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संप्रभु ऋण का चक्रव्यूह: विकास की आड़ में आम आदमी पर बढ़ता वित्तीय बोझ !

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    ​##  1 पूंजीगत व्यय बनाम बाह्य ऋण  ​किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए अवसंरचना  का निर्माण अनिवार्य है। इसके लिए जब घरेलू राजस्व कम पड़ता है, तो सरकारें वर्ल्ड बैंक जैसे बहुपक्षीय संस्थानों से दीर्घकालिक ऋण लेती हैं। आर्थिक शब्दावली में इसे राजकोषीय घाटे को पाटने का जरिया माना जाता है। परंतु जब बाह्य ऋण की संचयी राशि अत्यधिक बढ़ जाती है, तो देश का ऋण सेवा अनुपात बिगड़ने लगता है। इसका अर्थ यह है कि देश के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा विकास कार्यों में लगने के बजाय केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च होने लगता है। ​## 2. कराधान का प्रतिगामी प्रभाव  ​जब सरकार पर विदेशी कर्ज और ब्याज का दबाव बढ़ता है, तो राजकोषीय समेकन के लिए राजस्व बढ़ाना अनिवार्य हो जाता है। ऐसे में सरकारें प्रत्यक्ष करों जैसे इनकम टैक्स, जो अमीरों पर ज्यादा लगता है) के बजाय अप्रत्यक्ष करों  जैसे GST, ईंधन पर वैट/एक्साइज ड्यूटी) पर निर्भरता बढ़ा देती हैं। ​आर्थिक सिद्धांत के अनुसार, अप्रत्यक्ष कर प्रतिगामी होते हैं। एक गरीब मजदूर और एक अरबपति, दोनों को एक लीटर पेट्रोल या एक पैके...

​समाज ईंट-पत्थरों से नहीं, इंसानियत से बनता है!

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  ​मामूली दिखने वाले 'असाधारण' व्यवहार !  ​आज हम जब भी किसी 'विकसित' समाज या शहर की कल्पना करते हैं, तो हमारे दिमाग में बड़ी-बड़ी इमारतें, चौड़ी सड़कें, चमचमाती गाड़ियाँ और आधुनिक योजनाएँ आती हैं। लेकिन क्या वाकई विकास का पैमाना सिर्फ यही है? ​किसी ने सच ही कहा है कि "समाज केवल सड़कों, इमारतों और योजनाओं से नहीं बनता।" ये सब तो केवल एक ढांचा हैं। उस ढांचे में प्राण फूंकने का काम हमारा और आपका व्यवहार करता है। ​छोटी-छोटी बातें, बड़े बदलाव ​एक बेहतरीन और रहने योग्य समाज की नींव सीमेंट से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे मानवीय व्यवहारों से मजबूत होती है। हम अक्सर बड़ी क्रांतियों की तलाश में रहते हैं, जबकि बदलाव की शुरुआत हमारे रोजमर्रा के इन छोटे कदमों से होती है: ​एक छोटा सा झुकाव: चिलचिलाती धूप में काम करके थके हुए किसी अनजान व्यक्ति या डिलीवरी बॉय से बस इतना पूछ लेना—"भैया, थोड़ा पानी पिएंगे?" यह सिर्फ पानी नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व को सम्मान देना है। ​पड़ोसी का संबल: जब आपका पड़ोसी घर पर न हो, तो बिना किसी स्वार्थ के उसके घर पर एक नजर रख लेना कि सब ठीक-ठाक है...

​जनसांख्यिकीय बदलाव की आड़ में बहुसंख्यकवाद की राजनीति!

