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भारतीय शेयर बाजार में IPO नियमों में सुधार और कम 'पब्लिक फ्लोट' (Public Float) के खतरों पर चिंता।

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    ​"बाजार नियामक SEBI को IPO नियमों में तुरंत सुधार करना चाहिए ताकि कृत्रिम मूल्यांकन और पूंजी के पलायन को रोका जा सके" आर्थिक विशेषज्ञों की चिंताओं के मद्देनजर, भारतीय शेयर बाजार (Stock Market) में मौजूदा IPO (प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम) नियमों की समीक्षा करने की तत्काल आवश्यकता है। वर्तमान नियम न केवल घरेलू निवेशकों के हितों को प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपये की स्थिरता के लिए भी चुनौती बन रहे हैं। ​मुख्य चिंताएं और विश्लेषण: ​कृत्रिम रूप से बढ़ा हुआ मूल्यांकन  वर्तमान नियमों के तहत कई बड़ी कंपनियों को बहुत कम पब्लिक फ्लोट (केवल 1% से 5% तक सार्वजनिक हिस्सेदारी) के साथ बाजार में सूचीबद्ध होने की अनुमति दी गई है। अर्थशास्त्र के बुनियादी 'मांग और आपूर्ति' के नियम के अनुसार, जब बाजार में शेयरों की आपूर्ति बेहद सीमित होती है, तो उनकी कीमतें कृत्रिम रूप से आसमान छूने लगती हैं। यह एक तरह से "मूल्यांकन में हेरफेर करने का कानूनी लाइसेंस" बन जाता है। ​विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) का भारत रुख और उच्च P/E अनुपात: एक समय था जब कोका-कोल...

एटीएम में 'नो कैश' का संकट और जमीनी हकीकत !

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     यह समस्या नकदी की कमी की नहीं, बल्कि वितरण नेटवर्क के टूटने और यूपीआई (UPI) के तेजी से बढ़ते चलन के कारण पैदा हुई है।  डिजिटल इंडिया और यूपीआई क्रांति निसंदेह सराहनीय है, लेकिन आज भी देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा—विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र, बुजुर्ग और छोटे व्यापारी—पूरी तरह नकद लेनदेन पर निर्भर हैं। जब स्वतंत्र एटीएम ऑपरेटरों को समय पर नकदी नहीं मिलती, तो इसका सीधा असर आम नागरिक के दैनिक जीवन पर पड़ता है। पुराने नियमों और कम इंटरचेंज फीस के कारण एटीएम ऑपरेटरों के लिए मशीनें चलाना घाटे का सौदा बन गया है। ईंधन और सुरक्षा की बढ़ती लागत ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।  रिज़र्व बैंक (RBI) और सरकार को तुरंत 'हाइब्रिड एटीएम' और छोटे नोट (जैसे ₹100, ₹200) देने वाली मशीनों की संख्या बढ़ानी चाहिए। साथ ही, एटीएम ऑपरेटरों के लिए मुआवजे के मॉडल में सुधार करना बेहद जरूरी है। ​डिजिटल भुगतान और भौतिक नकद एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, बल्कि पूरक होने चाहिए। यदि एटीएम नेटवर्क इसी तरह चरमराता रहा, तो वित्तीय समावेशन का हमारा लक्ष्य प्रभावित हो सकता है। 

दृष्टिकोण का महत्व: बाहरी साधन बनाम आंतरिक संतोष !

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     हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ सफलता का पैमाना केवल बाहरी भौतिक उपलब्धियों से मापा जाता है। बेहतर नौकरी, अधिक वेतन और आलीशान सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ में हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि असली शांति हमारे भीतर है। ​इस विचार के संदर्भ में मैं कुछ मुख्य बातें साझा करना चाहता हूँ: ​आंतरिक बनाम बाहरी बदलाव: भौतिक साधन हमारी सुख-सुविधाएं तो बढ़ा सकते हैं, लेकिन वे हमारे मानसिक तनाव या असंतोष को दूर नहीं कर सकते। जब तक हम अपने सोचने का तरीका (नजरिया) नहीं बदलते, तब तक कोई भी बड़ी उपलब्धि हमें स्थायी खुशी नहीं दे सकती। ​दृष्टिकोण की ताकत: एक सकारात्मक और संतुलित दृष्टिकोण इंसान को विपरीत या सीमित परिस्थितियों में भी बिखरने नहीं देता। इतिहास गवाह है कि महान विचार और महान कार्य अक्सर बेहद सीमित संसाधनों में ही जन्म लेते हैं, क्योंकि वहाँ 'संतोष' और 'सकारात्मकता' की मजबूत नींव होती है। ​आज की आवश्यकता: आज के युवाओं को इस बात को गहराई से समझने की जरूरत है। जीवन में आगे बढ़ने के प्रयास जरूर करें, लेकिन अपनी आंतरिक शांति की कीमत पर नहीं। जीवन की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर नहीं करती क...

निकोबार में चुनाव बनाम परंपरा: स्वशासन की आत्मा को बचाने की चुनौती!

