Posts

बाढ़ प्रबंधन: अस्थायी राहत से स्थायी समाधान की आवश्यकता।

Image
       हर साल असम, हिमाचल प्रदेश,  यूपी, बिहार, केरल और ओडिशा जैसे राज्यों में मानसून के समय बाढ़ आने पर केवल राहत शिविर लगाना और मुआवजा बांटना एक तात्कालिक उपाय है। आपदा प्रबंधन का मुख्य ध्यान अस्थायी सहायता से हटकर दूरगामी अवसंरचना और बाढ़-रोधी नियोजन पर होना चाहिए।  बाढ़ से प्रभावित परिवारों को केवल तत्कालीन सहायता देने के बजाय उन्हें ऐसे सुरक्षित स्थानों पर बसाया जाना चाहिए जहाँ बार-बार बाढ़ का खतरा न हो। साथ ही, उनकी आजीविका के साधनों को पुनः स्थापित करके उन्हें आत्मनिर्भर बनाना आवश्यक है, ताकि वे हर साल शून्य से शुरुआत करने को मजबूर न हों।   पुनर्वास नीतियों का केवल कागजों पर बनना काफी नहीं है। इनका पारदर्शी तरीके से धरातल पर लागू होना और कड़ाई से अमल होना बेहद जरूरी है, ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी भ्रष्टाचार के सीधे वास्तविक पीड़ितों तक पहुँच सके। पिछले वर्षों में बाढ़ पीड़ितों को महीनों तक भटकना पड़ा है और इस साल भी हजारों परिवार बेघर होकर पुनर्वास की विकट समस्या से जूझ रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि प्रशासनिक नीतियां और धरातलीय...

युवा शक्ति: चुनावी राजनीति में आकार लेता एक नया वोट बैंक।

Image
  भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है, जहाँ की लगभग 65% जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। इसके बावजूद, देश के 75 वर्षों के चुनावी इतिहास में युवाओं ने कभी एक ठोस या एकमुश्त 'वोट बैंक' (Electoral Bloc) के रूप में मतदान नहीं किया है। हालांकि, हालिया सामाजिक-आर्थिक घटनाक्रमों और बढ़ते जन-आक्रोश ने राजनीतिक दलों को युवाओं पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मजबूर कर दिया है। राजनीतिक जुड़ाव: सभी राजनीतिक दल जनरेशन-जेड (Gen Z - 14 से 29 वर्ष) को लुभाने के लिए अपनी संचार शैलियों, डिजिटल अभियानों और भाषा में बदलाव कर रहे हैं। पारंपरिक बनाम आधुनिक मुद्दे: जाति, धर्म, वर्ग और लिंग आधारित पारंपरिक वोट बैंक आज भी हावी हैं। लेकिन शिक्षा, कौशल विकास और बेरोजगारी (NEET श्रेणी में 8.7 करोड़ युवा) जैसे मुद्दे अब प्राथमिक बन रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और प्रस्तावित राष्ट्रीय युवा नीति 2026 जैसी पहलें युवा सशक्तीकरण के उद्देश्य से लाई गई हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार के अवसरों के बीच का अंतर अभी भी एक बड़ी चुनौती है। हाल के विधानसभा चुनावों (जैसे तमिलनाडु, पश्चिम...

युवा आंदोलनों को राहत और न्याय के दोहरे मानदंड ।

Image
    भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए परीक्षा सुधार और सरकारी जवाबदेही की मांग कर रहे युवाओं पर दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द करना एक सराहनीय कदम है। केंद्र सरकार के अनुरोध पर लिया गया यह निर्णय उन युवाओं को राहत देता है जिन्होंने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के बैनर तले देशभर में विरोध प्रदर्शन किया था। आंदोलन की पृष्ठभूमि और प्रभाव यह आंदोलन पूर्व मुख्य न्यायाधीश के "बेरोजगारी" और "कॉकरोच" संबंधी बयानों के विरोध में शुरू हुआ था। देखते ही देखते यह इतना व्यापक हो गया कि तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। युवाओं की मुख्य मांगों में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज प्राथमिकी (FIR) वापस लेना शामिल था, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार करते हुए केंद्र को भविष्य में नई FIR दर्ज न करने का निर्देश दिया। केंद्र सरकार की यह पहल यह दर्शाती है कि युवाओं के मुद्दे—विशेष रूप से पेपर लीक की बार-बार होने वाली घटनाएं और बेरोजगारी की समस्या—कितने गंभीर थे। असंतोष के प्रति दोहरा रवैया यद्यपि युवाओं के मामले में ...

श्रीमद्भगवद्गीता: कर्म, धर्म और जीवन दर्शन का अमृत !

Image
     दुनिया के 80 से अधिक देशों में गीता को पढ़ा, पढ़ाया और इस पर शोध किया जाता है।  श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर विश्व के सबसे महान ज्ञानकोश 'श्रीमद्भगवद्गीता' के दर्शन को समझना मानव जीवन को सही दिशा देने जैसा है। कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया यह उपदेश किसी एक धर्म या जाति के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के कल्याण के लिए है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर गीता की प्रमुख उक्तियों का अर्थ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फलों पर कभी नहीं। इसलिए कर्म के फल की इच्छा मत करो और न ही कर्म न करने (अकर्म) में तुम्हारी आसक्ति होनी चाहिए।   महत्व: यह सूक्त व्यक्ति को निष्काम कर्म सिखाता है। परिणाम की चिंता छोड़कर केवल अपनी पूरी निष्ठा के साथ कर्तव्य निभाने की प्रेरणा देता है। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ अर्थ: हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती ...

