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प्रेमचंद जयंती पर 'सूत्रधार' का विशेष आयोजन: "वर्तमान में क्यों प्रासंगिक हैं कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद?"

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  महान उपन्यासकार एवं कहानीकार मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती के शुभ अवसर पर खगौल स्थित जमालुद्दीन चक के 'सूत्रधार' कार्यालय में एक भव्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया। नाट्य संस्था 'सूत्रधार' द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में क्षेत्र के प्रमुख कलाकारों, साहित्यकारों और रंगकर्मियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम की शुरुआत मुंशी प्रेमचंद के चित्र पर श्रद्धा-सुमन अर्पित कर पुष्पांजलि के साथ हुई। इस संगोष्ठी का मुख्य विषय "वर्तमान समय में प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता" रखा गया था। वक्ताओं के मुख्य विचार: साहित्य, यथार्थ और सामाजिक चेतना संगोष्ठी के दौरान उपस्थित विद्वानों और वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य और उनके सामाजिक दृष्टिकोण पर अपने विचार साझा किए: प्रेमचंद ने समाज को नई दिशा दी (नवाब आलम, महासचिव): नाट्य संस्था 'सूत्रधार' के महासचिव नवाब आलम ने बताया कि संस्था हर साल प्रेमचंद जयंती मनाती है। इस बार का विषय युवाओं को ध्यान में रखकर चुना गया है, ताकि नई पीढ़ी समकालीन संदर्भों में प्रेमचंद के साहित्य और उनके सामाजिक दृष्टिकोण को बेहतर ढंग से समझ सके। मानवता ...

राम लखन सिंह यादव कॉलेज में "प्रेमचंद का साहित्य और आज का वंचित समाज" विषय पर परिचर्चा आयोजित!

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  पटना, 31 जुलाई: राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनीसाबाद, पटना में मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर एक विशेष परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा का मुख्य विषय "प्रेमचंद का साहित्य और आज का वंचित समाज: दलित, शोषित और हाशिए के स्वर" तथा "21वीं सदी का भारत और प्रेमचंद का यथार्थ: क्या बदला और क्या आज भी वही है?" रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद ने की, जबकि परिचर्चा का विषय प्रवेश प्रो. रोहित कुमार द्वारा कराया गया। पूरे कार्यक्रम का कुशल मंच संचालन प्रो. प्रसिद्ध कुमार ने किया। परिचर्चा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला: प्रो. राय श्री पाल सिंह ने कहा कि प्रेमचंद ने अपने समय की तमाम सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहार किया था। उन्होंने 'निर्मला', 'गोदान' और 'पंच परमेश्वर' जैसी कालजयी कृतियों का उल्लेख करते हुए प्रेमचंद के सामाजिक चिंतन को रेखांकित किया। प्रो. (डॉ.) शंकर प्रसाद शाह ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने केवल साहित्य ही नहीं रचा, बल्कि अपने ल...

समय की कसौटी पर खरा: समकालीन संदर्भ में प्रेमचंद का शब्द-संसार!

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   " साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।" — मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के क्षितिज पर मुंशी प्रेमचंद एक ऐसे प्रकाशपुंज हैं, जिनकी रचनाधर्मिता समय की सीमाओं को लांघकर हर युग में नई चेतना का संचार करती है। प्रायः कहा जाता है कि महान साहित्य वह है जो अपने समय का दस्तावेज़ होते हुए भी कालजयी हो। प्रेमचंद का साहित्य इसी कसौटी पर शत-प्रतिशत खरा उतरता है। उन्होंने आज से लगभग एक शताब्दी पूर्व जिस समाज, जिन समस्याओं और जिन मानवीय संवेदनाओं को अपनी लेखनी का विषय बनाया, वे समस्याएँ रूप बदलकर आज भी हमारे सम्मुख खड़ी हैं। 1. यथार्थ के धरातल पर किसान और ग्रामीण जीवन प्रेमचंद को 'उपन्यास सम्राट' और 'कलम का सिपाही' यूँ ही नहीं कहा जाता; उन्होंने भारतीय गाँव की आत्मा को उसकी पूरी नग्नता और जीवंतता के साथ पहचाना था। ऋण और शोषण का दुष्चक्र: 'गोदान' का होरी केवल 1936 का एक भारतीय किसान नहीं है, बल्कि वह आज भी कर्ज़ के बोझ तले दबे, मौसम की मार झेलते और बाज़ार व्यवस्था के हाथों शोषित होते हर अन्नदाता का प्रतीक...

राजनीतिक भाषा का दोहरा मानदंड और समाज का दर्पण!

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    सभ्यता और भाषा के इतिहास में अशिष्टता कोई नया अध्याय नहीं है। बदलाव केवल जन-मानस की स्मृति और सुविधा अनुसार चुनी गई प्रतिक्रियाओं में आया है। भाषा केवल शब्दों से नहीं बनती; उसमें उस दौर की मानसिकता, समाज के द्वंद्व और राजनीतिक संस्कृति की स्पष्ट छाप होती है। अतीत के पन्नों को पलटें तो सत्ता और शीर्ष नेताओं के विरुद्ध उग्र और व्यक्तिगत कटाक्ष कोई अनहोनी घटना नहीं रहे हैं। अस्सी के दशक में जब सार्वजनिक मंचों या जन-संचार माध्यमों पर सत्ता-शीर्ष के विरुद्ध तीखी टिप्पणी या नारे गूँजते थे, तब समाज उन्हें भावी पीढ़ी के 'संस्कारों के पतन' के रूप में देखने के बजाय राजनीतिक माहौल की तात्कालिक प्रतिक्रिया मानता था। आपातकाल के दौर में लगे अश्लील नारे हों या बोफोर्स प्रकरण के समय गूँजती उक्तियाँ, बच्चों ने उन शब्दों को गढ़ा नहीं था, बल्कि केवल उस माहौल से उधार लिया था जिसमें वे सांस ले रहे थे। बच्चे या युवा स्वयं भाषा का सृजन नहीं करते, वे केवल अपने परिवेश का प्रतिध्वनित रूप होते हैं। अतीत में जब व्यंग्य और तीखे आक्रमण राजनीतिक बहस का हिस्सा थे, तब उन्हें लोकतंत्र के स्वाभाविक उग्र रूप ...