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   ​अंडमान और निकोबार प्रशासन द्वारा जनजातीय परिषदों  के लिए प्रस्तावित नए चुनावी नियम (२०२६) ने द्वीप समूह के मूल निवासी निकोबारी समुदाय के भीतर एक गंभीर वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है। प्रशासन का तर्क है कि देश के बाकी हिस्सों की तरह यहां भी ५-वर्षीय औपचारिक चुनावी प्रक्रिया, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किया जाना चाहिए। पहली नजर में यह आधुनिक लोकतंत्र का एक स्वागत योग्य कदम लग सकता है, परंतु इसके पीछे छिपी जमीनी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ​निकोबारी समुदाय सदियों से अपनी पारंपरिक सर्वसम्मति-आधारित स्वशासन प्रणाली के तहत संचालित होता आ रहा है, जहाँ गांवों के कप्तानों का चयन किसी जटिल नौकरशाही तंत्र के बजाय आपसी सहमति और सामुदायिक बैठकों से होता है। जनजातीय नेताओं का यह डर पूरी तरह स्वाभाविक है कि इस नई व्यवस्था से उनका पारंपरिक ताना-बाना और निर्णय लेने की स्वायत्तता छिन्न-भिन्न हो जाएगी। शासन का यह 'आधुनिकीकरण' वास्तविक सशक्तीकरण करने के बजाय व्यवस्था का 'नौकरशाहीकरण' अधिक कर सकता है। ​इसके अलावा, इस जल्दबाजी के पीछे एक बड़ा क...

जन - जन के नायक का जन्मोत्सव: राबड़ी आवास पर श्रद्धा और सुरों का महासंगम! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    10, सर्कुलर रोड' , पटना।  ​बिहार की राजनीतिक आबोहवा में जब भी कोई उत्सव आकार लेता है, तो वह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि जन-भावनाओं का ज्वार बन जाता है। राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के जन्मोत्सव पर पटना का '10, सर्कुलर रोड' (राबड़ी आवास) एक ऐसे ही भावुक और जीवंत दृश्य का साक्षी बना, जहाँ सुरक्षा की कड़ाई और श्रद्धा की तरलता एक साथ एकाकार हो रही थी। ​सुरों की सरिता और स्नेह की सौगात ​जन्मोत्सव की बेला में संगीत की ऐसी त्रिवेणी बही कि वहाँ मौजूद हर आँख सजल और हर हृदय मुदित हो उठा। विख्यात लोकगायक छोटू छलिया के कंठ से जब सुरीले और माटी की गंध से सराबोर गीत फूटे, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो सुरों की कोई मंदाकिनी बह निकली हो। उनके सुरों ने उपस्थित जनसमुदाय को आत्मविभोर कर सम्मोहन के पाश में बांध दिया। इसी मांगलिक घड़ी में, सहधर्मिणी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने लालू जी को एक अनमोल उपहार भेंट किया—यह उपहार केवल भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि दशकों के सहचर्य, अटूट विश्वास और अगाध प्रेम का प्रतीक था। ​'कर्तव्य-पथ' पर डटे प्रहरी: निष्ठा का रोस्टर ​राजनीति में ने...

​गुदरी का लाल, सामाजिक न्याय की मशाल: लालू प्रसाद यादव ! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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     ​"घोर अंधेरी रात, असमानता का आघात, तेज आंधियों में जला एक चिराग..." ​भारतीय राजनीति के क्षितिज पर कुछ नाम ऐसे होते हैं जो महज़ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि अपने आप में एक संपूर्ण आंदोलन बन जाते हैं। लालू प्रसाद यादव एक ऐसा ही नाम हैं। वे सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि देश के करोड़ों वंचितों, शोषितों और 'बैक-बेंचर्ज़' की उस चेतना का नाम हैं, जिसने कभी सत्ता के सामने झुकना नहीं सीखा और न ही अपने सिद्धांतों से समझौता किया। ​11 जून 1948 को गोपालगंज के फुलवरिया गाँव में माता मरछिया देवी और पिता कुंदन राय के आँगन में जनमे लालू जी की कोई बड़ी पारिवारिक या आर्थिक पृष्ठभूमि नहीं थी। वे सचमुच 'गुदरी के लाल' हैं, जिन्होंने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर पटना यूनिवर्सिटी के छात्र संघ (1973-74) से लेकर देश की संसद और केंद्रीय रेल मंत्रालय तक का सफर तय किया। मात्र 29 वर्ष की उम्र में छपरा से देश के सबसे युवा सांसद बनने वाले लालू जी ने भारतीय राजनीति की दिशा और दशा को हमेशा के लिए बदल दिया। ​1. संसद से सड़क तक: वंचितों की बेबाक आवाज़ ​लालू यादव के व्यक्तित्व की थाह पाने के लिए ...

​नया नेतृत्व, पुरानी उलझनें: क्या भारत और नेपाल बदल पाएंगे अपनी कड़वाहट का इतिहास?

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   ​पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते कांच के बर्तन जैसे होते हैं—ज़रा सी असावधानी और दरार तय है। हाल ही में नेपाल की सत्ता में आए नए और युवा नेतृत्व (RSP और प्रधानमंत्री बालेन शाह) के बाद दिल्ली और काठमांडू के बीच कूटनीतिक हलचलें तेज़ हो गई हैं। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल और पार्टी अध्यक्ष रबी लामिछाने का दिल्ली दौरा इसी सिलसिले की एक कड़ी है। ​लेकिन सवाल यह है कि क्या यह 'नया और अनुभवहीन' नेतृत्व दशकों पुराने सीमा विवादों और कूटनीतिक संवेदनशीलता को संभालने के लिए तैयार है? ​विवाद की ताज़ा वजह ​नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अपनी संसद में एक ऐसा बयान दिया जिसने दिल्ली के नीति-निर्माताओं को चौंका दिया। उन्होंने भारत पर नेपाल की ज़मीन कब्ज़ा करने का आरोप तो लगाया ही, साथ ही यह भी कह दिया कि नेपाल इस मुद्दे पर चीन और ब्रिटेन के संपर्क में है। रही-सही कसर तब पूरी हो गई जब उन्होंने भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री से मिलने से मना कर दिया। ​कूटनीति में ऐसे कदम 'आग में घी' का काम करते हैं। हालांकि, बाद में आए नेपाली नेताओं ने "पुरानी कड़वाहट" को पीछे छोड़कर आग...