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राष्ट्रीय किसान मोर्चा का एक दिवसीय चिंतन शिविर सम्पन्न, बिहार के किसानों की समस्याओं पर हुआ गंभीर मंथन !

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  पटना (खुसरूपुर): राष्ट्रीय किसान मोर्चा बिहार इकाई संगठन के तत्वावधान में खुसरूपुर प्रखंड के चौड़ा ग्राम में एक दिवसीय परिचय, सम्मान सह चिंतन शिविर का आयोजन किया गया। इस भव्य कार्यक्रम में संगठन के तमाम शीर्ष नेताओं सहित सैकड़ों की संख्या में किसान और मजदूर शामिल हुए। सभा की अध्यक्षता चौड़ा ग्राम के विश्वनाथ यादव ने की, जबकि मंच का कुशल संचालन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्याम नंदन कुमार यादव द्वारा किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत में आए हुए सभी अतिथियों का अंग वस्त्र (शॉल) और पुष्पहार देकर भव्य स्वागत किया गया। कार्यक्रम के समापन पर प्रदेश महासचिव रवींद्र कुमार सिंह ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। दिग्गजों का जुटाव इस अवसर पर संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्याम नंदन कुमार यादव, राष्ट्रीय महासचिव विपिन चौधरी, प्रदेश महासचिव (मधुबनी) श्री विनोद कुमार सिंह यादव, प्रदेश महासचिव व फतुहा प्रखंड के उप प्रमुख रवींद्र कुमार सिंह, प्रदेश कोषाध्यक्ष उत्तम सिंह बाल्यान, रुपेश सिंह कुंतल, खुसरूपुर के प्रखंड अध्यक्ष सुरेश यादव, शंभूशरण सिंह यादव, सूरज कुमार यादव, पुनीत सिंह, जगवीर सिंह शा...

मृत्युभोज: आस्था के नाम पर सामाजिक अभिशाप और हमारी संवेदनहीनता !

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  शोक के आंगन में स्वाद की तलाश क्यों? किसी प्रियजन के चले जाने का दुख क्या होता है, यह केवल वही परिवार समझ सकता है जिसने अपना कोई खोया है। मृत्यु के बाद घर में पसरा सन्नाटा, अपनों के आंसू और वो कभी न भरने वाला खालीपन... ऐसे गमगीन माहौल में जब पूरा समाज उस पीड़ित परिवार के घर 'मृत्युभोज' (तेरहवीं) के नाम पर पकवान खाने जुटता है, तो मानवता सचमुच शर्मसार हो जाती है। जिस चौखट पर बैठकर कभी ढांढस बंधाना चाहिए था, वहां बैठकर भोजन की फरमाइश करना हमारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। शास्त्रों का सच्चा संदेश: पुण्य नहीं, यह पाप है हम अक्सर परंपराओं की दुहाई देकर अपनी गलतियों को छुपाने की कोशिश करते हैं, लेकिन हमारे ग्रंथ और इतिहास कुछ और ही सीख देते हैं। महाभारत का अनुशासन पर्व: महाभारत में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि विपदा और संकट के समय पीड़ित परिवार की तन, मन और धन से सहायता करनी चाहिए, न कि उनके घर जाकर भोजन ग्रहण करना चाहिए। श्रीकृष्ण का उपदेश: भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, भोजन हमेशा प्रसन्न मन की स्थिति में ही ग्रहण करना चाहिए। शोक संतप्त मन से बनाया और खिलाया गया भोजन कभी तृप्ति नहीं ...

E20 ईंधन नीति: पारदर्शिता का अभाव और उपभोक्ता का संशय !

