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तार्किकता और वैज्ञानिक चेतना: विकसित राष्ट्र की अनिवार्य शर्त।

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  देश के विकास का पैमाना केवल ऊंचे भवनों या आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नैतिक मूल्यों पर भी निर्भर करता है। आज समाज और राष्ट्र के समक्ष यह एक गंभीर प्रश्न है कि क्या संकीर्णता और धर्मांधता के सहारे किसी देश को प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ाया जा सकता है? शिक्षा का वास्तविक स्वरूप और वर्तमान विसंगतियाँ शिक्षा केवल साक्षर होने या उपाधि प्राप्त करने का नाम नहीं है। एक ऐसी शिक्षा प्रणाली, जिसमें वैज्ञानिक सोच (Scientific Temper), तर्कशक्ति, नैतिकता, मानवीय संस्कृति और अच्छे संस्कार न हों, वह समाज को दिशा देने में असमर्थ है। रूढ़िवादिता और अंधविश्वास: आज खुद को शिक्षित कहने वाला वर्ग भी कई बार तार्किकता से दूर होकर रूढ़िवादिता और अंधी निष्ठा में लिفت दिखाई देता है। नैतिक पतन: जब शिक्षा से मूल्य और विवेक गायब हो जाते हैं, तब समाज केवल उपभोक्तावादी संस्कृति का केंद्र बनकर रह जाता है। जनसंचार और कला जगत की भूमिका पत्रकारिता, सिनेमा, डिजिटल मीडिया (यूट्यूब), साहित्य और कथाकार समाज के दर्पण माने जाते हैं। मुनाफाखोरी बनाम सामाजिक उत्तरदायित्व: आज...

​चिकित्सा जगत में मान बढ़ाया: डॉ. सुधीर कुमार को प्रतिष्ठित "Young Achiever Leader Award" से किया गया सम्मानित।

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​नई दिल्ली ।  ​मनुक्षी एडवांस फिजियोथेरेपिस्ट एवं रिहैबिलिटेशन सेंटर के डायरेक्टर, प्रख्यात फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. सुधीर कुमार (PT) को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं, असाधारण नेतृत्व क्षमता और चिकित्सा के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान के लिए प्रतिष्ठित "Young Achiever Leader Award" (IAP Excellence Awards 2026) से सम्मानित किया गया है। यह गौरवशाली सम्मान इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजियोथेरेपिस्ट्स (IAP) द्वारा प्रदान किया गया है। ​यह गरिमामयी सम्मान नई दिल्ली के अत्याधुनिक यशोभूमि कन्वेंशन सेंटर में आयोजित प्रतिष्ठित "World Physiotherapy Asia Western Pacific Regional Conference" (26-27 सितंबर 2026) के मंच पर प्रदान किया गया। ​यह उपलब्धि न केवल डॉ. सुधीर कुमार के लिए एक व्यक्तिगत मील का पत्थर है, बल्कि यह उनकी अनवरत साधना, व्यावसायिक उत्कृष्टता और उस अटूट कर्मनिष्ठा का जीवंत प्रमाण है, जो उन्होंने रोगियों के जीवन में आरोग्यता और सकारात्मकता का प्रकाश फैलाने के लिए समर्पित की है। ​डॉ. सुधीर कुमार की यह प्रेरणादायक यात्रा चिकित्सा जगत के अन्य पेशेवरों और युवाओं के लिए एक मिसाल है, जो यह सिद्...

दिखावे का फेर नहीं, विश्वसनीयता की जरूरत: भारतीय निर्वाचन आयोग की साख और सुधार।

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  The indian express की पत्रकार रितिका चोपरा को सैल्यूट!  भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की साख और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर हालिया संपादकीय और रिपोर्टों में गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई हैं। केवल निर्वाचन आयोग के अधिकारियों में फेरबदल करने से स्थिति में सुधार नहीं होगा, बल्कि आयोग को अपनी कार्यशैली में पारदर्शिता लाकर अपनी विश्वसनीयता साबित करनी होगी।    ट्रस्ट बनाम वर्थिनैस (विश्वास बनाम पात्रता): चुनाव आयोग लंबे समय तक केवल 'विश्वास' के सहारे चला है, न कि अपनी 'विश्वसनीयता' के प्रदर्शन पर। पिप्पा नॉरिस के अनुसार, विश्वास नागरिकों का एक आत्मपरक आकलन है, जबकि विश्वसनीयता संस्थान का वास्तविक प्रदर्शन और निष्पक्षता है।    चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी: मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन पैनल से हटाकर प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल करने से आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं। एक ऐसी चयन प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए जिसमें विपक्षी दल भी विश्वास जता सकें।    निर्णयों का आधार सार्वजनिक हो: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसे महत्वपूर्ण मामलो...

‘पीरो के गांधी’ स्व. रामएकबाल सिंह वरसी की दसवीं पुण्यतिथि पर विशेष स्मृति समारोह आयोजित।

