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राज्य-स्तरीय जाति सर्वेक्षण का औचित्य: एक नीतिगत आवश्यकता।

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    प्रशासनिक डेटा के एकीकरण और सामाजिक न्याय को लक्षित करने का व्यावहारिक मार्ग।  आगामी जनगणना के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत गणना जटिल और केंद्र-राज्य के मध्य परिभाषाओं के विवादों को जन्म दे सकती है। लेखकों के अनुसार, राष्ट्रीय जनगणना की तुलना में राज्य सरकारें जाति सर्वेक्षण आयोजित करने के लिए कहीं अधिक उपयुक्त हैं। किसी भी प्रभावी राज्य-स्तरीय सर्वेक्षण को इन पाँच बुनियादी प्रश्नों का उत्तर खोजना चाहिए: राज्य की कुल आबादी में संबंधित जाति का आनुपातिक प्रतिशत क्या है? उस जाति का भौगोलिक वितरण राज्य में कैसा है? शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ेपन का वास्तविक और मापने योग्य पैमाना क्या है? सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी नौकरियों में उनका आनुपातिक प्रतिनिधित्व कितना है? उच्च सरकारी व सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में उनकी भागीदारी की वर्तमान स्थिति क्या है?  राज्यों के पास पहले से ही ई-सेवा केंद्रों, जाति प्रमाण पत्रों, राशन कार्ड, आधार लिंकेज और विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं के माध्यम से विशाल डिजिटल डेटा उपलब्ध है। तमिलनाडु सरकार द्वारा घोषित किया गय...

विज्ञान में निवेश: परोपकार का नया और रणनीतिक नजरिया!

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    भारत की आर्थिक प्रगति ने देश में अरबपतियों के एक ऐसे नए वर्ग को जन्म दिया है, जो अब परोपकार को सिर्फ धार्मिक या सामाजिक कल्याण तक सीमित न रखकर एक रणनीतिक राष्ट्रीय निवेश के रूप में देख रहे हैं। एक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा रखने वाले देश के लिए सिर्फ सड़कों और डिजिटल बुनियादी ढांचे का निर्माण काफी नहीं है, बल्कि अनुसंधान प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों और एक मजबूत वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र की भी उतनी ही आवश्यकता है। वर्तमान चुनौतियाँ और परोपकार की जरूरत कम सरकारी और निजी खर्च: वैश्विक मानकों की तुलना में अनुसंधान और विकास पर भारत का खर्च अभी भी काफी पीछे है। पारंपरिक दान की सीमाएं: लंबे समय से भारत में निजी दान का एक बड़ा हिस्सा धार्मिक संस्थाओं और तात्कालिक सामाजिक जरूरतों (जैसे गरीबी और कल्याण) की ओर जाता रहा है। जोखिम भरा और दीर्घकालिक निवेश: वैज्ञानिक अनुसंधान के परिणाम आने में लंबा समय लगता है। परोपकारी पूंजी इस मामले में अद्वितीय है क्योंकि यह बिना किसी तात्कालिक व्यावसायिक लाभ के लंबे समय तक चलने वाले, उच्च-जोखिम वाले शोध का समर्थन कर सकती है। व्यापक नीति...

लोकतांत्रिक संकट और न्यायिक जवाबदेही: सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका पर सवाल !

