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राजनीतिक भाषा का दोहरा मानदंड और समाज का दर्पण!

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    सभ्यता और भाषा के इतिहास में अशिष्टता कोई नया अध्याय नहीं है। बदलाव केवल जन-मानस की स्मृति और सुविधा अनुसार चुनी गई प्रतिक्रियाओं में आया है। भाषा केवल शब्दों से नहीं बनती; उसमें उस दौर की मानसिकता, समाज के द्वंद्व और राजनीतिक संस्कृति की स्पष्ट छाप होती है। अतीत के पन्नों को पलटें तो सत्ता और शीर्ष नेताओं के विरुद्ध उग्र और व्यक्तिगत कटाक्ष कोई अनहोनी घटना नहीं रहे हैं। अस्सी के दशक में जब सार्वजनिक मंचों या जन-संचार माध्यमों पर सत्ता-शीर्ष के विरुद्ध तीखी टिप्पणी या नारे गूँजते थे, तब समाज उन्हें भावी पीढ़ी के 'संस्कारों के पतन' के रूप में देखने के बजाय राजनीतिक माहौल की तात्कालिक प्रतिक्रिया मानता था। आपातकाल के दौर में लगे अश्लील नारे हों या बोफोर्स प्रकरण के समय गूँजती उक्तियाँ, बच्चों ने उन शब्दों को गढ़ा नहीं था, बल्कि केवल उस माहौल से उधार लिया था जिसमें वे सांस ले रहे थे। बच्चे या युवा स्वयं भाषा का सृजन नहीं करते, वे केवल अपने परिवेश का प्रतिध्वनित रूप होते हैं। अतीत में जब व्यंग्य और तीखे आक्रमण राजनीतिक बहस का हिस्सा थे, तब उन्हें लोकतंत्र के स्वाभाविक उग्र रूप ...

सफलता का असली पैमाना: चरित्र और मानवीय संवेदनाएं!

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  आज के आधुनिक दौर में हमने सफलता के ऐसे मानदंड तय कर लिए हैं जो केवल बाहरी दुनिया और भौतिक वस्तुओं तक सीमित रह गए हैं। हम किसी व्यक्ति की सफलता का आकलन इस बात से करते हैं कि उसका बैंक बैलेंस कितना है, उसकी प्रसिद्धि का दायरा कितना बड़ा है, या उसके नाम के साथ कितनी बड़ी उपलब्धियां जुड़ी हैं। लेकिन क्या वास्तव में यही जीवन का अंतिम सत्य है? सच्ची सफलता का गणित उस दिन बदलेगा, जब समाज अपना नजरिया बदलेगा। बैंक खाते से पहले व्यवहार: भौतिक धन तो आता-जाता रहता है, लेकिन आपका सौम्य और आदरपूर्ण व्यवहार ही लोगों के दिलों में आपकी स्थायी जगह बनाता है। लोकप्रियता से पहले ईमानदारी: केवल प्रसिद्ध होना काफी नहीं है, बल्कि सत्य और निष्ठा के मार्ग पर चलना अधिक मूल्यवान है। क्षणिक प्रसिद्धि की तुलना में ईमानदारी से मिला सम्मान जीवन भर साथ रहता है। उपलब्धियों से पहले मानवीय संवेदनाएं: आपकी डिग्री और पद तब तक बेमानी हैं जब तक आपके भीतर दूसरों के दर्द को समझने और उनकी मदद करने की करुणा नहीं है। एक संवेदनशील और संवेदनशील इंसान बनना किसी भी उपलब्धि से बड़ा है। हमें यह याद रखना होगा कि चरित्र ही मनुष्य की...

जे.एन.एल. कॉलेज में 'भारतीय मनोविज्ञान दिवस' पर भाषण प्रतियोगिता आयोजित, छात्रों ने जाने भारतीय ज्ञान परंपरा के रंग!

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  पटना: जगत नारायण लाल (जे.एन.एल.) कॉलेज के काउंसलिंग सेल और मनोविज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में 29 जुलाई 2026 को 'भारतीय मनोविज्ञान दिवस' का आयोजन बड़े ही उत्साह के साथ किया गया। इस अवसर पर विद्यार्थियों के लिए एक विशेष भाषण प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें छात्रों ने भारतीय मनोविज्ञान के इतिहास और इसमें दिग्गजों के योगदान पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम में विषय की गहराई और भारतीय ज्ञान परंपरा पर विस्तार से चर्चा हुई। भारतीय ज्ञान परंपरा और मनोविज्ञान का गहरा संबंध कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए काउंसलिंग सेल की नोडल ऑफिसर डॉ. किरण बाला ने भारतीय ज्ञान परंपरा में मनोविज्ञान की सदियों पुरानी भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि किस तरह भारतीय दर्शन और प्राचीन ज्ञान में मन, चेतना और व्यवहार को समझने के गहरे आयाम मौजूद हैं। इसके बाद मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष एवं सहायक प्राध्यापिका डॉ. अर्चना भारती ने भारत में आधुनिक मनोविज्ञान के इतिहास और इसके विकास यात्रा की जानकारी दी। उन्होंने डॉ. नरेंद्र नाथ सेन गुप्ता, डॉ. गिरीन्द्रशेखर बोस और डॉ. जे.पी. दास जैसे महान भारतीय मन...

दलित सम्मान पर चोट और भाजपा की दिखावटी राजनीति: श्रेयसी सिंह प्रकरण का आलोचनात्मक विश्लेषण!

