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नेपाल के रसुवा में रहस्यमयी भीषण बाढ़: 16 की मौत, 41 सुरक्षाकर्मी लापता।

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     नेपाल के रसुवा जिले में तिब्बत की ओर से बहने वाली भोटे कोशी नदी में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने व्यापक स्तर पर तबाही मचाई है, जिसमें अब तक 16 लोगों की जान जा चुकी है और 41 से अधिक सुरक्षाकर्मी लापता हैं। स्थानीय मौसम साफ होने के बावजूद आई इस बाढ़ ने तटीय क्षेत्रों को पूरी तरह अपनी चपेट में ले लिया है। बाढ़ से जुड़ी प्रमुख जानकारी और नए अपडेट हताहत और रेस्क्यू ऑपरेशन: अब तक 16 शव बरामद किए जा चुके हैं। लापता 41 जवानों और अन्य नागरिकों की तलाश के लिए नेपाली सेना और आपदा प्रबंधन की टीमों ने बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन तेज कर दिया है। बुनियादी ढांचे की तबाही: नदी के तेज बहाव के कारण तटीय इलाकों में स्थित कई बाजार जलमग्न हो गए हैं। इसके अलावा, इस क्षेत्र में संचालित और निर्माणाधीन कई महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजनाओं (हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स) को भारी क्षति पहुंची है। निचले इलाकों में रेड अलर्ट: भोटे कोशी आगे जाकर त्रिशूली नदी में मिलती है। खतरे की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने त्रिशूली नदी के निचले इलाकों में रहने वाले नागरिकों के लिए चेतावनी जारी कर उन्हें तुरंत सुरक्ष...

राम लखन सिंह यादव कॉलेज में विधायक डॉ संजीव चौरसिया का स्वागत एवं वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित; नए भवन निर्माण हेतु सौंपा गया मांग पत्र।

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  पटना। आज राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनिसाबाद के प्रांगण में स्थानीय विधायक डॉ संजीव चौरसिया जी का आगमन हुआ। कार्यक्रम के दौरान कॉलेज के प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद ने माननीय विधायक जी को अंगवस्त्र एवं पुष्पगुच्छ (बुके) भेंट कर उनका भावभीना स्वागत किया। वहीं महाविद्यालय के प्राध्यापकों ने भी विधायक जी का माल्यार्पण कर अभिनंदन किया। कार्यक्रम के दौरान प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद ने विधायक जी को एक मांग पत्र सौंपा, जिसमें कॉलेज में छात्रों की बढ़ती संख्या और जर्जर भवनों को देखते हुए 'विधायक क्षेत्र विकास निधि' से दो छतदार कमरे एवं बरामदे (80 फीट × 35 फीट) के अविलंब निर्माण की स्वीकृति का अनुरोध किया गया। स्वागत समारोह के उपरांत माननीय विधायक जी ने  मांग पूरी करने का आशावसं दिया। कॉलेज प्रांगण में वृक्षारोपण किया। इसी क्रम में एनसीसी (NCC) प्रभारी मुकेश कुमार यादव ने अपने कैडेट्स के साथ 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान के तहत पौधारोपण किया। तद्परांत विधायक जी ने महाविद्यालय परिसर का गहन निरीक्षण किया , कॉलेज में खुला नया ओपी मणिकचंद्त  था कॉलेज के विशाल परिसर व व्यवस्था ...

पुनर्बीमा का कराधान और भारत का रणनीतिक दृष्टिकोण!

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  जब कोई भारतीय नागरिक या कंपनी बीमा पॉलिसी खरीदती है, तो उस जोखिम का एक बड़ा हिस्सा म्यूनिख, ज्यूरिख, सिंगापुर या लंदन जैसे वैश्विक वित्तीय केंद्रों में कार्यरत पुनर्बीमा कंपनियों के पास स्थानांतरित कर दिया जाता है। IRDAI की रिपोर्ट के अनुसार, FY25 में भारत का पुनर्बीमा बाजार ₹1,12,305 करोड़ तक पहुँच गया। इसमें से लगभग ₹43,000 करोड़ का व्यवसाय भारत में बिना किसी स्थायी प्रतिष्ठान के विदेशी वित्तीय केंद्रों द्वारा लिखा गया। यह स्थिति कर चोरी नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय दोहरे कराधान निवारण समझौतों (DTAA) के अनुच्छेद 7  तहत व्यावसायिक लाभ आवंटन का परिणाम है, जो बिना PE के विदेशी कंपनियों के व्यावसायिक लाभ पर भारत को कर लगाने की अनुमति नहीं देता। अनुच्छेद 7 और PE की शर्त: DTAA के तहत, भारत केवल तभी किसी विदेशी पुनर्बीमाकर्ता के लाभ पर कर लगा सकता है जब उसका भारत में कोई PE हो (जैसे भारत में स्थित उसकी शाखाएँ)। गैर-संधि क्षेत्र (जैसे बरमूडा): यहाँ अनुच्छेद 7 लागू नहीं होता, जिससे घरेलू कानून और विदहोल्डिंग टैक्स महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इसमें एक विशेष प्रावधान है जो स्थानीय जोखिमों ...

न्यायिक नियुक्तियों में गोपनीयता की संस्कृति का अंत: पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता!

