नालंदा का चीर-हरण: सुशासन की चिता! ( कविता) -प्रो प्रसिद्ध कुमार.
जहाँ तथागत की करुणा ने, शांति-मंत्र था फूँका, जहाँ मेधा के सूर्य-तेज से, तिमिर सदा ही चूका। आज उसी नालंदा की, माटी लहूलुहान हुई, अजयपुर की उन गलियों में, मानवता बेजान हुई। कहाँ गया वह शील-वंश? वह आर्यवर्त का मान कहाँ? ज्ञान-पुंज की इस धरती पर, बचा अब इंसान कहाँ? एक अबला की आर्तनाद से, अंबर भी थर्राया है, पर सुशासन की निद्रा पर, कोई मोह न छाया है। मूक खड़े थे वीर वहाँ के, कायरता का चोला था, द्रौपदी फिर से चीख रही थी, दुशासन फिर बोला था। अजयपुर की वह विवश लाड़ली, न्याय मांगती हार गई, भीड़ खड़ी थी तमाशबीन बन, मर्यादा को मार गई। धिक है ऐसी सत्ता को, जो केवल कागज़ बुनती है, चीखें गलियों में दबती हैं, वह दिल्ली में सुनती है। जिस शासन में बेटी की, अस्मत सरेआम नीलाम हुई, समझो उस राजा की गद्दी, अधर्म के ही नाम हुई। हे नालंदा! तू फिर से जाग, प्रतिशोध की ज्वाला भर, इन नरपिशाच कुकृत्यों पर, काल बनकर अब प्रहार कर। गर न्याय न मिला उस बेटी को, तो इतिहास गवाही देगा, शून्य सुशासन की राख पर, कलंक ही बस दिखाई देगा। अब और न सहना मौन यहाँ, अब रणचंडी को आना है, अजयपुर के इन पापियों को, रसातल म...