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102 वर्षों का ऐतिहासिक सफर: खगौल के गांधी विद्यालय में धूमधाम से मनाई गई गांधी जयंती। प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    ​खगौल के ऐतिहासिक गांधी विद्यालय में इस वर्ष गांधी जयंती बेहद खास और ऐतिहासिक माहौल में मनाई गई। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता लखनीबिगहा पंचायत के पैक्स अध्यक्ष संजय गांधी ने की, जबकि संचालन सरारी पंचायत के पैक्स अध्यक्ष व मुखिया प्रतिनिधि सागर कुमार द्वारा किया गया। ​पुष्पांजलि अर्पित कर नमन: कार्यक्रम की शुरुआत उपस्थित गणमान्य लोगों द्वारा महात्मा गांधी की आदमकद प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करके की गई। ​ऐतिहासिक जुड़ाव: मुख्य अतिथि प्रो. प्रसिद्ध कुमार ने विस्तार से बताया कि महात्मा गांधी सितंबर 1925 में आर्यभट्ट की नगरी खगौल आए थे और इसी विद्यालय की नींव रखी थी, जो आज उन्हीं के नाम पर सुशोभित है। ​भावुक पल: अस्सी के दशक में इसी विद्यालय के छात्र रहे प्रो. प्रसिद्ध कुमार ने इस ऐतिहासिक स्थल पर 102 वर्षों के बाद इतने बड़े पैमाने पर जयंती मनाए जाने को अपने लिए एक बेहद भावुक पल बताया। उन्होंने लोगों से गांधी जी के सत्य, अहिंसा और आत्मबल के विचारों को अपने जीवन में आत्मसात करने पर जोर दिया। ​विचारों का आदान-प्रदान: पटना जिला लोजपा के अध्यक्ष चंदन यादव ने गांधी जी के एकता के संदे...

महात्मा गांधी के विचार: एक समकालीन और तथ्यात्मक दृष्टि!

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    ​महात्मा गांधी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक युगद्रष्टा थे, जिनके विचार आज भी मानवता, समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं जितने स्वतंत्रता आंदोलन के समय थे। उनके विचार सत्य, अहिंसा और सर्वोदय की मजबूत नींव पर टिके थे। ​यहाँ उनके प्रमुख वैचारिक आयामों का तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत है: ​1. आर्थिक विचार: स्वावलंबन और ट्रस्टीशिप ​गांधीजी की आर्थिक दृष्टि विकेंद्रीकरण और कुटीर उद्योगों पर आधारित थी। ​ग्राम स्वराज्य और खादी: उनका मानना था कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। मशीनीकरण के अंधानुकरण के बजाय उन्होंने खादी और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया ताकि हर हाथ को काम मिल सके। ​ट्रस्टीशिप (न्यासधारिता का सिद्धांत): गांधीजी पूंजीवाद के विरोधी थे, लेकिन वे पूंजीपतियों के नाश के पक्ष में भी नहीं थे। उनके अनुसार, मिल मालिकों और उद्योगपतियों को अपनी संपत्ति का व्यक्तिगत स्वामी न मानकर, समाज की भलाई के लिए उसका 'ट्रस्टी' (संरक्षक) समझना चाहिए। ​2. सामाजिक विचार: समता और छुआछूत का विरोध ​सामाजिक सुधार गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों का केंद्र बिंदु थे। ​अस्पृश्यता क...

विश्व मंच पर महात्मा गाँधी जी का अधूरा काम।

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    ​महात्मा गांधी का व्यक्तित्व और उनका वैचारिक दर्शन केवल भारत की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि वह संपूर्ण मानवता के लिए एक मार्गदर्शक था। 'विश्व मंच पर महात्मा का अधूरा काम' इस बात पर गहराई से विचार करता है कि कैसे गांधीजी के विचार वैश्विक स्तर पर शांति, समानता और न्याय की स्थापना के लिए अनिवार्य हैं, और आज भी उनके कई उद्देश्य वैश्विक राजनीति व समाज में अधूरे हैं। ​1. वैश्विक शांति और अहिंसा की प्रासंगिकता: आज की दुनिया युद्ध, आतंकवाद, हथियारों की होड़ और आपसी संघर्षों से घिरी हुई है। महात्मा गांधी का अहिंसा का सिद्धांत इन वैश्विक समस्याओं का सबसे सटीक समाधान प्रस्तुत करता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीति और शक्ति प्रदर्शन के आगे गांधीवादी सिद्धांतों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। विश्व मंच पर शांति स्थापित करने का उनका सपना आज भी पूरी तरह फलीभूत नहीं हो सका है। ​2. नस्लीय और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष: गांधीजी ने न केवल भारत में बल्कि दक्षिण अफ्रीका में भी नस्लीय भेदभाव और अन्याय के खिलाफ मुखर लड़ाई लड़ी थी। वैश्विक स्तर पर आज भी रंगभेद, नस्लवाद, ...

जहानाबाद के पूर्व विधायक सच्चिदानंद यादव का निधन!

