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आधुनिक समाज में बढ़ता भावनात्मक फासला और 'आंसुओं' की सार्थकता !

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  आज के युग में हम शारीरिक रूप से एक-दूसरे के जितने करीब आए हैं, भावनात्मक रूप से उतने ही दूर होते जा रहे हैं। "हम एक-दूसरे के सामने होकर भी एक-दूसरे के सुख-दुख से कितने अपरिचित हैं!"—आज के 'डिजिटल एकांत' (Digital Isolation) की कड़वी सच्चाई को बयां करती है। 1. भौतिक निकटता बनाम भावनात्मक दूरी मनोवैज्ञानिक रूप से, हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ 'भीड़ में अकेलापन' एक सामान्य स्थिति बन गई है। सोशल मीडिया पर सैकड़ों मित्र होने के बावजूद, जब कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन के 'सुख-दुख' से गुजरता है, तो उसके पास वास्तविक संवेदना साझा करने वाले लोगों का अभाव होता है। हम एक ही मेज पर बैठकर फोन में व्यस्त रहते हैं, जिससे हमारे बीच की सहानुभूति (Empathy) का स्तर गिरता जा रहा है। 2. आंसुओं का मनोविज्ञान:  मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, आंसू केवल दुख की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि ये मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक 'कैथार्सिस' (Catharsis) या भावनात्मक शुद्धिकरण का कार्य करते हैं। तनाव से मुक्ति: आंसू बहाने से शरीर में 'कोर्टिसोल' (तनाव हार्मोन) का स्तर कम ह...

भारतीय रेल: सुरक्षा और सेवा के 'ट्रैक' पर गहराता संकट!

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  भारतीय रेलवे को देश की जीवनरेखा कहा जाता है, लेकिन वर्तमान में यह रेखा असुरक्षा और अव्यवस्था के भंवर में फंसी नजर आती है। एक तरफ सरकार रेलवे को 'विश्व स्तरीय' बनाने के दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ यात्रियों की बुनियादी जरूरतों—भोजन और सुरक्षा—के साथ खिलवाड़ एक कड़वा सच बन चुका है। 1. भोजन नहीं, बीमारी का 'जोखिम' हालिया आंकड़ों और यात्रियों के अनुभवों से स्पष्ट है कि ट्रेनों में परोसा जाने वाला भोजन अब केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि एक 'जोखिम' बन गया है। गुणवत्ता का अभाव: प्रीमियम ट्रेनों (राजधानी, शताब्दी) से लेकर सामान्य मेल ट्रेनों तक, भोजन में तिलचट्टे, कीड़े और अखाद्य वस्तुओं का मिलना आम हो गया है। 2024-25 के दौरान खान-पान की गुणवत्ता को लेकर 6,645 आधिकारिक शिकायतें दर्ज होना इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है। आर्थिक शोषण: यात्रियों से तय कीमत से अधिक राशि वसूलना और बदले में कम मात्रा या बासी खाना देना रेलवे के निगरानी तंत्र की विफलता है। जवाबदेही की कमी: शिकायत करने पर कर्मियों द्वारा यात्रियों से दुर्व्यवहार की खबरें सिस्टम की तानाशाही प्रवृत्ति को उजा...

गया की गलियों में गूँजती वो आख़िरी ठुमरी: जद्दनबाई की हवेली का अंत ! उनकी बेटी नरगिस और नाती संजय दत्त ने भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुँचाया।

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  ​इतिहास कभी-कभी ईंट-गारों की दीवारों में नहीं, बल्कि उन हवाओं में बसता है जो किसी दौर की महफिलों की गवाह रही हों। बिहार के गया शहर के पंचायती अखाड़ा रोड पर खड़ी वह हवेली अब मिट्टी में मिल चुकी है, लेकिन उसकी रूह में आज भी ठुमरी के वो सुर और घुँघरुओं की वो खनक दफ़न है, जिसने कभी राजा-रजवाड़ों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। ​ कला की 'मल्लिका' और गया का नाता ​यह हवेली सिर्फ़ एक इमारत नहीं थी, बल्कि भारतीय कला जगत की एक गौरवशाली विरासत थी। यहाँ देश की प्रसिद्ध नर्तकी और गायिका जद्दनबाई का बसेरा था। वही जद्दनबाई, जिनकी विरासत को आगे चलकर उनकी बेटी नरगिस और नाती संजय दत्त ने भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुँचाया। ​कहा जाता है कि करीब 100 साल पहले इस हवेली में जब जद्दनबाई अपनी महफ़िल सजाती थीं, तो वक्त ठहर जाया करता था। ठुमरी के सुरों पर जब वे थिरकती थीं, तो दूर-दूर से रईस और कला-पारखी उनके फन का दीदार करने खिंचे चले आते थे। वह दौर कला की कद्रदानी का स्वर्णिम युग था। ​ विकास की भेंट चढ़ी विरासत ​विडंबना देखिए, जिस विरासत को एक 'म्यूज़ियम' या कला केंद्र होना चाहिए था, वह समय की मार और सरक...

बेटियों के लहू से लाल होता शिक्षा का मंदिर: न्याय की पुकार!

