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कर्तव्यपरायणता ही राष्ट्रभक्ति की असली कसौटी है ! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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     ' आज हर तरफ कर्तव्यबोध का अभाव' है।  ​ देश में राष्ट्रभक्ति की चर्चा बहुत होती है, लेकिन मेरा मानना है कि राष्ट्रभक्ति का अर्थ केवल सीमाओं पर लड़ना ही नहीं, बल्कि अपने दैनिक कर्तव्यों का निष्ठा और ईमानदारी से निर्वहन करना है। यह सत्य है कि हमारा आचरण ही दूसरे के लिए नजीर (उदाहरण) बन जाता है। चाहे वह राजनेता हो, जनप्रतिधिनिधि हो, शिक्षक हो, पुलिसकर्मी हो या कोई अन्य अधिकारी—पदों की गरिमा और उनका दायित्व जितना बड़ा है, कर्तव्यबोध भी उतना ही अधिक होना चाहिए। ​दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आज स्थिति इसके उलट है। व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा 'समाधान' खोजने के बजाय 'समस्या' पैदा करने में अपनी ऊर्जा व्यर्थ कर रहा है। इसी मानसिकता के गर्भ से भ्रष्टाचार, शोषण, दमन और दोहन जैसे विकृत स्वरूपों का जन्म होता है। यदि हम अपने काम के प्रति शुचितापूर्ण और वफादार रहें, तो व्यवस्था की आधी से अधिक विसंगतियां स्वतः समाप्त हो जाएँगी। ​साथ ही, आज समाज में जाति, धर्म और विचारधारा के नाम पर जो कट्टरता और अहंकार फैल रहा है, वह चिंताजनक है। किसी को नीचा दिखाना या कट्टरता का प्रदर्शन करना ...

पटना में 'एक दिवसीय विशाल धरना प्रदर्शन': जन अधिकार के लिए एकजुट हों!

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    ​दिनांक: 17 जून, 2026 को गर्दनीबाग में होगा भव्य आंदोलन !  ​राष्ट्रीय जनता दल, पटना जिला द्वारा जनहित और अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम की घोषणा की गई है। पटना जिला राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष, दीनानाथ सिंह यादव द्वारा जारी आधिकारिक सूचना के अनुसार, आगामी 17 जून, 2026 को बिहार के सभी सांगठनिक जिला मुख्यालयों पर एक दिवसीय जन-आंदोलन और प्रभावशाली धरना प्रदर्शन का आयोजन किया जा रहा है। ​कार्यक्रम का उद्देश्य ​इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य जनता की आवाज़ को बुलंद करना और अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार और प्रशासन तक अपनी बात मजबूती से पहुँचाना है। इसी क्रम में, पटना जिला राष्ट्रीय जनता दल द्वारा पटना के ऐतिहासिक गर्दनीबाग में एक विशाल धरना आयोजित किया गया है। ​कार्यक्रम की रूपरेखा ​आंदोलन में शामिल होने वाले सभी कार्यकर्ताओं और साथियों के लिए कार्यक्रम का विवरण नीचे दिया गया है: ​दिनांक: 17 जून, 2026 (बुधवार) ​समय: पूर्वाह्न 11:00 बजे से अपराह्न 04:00 बजे तक ​स्थान: धरना स्थल, गर्दनीबाग, पटना ​कार्यकर्ताओं से अपील ​पार्टी के सभी सम्मानित सांसदों, विधायकों, ...

आर्थिक विकास में भौतिक सुख-सुविधाएं मिली, 'सुकून' खोया!

