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डॉ संजीव कुमार का शिक्षकों से संवाद।-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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     पटना: राजधानी पटना के ऊर्जा ऑडिटोरियम में आयोजित 'शिक्षक संवाद' कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलित कर विधिवत रूप से की गई। इस कार्यक्रम में बिहार भर से आए हज़ारों शिक्षकों का भारी उत्साह, जोश और विश्वास देखने को मिला, जिससे यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि इस बार शिक्षक हित की जीत तय है और बदलाव निश्चित है  ​शिक्षा व्यवस्था पर गहरी चिंता: पालीगंज के विधायक कॉमरेड संदीप सौरभ ने बिहार में गिरती शिक्षा व्यवस्था पर गहरी चिंता व्यक्त की और डॉ. संजीव कुमार को माला पहनाकर उनकी जीत की अग्रिम बधाई  दी । ​वित्तरहित शिक्षकों की दयनीय स्थिति: राजद नेता शक्ति सिंह यादव ने वित्तरहित शिक्षकों की आर्थिक व सामाजिक परेशानियों को पुरजोर तरीके से उठाया और इसके लिए सरकार को कटघरे में खड़ा किया । ​समाजवाद और न्याय की बात: प्रो. प्रसिद्ध कुमार ने बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर और डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों को अपनाने की अपील की। उन्होंने लालू यादव के समाजवाद और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को रखते हुए समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को विकास से जोड़ने पर बल दिया । ​शिक्षकों के हक...

मनोदशा का द्वंद्व: हमारी सुविधाजनक विरोधाभासी दुनिया।

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   ​हम सब अक्सर आधुनिकता, स्वतंत्रता और प्रगति की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन जब इन्हें जमीन पर उतारने की बात आती है, तो हमारे कदम पीछे हट जाते हैं। यह अंतर्द्वंद्व हमारे समाज का एक गहरा मनोवैज्ञानिक सच उजागर करता है—हम विचारों की प्रशंसा तो करते हैं, लेकिन उनके अभ्यास से डरते हैं।   ​विचारों और अभ्यास के बीच की खाई ​हम 'स्वतंत्रता' को एक अवधारणा के रूप में बहुत प्यार करते हैं, लेकिन एक ऐसे 'स्वतंत्र व्यक्ति' से डरते हैं जो स्थापित मानदंडों को चुनौती दे सके। हम चाहते हैं कि समाज में खुलापन हो, मगर जब कोई लीक से हटकर जीने का साहस करता है, तो हम असहज हो जाते हैं।   ​अपेक्षाओं का पिंजरा ​'प्रतिभा' की हमारी चाहत अक्सर एक पिंजरे की तरह होती है। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे प्रतिभाशाली हों, लेकिन केवल उन्हीं क्षेत्रों में जो हमें स्वीकार्य हों, या जिन्हें हम 'सफल' मानते हैं। यदि प्रतिभा उन्हें किसी अपरंपरागत या नए रास्ते पर ले जाती है, तो हम उसे स्वीकार करने के बजाय रोक देते हैं।   ​प्रगति और सुरक्षा का विरोधाभास ​हम एक 'प्रगतिशील' समाज का सपना तो द...

( कहानी) ठगी की दुनिया में मैं भी ठगाया: जब खागौल के चौराहे पर गच्चा खा गए गुरुजी!-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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   ​"साधारण सी दिखने वाली मासूमियत कभी-कभी बड़े-बड़े विद्वानों और प्रोफेसरों को भी गच्चा दे जाती है।" ​ज्ञान की नगरी खागौल और शाम का मोती चौक ​बिहार की ऐतिहासिक और ज्ञान की भूमि—आर्यभट्ट की नगरी 'खागौल' (जिसे स्थानीय लोग बड़े प्रेम और मज़ाक में 'खा-पीकर गोल' भी कहते हैं)—अपनी अनूठी संस्कृति के लिए जानी जाती है। शाम के करीब पाँच बज रहे थे। कॉलेज का एक लंबा दिन बिताकर मैं रोजाना की तरह मोती चौक पर उतरा। यहाँ से अपने गाँव जाने के लिए ऑटो का इंतज़ार करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। ​मोती चौक से महज पचास कदम की दूरी पर राजकुमार साव की खल्ली-चोकर की दुकान है। साव जी से मेरी पुरानी और गहरी दोस्ती है, इसलिए ऑटो के आने तक उनकी दुकान पर बैठना मेरा रोज का नियम था। उस दिन भी मैं वहीं बेंच पर बैठा था। कभी साव जी दुकान के काम से इधर-उधर आ-जा रहे थे, और कभी मेरी नजरें सड़क पर गुजरते ऑटो तलाश रही थीं। ​मासूम चेहरा और वह रहस्यमयी चाबी ​अचानक राजकुमार साव बिना कुछ कहे दुकान से कहीं चले गए। तभी वहाँ एक आठ-दस साल की छोटी सी बच्ची आई। उसके कपड़े साधारण थे, और चेहरे पर एक अजीब सी श...

