साहब, मेमसाहब और 'टॉमी'! ( कहानी ) - प्रो प्रसिद्ध कुमार।
'कुत्ता' होना खुशनसीबी है, और 'इंसान' बने रहना सबसे बड़ा अभिशाप!" दिल्ली की तपती दोपहर में लुटियंस ज़ोन की चौड़ी सड़कों पर सन्नाटा पसरा था। सड़क के किनारे फुटपाथ पर एक बूढ़ा आदमी पुरानी चादर बिछाए पेट की आग को दबाने की कोशिश कर रहा था। उसकी आँखें सड़क पर चलती गाड़ियों में शायद कुछ ढूँढ रही थीं—शायद एक रोटी, शायद कोई रहम। तभी एक चमचमाती, एअर-कंडीशंड मर्सिडीज़ रेड लाइट पर आकर रुकी। गाड़ी की पिछली सीट पर रेशमी गद्दे पर बैठा था—'टॉमी'। टॉमी कोई साधारण प्राणी नहीं था; वह इस दौर के एक बड़े उद्योगपति का 'कुत्ता' था। टॉमी की दिनचर्या किसी राजा-महाराजा जैसी थी। सुबह-सुबह उसके लिए पर्सनल वेटर उबला हुआ चिकन और पैकेज़्ड न्यूट्रिशन लाता, दोपहर में उसके स्पेशल एसी रूम में तापमान 22 डिग्री फारेनहाइट पर सेट रहता, और महीने में दो बार 'एनिमल डर्मेटोलॉजिस्ट' उसके बालों की चमक चेक करने घर आते। टॉमी की देखभाल के लिए दो नौकर 24 घंटे तैनात रहते थे, जिनकी अपनी तनख्वाह शायद किसी प्राइमरी स्कूल के मास्टर साहब से ज्यादा थी। रेड लाइट पर गाड़ी रुकी तो टॉमी ने अपनी मखम...