संघर्ष से सफलता तक: उमेश मांझी की प्रेरक जीवन गाथा! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

Image
  कहते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों और इरादे मजबूत, तो ज़िंदगी का बड़े से बड़ा तूफान भी आपका रास्ता नहीं रोक सकता। दानपुर प्रखंड के शिवाला मुसहरी के रहने वाले उमेश मांझी जी की कहानी इसी अटूट जीवटता और संघर्ष का एक अद्भुत उदाहरण है। शिक्षित और जागरूक उमेश मांझी जी ने अपने करियर की शुरुआत पत्रकारिता से की थी। इसके बाद उन्होंने 'बिहार महादलित विकास मिशन' में लंबे समय तक समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों के उत्थान के लिए काम किया। जीवन सही ढर्रे पर चल रहा था, लेकिन तभी एक भयंकर सड़क दुर्घटना ने उनकी ज़िंदगी को अचानक थाम सा दिया। इस हादसे के कारण उन्हें कई वर्षों तक बिस्तर पर रहना पड़ा। शारीरिक तकलीफ बेहद गंभीर थी, लेकिन उमेश जी ने कभी अपने हौसले को टूटने नहीं दिया। बेड पर रहते हुए भी उन्होंने समाज से अपना जुड़ाव बनाए रखा। जब सांसद डॉ. मीसा भारती जी के साथ उनसे मुलाकात हुई, तब भी उनके भीतर समाज सेवा की वही तड़प और ललक देखने को मिली। उमेश जी का पारिवारिक पृष्ठभूमि भी प्रेरणादायक रही है। दानापुर रेलवे मंडल के पास स्थित गाँव के होने के कारण उनके पिता रेलकर्मी थे, जिससे परिवार को आर्थिक ...

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार और खाकी की मनमानी!

Image
  राजधानी दिल्ली के साकेत थाने से सामने आई यह घटना न सिर्फ लोकतंत्र के मूल्यों को शर्मसार करती है, बल्कि प्रेस की आजादी और महिला सुरक्षा के दावों की धज्जियां भी उड़ाती है। यदि पत्रकार सवाल पूछने जैसे अपने मूल संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करने पर हिरासत और बर्बरता का शिकार बनते हैं, तो यह सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का हनन: एक पत्रकार का काम सत्ता से तीखे और जरूरी सवाल पूछना है। यदि सवाल पूछने के बदले पुलिस हिरासत और शारीरिक प्रताड़ना मिले, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर गहरा आघात है।   महिला सुरक्षा के दावों पर सवाल: देश की राजधानी में, जहां महिला सुरक्षा को लेकर लगातार बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं महिला पत्रकारों के साथ थाने के भीतर कथित तौर पर अभद्रता और मारपीट होना पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जवाबदेही और निष्पक्ष जांच की सख्त जरूरत: हालांकि पुलिस प्रशासन इन आरोपों को खारिज कर रहा है, लेकिन इस तरह की घटनाओं से जनता का न्याय व्यवस्था पर से विश्वास डगमगाता है। इस मामले की बिना किसी दबाव के निष्पक...

सत्ता के गलियारे, विज्ञापनों का सच और 'शेष कुशल है' की कड़वी हकीकत!

Image
  मंत्री हैं अब राजा-रानी, असली राजा भरता पानी। संसद के भीतर जंगल है, शेष कुशल है। परिवर्तन नारों में है, उपलब्धि अखबारों में है। नालों में ही गंगाजल है, शेष कुशल है। न्याय बिके अब बाजारों में, सच्चाई दुबकी कारों में। हर तरफ केवल हड़कंप है, शेष कुशल है। -प्रसिद्ध व्यंग्यकार और कवि अशोक चक्रधर ।    यह पंक्तियाँ भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान तस्वीर पर एक धारदार व्यंग्य हैं। यह कविता उस बड़े अंतर को रेखांकित करती है जो सरकार के दावों (विज्ञापनों) और धरातल की कड़वी सच्चाई के बीच मौजूद है। संविधान के अनुसार जनता ही लोकतंत्र में 'राजा' है, लेकिन आज आम नागरिक बुनियादी सुविधाओं—पानी, स्वास्थ्य, रोजगार—के लिए तरस रहा है। वहीं, जनप्रतिनिधि या 'मंत्री' सामंती राजा-रानी की तरह विशेषाधिकारों का आनंद ले रहे हैं। संसद, जो जन-समस्याओं के समाधान का मंदिर थी, आज शोर-शराबे, हंगामे और गिरते राजनीतिक विमर्श का अखाड़ा बन चुकी है।  राजनीति केवल लुभावने नारों और अखबारों के बड़े-बड़े विज्ञापनों तक सीमित हो गई है। कागजों और मीडिया कवरेज में तो नदियाँ साफ हो रही हैं और विकास की नदियाँ बह रही हैं,...