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    क्या एक बड़ी नीतिगत बदलाव के लिए केवल तकनीकी तैयारी पर्याप्त है, यदि उपभोक्ता ही विश्वास में न लिया गया हो?  हालांकि सरकार, वाहन निर्माताओं और इथेनॉल डिस्टिलर्स के बीच व्यापक विचार-विमर्श हुआ, लेकिन इन प्रयोगों के निष्कर्षों को वाहन खरीदारों के साथ पर्याप्त रूप से साझा नहीं किया गया। यह सूचना का अभाव सीधे तौर पर जनता के बीच 'इंजन के स्वास्थ्य' को लेकर भ्रामक जानकारी और डर पैदा करने का आधार बना।  ईंधन विकल्प के मामले में उपभोक्ताओं की पसंद को चुनौती दी जा रही है। नीति निर्माताओं की यह लापरवाही कि उन्होंने उपभोक्ताओं को इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया या उन्हें आश्वस्त नहीं किया, एक गंभीर 'कम्युनिकेशन गैप' (संवाद की खाई) पैदा करती है। सरकार और उद्योग जगत का रुख 'प्रतिक्रियाशील'  रहा है, न कि 'सक्रिय' ! भ्रामक सूचनाओं को दूर करने के लिए पूर्व-सक्रिय कदम उठाने के बजाय, एक 'आत्मसंतुष्टि'  का माहौल विकसित हुआ है। यह तब और अधिक गंभीर हो जाता है जब हम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े ऑटोमोबाइल बाजार की बात कर रहे हों। यद्यपि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और जल...

श्रीराम के हुंडी में चोर!

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      चढ़ावे का सच और पाखंड का बाज़ार !  ​रामलला की आँखों में है, भक्तों की अटूट आस, मंदिर तो है भव्य, पर चढ़ावे का है काला इतिहास। भंडार में लगे दान के सिक्के और नोटों के ढेरे, पर भ्रष्टाचार की घुटन से, साँसें हैं रुकते, ठहरे। ​राम से बड़ा नाम का आधार, ये कहते सब ज्ञानी, पर नाम की आड़ में रचा, इन्होंने ये झूठा संसार। नाम जपने वाले ही बने, नाम के महाभक्षक, राम के नाम पर, खुद ही बन बैठे नए रक्षक। ​चंदे के नाम पर, आम आदमी के विश्वास की हत्या, चढ़ावे की लूट ने, श्रद्धा के श्राद्ध में रीत को नहलाया। पाखंड का पाषाण है, इनकी ये चाकी की चाल, राम के नाम को व्यापार बना, ये कर रहे हैं बेहाल। ​'अयोध्या तो झांकी है'—बस, एक नारा बनकर रह गया, मंदिर के पीछे का ये गोरखधंधा, सब को डरा गया। परजीवी भोग-विलास में मस्त हैं, और भूखा है श्रम करने वाला, जब तक मूर्खता रहेगी, तब तक  वर्चस्व ढोंगी माला। ​जागो, हे भारतवासियों! इस पाखंड का पर्दा हटाओ, राम के नाम को कलंकित, अब और न होने पाओ।

कैंसर: राष्ट्रीय स्तर पर 'अधिसूचनीय रोग' बनाने की आवश्यकता!

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    ​वर्तमान में भारत में कैंसर एक 'अधिसूचनीय रोग' नहीं है। स्वास्थ्य मंत्रालय का पारंपरिक दृष्टिकोण यह है कि इस श्रेणी में केवल संक्रामक रोगों को ही शामिल किया जाना चाहिए। अब इस नीति को बदलने और कैंसर को राष्ट्रीय स्तर पर अधिसूचनीय बनाने का समय आ गया है। केंद्र सरकार वर्तमान में जनसंख्या-आधारित और अस्पताल-आधारित कैंसर रजिस्ट्रियों पर निर्भर है। ये रजिस्ट्रियां देश की केवल 10% से 16% आबादी को कवर करती हैं और इनमें शहरी तथा सरकारी स्वास्थ्य ढांचे की ओर झुकाव अधिक है।  भारत में कैंसर का एक बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र द्वारा संभाला जाता है, जिसका डेटा समान रूप से दर्ज नहीं हो पाता है। ​राज्यों की पहल: कई राज्य पहले ही कैंसर को अधिसूचनीय बना चुके हैं। तेलंगाना इस सूची में शामिल होने वाला नवीनतम राज्य है, जिससे अब ऐसे राज्यों की कुल संख्या 17 हो गई है। ग्लोबल कैंसर ऑब्जर्वेटरी (WHO) के अनुमान के अनुसार, 2022 (1.41 मिलियन) से 2045 (2.46 मिलियन) के बीच कैंसर के मामलों में 74% से अधिक की वृद्धि होने की आशंका है। बढ़ती उम्र और जीवनशैली में बदलाव को देखते हुए, सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष...