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  भारतीय न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली लंबे समय से बहस का विषय रही है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की टिप्पणी ने इस चर्चा को पुनर्जीवित कर दिया है, जिसमें उन्होंने कहा कि कॉलेजियम प्रक्रिया में अधिक खुलापन जनता के विश्वास को मजबूत करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि योग्यता ही प्राथमिक मानदंड बनी रहे। स्वतंत्रता के संरक्षण के नाम पर कॉलेजियम प्रणाली को कार्यकारी हस्तक्षेप से दूर रखा गया था, लेकिन समय के साथ यह संवैधानिक जवाबदेही से ही अलग-थलग पड़ गई। न्यायपालिका खुद एक ऐसी प्रणाली बन गई है जो अन्य सभी सार्वजनिक संस्थानों से पारदर्शिता की मांग करती है, परंतु अपनी ही नियुक्ति प्रक्रिया को बंद दरवाजों के पीछे रखती है। कॉलेजियम प्रणाली का विकास संविधान के मूल पाठ से नहीं, बल्कि न्यायालय के ही फैसलों (प्रथम, द्वितीय और तृतीय न्यायाधीश मामलों) के माध्यम से हुआ है। हालाँकि शुरुआती मंशा न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करना था, परंतु तीन दशकों के बाद भी यह प्रक्रिया दुनिया के किसी भी प्रमुख संवैधानिक लोकतंत्र की तुलना में स...

विलंब का जोखिम ।

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    यदि भारत एक साथ दो मोर्चों पर संकट का सामना करता है (उदा. लद्दाख और सियाचिन में एक साथ तनाव), तो यह निर्णय कौन और कितनी जल्दी लेगा कि राफेल लड़ाकू विमानों या S-400 वायु रक्षा प्रणालियों की सीमित संपत्तियों को कहाँ तैनात किया जाए? थिएटरइजेशन का उद्देश्य भारतीय वायु सेना की स्वायत्तता या लचीलेपन को कम करना नहीं है, बल्कि कमांड संरचना को मजबूत बनाना है ताकि युद्ध की स्थिति में संसाधनों का सही और त्वरित उपयोग हो सके। यदि यह बहस अनसुलझी रहती है, तो विफलता का दायरा केवल वायु सेना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी सैन्य संरचना की तैयारी पर सवाल खड़े करेगा। यह निर्णय केवल वायु सेना का नहीं, बल्कि भारत के राजनीतिक नेतृत्व का है, जिसकी जवाबदेही राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति सबसे अधिक है।

भारत में युवा संकट: परीक्षा सुधार नहीं, रोज़गार का अभाव असली चुनौती!

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  भारत का वर्तमान युवा संकट केवल परीक्षा सुधारों या प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मुख्य कारण अर्थव्यवस्था में गुणवत्तापूर्ण रोज़गार और अवसरों की भारी कमी है।  निजी कोचिंग का खर्च भारतीय परिवारों के शिक्षा बजट का 16% तक पहुंच गया है (जो 2018 में 12.5% था)। उच्च माध्यमिक स्तर पर यह खर्च बजट के लगभग एक-चौथाई हिस्से के बराबर है। 22 लाख से अधिक अभ्यर्थी लगभग 1.4 लाख मेडिकल सीटों के लिए परीक्षा में बैठते हैं, जिनमें से शीर्ष 50 कॉलेजों में 10,000 से भी कम सीटें हैं। यही स्थिति इंजीनियरिंग (JEE) जैसी परीक्षाओं की भी है।  ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) के अनुसार, 2011 के बाद पहली बार 2023-24 में स्नातक (UG) नामांकन में 93,322 की कमी दर्ज की गई, जिसमें उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी गिरावट (1.53 लाख) देखी गई। पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2025 के आंकड़ों के अनुसार, 15 से 29 वर्ष की आयु के प्रति 100 स्नातकों में से केवल 26 के पास नियमित वेतन वाली नौकरी है, और मात्र 4 के पास अनुबंध व सामाजिक सुरक्षा युक्त नौकरी है। 6%-6.5% की जीडीपी वृद्धि के दा...

Spendonomics -: भारत में उपभोग क्रांति और बढ़ती क्रय शक्ति का नया दौर। -प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र विभाग।

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  NielsenIQ-World Data Lab की नई रिपोर्ट के अनुसार, अगले 10 वर्षों में (वर्ष 2036 तक) भारत दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी 'समृद्ध' उपभोक्ता आबादी वाला देश बन सकता है। यद्यपि इस सूची में अमेरिका शीर्ष पर बना रहेगा, लेकिन भारत अपनी तीव्र आर्थिक वृद्धि दर और उच्च क्रय शक्ति के बल पर चीन को पीछे छोड़ देगा। यद्यपि चीन की नामांक जीडीपी भारत की तुलना में लगभग 5 गुना अधिक है, लेकिन भारत में जीवन-यापन की लागत (वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें) काफी कम है। अमेरिका में प्रतिदिन $90 खर्च करने वाले व्यक्ति को 'समृद्ध' माना जाता है। भारत में क्रय शक्ति समानता के आधार पर प्रतिदिन ₹1,800 (या ₹54,000 प्रति माह) का खर्च अमेरिकी $90 के बराबर माना गया है।  अनुमान है कि 2036 तक भारत में लगभग 10.8 करोड़ लोग नियमित रूप से इतना खर्च करने में सक्षम होंगे, जबकि चीन में ऐसे लोगों की संख्या 10.3 करोड़ रहेगी। मांग में उछाल: मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग की आय बढ़ने से हवाई यात्रा , होटल, लग्जरी गाड़ियां, टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएं और रेस्तरां में खान-पान की बिक्री में भारी बढ़ोतरी होगी। निजी उपभोग भारतीय जीडीपी का सब...