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साहित्य: सहानुभूति और दूसरों के प्रति समझ का एक पुल।

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    ( डॉ संजीव कुमार दाहिनी तरफ प्रो विनोद कुमार)  मानव स्वभाव ही है कि हम अपने अनुभवों के केंद्र में जीते हैं। हम अपने अनुभवों के आधार पर दुनिया को समझने का प्रयास करते हैं, लेकिन यही बात हमें दूसरों के प्रति असंवेदनशील भी बना देती है। हम दूसरों की पीड़ा को तब तक पूरी तरह महसूस नहीं कर पाते हैं, जब तक हम उनके संसार के भीतर प्रवेश न करें। साहित्य हमें यही अवसर प्रदान करता है। साहित्य के माध्यम से हम दूसरों के अनुभवों को समझने का प्रयास करते हैं, उनकी पीड़ा को महसूस करते हैं और उनके संसार के भीतर प्रवेश करते हैं। साहित्य हमें सहानुभूति और करुणा का पाठ पढ़ाता है। साहित्य के माध्यम से हम दूसरों के प्रति अपनी समझ को बढ़ा सकते हैं, उनके प्रति सहानुभूति और करुणा का अनुभव कर सकते हैं। साहित्य हमें एक बेहतर इंसान बनाता है, एक बेहतर समाज का निर्माण करने में मदद करता है। #साहित्य #अनुभूति #समझ #करुणा #समाज #बेहतर इंसान #संवेदना

न्याय, संघर्ष और उम्मीद का नया इतिहास: दीपांशु शौकीन और दिल्ली यूनिवर्सिटी के चुनाव ।

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    दिल्ली विश्वविद्यालय (DUSU) के छात्रसंघ चुनाव हमेशा से राजनीति, रसूख और पैसे की चमक-दमक के लिए जाने जाते रहे हैं। यहाँ के गलियारों से निकले छात्र आगे चलकर देश की राजनीति की मुख्यधारा का हिस्सा बनते हैं। लेकिन इस बार का चुनाव इन तमाम पुरानी परिभाषाओं को पीछे छोड़ गया। इस बार की जीत किसी बड़े राजनीतिक दल के रसूख की नहीं, बल्कि एक डीटीसी बस कंडक्टर के बेटे की बेबाक और दर्द से उपजी आवाज की जीत है। जब दर्द बनता है अलार्म: 'न्याय सत्याग्रह' की अनकही कहानी सितंबर की तपती दोपहरी में दिल्ली यूनिवर्सिटी के दक्षिणी कैंपस के पास स्थित सत्य निकेतन की एक इमारत ('हॉस्टल डेज') अचानक भरभरा कर बैठ गई। इस मलबे में 5 छात्रों और 2 मजदूरों की जान चली गई। यह हादसा सिर्फ एक इमारत का गिरना नहीं था, बल्कि उन हजारों छात्रों की सुरक्षा पर एक बड़ा सवाल था जो दिल्ली के महंगे और अनधिकृत पीजी (PG) में रहने को मजबूर हैं। इस हादसे के बाद कैंपस में एक लड़का ऐसा उठा जिसने अपने पैरों से जूते उतार दिए। नाम था दीपांशु शौकीन। उसने कसम खाई कि जब तक इन मासूम बच्चों को इंसाफ नहीं मिल जाता, वह पैरों में जूता-...

अमेरिका के प्रतिबंध अधिनियम का भारत पर प्रभाव।

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      अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026' का मुख्य उद्देश्य रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध के वित्तपोषण से रोकना है।   यह अधिनियम रूस से तेल आयात करने वाले देशों पर 100% तक का भारी शुल्क (टैरिफ) लगाने का प्रावधान करता है।   ​भारत पर प्रभाव के मानदंड: यदि भारत रूस के कच्चे तेल का आयात जारी रखता है और शीर्ष पांच बड़े आयातों में शामिल रहता है, या रूस प्रतिबंधों से बचने में मदद करता है, तो भारत पर यह टैरिफ लागू हो सकता है।    यदि भारत को आयात कम करना पड़ा, तो देश के भीतर ईंधन की आपूर्ति और कीमतों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।   अमेरिकी राष्ट्रपति राष्ट्रीय हितों का हवाला देकर इस टैरिफ को माफ कर सकते हैं, या यदि रूस यूक्रेन के साथ शांति समझौता कर लेता है, तो इस स्थिति से बचा जा सकता है।  

बिहार की राजनीति का नया समीकरण: जब तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए संजीव कुमार ने दी थी! कुर्बानी ।

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     कुल पंजीकृत शिक्षकों/मतदाताओं की संख्या लगभग 16,600 के आसपास है। बिहार की सियासत में इन दिनों जातिगत समीकरणों से परे एक नई इबारत लिखी जा रही है। हाल ही में सामने आए राजनीतिक घटनाक्रम  के अनुसार, राज्य की राजनीति में बदलाव की एक बयार बह रही है।    राजनीति का नया अध्याय और बड़ा कदम तेजस्वी यादव का समर्थन:  पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से मजबूती के साथ खड़े संजीव कुमार ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए एक बड़ी राजनीतिक कुर्बानी दी थी ।    NDA का मोह त्याग: एक तरफ जहां राजनीतिक दलों में पारंपरिक समीकरणों पर जोर रहता है, वहीं इस कदम ने यह साबित किया है कि बदलाव के लिए बड़े फैसलों की जरूरत होती है, जहां एक ओर नेताओं ने पारंपरिक पाबंदियों को पीछे छोड़ा है।    भूमिहार-यादव समीकरण: बिहार की दो प्रमुख और मुखर जातियों—भूमिहार और यादव—के एक साथ आने की चर्चा राजनीतिक गलियारों में तेज हो गई है।    क्या बदलेगा महासंग्राम का रुख? सवाल यह उठ रहा है कि क्या अब महागठबंधन के लोग एमएलसी चुनाव में पूरी ताकत से जीत हासिल कर पाएंगे...