​दिल्ली में सुरक्षा कड़ी: बंगाल और छत्तीसगढ़ से CRPF के 7,000 जवान तैनात।

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  ​सुरक्षा बलों की तैनाती: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन के मद्देनजर पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ से केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के लगभग 7,000 कर्मियों (लगभग 70 कंपनियों) को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिल्ली बुलाया गया है।   ​हाई-अलर्ट और निर्देश: केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशों के तहत, पश्चिम बंगाल से 40 कंपनियों को 'शून्य समय' (zero time) में और छत्तीसगढ़ सेक्टर से 30 कंपनियों को तुरंत दिल्ली में तैनात व तैयार रहने को कहा गया है।   ​विशेष उपकरण और हथियार: तैनात किए जाने वाले जवानों को नवीनतम दंगा-विरोधी उपकरण (anti-riot equipment), ऑपरेशनल-स्केल हथियार और निर्धारित गोला-बारूद के साथ पूरी तरह से लैस रहने के निर्देश दिए गए हैं।   ​गृह मंत्री का दौरा रद्द: स्थिति पर लगातार नजर रखने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तेलंगाना, मेघालय, मिजोरम और मणिपुर के अपने निर्धारित दौरे रद्द कर दिए हैं और वे दिल्ली में ही रुके हुए हैं।   ​धारा 163 लागू: दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में किसी भी तरह के जुलूस, रैल...

कमजोर रुपया और वैश्विक आर्थिक उथल-पुथल: कारण और प्रभाव.

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    ​वैश्विक स्तर पर चल रही आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच भारतीय रुपया अपने न्यूनतम स्तर पर है। हालांकि इसे एक कमजोरी के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति को रुपये का "अंडरवैल्यूड" (कम आंका जाना) मानना भविष्य में अर्थव्यवस्था के लिए रिकवरी का रास्ता तैयार कर सकता है।   ​ऐतिहासिक संदर्भ और वास्तविकता: वर्तमान में मुद्रास्फीति (Inflation) को समायोजित करने के बाद रुपये का वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (REER) 90 के आसपास है, जो 2013-14 के 'यूएस टेंडर टैंट्रम' (US taper tantrum) के दौर की याद दिलाता है। यह गिरावट भारत के मजबूत बुनियादी आर्थिक फंडामेंटल्स (fundamentals) में किसी खराबी के कारण नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह (capital flow) की गतिशीलता के कारण है।   ​वैश्विक कारण: भू-राजनीतिक जोखिमों, आक्रामक मौद्रिक सख्ती (monetary tightening) और ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के कारण वैश्विक बॉन्ड बाजारों में भारी बिकवाली देखी जा रही है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) द्वारा लगातार बिकवाली से डॉलर की मांग असामान्...

भारतीय सिनेमा के बेजोड़ नायक: नाना पाटेकर

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    ​भारतीय सिनेमा ने एक ऐसा अनूठा और विद्रोही व्यक्तित्व खो दिया है, जिसने अभिनय को कभी महज़ एक कला नहीं बल्कि जीवन के साथ एक सीधा टकराव माना। 75 वर्ष की आयु में गोवा स्थित अपने आवास पर हृदयाघात के कारण उनका निधन हो गया। उनका पूरा जीवन और अभिनय सफर लीक से हटकर सोचने और धारा के विपरीत चलने वाले व्यक्ति का प्रमाण रहा है।   ​अभिनय का अनूठा सफर और शैली   ​समानांतर और व्यावसायिक सिनेमा का सेतु: नाना पाटेकर ने अपने चार दशक से अधिक लंबे करियर में समानांतर कला-आन्दोलनों और मुख्यधारा के व्यावसायिक सिनेमा के बीच की खाई को पाटने का काम किया।   ​विशिष्ट पहचान: तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार (National Award) और चार बार फिल्मफेयर पुरस्कार (Filmfare Award) जीतने वाले नाना पाटेकर ने ऐसे किरदारों को चुना जो आसानी से किसी श्रेणी में नहीं बंधे।   ​प्रमुख फिल्में और यादगार भूमिकाएं: 'गमन' (1978) से अपने अभिनय की शुरुआत करने वाले नाना ने 'अंकुश' (1986) में एक बेरोजगार युवा, 'परिंदा' (1989) में खतरनाक अंडरवर्ल्ड डॉन 'अन्ना सेठ', 'प्रहार' (1991) में गहराई से राष्...

पटना स्नातक :बिहार की सियासत में 'शुचिता' का सवाल: बाहुबल और आदर्शों का द्वंद्व । _प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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      राजद के दिलीप पटेल इस सियासी लड़ाई में अपनी गाड़ी को 'ग्रीन सिग्नल' मिलते हुए देख रहे हैं।  ​बिहार की राजनीति एक बार फिर उस चौराहे पर खड़ी है जहाँ आदर्शों और बाहुबल का द्वंद्व चरम पर है। प्रदेश के सबसे बड़े राजनैतिक दल, जदयू (JDU) की चुप्पी और उसकी विवशता, राजनीति के गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। सवाल यह है कि क्या पार्टी के भीतर भय इतना व्याप्त है कि वह अपने ही बागी नेताओं को 'बागी' तक कहने की हिम्मत खो चुकी है? ​वर्तमान घटनाक्रम के केंद्र में हैं जदयू के उम्मीदवार नीरज सिंह, जो भले ही अपनी बड़बोली शैली के लिए कुख्यात रहे हों, लेकिन उनके राजनीतिक चरित्र का एक उज्ज्वल पहलू भी है। उन्होंने कभी भी न तो अपराधियों को प्रत्यक्ष समर्थन दिया और न ही उनके सामने नतमस्तक हुए। स्वस्थ लोकतंत्र की यही वह शुचिता है जिसकी अपेक्षा एक राजनेता से की जाती है। ​इसके ठीक विपरीत, अनंत सिंह जैसे बाहुबली खुलेआम पार्टी से बगावत कर रहे हैं। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी नेतृत्व, कार्रवाई तो दूर, उनसे स्पष्टीकरण (Show Cause) तक मांगने की हिम्मत नह...