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    यह चुनावी प्रक्रिया में मतदाताओं को बाहर किए जाने की समस्या और उसके प्रति सर्वोच्च न्यायालय के उदासीन व सुस्त रवैये की गंभीर समीक्षा  है। मतदान के अधिकार का क्षरण: चुनाव आयोग द्वारा लागू की गई 'विशेष गहन समीक्षा' (SIR) प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है। इसने गरीब, निरक्षर और प्रवासी मजदूरों जैसे हाशिए के नागरिकों के लिए मतदाता सूची में नाम बनाए रखना बेहद कठिन बना दिया है, जिसे विद्वान 'डिजिटल संरचनात्मक तानाशाही' भी कह रहे हैं। न्यायालय का विलंबित हस्तक्षेप: न्यायालय कार्यपालिका या चुनाव आयोग के निर्णयों को समय रहते चुनौती देने में विफल रहा है। बिहार के 'SIR' मामले में अदालत का फैसला तब आया जब चुनाव समाप्त हो चुके थे, जिससे यह निर्णय केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया। न्यायिक समीक्षा बनाम प्रशासनिक पक्षपात: न्यायालय ने इस प्रक्रिया में निष्पक्ष न्यायिक समीक्षा करने के बजाय खुद को प्रशासनिक समन्वय में शामिल कर लिया, जिससे लाखों मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया को बल मिला। अदालत ने जमीनी सामाजिक वास्तविकताओं (जैसे गरीबी और निरक्षरता) की पूरी तरह अनदेखी की। संस्थागत निष्...

​राम लखन सिंह यादव कॉलेज, पटना में 'प्लास्टिक मुक्त परिसर' अभियान का सफल आयोजन !

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    ​पटना, 13 जुलाई 2026: पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के निर्देशानुसार, आज राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनिसाबाद, पटना के राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) विभाग द्वारा "प्लास्टिक मुक्त परिसर जागरूकता कार्यक्रम" का आयोजन किया गया। ​कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सिंगल-यूज प्लास्टिक के दुष्प्रभावों के प्रति छात्रों और समुदाय में जागरूकता पैदा करना था। कार्यक्रम की शुरुआत सामूहिक राष्ट्रगान के साथ हुई, जिसके बाद एक विशाल जागरूकता रैली निकाली गई। कॉलेज परिसर से शुरू होकर अनिसाबाद गोलंबर तक निकाली गई इस रैली में छात्रों ने प्लास्टिक विरोधी नारे और बैनर के माध्यम से जन-जागरूकता का संदेश दिया। ​रैली के उपरांत, NSS स्वयंसेवकों ने कॉलेज परिसर में व्यापक सफाई अभियान चलाकर प्लास्टिक कचरा एकत्रित किया। कार्यक्रम के समापन पर प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद और NSS समन्वयक प्रो. प्रसिद्ध कुमार की उपस्थिति में सभी विद्यार्थियों और कर्मचारियों ने प्लास्टिक का उपयोग न करने की शपथ ली। प्रो. प्रसिद्ध कुमार ने बताया कि यह अभियान छात्रों में पर्यावरणीय जिम्मेदारी की भावना विकसित करने के लिए निरंतर जारी रहेगा। ​द्...

वेतन, पेंशन और बकाये अनुदान की मांगों को लेकर 'वित्त रहित शिक्षा संयुक्त संघर्ष मोर्चा' का जनसंपर्क अभियान शुरू !

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    Mlc के साथ वित्त रहित के नेतागण।   विधान परिषद सदस्य प्रो० नवल किशोर यादव ने दिया शीघ्र कार्रवाई का आश्वासन!  पटना। शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन, पेंशन तथा बकाये अनुदान के महत्वपूर्ण सवालों को लेकर आज से 'वित्त रहित शिक्षा संयुक्त संघर्ष मोर्चा' का व्यापक  जनसंपर्क अभियान प्रारंभ हो गया है। अभियान  के पहले दिन मोर्चा के प्रतिनिधियों ने बिहार विधान परिषद के माननीय सदस्य प्रो० नवल किशोर यादव से मुलाकात की और अपनी गंभीर समस्याओं से उन्हें अवगत कराया। इस मुलाकात के दौरान लंबित मांगों पर विस्तृत चर्चा हुई। माननीय सदस्य प्रो० नवल किशोर यादव ने मोर्चा को पूरी तरह आश्वस्त किया है कि मुख्यमंत्री के स्तर से बकाया अनुदान का भुगतान जल्द ही कर दिया जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने वेतन और पेंशन से जुड़े मामलों पर भी शीघ्र सकारात्मक कार्रवाई कराने का दृढ़ आश्वासन दिया है। मोर्चा के नेतृत्व ने यह साफ कर दिया है कि अपनी जायज मांगों को लेकर उनका यह संघर्ष और घेराव अभियान कल भी पूरी एकजुटता के साथ जारी रहेगा। आज के इस घेराव व धरना अभियान में वित्त रहित मोर्चा के अध्यक...