अमेरिका का वैश्विक प्रभाव और भविष्य की चुनौतियाँ!

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    ​ अमेरिका प्रौद्योगिकी, वित्त और स्वास्थ्य सेवा में वैश्विक अग्रणी है। इसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी ($94,000) वैश्विक औसत से 6 गुना अधिक है। इसकी समृद्धि का आधार सुदृढ़ प्रशासनिक संस्थान, प्राकृतिक संसाधन और प्रवासियों का स्वागत करने वाली संस्कृति है। अमेरिका वैश्विक सैन्य खर्च का 35% खर्च करता है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों (समुद्री रास्तों) की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। नाटो (NATO) और अन्य वैश्विक सुरक्षा ढांचे में इसकी भूमिका निर्णायक है। अमेरिका 'होफस्टेड इंडिविजुअलिज्म' स्कोर में शीर्ष पर है, जो व्यक्तिगत उद्यमशीलता और अद्वितीय परोपकारी संस्कृति को बढ़ावा देता है। वहां के नागरिक सरकार पर निर्भर रहने के बजाय नागरिक संस्थाओं के माध्यम से समस्याओं का समाधान खोजने में विश्वास रखते हैं। अमेरिका के वर्तमान आर्थिक घाटे और वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी घटने (1960 के 40% से घटकर 27%) को लेकर चिंताएं हैं। स्ट्रॉस-हावे जनरेशनल थ्योरी के अनुसार, अमेरिका वर्तमान में एक ऐतिहासिक संकट के दौर से गुजर रहा है। हालांकि, अतीत की तरह, अमेरिका इस दौर से भी अधिक मजबूत होकर उभरेगा।

​कोचिंग सेंटरों पर नियंत्रण: एक विश्लेषण!

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     यह भारत में कोचिंग सेंटरों के बढ़ते प्रभाव और उन्हें विनियमित करने की आवश्यकता पर चर्चा है। ​कोचिंग का विस्तार: कोचिंग अब केवल एक सहायक साधन न रहकर एक व्यापक समानांतर शिक्षा प्रणाली बन गई है, जो मध्य विद्यालय से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं तक फैली हुई है। ​प्रस्तावित विनियमन: केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की एक समिति ने कोचिंग सेंटरों के लिए राष्ट्रीय कानून का प्रस्ताव दिया है। इन दिशानिर्देशों में शामिल हैं: ​अनिवार्य पंजीकरण। ​बुनियादी ढांचा और सुरक्षा मानक। ​पारदर्शी शुल्क नीतियां, परामर्श सेवाएं और आयु प्रतिबंध। ​चुनौतियां: केवल कोचिंग सेंटरों को विनियमित करना पर्याप्त नहीं है क्योंकि यह उन संरचनात्मक प्रोत्साहनों को संबोधित नहीं करता है जो छात्रों को कोचिंग की ओर धकेलते हैं। ​समाधान के उपाय: ​प्रवेश परीक्षाओं को अधिक वैचारिक बनाना ताकि उन्हें 'रटने' के आधार पर तैयार न किया जा सके। ​स्कूली शिक्षा को मजबूत करना ताकि कक्षाएं सीखने का मुख्य केंद्र बनें। ​'डमी स्कूल' इकोसिस्टम को खत्म करना अनिवार्य है। यदि कोचिंग संस्कृति में वास्तविक बदलाव लाना है, तो सरकार को केवल नियमों...