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  17 फरवरी को शाम 5 बजे से नकटी भवानी से एम्स होते फुलवारी कैंडल मार्च: सोई हुई व्यवस्था को जगाने की एक कोशिश! ​पटना के फुलवारी शरीफ से आई खबर ने न केवल एक परिवार को उजाड़ दिया है, बल्कि मानवता को भी शर्मसार कर दिया है। 16 साल की एक मासूम, जो आँखों में भविष्य के सुनहरे सपने लेकर 'फंडामेंटल कोचिंग' की दहलीज पर कदम रखती थी, आज वह दरिंदगी की भेंट चढ़ गई। ​परिजनों का आरोप है कि उसके साथ हैवानियत की गई और फिर साक्ष्य मिटाने के लिए उसे छत से नीचे फेंक दिया गया। क्या अब शिक्षा के केंद्र भी बेटियों के लिए सुरक्षित नहीं रहे? शरीर पर पड़े वे जख्म चीख-चीख कर इंसाफ मांग रहे हैं। ​ सत्ता और सियासत के बीच सिसकता न्याय ​घटना के बाद इलाके में भारी आक्रोश है। सांसद पप्पू यादव, पूर्व विधायक गोपाल रविदास और राजद नेता  हरिनारायण  यादव ने पीड़ित परिवार से मिलकर अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं। प्रबुद्ध जनों का कहना है कि अपराधियों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है, जिसके कारण अपराधी बेखौफ हैं। ​"यह सिर्फ एक छात्रा की मौत नहीं, बल्कि प्रशासन के इकबाल की हत्या है।" ​ 🕯️ कैंडल मार्च: सोई हुई व्...

सरला माहेश्वरी: जहाँ चेहरा नहीं, शब्द और चरित्र बोलते थे!

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  ​आज की कानफोड़ू 'ब्रेकिंग न्यूज़' और चकाचौंध भरे स्टूडियो के शोर में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एक सौम्य चेहरा आंखों के सामने तैर जाता है— सरला माहेश्वरी । दूरदर्शन के उस श्वेत-श्याम और शुरुआती रंगीन दौर की वह एक ऐसी आवाज़ थीं, जिसने पत्रकारिता को 'ग्लैमर' से नहीं, बल्कि 'गरिमा' से परिभाषित किया था। ​सादगी का सौंदर्य और शब्दों का संस्कार ​सरला जी का व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति की उस शालीनता का प्रतिबिंब था, जिसे आज के दौर में ढूँढना कठिन है। सीधा पल्लू, माथे पर एक छोटी सी बिंदी और चेहरे पर वह ठहराव, जो दर्शकों को सहज ही अपना बना लेता था। उनके लिए समाचार पढ़ना केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी थी। जब वे स्क्रीन पर अवतरित होती थीं, तो ऐसा लगता था मानो परिवार का कोई सदस्य घर के बैठक में बैठकर देश-दुनिया का हाल सुना रहा हो। ​संयम की प्रतिमूर्ति ​1982 से समाचार वाचन की कमान संभालने वाली सरला जी ने कभी आवाज़ की तीव्रता से खबरों को बड़ा दिखाने की कोशिश नहीं की। उनकी आवाज़ में वह गंभीरता थी, जो बिना चिल्लाए भी गहरा असर छोड़ती थी। ​"उनकी पत्रकारिता...

वंदे मातरम बिना किसी संसदीय कानून या संवैधानिक संशोधन के थोपा गया।

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1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और 1937 का समझौता ​ 1937 में कांग्रेस कार्य समिति ने यह निर्णय लिया था कि केवल पहले दो अंतरा ही 'राष्ट्रीय गीत' के रूप में गाए जाएंगे। ​यह निर्णय इसलिए लिया गया था क्योंकि बाद के अंतराओं में हिंदू देवियों (दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती) का आह्वान किया गया है, जो एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में अन्य धर्मों के नागरिकों की मान्यताओं से टकरा सकता था। ​रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने भी केवल पहले दो अंतराओं को ही सर्वस्वीकार्य माना था। ​ 2. संवैधानिक और कानूनी तर्क ​अनुच्छेद 51A: संविधान के मौलिक कर्तव्यों में 'राष्ट्र ध्वज' और 'राष्ट्रगान' (जन गण मन) का सम्मान करने की बात है, लेकिन 'राष्ट्रीय गीत' (वंदे मातरम) का उल्लेख जानबूझकर नहीं किया गया है। ​बिजोय इमैनुएल केस (1986): सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण उसे गाता नहीं है, तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता। ​ जब राष्ट्रगान (जिसका उल्लेख संविधान में है) गाने के लिए मजबूर...

संरक्षणवाद से सक्रिय भागीदारी तक का सफर !

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  ​ भारत का व्यापारिक इतिहास स्वाधीनता के बाद "वस्तु विनिमय" (Barter trade) और सोवियत संघ के साथ सीमित व्यापार से शुरू हुआ था। अतीत में भारत अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए संरक्षणवादी नीति अपनाता था, लेकिन वर्तमान सरकार ने इस हिचकिचाहट को छोड़कर अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे बड़े बाजारों के साथ जुड़ने का "साहसिक" निर्णय लिया है। ​वैश्विक व्यापार का बदलता परिदृश्य ​WTO की चुनौतियां: विश्व व्यापार संगठन (WTO) के विवाद निपटान तंत्र के कमजोर होने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में आए तनाव के कारण अब बहुपक्षीय समझौतों के बजाय द्विपक्षीय FTA (मुक्त व्यापार समझौते) अधिक प्रभावी हो गए हैं। ​रणनीतिक स्वायत्तता: भारत अब केवल कागजी सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि लागत-लाभ (Cost-benefit) के व्यावहारिक आकलन पर अपनी विदेश नीति तय कर रहा है। ​भारत-अमेरिका समझौते के मुख्य लाभ ​निर्यात में वृद्धि: भारत ने 2024-25 में अमेरिका को 86.5 बिलियन डॉलर का निर्यात किया। इस समझौते से उन वस्तुओं पर टैरिफ कम होगा जहां भारत की पकड़ मजबूत है (जैसे: जेनेरिक दवाएं, रत्न-आभूषण और विमान के पुर्जे)। ...