( संस्मरण) केसिंगा की माटी: अभाव के आंचल से आत्मीयता के सफर तक। -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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ओडिशा के अंचल में फैला कलाहांडी जिला और उसकी गोद में बसा केसिंगा कस्बा, प्रकृति की सुंदर छटा और इतिहास के एक लंबे संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है। छोटी-छोटी पहाड़ियों और सघन जंगलों के बीच घिरा यह आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र कभी देश के सबसे पिछड़े इलाकों में गिना जाता था। अस्सी के दशक का वह दौर आज भी सिहरन पैदा कर देता है, जब भीषण सूखे की मार ने यहाँ के जनजीवन को झकझोर कर रख दिया था। उस वक्त पेट की आग बुझाने के लिए लोगों को जंगलों की घास और पत्तों का सहारा लेना पड़ता था। विकास के पदचिह्न और ऐतिहासिक पदयात्रा इस बदहाली के भंवर से कलाहांडी को निकालने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने यहाँ सिंचाई और बुनियादी विकास की नींव रखी। उस दौर में यहाँ के जुझारू सांसद भक्त चरण दास थे, जिन्होंने क्षेत्र के विकास में अहम भूमिका निभाई। आगे चलकर चंद्रशेखर की सरकार में वे रेल राज्य मंत्री बने और उनके तथा तत्कालीन गृह राज्य मंत्री के नेतृत्व में केसिंगा और टिटिलागढ़ जैसे रेलवे स्टेशनों का कायाकल्प हुआ। यह क्षेत्र तब राष्ट्रीय सुर्खियों में आया जब अस्सी के दशक में चंद्रशेखर के नेतृत्व में...

जरासंध का सिद्धांत और राजनीतिक दलों का विभाजन।

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  भारतीय राजनीति में कॉरपोरेट तर्ज पर राजनीतिक दलों के विभाजन का विचार नया नहीं है। कांग्रेस से लेकर कई कम्युनिस्ट पार्टियों और हाल ही में शिवसेना के विभाजन में यह देखा जा चुका है। अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) की बारी है।    राजनीतिक दलों में 'ब्रांड' और प्रतीकों की लड़ाई पश्चिम बंगाल में आगामी दो उपचुनावों में प्रतिनिधित्व के उद्देश्य से TMC के 'फूल और घास' चुनाव चिन्ह पर अधिकार को लेकर संघर्ष छिड़ गया है।    चुनाव आयोग (EC) द्वारा नाम और प्रतीक को अंतरिम रूप से फ्रीज करना, एकनाथ शिंदे बनाम उद्धव ठाकरे के 'असली शिवसेना कौन है?' के फार्मूले जैसा ही एक सटीक कदम है। इसे राजनीति पर 'जरासंध पूंजीवाद' लागू करना कहा जा सकता है, जिसमें इकाई को दो हिस्सों में बांट दिया जाता है और फिर यह खोजा जाता है कि दोनों हिस्से खुद को असली बता रहे हैं।    कंपनियों के लिए सबसे मूल्यवान संपत्ति उनका ब्रांड होती है। इसी प्रकार राजनीतिक ब्रांडों में भी नेताओं, नारों, वफादारियों, रंगों और प्रतीकों की संचित विरासत शामिल होती है।    एक मतदाता चुनाव चिन्ह आदेश 1968 के पैरा 1...

निजी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं और दवाओं के मूल्य निर्धारण को सुगम बनाना ।

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    ​निजी अस्पतालों में दवाओं, मेडिकल उपकरणों और उपभोग्य सामग्रियों पर अत्यधिक मुनाफाखोरी मरीजों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। महाराष्ट्र एफडीए के एक सर्वेक्षण के अनुसार, सामान्य उपभोग्य सामग्रियों पर 2,841% तक का अत्यधिक मार्कअप देखा गया है, जिसे मरीज समझ नहीं पाते और न ही उनके पास मोलभाव करने की शक्ति होती है। केंद्र सरकार और एनपीपीए (NPPA) द्वारा निजी स्वास्थ्य देखभाल की कीमतों को न्यायसंगत और पारदर्शी बनाने के लिए पांच प्रमुख सुझाव दिए गए हैं:   ​पारदर्शिता और पूर्वानुमान: प्रत्येक अस्पताल को डिजिटल प्रारूप में अपनी मूल्य सूची (शेड्यूल ऑफ चार्जेस) प्रकाशित करनी चाहिए ताकि नियोजित प्रक्रियाओं के लिए मरीजों को पहले ही अनुमानित खर्च मिल सके।    आवश्यक सामग्रियों और उपकरणों पर अत्यधिक मुनाफे की जांच होनी चाहिए, और खरीद मूल्य की पारदर्शिता से अनुचित मार्जिन पर दबाव पड़ेगा।   केवल मूल्य कैप लगाने से समस्या का समाधान नहीं होता; इसके लिए चिकित्सीय रूप से आवश्यक प्रक्रियाओं और नैदानिक ​​लेखापरीक्षणों (क्लिनिकल ऑडिट) का उपयोग किया जाना चाहिए ताकि ...