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रंग-तरंग: जब खगौल के मंच पर 'गबरघिचोर' के साथ जीवंत हो उठी भिखारी ठाकुर की लोक-संस्कृती - प्रो. प्रसिद्ध कुमार की आँखों देखी !

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    पटना/खगौल। रविवार की शाम खगौल का नवनिर्मित सृजन प्रेक्षागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था। मौका था भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के कालजयी लोकनाट्य 'गबरघिचोर' के प्रभावशाली मंचन का। चर्चित नाट्य संस्था 'सूत्रधार' द्वारा प्रस्तुत इस नाटक को देखने के लिए दर्शकों की ऐसी भीड़ उमड़ी कि हॉल खचाखच भर गया। आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस यह प्रेक्षागृह किसी बड़े थिएटर या मॉल से कम नहीं लग रहा था—मखमली फर्श, आरामदायक सीटें, शानदार लाइट-साउंड व्यवस्था और दीवारों पर उकेरी गई खूबसूरत चित्रकारी ने रंगकर्म के माहौल को और भी भव्य बना दिया था। गरिमामय शुरुआत और सम्मान कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन और एक विशेष पुस्तिका के विमोचन के साथ हुई। उपस्थित सभी अतिथियों को अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। फ्रंट सीट पर बैठकर नाटक का आनंद ले रहे अतिथियों में जेएनएल कॉलेज की प्राचार्य सह प्रख्यात साहित्यकार प्रो. (डॉ.) मधु प्रभा सिंह पूरी तन्मयता के साथ कलाकारों का हौसला बढ़ा रही थीं। एक महिला और साहित्यकार के नाते मंच पर उकेरी जा रही स्त्री-वेदना उ...

राजनीति का भंवर और छात्र आक्रोश: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की पूरी कहानी!

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  केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भारतीय राजनीति और छात्र आंदोलनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ बनकर उभरा है। देश भर में परीक्षा पत्रों के लीक होने की घटनाओं और छात्रों के लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बाद, अंततः नरेंद्र मोदी सरकार पर बने भारी दबाव के कारण उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा। GenZ (युवा पीढ़ी) के इस प्रचंड विरोध ने एक बार फिर साबित कर दिया कि युवाओं की चिंताएं सत्ता के समीकरणों पर भारी पड़ सकती हैं। राजनीति में निरंतर बढ़त और पारिवारिक पृष्ठभूमि 1969 में ओडिशा के तालचर में जन्मे धर्मेंद्र प्रधान का संबंध लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े परिवार से रहा है। उनके पिता देबेंद्र प्रधान भी संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता और वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके थे। धर्मेंद्र प्रधान ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से की और बाद में भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उत्कल विश्वविद्यालय से एंथ्रोपोलॉजी (मानव विज्ञान) में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल करने वाले प्रधान ने 2000 में ओडिशा वि...

हरित भविष्य की ओर: धान की खेती और पर्यावरण का संतुलन !

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      भारत दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक देशों में से एक है, जो वैश्विक खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, हालिया अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों (जैसे Nature Food) से यह बात सामने आई है कि पारंपरिक सिंचित धान के खेत वैश्विक स्तर पर मीथेन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोतों में शामिल हो चुके हैं। यह इस चुनौती के प्रमुख कारणों, इसके वैज्ञानिक पहलुओं और उन प्रेरणादायक तकनीकों पर प्रकाश डालता है, जिनके माध्यम से भारत अपनी खाद्य सुरक्षा को बनाए रखते हुए पर्यावरण संरक्षण का नया मार्ग प्रशस्त कर सकता है। उत्सर्जन में वृद्धि: 1960 के दशक के बाद से धान की खेती से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में दोगुनी वृद्धि देखी गई है। वैश्विक स्तर पर धान के खेतों से प्रतिवर्ष लगभग 1.1 अरब टन CO₂-समकक्ष गैसों का उत्सर्जन होता है। भारत की स्थिति: भारत में सिंचित धान के खेत सालाना लगभग 3.9 करोड़ टन मीथेन का उत्सर्जन करते हैं, जो जर्मनी के कुल वार्षिक मीथेन उत्सर्जन से भी अधिक है। खेतों में लगातार जलभराव जिससे ऑक्सीजन-रहित परिस्थितियाँ बनती हैं और मीथेन बनाने वाले सूक्ष...

ज़ूफार्माकोग्नोसी: जब जानवर स्वयं बनते हैं अपने चिकित्सक!

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  प्रकृति ने जीवों को केवल जीवन ही नहीं दिया, बल्कि स्वास्थ्य और उपचार का ज्ञान भी उनके सहज व्यवहार (Instinct) में समाहित किया है। विज्ञान की भाषा में इस प्रक्रिया को ज़ूफार्माकोग्नोसी (Zoopharmacognosy) कहा जाता है, जिसका सीधा अर्थ है—पशु-पक्षियों और अन्य जीवों द्वारा आत्म-उपचार (Self-medication) के लिए वनस्पतियों और प्राकृतिक तत्वों का उपयोग करना। स्व-उपचार के अद्भुत उदाहरण ओरंगुटान का देसी इलाज: इंडोनेशिया के मध्य कालीमंतन स्थित सेबंगु जंगल में ओरंगुटान 'ड्राकेना' (Dracaena) नाम के पौधे की पत्तियों को अपनी लार के साथ मिलाकर पेस्ट बनाते हैं। वे इस पेस्ट को शरीर पर लगाते हैं ताकि मांसपेशियों का दर्द, जोड़ों की अकड़न और त्वचा संबंधी समस्याएं दूर हो सकें। शालपर्णी और चिंपैंजी: नाइजीरिया में चिंपैंजी 'डेस्मोडियम गैंगेटिकम' (Desmodium gangeticum या शालपर्णी) की पत्तियों को निगलकर अपनी त्वचा पर मौजूद परजीवियों से छुटकारा पाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन आयुर्वेद में भी महर्षि सुश्रुत जैसे वैद्यों ने इस पौधे का उपयोग दमा, बवासीर और टाइफाइड जैसी बीमारियों के इलाज के लिए...

