Posts

हम 'ऑर्वेलियन डिस्टोपिया' को सामान्य नहीं बना सकते।

Image
     इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 'उत्तर प्रदेश नियंत्रण   Goondas  Act 1970' के कथित दुरुपयोग और उत्पीड़न के साधनों के रूप में इसके इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई है.    कानून का दुरुपयोग: अदालत ने एक मामले में गोण्डा के जिलाधिकारी द्वारा किसी व्यक्ति को 'गुंडा' घोषित कर 6 महीने के लिए तड़ीपार करने के आदेश को रद्द करते हुए यह स्पष्ट किया कि केवल एक मामले से कोई आदतन अपराधी नहीं बनता.    प्रशासनिक लापरवाही और मनमानी: देवरिया पुलिस द्वारा सीसीटीवी कैमरों के खराब होने का दावा करने तथा 'बुलडोजर न्याय' और आकृती चौधरी (डीयू छात्र कार्यकर्ता) पर एनएसए लगाने जैसे मामलों में कार्यकारी मनमानी और संवैधानिक तनाव को उजागर किया गया है.    मौलिक अधिकारों की रक्षा: अदालत ने रेखांकित किया कि कानून व्यवस्था बनाए रखने का अर्थ यह नहीं है कि कार्यपालिका को बिना सबूत और उचित प्रक्रिया के मौलिक अधिकारों की उपेक्षा करने का खुला अधिकार मिल जाए.    यदि निवारक कानूनों का इस्तेमाल असहमति को दबाने के लिए किया जाता है, तो हम ...

दीपों का उत्सव और चुल्हों का सन्नाटा ! - प्रो प्रसिद्ध कुमार।

Image
    ​लोक-संस्कृति के पन्नों को पलटिए, तो भाद्रपद मास की संक्रांति पर औजारों, शिल्पकला और श्रम के देवता भगवान विश्वकर्मा की आराधना का विधान मिलता है। सदियों से यह परंपरा रही है कि इस दिन कारखानों से लेकर खेतों तक, हर उस यंत्र की पूजा होती है जो मनुष्य के श्रम को गति देता है। किंतु बदलते दौर में, डिजिटल भारत की इस हाई-टेक वेला में, अब देवताओं की प्राथमिक सूची भी राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार तय होने लगी है। इस बार विश्वकर्मा पूजा का हश्र कुछ ऐसा हुआ कि मानो वे किसी और युग के देवता हों; उनकी जगह 'महामानव' की आराधना का भव्य अनुष्ठान पूरे राष्ट्रीय परिदृश्य पर छा गया। ​हो भी क्यों न, जब अवतरण ही 'नॉन-बायोलॉजिकल' हो, तो सांसारिक देवताओं की सुधि किसे रहे? सरकारी फरमान जारी हुए, और प्रशासनिक तंत्र दीपों की इस विशेष कतार को सजाने में ऐसा मुस्तैद हुआ कि मानो पूरा देश किसी दीवाली नहीं, बल्कि राज्याभिषेक की रिहर्सल में उतरा हो। खादी से लेकर राजनीति तक के तमाम कर्णधार—विधायक, सांसद और मंत्रीगण—अपने-अपने क्षेत्रों में दीया बांटते और कैमरे के सामने उत्सव मनाते नजर आए। नतीजा यह हुआ क...

बाबूचक: उम्मीदों, संघर्षों और अंतर्विरोधों के बीच धड़कती जन्मभूमि ! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

Image
    राजधानी पटना की चकाचौंध से महज 10 किलोमीटर पश्चिम में, विकास की दौड़ और ग्रामीण अंतर्विरोधों के बीच बसा एक ऐसा गांव है, जहां की माटी में संघर्ष की सोंधी महक और सफलता के नए इतिहास दर्ज हैं— बाबूचक। दानापुर स्टेशन से तीन किलोमीटर पश्चिम, एम्स के करीब और फुलवारीशरीफ प्रखंड के मैनपुरा अंदा पंचायत के अंतर्गत आने वाला यह गांव आज एक जीवंत विरोधाभास का प्रतीक बन चुका है। सफलता के शिखर और शिक्षा की अलख कभी अभावों और संघर्षों की कोख से निकले इस गांव ने देश को कई रत्न दिए हैं। साठ के दशक में जब उच्च शिक्षा दुर्लभ थी, तब इस क्षेत्र के पहले इंजीनियर स्व. सियाशरण सिंह ने पीडब्ल्यूडी (PWD) में अपनी मेधा का लोहा मनवाया था। आज उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गांव के मजदूर हरेंद्र महतो की सुपुत्री दिशा भारती ने नीट (NEET) क्रैक कर गया मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया है, जो पूरे गांव के लिए गर्व का विषय है। गांव की माटी से निकलकर डीएसपी योगेंद्र यादव, डॉक्टर रविंद्र यादव, त्रिपुरा में इतिहास के ,अर्थशास्त्र के प्रोफेसर, बैंक प्रबंधक, 1965 के भारत-पाक युद्ध के शहीद जयगोविंद यादव, तथा देश के कोने-को...

पटना : पाटलिपुत्र के बौद्धिक इतिहास से लेकर आधुनिक मरीन ड्राइव और सियासी गलियारों की धड़कन तक!