अहिंसा की शक्ति: जब संवेदना ने बदल दी परंपरा की दिशा !

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     अधिकारी पूरन महतो की कहानी।  भगवान बुद्ध की करुणा, भगवान महावीर का अहिंसा का सिद्धांत और महात्मा गांधी का सत्याग्रह—ये केवल अतीत की बातें नहीं हैं।  ​इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े युद्धों और संघर्षों का अंत हथियारों से नहीं, बल्कि प्रेम, संवेदना और अहिंसा के मार्ग से हुआ है। भगवान बुद्ध की करुणा, भगवान महावीर का अहिंसा का सिद्धांत और महात्मा गांधी का सत्याग्रह—ये केवल अतीत की बातें नहीं हैं, बल्कि ये आज भी हमारे समाज की आधारशिला हैं। पश्चिम बंगाल के लालगढ़ से आई एक घटना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि आज के दौर में भी 'संवेदना' सबसे बड़ा हथियार है। ​एक अनूठी पहल: जब अधिकारी ने झुका दिए सिर ​यह घटना वर्ष 2018 की है। मिदनापुर की अतिरिक्त प्रभागीय वन अधिकारी (DFO) पुरबी महतो के सामने एक बड़ी चुनौती थी। लगभग 5,000 आदिवासियों का एक समूह पारंपरिक शिकार उत्सव के लिए जंगल में प्रवेश करने वाला था। अधिकारी को भय था कि इस भीड़ के जंगल में जाने से वहां मौजूद बाघ के सुरक्षित जीवन पर खतरा उत्पन्न हो सकता है। ​कानूनी सख्ती के बजाय, उन्होंने जो किया वह मानवता का एक दुर्लभ उदाहर...

भारतीय उच्च शिक्षा में बदलाव की आवश्यकता!

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     ​ चीन ने हाल ही में अपने भविष्य के कार्यबल की जरूरतों को देखते हुए अपने एक-तिहाई स्नातक पाठ्यक्रमों को बंद कर दिया है और एआई (AI), रोबोटिक्स और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में नए पाठ्यक्रम शुरू किए हैं। इसके विपरीत, भारत के शिक्षा संस्थान अभी भी पुरानी परंपराओं पर चल रहे हैं।  नवीनतम 'इंडिया स्किल्स रिपोर्ट' के अनुसार, भारत के केवल 56% स्नातक ही रोजगार के योग्य हैं। पारंपरिक पाठ्यक्रमों (जैसे BBA, BA, BCom) की मांग गिर रही है, जबकि एआई और मशीन लर्निंग जैसे क्षेत्रों में कौशल की मांग बढ़ रही है। ​भारत को चीन के मॉडल की नकल करने के बजाय अपनी अनूठी लोकतांत्रिक संरचना और जरूरतों के अनुसार शिक्षा प्रणाली को सुधारना चाहिए। इंजीनियरिंग और मानविकी के पाठ्यक्रमों को 'सिस्टम थिंकिंग' और 'डिजिटल ह्यूमैनिटीज' जैसे आधुनिक विषयों के साथ जोड़ना आवश्यक है। केवल डिग्री लेना पर्याप्त नहीं है; पाठ्यक्रम के साथ 'कौशल संवर्धन' को अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए। भारत को एक ऐसे ढांचे की आवश्यकता है जहाँ प्रत्येक छात्र में एआई और डेटा साक्षरता के साथ-साथ अपने विषय का गहरा ज्ञान ...