Posts

भारत मेंकॉपीराइट की वर्तमान स्थिति!

Image
  1. कॉपीराइट की वर्तमान स्थिति और बाधाएं:  वर्तमान कॉपीराइट कानून अपने मूल उद्देश्य (रचनात्मकता को बढ़ावा देना) से भटक गए हैं और अब वे ज्ञान तक पहुँच में बाधा बन रहे हैं।  अत्यधिक क ऐतिहासिक रूप से कॉपीराइट एक सीमित अधिकार था (शुरुआत में केवल 14 वर्ष के लिए), । इस 'कॉपीराइट मैक्सिमलिज्म' (अतिवाद) ने सार्वजनिक डोमेन को सिकोड़ दिया है। 3. AI और डेटा माइनिंग की चुनौतियाँ: जेनेरेटिव AI के दौर में, मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए भारी मात्रा में डेटा की आवश्यकता होती है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के सात देशों के अध्ययन से पता चलता है कि भारत सहित कई देशों के कानून स्पष्ट रूप से AI ट्रेनिंग के लिए डेटा के उपयोग की अनुमति नहीं देते हैं, जिससे कानूनी अनिश्चितता पैदा होती है। 4. अन्य देशों के उदाहरण: यूरोपीय संघ, जापान और सिंगापुर जैसे देशों ने 'टेक्स्ट और डेटा माइनिंग' (TDM) के लिए अपने कानूनों में छूट दी है। जापान का कानून विशेष रूप से मशीनों द्वारा डेटा के उपयोग को मानवीय उपभोग से अलग मानता है, जो AI के विकास के लिए अनुकूल है। 5. भविष्य की राह और सुझाव: भारत को अपने कॉपीरा...

तकनीक के दौर में मानवीय रचनात्मकता और बौद्धिक संकट! !

Image
  मुख्य  विचार  क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मानवीय रचनात्मकता और मौलिक चिंतन को समाप्त कर रहा है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं, बल्कि एक विचारशील इंसान बनाना है, जिसे आज की "क्लिक और कॉपी" संस्कृति नुकसान पहुँचा रही है। बौद्धिक प्रतिगमन (Intellectual Regression): आधुनिक पीढ़ी ज्ञान के लिए संघर्ष करने के बजाय त्वरित उत्तरों पर निर्भर हो गई है। यह 'बौद्धिक पतन' का संकेत  है, जहाँ सूचना तक पहुँच तो आसान है, लेकिन गहन समझ का अभाव है। लेखन और कल्पना का ह्रास: एआई के कारण लेखन अब एक मानवीय अभिव्यक्ति के बजाय केवल एक 'उत्पाद' बन गया है। जब छात्र और शोधकर्ता एआई से निबंध लिखवाते हैं, तो वे अपनी सोचने और तर्क करने की क्षमता खो देते हैं। वैज्ञानिक शोध पर संकट: शोध पत्रों में एआई का अनियंत्रित उपयोग "भ्रामक उद्धरणों" (phantom citations) और गलत जानकारी को बढ़ावा दे रहा है, जिससे अकादमिक विश्वसनीयता खतरे में है। भाषा और लोकतंत्र: भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि भावनाओं और स्वतंत्र विचारों की अभिव्यक्ति है। यदि भाषा का स्तर गिरेगा, तो मानवीय...

आवश्यकतानुसार न्यायपालिका में विविधता और सुलभता: कॉलेजियम प्रणाली और सुधार की चुनौतियाँ!

Image
       1. न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व का अभाव यह इस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि भारतीय उच्चतर न्यायपालिका में सामाजिक विविधता की भारी कमी है। आंकड़े: 2018 से 2024 के बीच नियुक्त न्यायाधीशों में केवल 20% SC, ST और OBC समुदायों से थे। लैंगिक और धार्मिक असंतुलन: महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व क्रमशः 15% और 5% से भी कम है। आलोचना: यह आंकड़े दर्शाते हैं कि 'योग्यता' (Merit) के नाम पर अनजाने में एक विशिष्ट वर्ग का वर्चस्व बना हुआ है, जो न्यायपालिका की समावेशी छवि को प्रभावित करता है। 2. कॉलेजियम प्रणाली: स्वतंत्रता बनाम पारदर्शिता विकास: 1993 के 'दूसरे न्यायाधीश मामले' के बाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए इसे लाया गया। समस्या:  इस प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी है। भाई-भतीजावाद (Nepotism) के आरोपों और बंद दरवाजों के पीछे होने वाली नियुक्तियों ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। NJAC की विफलता: 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द करना न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच...

आधुनिक समाज में बढ़ता भावनात्मक फासला और 'आंसुओं' की सार्थकता !

Image
  आज के युग में हम शारीरिक रूप से एक-दूसरे के जितने करीब आए हैं, भावनात्मक रूप से उतने ही दूर होते जा रहे हैं। "हम एक-दूसरे के सामने होकर भी एक-दूसरे के सुख-दुख से कितने अपरिचित हैं!"—आज के 'डिजिटल एकांत' (Digital Isolation) की कड़वी सच्चाई को बयां करती है। 1. भौतिक निकटता बनाम भावनात्मक दूरी मनोवैज्ञानिक रूप से, हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ 'भीड़ में अकेलापन' एक सामान्य स्थिति बन गई है। सोशल मीडिया पर सैकड़ों मित्र होने के बावजूद, जब कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन के 'सुख-दुख' से गुजरता है, तो उसके पास वास्तविक संवेदना साझा करने वाले लोगों का अभाव होता है। हम एक ही मेज पर बैठकर फोन में व्यस्त रहते हैं, जिससे हमारे बीच की सहानुभूति (Empathy) का स्तर गिरता जा रहा है। 2. आंसुओं का मनोविज्ञान:  मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, आंसू केवल दुख की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि ये मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक 'कैथार्सिस' (Catharsis) या भावनात्मक शुद्धिकरण का कार्य करते हैं। तनाव से मुक्ति: आंसू बहाने से शरीर में 'कोर्टिसोल' (तनाव हार्मोन) का स्तर कम ह...

