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क्रांति का शंखनाद! ( कविता) -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    सवाल पूछो तो मौन साधते, उत्तर कोई पास नहीं,  परीक्षा की जो ट्रिक सिखाते, उन पर अब विश्वास नहीं।  प्रश्नपत्र लीक होने पर जो चुप्पी साध कर बैठे हैं,  मन की बात सुनाने वाले, सच से आँखें ऐंठे हैं। अंधभक्ति के इस दलदल में, कैसा हश्र दिखाया है,  जाहिल को नेता मानकर, खुद का भविष्य गँवाया है।  अपने ही हाथों से तुमने, बच्चों के सपने रौंदे,  कुर्सी के सौदागर बैठे, करने को काले सौदे। नासमझी की भारी कीमत, जंतर-मंतर चुका रहा,  लाठियां खाकर लहूलुहान, आज नौनिहाल हो रहा।कल तक जो मसरूफ रहे थे, जाति-धरम के झगड़ों में,  आज लगी है आग वही, खुद के घर के ही आँगनों में। पर धन्य भाग्य इन युवाओं का, जिसने आज अंगड़ाई ली,  काँप उठी दिल्ली की गद्दी, पूरे भारत ने गवाही दी।हिल गई है चूल हुकूमत की, संसद छोड़ वो भाग रहे,  बहुत बनाया मूर्ख हमें, अब सोते हुए सब जाग रहे। प्रश्न उठाने वाले को, जो देशद्रोही बतलाते थे,  जनता की गाढ़ी कमाई पर, जो ऐश सदा उड़ाते थे।  अब खैर नहीं है अत्याचारी, सब्र का बाँध ये टूटा है, युवा शक्ति का महाप्रलय, अब तेरे विनाश ...

बेशर्म सरकार! लोकतंत्र पर प्रहार: हक मांगते युवाओं पर लाठियां और तानाशाही का उदय! - प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    बहुत ही भारी मन से, मर्माहत होकर इस पोस्ट को लिख रहा हूँ। इसे पढ़कर आपको अगर पीड़ा नहीं होता है तो फिर क्या कहें!..  लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में सरकार संवाद के बजाय दमन का रास्ता चुन रही है। नीट (NEET) जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में लगातार होते पेपर लीक ने देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य को अधर में लटका दिया है। जब यही पीड़ित युवा अपने अधिकारों की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर लोकतांत्रिक तरीके से इकट्ठा हुए, तो सरकार ने उनसे बात करने के बजाय पुलिसिया बर्बरता का सहारा लिया। शांत मन से अपनी बात कह रहे छात्रों पर लाठियां बरसाना और आंसू गैस के गोले छोड़ना बेहद निंदनीय और शर्मनाक है। यह कार्रवाई स्पष्ट करती है कि सत्ता अब जनसरोकारों के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील हो चुकी है। संवाद का अंत और लाठीशाही का राज किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र की पहली शर्त होती है—जनता और सरकार के बीच निरंतर संवाद। शिक्षा मंत्री से जवाब मांगने आए छात्रों को अपराधियों की तरह खदेड़ना इस बात का प्रमाण है कि सरकार अपनी कमियों ...

प्रेम की भाषाएं: परिवार, वर्कप्लेस और समाज में मजबूत रिश्तों का आधार!