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          मुद्रास्फीति और क्रय शक्ति का क्षरण !   समय के साथ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाती है। 1985 में जो 50 रुपये पूरे महीने का राशन या किराया दिला सकते थे, आज उसकी क्रय शक्ति बहुत कम हो गई है। यह रुपये के मूल्य में अवमूल्यन को दर्शाता है, जहाँ '50' का अंकित मूल्य तो वही है, लेकिन उसकी वास्तविक आर्थिक शक्ति लगभग समाप्त हो चुकी है। जीवन स्तर में अंतर और विलासिता का प्रभाव  1985 में बुनियादी जरूरतों (दूध, आटा, चावल) पर ध्यान केंद्रित था। आज की महंगाई में केवल मुद्रास्फीति जिम्मेदार नहीं है, बल्कि उपभोग के पैटर्न में बदलाव भी है। आज हम 1985 की तुलना में कहीं अधिक 'विलासिता' वाली चीजों का उपभोग कर रहे हैं, जो हमारी जीवन लागत  को बढ़ाती हैं। ​इस तुलना का सबसे बड़ा आर्थिक पहलू 'वास्तविक आय' है।  यदि 1985 में ₹50 में घर चलता था, तो उस समय आय भी बहुत कम थी। आज यदि ₹50 की कीमत 2000 रुपये के बराबर है, तो औसत वेतन और आय में भी ऐतिहासिक वृद्धि हुई है। यह तुलना 'आय असमानता' के मुद्दे को नजरअंदाज करती ह...

रिश्तों की गहराई: परिभाषा से परे एक अहसास!

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    ​आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर रिश्तों को केवल शब्दों और औपचारिकताओं में बांधकर देखते हैं। लेकिन क्या सचमुच कोई रिश्ता सिर्फ शब्दों का मोहताज होता है?  दोस्ती केवल कहने भर का शब्द नहीं है, बल्कि यह गहराई से महसूस करने का एक पवित्र रिश्ता है। ​किसी भी सामाजिक ढांचे में रिश्तों की नींव विश्वास और देखभाल पर टिकी होती है। जिस तरह पौधे को पनपने के लिए खाद-पानी और देखभाल की जरूरत होती है, वैसे ही रिश्तों को भी समय-समय पर सहेजने की आवश्यकता होती है। यह समझने की जरूरत है कि रिश्तों को कभी भी संकुचित नियमों या बंधनों में नहीं बांधा जा सकता। जब हम उन्हें नियमों के दायरे में लाते हैं, तो उनकी सहजता और खुलापन खत्म होने लगता है। ​हम अक्सर यह गलती कर बैठते हैं कि समय के साथ दोस्ती की परिभाषा को एक निश्चित सांचे में ढाल देते हैं। हम अपने दोस्तों से उसी पुराने, शुरुआती दिनों जैसे व्यवहार की अपेक्षा करने लगते हैं। यहाँ हम एक मानवीय सत्य को नजरअंदाज कर देते हैं। हर व्यक्ति समय के साथ बदलता है, उसके विचार, परिस्थितियां और प्राथमिकताएं बदलती हैं। जिस तरह हम खुद को विकसित होते देख...

भारत में जनसांख्यिकीय (Demographic) शासन और राजनीति!

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    ​यह  भारत सरकार द्वारा जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के अध्ययन के लिए गठित समिति और इस मुद्दे के प्रति सरकार के दृष्टिकोण की समीक्षा है। सरकार ने "अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय परिवर्तनों" को राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के लिए एक गंभीर चुनौती माना है। गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे अवैध घुसपैठ से जोड़ते हुए एक 'सुनियोजित साजिश' बताया है।  जस्टिस पी.पी. नाओलेकर की अध्यक्षता में गठित समिति का काम जनसांख्यिकीय बदलावों, धार्मिक और सामाजिक समुदायों में जनसंख्या के असामान्य पैटर्न की जांच करना और घुसपैठियों की पहचान व निर्वासन के लिए तंत्र तैयार करना है।  जनसंख्या प्रबंधन केवल अवैध घुसपैठ तक सीमित नहीं होना चाहिए। जनसांख्यिकीय रुझानों को केवल सुरक्षा के नजरिए से देखने के हानिकारक परिणाम हो सकते हैं। यह चेतावनी  है कि इस प्रक्रिया से बड़ी संख्या में लोग 'राज्यविहीन'  हो सकते हैं, जिससे एक बड़ा मानवीय संकट पैदा हो सकता है। साथ ही, इससे मुसलमानों की सांप्रदायिक प्रोफाइलिंग का डर भी वास्तविक है।  भारत के सामने असली जनसांख्यिकीय चुनौतियां...

