्तिजनक बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने एक पूरे सम्मानित समाज को निशाना बनाते हुए आपत्तिजनक शब्दावली का इस्तेमाल किया। जब सत्ता के गलियारों में बैठे लोग ही इस तरह की ओछी भाषा का प्रयोग करने लगें, तो यह लोकतंत्र के माथे पर एक गहरा कलंक बन जाता है। ऐसी रुग्ण और संकीर्ण मानसिकता रखने वाले व्यक्ति को एक पल भी मंत्रिमंडल में बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है, और उन्हें अविलंब बर्खास्त किया जाना चाहिए। ​राजनीतिक अवसरवादिता और दोहरे मापदंड ​यह बेहद विडंबनापूर्ण और हास्यास्पद है कि एक तरफ उन्हीं की पार्टियों और गठबंधनों में यादव समाज के नेता अहम पदों पर काबिज हैं—चाहे भाजपा की ओर से नित्यानंद राय और राम कृपाल यादव हों, या जदयू क...

बीमा क्षेत्र की कमजोरियां: गलत प्रथाओं के लिए कोई 'बीमा' नहीं।

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    ​बीमा क्षेत्र में आयोगों  और ओवरराइडिंग कमीशन (ORC) को लेकर नियमों में कई खामियां और ओवरराइडिंग स्ट्रक्चर देखे गए हैं.   ​एग्रीगेटर्स और नए चैनलों के आने से कॉल सेंटर इंसेंटिव बढ़े, जिससे ग्राहकों को बिना मांगे उत्पाद बेचे गए और अवांछित पॉलिसियां थमा दी गईं.   ​IRDAI के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2013 से वित्त वर्ष 2023 के बीच बीमा पेनेट्रेशन 4.1% से गिरकर 3.7% रह गया, जबकि जीवन बीमा पेनेट्रेशन भी 3.1% से घटकर 2.7% हो गया.   ​कराधान अधिकारियों (tax authorities) द्वारा फर्जी बिलों के जरिए कर चोरी (tax fraud) के मामलों की जांच के बाद इस उद्योग में प्रतिष्ठा से जुड़े खतरे भी सामने आए.   ​एक ऐसा उद्योग जो खुद को आत्म-नियमित नहीं करता और उपभोक्ता को प्राथमिकता नहीं देता, उसे आने वाले समय में कड़े सवालों का सामना करना पड़ सकता है.  

स्वास्थ्य सेवा में उपभोक्ता अधिकार: हम सिर्फ 'मरीज' नहीं, 'ग्राहक' भी हैं।

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  ​स्वास्थ्य सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत 'सेवा' के दायरे में रखा गया है, जिसके तहत डॉक्टर और अस्पताल सेवा में कमी के लिए जवाबदेह हैं.   ​महाराष्ट्र के खाद्य और औषधि प्रशासन (FDA) के एक अध्ययन में चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों के खरीद मूल्यों और घोषित MRP के बीच 2,141% तक के भारी अंतर का खुलासा हुआ है.   ​स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या सूचना असंतुलन है, जहां मरीज अपनी कीमत, ब्रांड और गुणवत्ता की तुलना नहीं कर सकता.   ​उपभोक्ता आंदोलन का उद्देश्य 'डॉक्टर बनाम मरीज' का टकराव पैदा करना नहीं, बल्कि अस्पतालों, प्रयोगशालाओं और बीमाकर्ताओं के बीच सूचना और मोलभाव की शक्ति के अंतर को सुधारना है.   ​पारदर्शिता बढ़ाने के लिए हर अस्पताल के बिल को मशीन-पठनीय  बनाया जाना चाहिए और एल्गोरिदम के जरिए अत्यधिक मूल्य बदलावों की पहचान की जानी चाहिए.  

भारत का विभाजन कितने बार हुआ? अफगानिस्तान , नेपाल, भूटान , तिब्बत , बर्मा आदि भारत के ही अंग थे।

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      भारतीय इतिहास  पर अक्सर 'अखंड भारत' के टूटने और इसके कई बार विभाजित होने की चर्चाएं होती हैं। यदि ऐतिहासिक रूप से देखें, तो औपचारिक और मुख्य राजनीतिक विभाजन मुख्य रूप से 1947 (भारत और पाकिस्तान) तथा उसके बाद 1971 (बांग्लादेश का उदय) के रूप में दर्ज है। हालांकि, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान प्रशासनिक और रणनीतिक कारणों से भारतीय उपमहाद्वीप (अखंड भारत के भू-भाग) से कई पड़ोसी देशों और क्षेत्रों को अलग करने की प्रक्रिया को इतिहास के जानकारों द्वारा कई चरणों का विभाजन (लगभग 7 से अधिक बार) बताया जाता है।    यहाँ उन प्रमुख क्षेत्रों और देशों का विवरण दिया जा रहा है जो समय-समय पर ब्रिटिश काल या उसके आसपास मुख्य भू-भाग से प्रशासनिक रूप से अलग हुए और उनके प्रमुख धर्मों की स्थिति क्या है: प्रमुख विभाजित क्षेत्र, अलग होने का वर्ष और वहाँ के प्रमुख धर्म क्रम देश / क्षेत्र का नाम अलग होने का वर्ष (लगभग) मुख्य रूप से माने जाने वाले धर्म 1. अफगानिस्तान 1876 (गंधमार्क संधि के बाद) इस्लाम (बहुसंख्यक) 2. नेपाल 1904 (ब्रिटिश नीतियों के तहत अलग पहचान) हिंदू और बौद्ध धर्...