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  डॉ. गैरी चैपमैन की प्रसिद्ध पुस्तक "द 5 लव लैंग्वेजेस" (The 5 Love Languages) इस मूल अवधारणा पर आधारित है कि हर व्यक्ति प्यार को व्यक्त करने और उसे महसूस करने का अपना एक अलग तरीका रखता है। जिस प्रकार हम अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं, उसी तरह हमारे भावनात्मक जुड़ाव व्यक्त करने की "प्रेम भाषा" भी अलग हो सकती है। जब दो लोग एक-दूसरे की प्रेम भाषा को नहीं समझते, तो अक्सर सब कुछ सही होते हुए भी वे एक-दूसरे से अनदेखा या अप्रशंसित महसूस करते हैं। 5 लव लैंग्वेजेस (5 Love Languages) क्या हैं? 1. प्रशंसा के बोल (Words of Affirmation) इस भाषा वाले लोगों के लिए शब्द बहुत मायने रखते हैं। वे अपने साथी या प्रियजनों से सच्ची तारीफ, प्रोत्साहन, आभार और स्नेह भरे शब्द सुनना चाहते हैं। उदाहरण: "तुमने आज यह काम बहुत अच्छे से किया", "मुझे तुम पर गर्व है", या बस "थैंक यू"। ध्यान रखें: कड़वे या अपमानजनक शब्द इन्हें गहराई से चोट पहुँचाते हैं। 2. गुणवत्तापूर्ण समय (Quality Time) इन लोगों के लिए प्यार का मतलब है 'पूर्ण ध्यान' (Undivided Attention)। मोबाइल, ट...

भारत में क्यों बढ़ रही है महंगाई?: एक विश्लेषण

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  भारत में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित मुद्रास्फीति में हाल के महीनों में तेज उछाल देखा गया है। सामान्य आर्थिक धारणा यह मानती है कि महंगाई तब बढ़ती है जब मांग, आपूर्ति से अधिक हो जाती है । हालांकि, वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था का गहन विश्लेषण यह दर्शाता है कि यह उछाल मांग में वृद्धि के कारण नहीं, बल्कि सप्लाई शॉक और लागत में वृद्धि का परिणाम है। 1. प्राथमिक वस्तुएं बनाम विनिर्मित वस्तुएं (संरचनात्मक अंतर) पोलिश अर्थशास्त्री माइकल कालेकी के सिद्धांत के अनुसार, प्राथमिक और विनिर्मित वस्तुओं के मूल्य निर्धारण का तरीका अलग-अलग होता है: प्राथमिक वस्तुएं : इनमें कृषि उत्पाद (जैसे सब्जियां, फल आदि) शामिल हैं। इनकी आपूर्ति अल्पावधि में निश्चित होती है। जब मॉनसून खराब होता है या मौसम की मार पड़ती है, तो आपूर्ति घट जाती है और कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं। यह मांग और आपूर्ति के असंतुलन से तय होती हैं। विनिर्मित वस्तुएं : इनकी कीमतें केवल मांग से तय नहीं होतीं, बल्कि उत्पादन लागत और उस पर कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन से तय होती हैं। 2. मुद्रास्फीति के मुख्य चालक  खाद्य मुद्रास्फीति और मौस...

देश को अब पेशेवर राजनीति से मुक्ति चाहिए: युवाओं के कंधों पर नया सवेरा!

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    ये इमेज जंतर मंतर दिल्ली की है। भारतीय लोकतंत्र आज एक अभूतपूर्व मोड़ पर खड़ा है। स्वतंत्रता के सात दशकों बाद भी जिस सत्ता से जन-कल्याण और समावेशी विकास की उम्मीद थी, वह आज कई गंभीर सवालों के घेरे में है। देश का आम नागरिक बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक उदासीनता की मार झेल रहा है। ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वर्तमान राजनीतिक ढांचा देश की आकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम है या इसमें एक आमूलचूल बदलाव की आवश्यकता है? निरंकुशता, वंशवाद और गिरती संवैधानिक गरिमा आज राजनीति में वंशवाद (Dynasty) और व्यावसायीकरण (Professional Politics) अपने चरम पर है। जब राजनीति जनकल्याण के बजाय सत्ता प्राप्ति और व्यक्तिगत लाभ का माध्यम बन जाती है, तब आम नागरिक के लिए इस व्यवस्था में जगह पाना लगभग असंभव हो जाता है। जनता की मुख्य चुनौतियाँ: आम आदमी आज महंगाई और भ्रष्टाचार के दोहरे दबाव में पिसा जा रहा है। संस्थागत निष्पक्षता पर सवाल: लोकतांत्रिक स्तंभों की स्वायत्तता को लेकर लगातार चिंताएं जताई जा रही हैं। असहमति के स्वरों को सुनने के बजाय अक्सर उन्हें दबाने की प्रवृत्ति दे...