सफलता का असली पैमाना: चरित्र और मानवीय संवेदनाएं!

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  आज के आधुनिक दौर में हमने सफलता के ऐसे मानदंड तय कर लिए हैं जो केवल बाहरी दुनिया और भौतिक वस्तुओं तक सीमित रह गए हैं। हम किसी व्यक्ति की सफलता का आकलन इस बात से करते हैं कि उसका बैंक बैलेंस कितना है, उसकी प्रसिद्धि का दायरा कितना बड़ा है, या उसके नाम के साथ कितनी बड़ी उपलब्धियां जुड़ी हैं। लेकिन क्या वास्तव में यही जीवन का अंतिम सत्य है? सच्ची सफलता का गणित उस दिन बदलेगा, जब समाज अपना नजरिया बदलेगा। बैंक खाते से पहले व्यवहार: भौतिक धन तो आता-जाता रहता है, लेकिन आपका सौम्य और आदरपूर्ण व्यवहार ही लोगों के दिलों में आपकी स्थायी जगह बनाता है। लोकप्रियता से पहले ईमानदारी: केवल प्रसिद्ध होना काफी नहीं है, बल्कि सत्य और निष्ठा के मार्ग पर चलना अधिक मूल्यवान है। क्षणिक प्रसिद्धि की तुलना में ईमानदारी से मिला सम्मान जीवन भर साथ रहता है। उपलब्धियों से पहले मानवीय संवेदनाएं: आपकी डिग्री और पद तब तक बेमानी हैं जब तक आपके भीतर दूसरों के दर्द को समझने और उनकी मदद करने की करुणा नहीं है। एक संवेदनशील और संवेदनशील इंसान बनना किसी भी उपलब्धि से बड़ा है। हमें यह याद रखना होगा कि चरित्र ही मनुष्य की...

जे.एन.एल. कॉलेज में 'भारतीय मनोविज्ञान दिवस' पर भाषण प्रतियोगिता आयोजित, छात्रों ने जाने भारतीय ज्ञान परंपरा के रंग!

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  पटना: जगत नारायण लाल (जे.एन.एल.) कॉलेज के काउंसलिंग सेल और मनोविज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में 29 जुलाई 2026 को 'भारतीय मनोविज्ञान दिवस' का आयोजन बड़े ही उत्साह के साथ किया गया। इस अवसर पर विद्यार्थियों के लिए एक विशेष भाषण प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें छात्रों ने भारतीय मनोविज्ञान के इतिहास और इसमें दिग्गजों के योगदान पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम में विषय की गहराई और भारतीय ज्ञान परंपरा पर विस्तार से चर्चा हुई। भारतीय ज्ञान परंपरा और मनोविज्ञान का गहरा संबंध कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए काउंसलिंग सेल की नोडल ऑफिसर डॉ. किरण बाला ने भारतीय ज्ञान परंपरा में मनोविज्ञान की सदियों पुरानी भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि किस तरह भारतीय दर्शन और प्राचीन ज्ञान में मन, चेतना और व्यवहार को समझने के गहरे आयाम मौजूद हैं। इसके बाद मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष एवं सहायक प्राध्यापिका डॉ. अर्चना भारती ने भारत में आधुनिक मनोविज्ञान के इतिहास और इसके विकास यात्रा की जानकारी दी। उन्होंने डॉ. नरेंद्र नाथ सेन गुप्ता, डॉ. गिरीन्द्रशेखर बोस और डॉ. जे.पी. दास जैसे महान भारतीय मन...

दलित सम्मान पर चोट और भाजपा की दिखावटी राजनीति: श्रेयसी सिंह प्रकरण का आलोचनात्मक विश्लेषण!

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  भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था का मूल आधार समानता, बंधुत्व और हर नागरिक की गरिमा का सम्मान है। किंतु हाल ही में बिहार सरकार की खेल मंत्री श्रेयसी सिंह से जुड़ा एक घटनाक्रम यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह संवैधानिक मूल्य सिर्फ भाषणों और शपथ पत्रों तक ही सीमित रह गए हैं? राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के बिहार प्रदेश प्रवक्ता एजाज अहमद द्वारा उठाए गए सवाल न केवल एक राजनीतिक बयानबाजी हैं, बल्कि वे समाज के सबसे वंचित वर्ग—दलित समाज—के प्रति सत्तासीन दल के रवैये पर एक गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं। इवेंट-जीवित राजनीति और जमीनी हकीकत राजनीतिक लाभ और प्रचार के लिए 'इवेंट' तैयार करना वर्तमान दौर की राजनीति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। मंत्री श्रेयसी सिंह द्वारा दलित समाज की बच्चियों को मिठाई खिलाने का कार्यक्रम भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। जब तक कैमरे की नज़र मंत्री पर थी और वे स्वयं बच्चियों को मिठाई खिला रही थीं, तब तक सब कुछ एक आदर्श 'सोशल इंजीनियरिंग' और 'दलित प्रेम' का उदाहरण लग रहा था। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दुखद और सबसे घिनौना पहलू तब सामने आया जब उसी...