लोक-सेवा या लूट का उत्सव—व्यवस्था के आईने में एक प्रशासनिक विडंबना।

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      पटना ADM रविन्द्र कुमार दिवाकर और  इनकी पत्नी दानापुर की अवर निबंधक कुमारी स्वीटी के यहाँ छापे।  बिहार प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी और उनकी पत्नी के आवास पर हुई निगरानी अन्वेषण ब्यूरो (Vigilance Investigation Bureau) की कार्रवाई ने एक बार फिर व्यवस्था की चूलों को झकझोर कर रख दिया है। पटना के आपूर्ति अपर समाहर्ता (ADM) रविन्द्र कुमार दिवाकर और दानापुर की अवर निबंधक कुमारी स्वीटी के ठिकानों पर जब छापे पड़े, तो बरामद संपत्ति के आंकड़े ने आम जनमानस को अवाक कर दिया। डेढ़ करोड़ से अधिक की नगद राशि, भारी मात्रा में सोने-चांदी के आभूषण और सबसे दिलचस्प पहलू—48 कीमती घड़ियाँ! यह दृश्य उस गहरी सड़न को उजागर करता है जहाँ लोक-सेवक, जनसेवक न रहकर व्यवस्था के शोषक बन बैठते हैं। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि एक महीने में तीस दिन होते हैं, यदि कोई व्यक्ति हर रोज एक नई घड़ी भी बदले, तो भी महीने भर में तीस घड़ियाँ पर्याप्त होती हैं, फिर अड़तालीस घड़ियों का यह जखीरा किस मानसिक विलासिता का परिचायक है? यह संचय की वह प्रवृत्ति है जो नैतिक पतन की पराकाष्ठा को छूती है। द...

स्वास्थ्य और समय की असमानता: जब गरीबों के लिए समय बन जाता है दुर्लभ संपत्ति ।

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   सामाजिक असमानता एक अत्यंत गहरा और वास्तविक स्वरूप है, जो केवल धन या संपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों—यानी 'समय' और 'स्वास्थ्य' पर भी सीधा प्रभाव डालती है। आर्थिक संपन्नता और समय की खरीद आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग अपनी क्रय शक्ति के बल पर जीवन को आसान बना लेते हैं। वे निजी अस्पतालों, भुगतान आधारित स्वास्थ्य सेवाओं, पेशेवर एजेंटों और डिजिटल सहायता का उपयोग करके लंबी कतारों और प्रशासनिक झंझटों से बच जाते हैं और अपने लिए 'समय खरीद' लेते हैं। इसके विपरीत, सीमित आय वाले परिवारों के पास ऐसे कोई विकल्प नहीं होते हैं। आंकड़ों के आईने में स्वास्थ्य और सामाजिक असमानता विभिन्न रिपोर्ट्स और आंकड़े इस सामाजिक और स्वास्थ्यगत असमानता की पुष्टि करते हैं: जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) में अंतर: ऑक्सफैम और विभिन्न स्वास्थ्य अध्ययनों के अनुसार, आर्थिक रूप से संपन्न लोग देश के सबसे गरीब तबके की तुलना में औसतन 7.5 वर्ष अधिक जीते हैं। इसका मुख्य कारण गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी असमान पहुंच है। सबसे गरीब पांचवें हिस्से के लोगों की औसत ...

हृदय सम्राट और बेबाक वक्ता: प्रो. डॉ. अजय कुमार—संघर्ष, ईमानदारी और शिक्षकों के सच्चे मसीहा ! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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   राजनीतिक समीकरणों और सत्ता की पैंतरेबाज़ी के बीच कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो अपने कर्म, निष्ठा और संवेदनशीलता के कारण इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि सीधे लोगों के दिलों में बस जाते हैं। पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार और पटना कॉलेज ऑफ कॉमर्स, आर्ट्स एंड साइंस के गणित विभाग के अध्यक्ष (HOD) प्रो. डॉ. अजय कुमार आज ऐसे ही एक अनूठे जननायक के रूप में शिक्षकों के बीच चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। अध्यापन से जनसेवा तक का प्रेरणास्पद सफर एक उच्च विद्यालय के शिक्षक से लेकर कॉलेज के प्रोफेसर तक का उनका यह सफर उनकी अदम्य जिजीविषा, कड़ी मेहनत और अथक लगन की जीवंत दास्तान है। यह यात्रा साबित करती है कि यदि इरादे बुलंद हों और ईमानदारी आभूषण हो, तो सफलता की कोई सीमा नहीं होती। आत्मीय लगाव और अनुकरणीय कर्तव्यनिष्ठा प्रो. अजय कुमार का शिक्षकों के प्रति आत्मीय लगाव और सम्मान दुर्लभ है। परीक्षा केंद्रों पर मूल्यांकन के दौरान अक्सर शिक्षकों को मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझना पड़ता है। ऐसे में, जब वे परीक्षा नियंत्रक के पद पर थे, तो उन्होंने व्यवस्था की इस कमी को अपनी जिम्मे...