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  भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था का मूल आधार समानता, बंधुत्व और हर नागरिक की गरिमा का सम्मान है। किंतु हाल ही में बिहार सरकार की खेल मंत्री श्रेयसी सिंह से जुड़ा एक घटनाक्रम यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह संवैधानिक मूल्य सिर्फ भाषणों और शपथ पत्रों तक ही सीमित रह गए हैं? राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के बिहार प्रदेश प्रवक्ता एजाज अहमद द्वारा उठाए गए सवाल न केवल एक राजनीतिक बयानबाजी हैं, बल्कि वे समाज के सबसे वंचित वर्ग—दलित समाज—के प्रति सत्तासीन दल के रवैये पर एक गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं। इवेंट-जीवित राजनीति और जमीनी हकीकत राजनीतिक लाभ और प्रचार के लिए 'इवेंट' तैयार करना वर्तमान दौर की राजनीति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। मंत्री श्रेयसी सिंह द्वारा दलित समाज की बच्चियों को मिठाई खिलाने का कार्यक्रम भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। जब तक कैमरे की नज़र मंत्री पर थी और वे स्वयं बच्चियों को मिठाई खिला रही थीं, तब तक सब कुछ एक आदर्श 'सोशल इंजीनियरिंग' और 'दलित प्रेम' का उदाहरण लग रहा था। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दुखद और सबसे घिनौना पहलू तब सामने आया जब उसी...

भारत में बढ़ते अति-अमीर और कर व्यवस्था का बदलता परिदृश्य!

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  भारत की अर्थव्यवस्था में हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण और संरचनात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। हाल ही में भारत सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए 576 करदाताओं ने ₹100 करोड़ से अधिक की आय घोषित की है। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में लगभग एक-तिहाई (एक तिहाई से अधिक) की वृद्धि दर्शाता है। यह रुझान न केवल देश में 'सुपर-रिच' यानी उच्च आय वर्ग की बढ़ती संख्या को रेखांकित करता है, बल्कि देश की आयकर व्यवस्था की बढ़ती पारदर्शिता और विश्वसनीयता को भी साबित करता है। अति-अमीरों की संख्या में यह इजाफा इस बात का प्रमाण है कि देश में कर संरचना व्यावहारिक और पारदर्शी बन रही है। यह उन तर्कों का खंडन करता है कि अति-अमीर करों के बोझ से बचने के लिए देश छोड़ रहे हैं। आयकर विभाग की कठोर निगरानी, डिजिटल प्रक्रियाओं और सरलीकृत व्यवस्थाओं ने करदाताओं को खुलकर आय घोषित करने के लिए प्रोत्साहित किया है। हालाँकि, केवल अति-अमीरों का दायरा ही नहीं बढ़ा है, बल्कि आयकर रिटर्न दाखिल करने वाले सामान्य नागरिकों की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भार...

146वीं प्रेमचंद जयंती 2026: जानिए इस विशेष संगोष्ठी और आयोजन का पूरा विवरण!

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  हिंदी साहित्य के महान कथाकार और उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती हर साहित्य प्रेमी के लिए एक विशेष पर्व की तरह होती है। इस वर्ष 'सूत्रधार' (स्थापित-1979) संस्था द्वारा मुंशी प्रेमचंद जी की 146वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। यदि आप साहित्य में रुचि रखते हैं और प्रेमचंद जी की रचनाओं और विचारों को नए दृष्टिकोण से समझना चाहते हैं, तो यह कार्यक्रम आपके लिए एक बेहतरीन अवसर है। संगोष्ठी का विषय इस वर्ष आयोजित होने वाली संगोष्ठी का मुख्य विषय है: “वर्तमान समय में प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता” बदलते सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश में मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कृतियां आज भी हमारे समाज और सरोकारों को कितनी गहराई से छूती हैं, इसी विषय पर प्रबुद्ध वक्ता अपने विचार साझा करेंगे। कार्यक्रम की संपूर्ण जानकारी दिनांक: 31 जुलाई 2026 समय: संध्या 04:00 बजे स्थान: सूत्रधार कार्यालय, जमालुद्दीन चक, खगौल संपर्क एवं अधिक जानकारी यदि आप इस आयोजन में भाग लेना चाहते हैं या कार्यक्रम से जुड़ी अन्य जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए विवरण ...

नेउरा-दनियावाँ रेल खंड: क्या बाबूचक-मोहम्मदपुर में बनेगा 'शहीद जयगोविंद सिंह यादव रेलवे स्टेशन'?

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  पूर्व मध्य रेलवे (दानापुर मंडल) के अंतर्गत नेउरा-दनियावाँ नई रेल लाइन का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस नई रेल लाइन के शुरू होने के साथ ही स्थानीय ग्रामीणों और यात्रियों की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण माँग सामने आई है। हाल ही में स्थानीय निवासी प्रसिद्ध कुमार (ग्राम- बाबूचक, पटना) ने भारत सरकार के माननीय रेल मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव जी को पत्र लिखकर 'बाबूचक-मोहम्मदपुर' के पास एक नए स्टेशन के निर्माण और उसके नामकरण अमर शहीद जयगोविंद सिंह यादव के नाम पर करने का आग्रह किया है। 1. स्टेशनों की दूरी और भौगोलिक आवश्यकता वर्तमान रेल योजना के अनुसार: नेउरा और जट-डुमरी के बीच की दूरी लगभग 18.2 किलोमीटर है। इस दूरी के बीच केवल 'गोनपुरा' में स्टेशन प्रस्तावित है। नेउरा और गोनपुरा के ठीक बीचों-बीच (लगभग 7 किमी) 'बाबूचक-मोहम्मदपुर' स्थित है। भौगोलिक और तकनीकी दृष्टि से बाबूचक-मोहम्मदपुर एक ऐसा केंद्र है जहाँ स्टेशन बनने से आस-पास के दर्जनों गाँवों को सीधा लाभ मिलेगा। 2. पटना AIIMS और दानापुर पहुँचना होगा बेहद आसान बाबूचक-मोहम्मदपुर मुख्य पुरैनि...