भारतीय रेल: सुरक्षा और सेवा के 'ट्रैक' पर गहराता संकट!

Image
  भारतीय रेलवे को देश की जीवनरेखा कहा जाता है, लेकिन वर्तमान में यह रेखा असुरक्षा और अव्यवस्था के भंवर में फंसी नजर आती है। एक तरफ सरकार रेलवे को 'विश्व स्तरीय' बनाने के दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ यात्रियों की बुनियादी जरूरतों—भोजन और सुरक्षा—के साथ खिलवाड़ एक कड़वा सच बन चुका है। 1. भोजन नहीं, बीमारी का 'जोखिम' हालिया आंकड़ों और यात्रियों के अनुभवों से स्पष्ट है कि ट्रेनों में परोसा जाने वाला भोजन अब केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि एक 'जोखिम' बन गया है। गुणवत्ता का अभाव: प्रीमियम ट्रेनों (राजधानी, शताब्दी) से लेकर सामान्य मेल ट्रेनों तक, भोजन में तिलचट्टे, कीड़े और अखाद्य वस्तुओं का मिलना आम हो गया है। 2024-25 के दौरान खान-पान की गुणवत्ता को लेकर 6,645 आधिकारिक शिकायतें दर्ज होना इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है। आर्थिक शोषण: यात्रियों से तय कीमत से अधिक राशि वसूलना और बदले में कम मात्रा या बासी खाना देना रेलवे के निगरानी तंत्र की विफलता है। जवाबदेही की कमी: शिकायत करने पर कर्मियों द्वारा यात्रियों से दुर्व्यवहार की खबरें सिस्टम की तानाशाही प्रवृत्ति को उजा...

गया की गलियों में गूँजती वो आख़िरी ठुमरी: जद्दनबाई की हवेली का अंत ! उनकी बेटी नरगिस और नाती संजय दत्त ने भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुँचाया।

Image
  ​इतिहास कभी-कभी ईंट-गारों की दीवारों में नहीं, बल्कि उन हवाओं में बसता है जो किसी दौर की महफिलों की गवाह रही हों। बिहार के गया शहर के पंचायती अखाड़ा रोड पर खड़ी वह हवेली अब मिट्टी में मिल चुकी है, लेकिन उसकी रूह में आज भी ठुमरी के वो सुर और घुँघरुओं की वो खनक दफ़न है, जिसने कभी राजा-रजवाड़ों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। ​ कला की 'मल्लिका' और गया का नाता ​यह हवेली सिर्फ़ एक इमारत नहीं थी, बल्कि भारतीय कला जगत की एक गौरवशाली विरासत थी। यहाँ देश की प्रसिद्ध नर्तकी और गायिका जद्दनबाई का बसेरा था। वही जद्दनबाई, जिनकी विरासत को आगे चलकर उनकी बेटी नरगिस और नाती संजय दत्त ने भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुँचाया। ​कहा जाता है कि करीब 100 साल पहले इस हवेली में जब जद्दनबाई अपनी महफ़िल सजाती थीं, तो वक्त ठहर जाया करता था। ठुमरी के सुरों पर जब वे थिरकती थीं, तो दूर-दूर से रईस और कला-पारखी उनके फन का दीदार करने खिंचे चले आते थे। वह दौर कला की कद्रदानी का स्वर्णिम युग था। ​ विकास की भेंट चढ़ी विरासत ​विडंबना देखिए, जिस विरासत को एक 'म्यूज़ियम' या कला केंद्र होना चाहिए था, वह समय की मार और सरक...

बेटियों के लहू से लाल होता शिक्षा का मंदिर: न्याय की पुकार!

Image
  17 फरवरी को शाम 5 बजे से नकटी भवानी से एम्स होते फुलवारी कैंडल मार्च: सोई हुई व्यवस्था को जगाने की एक कोशिश! ​पटना के फुलवारी शरीफ से आई खबर ने न केवल एक परिवार को उजाड़ दिया है, बल्कि मानवता को भी शर्मसार कर दिया है। 16 साल की एक मासूम, जो आँखों में भविष्य के सुनहरे सपने लेकर 'फंडामेंटल कोचिंग' की दहलीज पर कदम रखती थी, आज वह दरिंदगी की भेंट चढ़ गई। ​परिजनों का आरोप है कि उसके साथ हैवानियत की गई और फिर साक्ष्य मिटाने के लिए उसे छत से नीचे फेंक दिया गया। क्या अब शिक्षा के केंद्र भी बेटियों के लिए सुरक्षित नहीं रहे? शरीर पर पड़े वे जख्म चीख-चीख कर इंसाफ मांग रहे हैं। ​ सत्ता और सियासत के बीच सिसकता न्याय ​घटना के बाद इलाके में भारी आक्रोश है। सांसद पप्पू यादव, पूर्व विधायक गोपाल रविदास और राजद नेता  हरिनारायण  यादव ने पीड़ित परिवार से मिलकर अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं। प्रबुद्ध जनों का कहना है कि अपराधियों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है, जिसके कारण अपराधी बेखौफ हैं। ​"यह सिर्फ एक छात्रा की मौत नहीं, बल्कि प्रशासन के इकबाल की हत्या है।" ​ 🕯️ कैंडल मार्च: सोई हुई व्...