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   ​एकतरफा उच्च-स्तरीय समिति का गठन !  ​भारत इस समय एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय संक्रमण  के दौर से गुजर रहा है। देश के अधिकांश हिस्सों में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर  या उससे भी नीचे आ चुकी है। ऐसे समय में जब देश को युवाओं के लिए रोजगार जुटाने और भविष्य में बूढ़ी होने वाली आबादी की देखभाल पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, तब सरकार का पूरा विमर्श 'अवैध घुसपैठ' और 'अप्राकृतिक जनसांख्यिकीय परिवर्तन' पर आकर टिक गया है। ​एकतरफा उच्च-स्तरीय समिति का गठन!  ​हाल ही में सरकार द्वारा 'जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर उच्च-स्तरीय समिति' का गठन किया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि इस समिति के कार्यक्षेत्र  में जनसांख्यिकीय चुनौतियों से निपटने के बजाय 'अवैध अप्रवासन' और 'सीमा प्रबंधन' को प्राथमिकता दी गई है। आश्चर्यजनक रूप से, इस पूरी समिति में एक भी पेशेवर जनसांख्यिकीविद् शामिल नहीं है; बल्कि इसके नीति-नियंताओं में सेवानिवृत्त न्यायाधीश, नौकरशाह और पुलिस अधिकारी शामिल हैं। यह ढांचा ही इसकी मंशा पर सवाल उठाता है। ​'घुसपैठ' के नैरेटिव का राजनीतिक उपयोग ​पिछले कुछ...

CBSE के सिस्टम को हिलाने वाले 3 'जीनियस' छात्र: ट्रोलिंग से सच्चाई की जीत तक!

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     ​यह कहानी है वेदांत श्रीवास्तव, निसर्ग अधिकारी और सार्थक सिद्धांत की. ​अक्सर 'जेन जेड' (Gen Z) को सोशल मीडिया पर रील बनाने और ध्यान भटकाने वाली पीढ़ी माना जाता है। लेकिन भारत के तीन किशोरों ने यह साबित कर दिया कि जब सही दिशा मिले, तो यही पीढ़ी बड़े-बड़े सिस्टम की खामियों को उजागर कर सकती है। ​यह कहानी है वेदांत श्रीवास्तव, निसर्ग अधिकारी और सार्थक सिद्धांत की, जिन्होंने अकेले अपने दम पर देश के सबसे बड़े परीक्षा बोर्ड, CBSE (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) के 'ऑन-स्क्रीन मार्किंग' (OSM) सिस्टम की गंभीर खामियों को दुनिया के सामने ला दिया। ​जब सच बोलने पर मिला 'एंटी-नेशनल' का टैग ​कहानी की शुरुआत हुई 12वीं के छात्र वेदांत श्रीवास्तव से। जब उन्होंने री-इवैल्यूएशन (पुनर्मूल्यांकन) के लिए अप्लाई किया, तो उनके पोर्टल पर उनके बजाय किसी अनजान छात्र की उत्तर-पुस्तिका दिखाई दे रही थी। ​जब उन्होंने इस गड़बड़ी को सोशल मीडिया (X) पर उठाया, तो मदद मिलने के बजाय उन्हें भयानक ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा। लोगों ने उन्हें 'देशद्रोही', 'पाकिस्तानी' तक कह डाला औ...

​भारत में शिक्षा की बदहाली: सिर्फ लीक होते पर्चे नहीं, जड़ें बहुत गहरी हैं !

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      U G C जैसी संस्थाएं आज भी सरकारी दखलंदाजी का एक बड़ा जरिया बनी हुई हैं।  ​आजकल देश में शिक्षा पर खूब चर्चा हो रही है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि यह चर्चा शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए नहीं, बल्कि NEET परीक्षा में धांधली, लीक होते पेपर्स और CBSE की बोर्ड परीक्षाओं में फैले भ्रष्टाचार के कारण हो रही है। इस बदहाली और भ्रष्टाचार ने हमारे देश के कई होनहार युवाओं को आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है। ​लेकिन क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था की समस्या सिर्फ पेपर लीक तक ही सीमित है?  यह तो सिर्फ बीमारी के लक्षण हैं; असली बीमारी तो बहुत गहरी है। ​1. केवल साक्षरता, वास्तविक शिक्षा नहीं ​हमारे देश के नेताओं और उच्च अधिकारियों को भी अच्छी तरह मालूम है कि सरकारी स्कूलों की हालत क्या है। यही कारण है कि वे कभी अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं भेजते। सरकार ने ऐसे स्कूल तैयार कर दिए हैं जो बच्चों को 'वास्तविक ज्ञान' (Real Learning) देने के बजाय केवल 'बारेस्ट लिटरेसी' (यानी सिर्फ अक्षर ज्ञान) दे रहे हैं। ​एक कड़वी सच्चाई: साल 2009 में जब तमिलनाडु और हिमा...