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    स्वतंत्रता सेनानी, पीरो के पूर्व विधायक और 1974 के छात्र आंदोलन के पुरोधा स्व. रामएकबाल सिंह वरसी की दसवीं पुण्यतिथि के अवसर पर पटना में एक भव्य ‘वरसी जी स्मृति समारोह’ का आयोजन किया जा रहा है।  आयोजन से जुड़ी मुख्य बातें तारीख व दिन: 4 अक्टूबर, रविवार (पुण्यतिथि से एक सप्ताह पूर्व) स्थान: गांधी संग्रहालय, पटना मुख्य आकर्षण: 'गांधी संग्रहालय' में 'पीरो के गांधी' (डॉ. राममनोहर लोहिया द्वारा दी गई उपाधि) के नाम और विचारों का अनूठा संगम।  आयोजनकर्ता एवं सहयोग मुख्य आयोजक: सोनांचल विकास परिषद सहयोगी संस्थाएं: मासिक पत्रिका 'वीरेंद्र यादव न्यूज' एवं 'वीरेंद्र यादव फाउंडेशन' विशेष जानकारी: सोनांचल विकास परिषद सोन नदी से सिंचित क्षेत्रों में सामाजिक कार्यों के लिए नवगठित संगठन है, जिसका यह पहला बड़ा कार्यक्रम है। आमंत्रण एवं महत्ता समाजवादी विचारधारा और जनहित से जुड़े सभी प्रबुद्ध नागरिकों व शुभचिंतकों को इस समारोह में सादर आमंत्रित किया जाता है। वरसी जी के कद और उनके व्यक्तित्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके अंतिम संस्कार में तत्कालीन मुख्यम...

कर्ज लेकर घी पीने की सियासत और बिहार का खाली खजाना: 2025 के बाद की आर्थिक हकीकत। _प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र विभाग।

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   जब तक जिएं, सुख से जिएं, कर्ज लेकर भी घी पिएं।  बिहार की राजनीति में जुमलों और लोकलुभावन वादों का इतिहास पुराना है, लेकिन जब बात राज्य की तिजोरी और वित्तीय अनुशासन की आती है, तो तस्वीर बेहद चिंताजनक नजर आती है। साल 2025 के विधानसभा चुनाव में सत्ता की चाबी एक बार फिर एनडीए (NDA) के हाथों में आ गई। जनता ने सरकार पर भरोसा जताया, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वापसी आर्थिक मोर्चे पर स्थिरता की गारंटी दे पाई है? हालिया आंकड़े और CRISIL जैसी एजेंसियों की रिपोर्ट्स इस बात की गवाही देती हैं कि राजनीतिक जीत के बावजूद वर्तमान सरकार खजाने के मामले में फिसड्डी साबित हो रही है। 'ऋण लेकर घी पीने' वाली प्रवृत्ति और बढ़ता राजकोषीय घाटा भारतीय संस्कृति में कहावत है— "यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्" ।बिहार के मौजूदा वित्तीय प्रबंधन पर यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। चुनाव जीतने और मतदाताओं को लुभाने के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर अंधाधुंध खर्च किया गया, जिसके लिए भारी-भरकम कर्ज का सहारा लेना पड़ा। परिणामस्वरूप, वित्तीय वर्ष 2025-26 में बिहार का राजकोषीय घाटा बढ़क...

न्याय और प्रचार के बीच की रेखा: भारतीय पुलिसिंग और मीडिया ब्रीफिंग की चुनौतियाँ।

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     भारत में किसी भी आरोपी को गिरफ्तार करने के बाद हथकड़ी लगाना, पुलिस द्वारा घेरा जाना और कभी-कभी अपराध का तख्तियां लिए घुमाने का चलन सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो जाता है, जो अक्सर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले ही होता है. सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका (PIL) ने इस बात पर सवाल उठाया है कि भारतीय पुलिसिंग में इसके लिए कोई स्पष्ट कानूनी आधार या राष्ट्रव्यापी मीडिया प्रोटोकॉल नहीं है.    आरोपी व्यक्तियों की तस्वीरें प्रकाशित करने की अनुमति देने या रोकने वाला कोई एक विशेष कानून नहीं है, बल्कि यह औपनिवेशिक युग के नियमों और आपराधिक प्रक्रिया के सामान्य ढांचे पर आधारित है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 84 (पूर्व में CrPC की धारा 82) भगोड़ों के लिए अदालत द्वारा उद्घोषणा की अनुमति देती है, लेकिन तस्वीरों के प्रकाशन के बारे में इसमें कुछ नहीं कहा गया है.    अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार और 'दोषी साबित होने तक निर्दोष' (Presumption of innocence) का सिद्धांत सर्वोपरि है. अदालतों ने यह माना है कि आरोप तय होने स...

भारतीय राजनीतिक वित्त पोषण का अंधेरा और सुधार की आवश्यकता।

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  भारतीय राजनीतिक वित्त पोषण की व्यवस्था में एक बड़ा विरोधाभास यह है कि चुनावी लोकतंत्र के मुख्य स्तंभ होने के बावजूद राजनीतिक दल संविधान में विशेष उल्लेख नहीं पाते हैं, सिवाय दसवीं अनुसूची के। इन्हें अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकारों के विस्तार के रूप में 'एसोसिएशन' (संघ) के रूप में देखा जाता है। राजनीतिक दलों के लिए न तो कोई कानूनी ढांचा तय किया गया है और न ही उन्हें कंपनी, ट्रस्ट, फर्म या गैर-लाभकारी संगठन के रूप में ढालने का कोई प्रयास किया गया है। इसके बावजूद, वे बेमिसाल और अभूतपूर्व तरीके से आयकर छूट का लाभ उठाते आ रहे हैं।    एसोशिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट के अनुसार, FY2022-23 में RUPPs की घोषित आय में 223% की वृद्धि हुई। 2,764 RUPPs में से केवल 739 ने चुनाव आयोग (ECI) को अपने वित्तीय रिकॉर्ड जमा किए थे।    वेंकटेश नायक के एक शोध पत्र के अनुसार, 2024 के आम चुनाव के लिए 22 राजनीतिक दलों के पास कुल ₹18,742.31 करोड़ थे, जिसमें चुनाव की घोषणा के समय उनकी झोली में मौजूद धन और उसके बाद जुटाए गए चंदे शामिल हैं।    पिछले एक दशक में,...