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 मगध विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष यादव के निधन से शिक्षा जगत में भी शोक की लहर।  राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद , पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी एवं राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकारी अध्यक्ष सह नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव सहित राजद के अन्य नेताओं ने राजद के वरिष्ठ नेता सह जहानाबाद के पूर्व विधायक सच्चिदानंद यादव के निधन पर गहरी शोक संवेदना प्रकट की है , उनके सम्मान में पार्टी का झंडा आधा झुका दिया।   राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री लालू प्रसाद , पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती राबड़ी देवी, राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष सह नेता प्रतिपक्ष श्री तेजस्वी प्रसाद यादव ,सांसद डॉ मीसा भारती, प्रदेश अध्यक्ष श्री मंगनी लाल मंडल, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री जगदानंद सिंह, श्री उदय नारायण चौधरी,राष्ट्रीय प्रधान महासचिव अब्दुल बारी सिद्दीकी, पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ कांति सिंह,जयप्रकाश नारायण यादव,राष्ट्रीय महासचिव श्री भोला यादव, सैयद फैसल अली, बीनू यादव,राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता प्रो मनोज कुमार झा, सांसद डॉ सुरेंद्र प्रसाद यादव, श्री...

भारत में बढ़ता घरेलू कर्ज: उपभोग, चुनौतियाँ और macroeconomic प्रभाव.

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    भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आँकड़ों के अनुसार, सितंबर 2025 तक भारत का घरेलू कर्ज (household debt) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 45.5% हो गया है, जो जून 2023 में 42% और 2021 में 39.2% था. इस तेज वृद्धि ने नीति निर्माताओं और विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित किया है.   ​बचत में गिरावट: कोविड-19 महामारी के बाद से घरेलू शुद्ध वित्तीय बचत में गिरावट आई है और वित्त वर्ष 2024-25 की पहली छमाही में यह बढ़कर GDP का 6% हो गई है.   ​कर्ज के कारण: असुरक्षित व्यक्तिगत ऋण और डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्मों के कारण कर्ज लेना आसान हो गया है, जिससे उपभोग को अस्थायी बढ़ावा तो मिलता है लेकिन भविष्य की आय गिरवी रखनी पड़ती है.   ​आर्थिक प्रभाव: यदि कर्ज का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य या आवास जैसी संपत्ति-निर्माण (asset-building) गतिविधियों के लिए किया जाए तो यह चिंता का विषय नहीं है; परंतु दैनिक खर्चों को पूरा करने के लिए कर्ज लेना वित्तीय जोखिम पैदा करता है.   ​सरकार और नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना है कि कर्ज तक आसान पहुँच को बेहतर आर्थिक कल्याण मे...

भारत और इफ़्टा (EFTA) समझौता: आर्थिक विकास और तकनीकी सहयोग की नई राह.

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    अक्टूबर 2025 में भारत और यूरोपीय फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA - जिसमें आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड शामिल हैं) के बीच ट्रेड एंड इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (TEPA) लागू हुआ. इस समझौते के तहत भारत ने अपने टैरिफ लाइनों पर महत्वपूर्ण रियायतें दी हैं, जबकि इफ़्टा ने भारत में 15 वर्षों में 100 अरब डॉलर के निवेश और 10 लाख प्रत्यक्ष नौकरियों के सृजन का लक्ष्य रखा है.   ​इस साझेदारी के मुख्य तीन प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं: ​भू-थर्मल ऊर्जा (Geothermal Energy): आइसलैंड के इस क्षेत्र के अनुभव का उपयोग भारत (विशेषकर हिमाचल प्रदेश) में कृषि और शीत भंडारण (cold storage) जैसी सुविधाओं के लिए किया जा रहा है.   ​कार्बन कैप्चर और यूटिलाइजेशन (CCUS): नीति आयोग के अध्ययन और भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से देश में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए तकनीकी रोडमैप तैयार किया गया है.   ​समुद्री अर्थव्यवस्था (Ocean Economy): आइसलैंड की मत्स्य पालन और समुद्री मूल्य-वर्धन (value-added processing) की विशेषज्ञता से भारत को अपनी नीली अर्थ...

पर्यावरण बनाम विकास: अरावली का विनाश और संवैधानिक संकट।

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  अरावली पर्वत श्रृंखला, जो गुजरात से लेकर दिल्ली तक लगभग 700 किलोमीटर के दायरे में फैली हुई है, उत्तर भारत के लिए केवल पहाड़ नहीं बल्कि एक प्राकृतिक ढाल और जीवनरेखा है। यह प्राचीन पर्वत श्रृंखला थार मरुस्थल को आगे बढ़ने से रोकती है, भूजल स्तर को बनाए रखती है और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) को प्रदूषण व जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों से बचाती है। हाल ही में अरावली क्षेत्र में खनन और टेंडर से जुड़े मामलों को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है, जो पर्यावरण संरक्षण के दावों और धरातल पर हो रहे कारनामों के बीच एक बड़ा विरोधाभास पैदा करती है।    क्या यह संविधान के अनुच्छेदों का उल्लंघन है? अरावली के अंधाधुंध दोहन और खनन की अनुमति या टेंडर दिए जाने की प्रक्रिया भारतीय संविधान के कई बुनियादी प्रावधानों और मौलिक अधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन प्रतीत होती है: अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार): उच्चतम न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक फैसलों (जैसे एमसी मेहता वाद) में स्पष्ट किया है कि 'जीने के अधिकार' के अंतर्गत ही स्वच्छ हवा, शुद्ध पानी और प्रदूषणमुक्त पर्यावरण का अधिकार भी शामि...