मुद्रा का अवमूल्यन और भारतीय अर्थव्यवस्था: एक विष्लेषणात्मक दृष्टिकोण!
वर्तमान में भारतीय रुपया (INR) अमेरिकी डॉलर (USD) के मुकाबले अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर है। यह स्थिति भारतीय नीति निर्माताओं और केंद्रीय बैंक (RBI) के लिए एक गंभीर चुनौती पेश करती है। इस गिरावट के पीछे केवल बाहरी कारक ही नहीं, बल्कि घरेलू संरचनात्मक विसंगतियां भी जिम्मेदार हैं। 1. बाह्य झटके और व्यापार घाटा (Trade Deficit) भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 80% आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit - CAD) चौड़ा हो जाता है। आयातित मुद्रास्फीति (Imported Inflation): कमजोर रुपया आयात को महंगा बना देता है। चूंकि कच्चा तेल उत्पादन की लागत का एक मुख्य हिस्सा है, इसलिए यह अंततः घरेलू बाजार में ईंधन और माल ढुलाई की दरों को बढ़ाता है, जिससे मुद्रास्फीति की दर (CPI) अनियंत्रित होने लगती है। 2. पूंजी का बहिर्वाह (Capital Outflow) विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारतीय बाजारों से अपना निवेश वापस ले रहे हैं। इसका प्रमुख कारण अमेरिका में ब्याज दरों का ऊंचा होना है। प्रतिफल का अंतर (Yield Differential): जब अमेरिकी बॉन्ड य...