भारत में 'जेन जेड' (Gen Z) के लिए घटते रोजगार की कड़वी सच्चाई !

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  भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में से एक है, लेकिन इस 'जनसांख्यिकीय लाभांश' का लाभ तभी मिल सकता है जब युवाओं को शिक्षा के बाद बेहतर और उत्पादक रोजगार मिले। समय के साथ यह स्थिति मजबूत होने के बजाय बिगड़ती दिख रही है, जिसका सबसे बड़ा असर 'जेन जेड' (Gen Z - 15 से 26 वर्ष आयु वर्ग) पर पड़ रहा है। प्रमुख आंकड़े और जमीनी स्थिति श्रम बल भागीदारी (LFPR): जेन जेड (Gen Z) में श्रम बल भागीदारी दर मात्र 41.7% है, जबकि 'मिलिनियल्स' (Millennials - 27 से 42 वर्ष) में यह 75% है। लैंगिक विषमता (Gender Gap): ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुष युवाओं की श्रम भागीदारी 59.3% है, जबकि महिलाओं के लिए यह आंकड़ा केवल 28% (ग्रामीण) और 21.1% (शहरी) ही है। बेरोजगारी दर  जेन जेड में कुल बेरोजगारी 11.9% है (मिलिनियल्स के 2% के मुकाबले)। शहरी इलाकों में यह स्थिति और भयावह है, जहाँ Gen Z बेरोजगारी 17.1% तक पहुँच गई है। शहरी युवा महिलाओं के लिए यह दर रिकॉर्ड 22.6% के खतरनाक स्तर पर है। संकट के मुख्य कारण और चुनौतियाँ 'ग्रेजुएट ट्रैप' (शिक्षित बेरोजगारी): शिक्षा का स्तर बढ़ने ...

बिहार में शिक्षा के 'भगवाकरण' पर सियासी घमासान: RJD का NDA सहयोगियों से तीखा सवाल— आखिर मौन क्यों हैं नीतीश के साथी?

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  Conversation with Gemini पटना: बिहार की राजनीति में शिक्षा और विचारधारा को लेकर एक बार फिर जुबानी जंग तेज हो गई है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने राज्य की मौजूदा भाजपा-नेतृत्व वाली सरकार और उसके फैसलों पर कड़ा हमला बोला है। आरजेडी के प्रदेश प्रवक्ता एजाज अहमद ने प्रेस बयान जारी कर उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और एनडीए (NDA) गठबंधन के घटक दलों को आड़े हाथों लिया है। 551 विद्यालयों का रंग-रूप बदलने का आरोप: क्या है पूरा मामला? आरजेडी प्रवक्ता एजाज अहमद ने आरोप लगाया कि सम्राट चौधरी के नेतृत्व में सरकार बिहार में शिक्षा व्यवस्था के 'भगवाकरण' की नीति पर काम कर रही है। नामकरण और रंग: एजाज अहमद के अनुसार, राज्य के 551 विद्यालयों को मॉडल स्कूल का नाम देकर उनका नामकरण 'सरस्वती विद्या केंद्र (आदर्श विद्यालय)' या 'शिशु विद्या केंद्र' किया जा रहा है और इनके भवनों को भगवा रंग में रंगा जा रहा है। गंगा-जमुनी तहजीब पर हमला: RJD का कहना है कि यह कदम बिहार की पारंपरिक सामाजिक समरसता और गंगा-जमुनी संस्कृति के खिलाफ है। JDU और NDA सहयोगियों की चुप्पी पर उठे सवाल प्रेस विज्ञप्ति ...