( कहानी) ठगी की दुनिया में मैं भी ठगाया: जब खागौल के चौराहे पर गच्चा खा गए गुरुजी!-प्रो प्रसिद्ध कुमार।
"साधारण सी दिखने वाली मासूमियत कभी-कभी बड़े-बड़े विद्वानों और प्रोफेसरों को भी गच्चा दे जाती है।" ज्ञान की नगरी खागौल और शाम का मोती चौक बिहार की ऐतिहासिक और ज्ञान की भूमि—आर्यभट्ट की नगरी 'खागौल' (जिसे स्थानीय लोग बड़े प्रेम और मज़ाक में 'खा-पीकर गोल' भी कहते हैं)—अपनी अनूठी संस्कृति के लिए जानी जाती है। शाम के करीब पाँच बज रहे थे। कॉलेज का एक लंबा दिन बिताकर मैं रोजाना की तरह मोती चौक पर उतरा। यहाँ से अपने गाँव जाने के लिए ऑटो का इंतज़ार करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। मोती चौक से महज पचास कदम की दूरी पर राजकुमार साव की खल्ली-चोकर की दुकान है। साव जी से मेरी पुरानी और गहरी दोस्ती है, इसलिए ऑटो के आने तक उनकी दुकान पर बैठना मेरा रोज का नियम था। उस दिन भी मैं वहीं बेंच पर बैठा था। कभी साव जी दुकान के काम से इधर-उधर आ-जा रहे थे, और कभी मेरी नजरें सड़क पर गुजरते ऑटो तलाश रही थीं। मासूम चेहरा और वह रहस्यमयी चाबी अचानक राजकुमार साव बिना कुछ कहे दुकान से कहीं चले गए। तभी वहाँ एक आठ-दस साल की छोटी सी बच्ची आई। उसके कपड़े साधारण थे, और चेहरे पर एक अजीब सी श...