Image
      पटना महज एक शहर की भौगोलिक बानगी नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी सांस्कृतिक जड़ों, साहित्यिक चेतना, आधुनिक जीवनशैली और बिहार की गर्मागरम राजनीति का एक जीवंत दस्तावेज है। दुनिया के सबसे पुराने लगातार आबाद शहरों में शुमार, पटना का हर रंग अपने आप में अनूठा है। ​पटना की बहुआयामी तस्वीर ​ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर: मौर्य और गुप्त साम्राज्य की राजधानी रहा पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) प्राचीन काल से ही सत्ता, संस्कृति और बौद्धिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। यहाँ का कुम्हरार, गोलघर और तख्त श्री पटना साहिब इसकी समृद्ध विरासत की गवाही देते हैं। ​कला और साहित्यिक गतिविधियाँ: यह शहर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, फणीश्वर नाथ रेणु और आचार्य जानकीनंदन शास्त्री जैसे साहित्यकारों की कर्मभूमि व प्रेरणास्त्रोत रहा है। यहाँ के प्रेमचंद रंगशाला और विभिन्न सांस्कृतिक मंचों पर आज भी लोक कलाओं, नाटकों और साहित्य बैठकों का दौर जारी रहता है। ​शिक्षा का हब (Student Life): पटना केवल प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि देश भर के यूपीएससी (UPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लाख...

संवाद का सार: असहमति के साथ सह-अस्तित्व ।

Image
  किसी भी स्वस्थ और विकसित सभ्यता की नींव एकरूपता (सबका एक ही तरह सोचना या दिखना) पर नहीं, बल्कि असहमति के साथ सह-अस्तित्व की भावना पर टिकी होती है। वैचारिक विभिन्नताएँ किसी भी समाज की जीवंतता का प्रतीक होती हैं। किंतु, विडंबना यह है कि हम अक्सर अपनी बात को ही एकमात्र विचार मान लेते हैं और सामने वाले के अलग मत या असहमति को अपनी अवमानना या अनादर समझ बैठते हैं। यही सोच रिश्तों में दूरियों, ईर्ष्या और द्वेष की नींव रखती है, क्योंकि जब हम दूसरे की बात सुनने की क्षमता खो देते हैं, तो संवाद का पुल टूटने लगता है। वास्तविक संवाद का अर्थ केवल अपनी बात रखना या बोलना नहीं है, बल्कि सामने वाले के दृष्टिकोण को समझना भी है। जब तक हम असहमति का सम्मान करना और धैर्य से सुनना नहीं सीखेंगे, तब तक न तो सच्चे संवाद की स्थापना हो सकती है और न ही एक प्रबुद्ध समाज का निर्माण।

डिजिटल युग का नया जाल: डार्क पैटर्न और उपभोक्ताओं का शोषण।

Image
  डिजिटल दुनिया और ऑनलाइन सेवाओं ने हमारे जीवन को जितना आसान बनाया है, उतना ही हमारे सामने नए तरह के धोखे भी खड़े कर दिए हैं। हाल ही में सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी (CCPA) द्वारा एक राइड एग्रीगेटर पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि ऑनलाइन व्यवसायों में किस प्रकार ग्राहकों को गुमराह किया जा रहा है। डार्क पैटर्न क्या हैं और यह कैसे काम करते हैं? बास्केट स्नेकिंग: ट्रेन टिकट बुक करते समय बिना इच्छा के भोजन को साथ में जोड़ देना, जिसका भुगतान ग्राहक अनजाने में कर बैठते हैं। मनोवैज्ञानिक प्रलोभन: "जितनी अधिक कीमत, राइड मिलने की उतनी अधिक संभावना" जैसे प्रॉम्प्ट्स का उपयोग करके उपयोगकर्ताओं से अधिक किराया वसूला जाना। बैटरी और ओएस आधारित भेदभाव: कुछ राइड एग्रीगेटरों पर यह आरोप भी है कि वे उन उपयोगकर्ताओं से अधिक किराया वसूलते हैं जिनके फोन की बैटरी कम होती है या जो प्रीमियम ऑपरेटिंग सिस्टम का उपयोग करते हैं। डार्क पैटर्न केवल एक मनोवैज्ञानिक चाल नहीं है, बल्कि यह उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा डाका डाल रहा है।  Datum इंटेलिजेंस की एक रिपोर्ट के अनुसार, ...

शब्दों से परे: मौन की अद्भुत शक्ति और आत्ममंथन।

Image
    ​"मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं, बल्कि विचारों की वह गहराई है जहाँ सत्य स्वयं से संवाद करता है।" ​जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब हमें सबसे ज्यादा संयम की आवश्यकता होती है, ठीक उसी समय हम सबसे अधिक बोलते हैं। विशेषकर आक्रोश, आवेश या उत्तेजना के क्षणों में मुख से निकले अनियंत्रित शब्द न केवल परिस्थितियों को बिगाड़ देते हैं, बल्कि बरसों से बने रिश्तों की डोर को भी पल भर में तोड़ देते हैं। ​मौन: एक साधना और व्रत ​भारतीय संस्कृति और प्राचीन परंपराओं में मौन को यों ही महत्व नहीं दिया गया है। इसे 'मौन व्रत' का नाम दिया गया है, जो इस बात का प्रमाण है कि यह संयम, साधना और आत्म-नियंत्रण का सर्वोच्च रूप है। बिना कुछ कहे भी कई बार बहुत बड़े संदेश दिए जा सकते हैं। ​बुद्धिजीवियों, विचारकों और जवाबदेह पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए तो एक-एक शब्द की कीमत होती है। उन्हें हमेशा तौलकर बोलना चाहिए। एक बार जुबान फिसल जाने या गलत शब्द निकल जाने के बाद उसकी भरपाई करना कठिन हो जाता है। ​मौन और देहभाषा (Body Language) का तालमेल ​गहरी समझ: मौन रहकर केवल आंतरिक शांति ही नहीं मिलती, बल...