माता-पिता को खोने का असमय डर और आज की पीढ़ी !

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   माता-पिता: हमारे जीवित अभिलेखागार!  माता-पिता की मृत्यु जीवन की सबसे अटल सच्चाइयों में से एक है। इसके बावजूद, आज के मिलेनियल्स और जेन-जी के लिए यह केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक स्थायी और डरावनी चिंता बन चुकी है। दूर देशों में बैठकर अपने माता-पिता के स्वास्थ्य डेटा (स्मार्टवॉच और सेंसर) पर लगातार नजर रखना, दवाइयों का स्टॉक बनाए रखना, करियर के बड़े फैसलों को टालना या उन्हें पीछे छोड़ देना—आज की पीढ़ी इस कड़वे सच को टालने के लिए सब कुछ कर रही है। हालांकि, इस पूरी जद्दोजहद के पीछे एक सबसे बड़ा खौफ यह है कि जिस दिन माता-पिता नहीं रहेंगे, उस दिन वे किसी के "बच्चे" नहीं रहेंगे और जीवन की अग्रिम पंक्ति पर आकर खड़े हो जाएंगे। एक समय था जब माता-पिता की मृत्यु का विचार वयस्कता के उत्तरार्ध में आता था, जब बच्चे खुद जीवन के परिपक्व चरण में होते थे। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। 20 से 40 वर्ष की आयु के बीच के युवा अत्यधिक एंग्जायटी और इस असमय डर का सामना कर रहे हैं। कुछ लोग अपने माता-पिता की सुरक्षा को लेकर इतने आशंकित हैं कि उन्होंने घरों में कैमरे और स्मार्ट डिवाइसेस लगवा ल...

अपलिट (UpLit): जब किताबें बनती हैं जीवन का मरहम!

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  आज की भागदौड़ भरी, तनावपूर्ण और शोर-शराबे से भरी ज़िंदगी में लोग सुकून और मानसिक शांति की तलाश में किताबों की ओर रुख कर रहे हैं। इसी रुझान ने साहित्य की दुनिया में एक नए और तेज़ी से उभरते जॉनर (Genre) को जन्म दिया है, जिसे 'UpLit' (Uplifting Literature), कम्फर्ट फिक्शन या हीलिंग फिक्शन कहा जा रहा है। ये ऐसी किताबें हैं जो पाठक को किसी सनसनीखेज सस्पेंस या भारी-भरकम ड्रामा में उलझाने के बजाय, उन्हें मानसिक संबल, आशा और आत्म-सहानुभूति का अहसास कराती हैं। क्या है 'हीलिंग फिक्शन' या अपलिट? अपलिट ऐसी कहानियाँ हैं जो सीधे तौर पर आत्म-सुधार (Self-help) की किताबें नहीं हैं, लेकिन पाठक के दिल को छूकर एक उपचारात्मक (healing) अनुभव देती हैं। जापानी साहित्य में इसे 'इयाशि केई' (Iyashikei) यानी 'भावनात्मक रूप से स्वस्थ करने वाली कहानियाँ' कहा जाता है। इन कहानियों में आमतौर पर: साधारण जीवन के किस्से: रोज़मर्रा की छोटी-छोटी घटनाएँ, खाना बनाना, कॉफी की महक और पुरानी किताबों की दुकानों का वर्णन। सहानुभूति और जुड़ाव: दयालुता, दूसरे मौकों (second chances), नए रिश्तों और प...

मैं दिल्ली का जंतर-मंतर हूँ! - प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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  समय के शिलालेख पर लिखी जनक्रांति और सत्ता के परिवर्तन की अमर गाथा!  1. स्थापत्य से क्रांति तक का सफर मैं केवल पत्थर, चूने और ईंटों से खड़ा कोई लाल-गुलाबी ढाँचा मात्र नहीं हूँ; मैं काल के गाल पर उकेरा गया इतिहास का एक जीवंत हस्ताक्षर हूँ। १८वीं सदी की शुरुआत में (सन १७२४), महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने मुझे नक्षत्रों की गति नापने, समय की चाल को समझने और खगोलशास्त्र के रहस्यों को सुलझाने के लिए गढ़ा था। मेरे सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र और राम यंत्र सदियों से तारों और ग्रहों से बातें करते आ रहे हैं। पर समय का चक्र बदला, और खगोलशास्त्र की गणना करने वाली मेरी दीवारें देश की राजनीति और जन-आंदोलनों की दिशा तय करने लगीं। तारों की चाल से शुरू हुआ मेरा सफर, सत्ता की चाल बदलने का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। "मैं वो वेधशाला हूँ जो सिर्फ़ आसमान के तारे नहीं गिनती, बल्कि धरातल पर तख्तो-ताज की किस्मत भी नापती है।" 2. सत्ता के गुरूर को तोड़ती मेरी ज़मीन मेरे आगोश में आज़ादी के बाद के भारत का संपूर्ण इतिहास और धड़कता हुआ वर्तमान समाहित है। जब-जब सत्ता के गलियारों में निरंकुशता ने जन्म लिया, ...