​चुड़ैल का डर और एक महिला की जीत: अंजू की कहानी !

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   17 पंचायतों की लगभग 400 महिलाएँ बोधगया के ब्लॉक ऑफिस के बाहर उठ खड़ी हुईं। ​हम अक्सर सुनते हैं कि शिक्षा ही सशक्तिकरण की पहली सीढ़ी है। लेकिन क्या होता है जब किसी को बचपन में यह कहकर स्कूल जाने से रोक दिया जाए कि "स्कूल जाओगी तो चुड़ैल खा जाएगी"? ​यह कहानी बिहार की अंजू की है, जिन्होंने अंधविश्वास, घरेलू हिंसा और घोर गरीबी की बेड़ियों को तोड़कर अपनी किस्मत खुद लिखी। यह कहानी हमें सिखाती है कि हक की लड़ाई लड़ने के लिए किसी डिग्री की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और एकजुटता की जरूरत होती है। ​अंधविश्वास का साया और संघर्ष की शुरुआत ​अंजू का जन्म 1978 में ग्रामीण बिहार में हुआ था। स्कूल जाने की उम्र में उनके पिता ने इसी अजीबोगरीब अंधविश्वास के डर से उन्हें अनपढ़ रखा। महज 15 साल की उम्र में उनकी शादी कर दी गई। शादी के बाद का जीवन और भी दर्दनाक था—एक शराबी पति जो उनके साथ मारपीट करता था, और दिन भर (8 घंटे) खेतों में कड़ी मेहनत करने के बदले पैसे नहीं, बल्कि सिर्फ डेढ़ किलो चावल मिलते थे। ​अंजू यही सोचती थीं, "मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूँ, इसके अलावा मैं और कर भी क्या सकती हूँ?" ​मुट...

किस्सा 'अहंकारी राजा' का: जब कविता बनी 'सियासी तूफान'!

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      ​🎭 सीन 1: एक अदद राजा और उसका 'मौन' एकालाप ​एक था राजा... नहीं, दरअसल राजा एक नहीं था। हर पांच साल में एक नया राजा डिजिटल स्क्रीन पर अवतरित होता है, जिसके पास 56 इंच का सीना हो या न हो, पर 5G नेटवर्क और लाखों 'फॉलोअर्स' की सेना ज़रूर होती है। ​कहानी में ट्विस्ट तब आया जब एक मंझे हुए कलाकार (शेखर सुमन) ने सूट-बूट पहनकर, चेहरे पर दुनिया भर की गंभीरता समेटे हुए, एक 'अहंकारी राजा' पर कविता या एकालाप (Monologue) पढ़ दिया। उन्होंने नाम किसी का नहीं लिया! लेकिन हमारे लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत बात यही है कि यहाँ "लगा निशाना कहीं पे, घायल कोई और होता है।" ​📱 सीन 2: सोशल मीडिया का 'अदालत-ए-आलिया' ​जैसे ही यह वीडियो इंटरनेट की गलियों में छूटा, वैसे ही राजनीतिक गलियारों में 'डिकोडिंग' की फैक्ट्री चालू हो गई। ​विपक्ष वाले उछल पड़े: "अरे! ये तो बिल्कुल उन्हीं की बात हो रही है! देखो, कुर्ता भी वैसा ही है और एटीट्यूड भी!" ​सत्ता पक्ष वाले भड़क गए: "ये हमारे 'प्रधान-सेवक' पर सीधा कटाक्ष है! राजा अहंकारी नहीं है, राजा तो बस ...