फुलवारीशरीफ की बेटी नबा हसन चाँद ने अमेरिका में लहराया सफलता का परचम !

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  ​फुलवारीशरीफ (पटना): प्रतिभा किसी स्थान या संसाधनों की मोहताज नहीं होती। यह साबित कर दिखाया है पटना जिले के फुलवारीशरीफ की रहने वाली नबा हसन चाँद ने। नबा ने अमेरिका के शिकागो स्थित प्रतिष्ठित दीपॉल यूनिवर्सिटी (DePaul University) से 'मास्टर ऑफ फाइनेंस' की डिग्री हासिल कर न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे क्षेत्र का मान बढ़ाया है। ​अमेरिका में मिली बड़ी शैक्षणिक उपलब्धि ​नबा हसन चाँद को यह प्रतिष्ठित डिग्री विश्वविद्यालय के डॉ. ड्रेहाउस कॉलेज ऑफ बिजनेस (Driehaus College of Business) के दीक्षांत समारोह में प्रदान की गई। एक छोटे शहर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मुकाम तक पहुँचना नबा के शैक्षणिक सफर की एक बड़ी उपलब्धि है। ​दृढ़ संकल्प और मेहनत की कहानी ​नबा के परिजनों के अनुसार, उनकी यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत, लगन और अनुशासित अध्ययन शैली के दम पर यह सफलता प्राप्त की है। नबा, फुलवारीशरीफ के प्रख्यात चिकित्सक रहे स्वर्गीय डॉ. अली हसन चाँद की पोती और शोएब हसन चाँद की पुत्री हैं। उन्होंने अपने पारिवारिक संस्कारों और शिक्षा के प्रति समर्पण को अपनी ...

फुलवारी का लहूलुहान इतिहास: सामाजिक न्याय के उन पांच दीवानों को याद करते हुए...

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    ​प्रो. प्रसिद्ध कुमार की कलम से ​फुलवारी की माटी आज भारी है। रामपुर फरीदपुर पंचायत की जिस ज़मीन ने दशकों तक सामाजिक न्याय का बिगुल फूंका, आज वह अपने पांच जांबाज़ सिपाहियों की कमी से कराह रही है। 1990 से लेकर आज तक, हमने इस पंचायत में जो लड़ाई लड़ी है, वह महज़ चुनावी राजनीति नहीं थी; वह व्यवस्था के विरुद्ध एक विद्रोह था। ​आई.के. गुजराल ,  गणेश यादव,राम कृपाल यादव से लेकर डॉ. मीसा भारती तक, और श्याम रजक, उदय मांझी से लेकर गोपाल रविदास तक—जब भी हमारे प्रत्याशियों के सिर जीत का सेहरा बंधा, उस जीत की बुनियाद हमारे साथियों के पसीने और खून से रची गई थी। लेकिन इस जीत का हिसाब-किताब बहुत महँगा रहा। ​कुर्बानी की लंबी फेहरिस्त ​सामाजिक न्याय का झंडा बुलंद करना इस इलाके में सीधे मौत को आमंत्रण देने जैसा था। हमारे तीन साथी—भोला यादव, रंजीत यादव और नीरज महतो (मुखिया) ने अपनी जान की आहुति देकर यह साबित किया कि आदर्शों की कीमत क्या होती है। मुझे आज भी वह दिन याद है जब मैं और अरुण यादव मौत के मुहाने से लौटकर आए थे; वह भाग्य ही था जिसने हमें बचा लिया। ​अब उस फेहरिस्त में दो और नाम जुड़ ...