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सरला माहेश्वरी: जहाँ चेहरा नहीं, शब्द और चरित्र बोलते थे!

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  ​आज की कानफोड़ू 'ब्रेकिंग न्यूज़' और चकाचौंध भरे स्टूडियो के शोर में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एक सौम्य चेहरा आंखों के सामने तैर जाता है— सरला माहेश्वरी । दूरदर्शन के उस श्वेत-श्याम और शुरुआती रंगीन दौर की वह एक ऐसी आवाज़ थीं, जिसने पत्रकारिता को 'ग्लैमर' से नहीं, बल्कि 'गरिमा' से परिभाषित किया था। ​सादगी का सौंदर्य और शब्दों का संस्कार ​सरला जी का व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति की उस शालीनता का प्रतिबिंब था, जिसे आज के दौर में ढूँढना कठिन है। सीधा पल्लू, माथे पर एक छोटी सी बिंदी और चेहरे पर वह ठहराव, जो दर्शकों को सहज ही अपना बना लेता था। उनके लिए समाचार पढ़ना केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी थी। जब वे स्क्रीन पर अवतरित होती थीं, तो ऐसा लगता था मानो परिवार का कोई सदस्य घर के बैठक में बैठकर देश-दुनिया का हाल सुना रहा हो। ​संयम की प्रतिमूर्ति ​1982 से समाचार वाचन की कमान संभालने वाली सरला जी ने कभी आवाज़ की तीव्रता से खबरों को बड़ा दिखाने की कोशिश नहीं की। उनकी आवाज़ में वह गंभीरता थी, जो बिना चिल्लाए भी गहरा असर छोड़ती थी। ​"उनकी पत्रकारिता...

वंदे मातरम बिना किसी संसदीय कानून या संवैधानिक संशोधन के थोपा गया।

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1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और 1937 का समझौता ​ 1937 में कांग्रेस कार्य समिति ने यह निर्णय लिया था कि केवल पहले दो अंतरा ही 'राष्ट्रीय गीत' के रूप में गाए जाएंगे। ​यह निर्णय इसलिए लिया गया था क्योंकि बाद के अंतराओं में हिंदू देवियों (दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती) का आह्वान किया गया है, जो एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में अन्य धर्मों के नागरिकों की मान्यताओं से टकरा सकता था। ​रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने भी केवल पहले दो अंतराओं को ही सर्वस्वीकार्य माना था। ​ 2. संवैधानिक और कानूनी तर्क ​अनुच्छेद 51A: संविधान के मौलिक कर्तव्यों में 'राष्ट्र ध्वज' और 'राष्ट्रगान' (जन गण मन) का सम्मान करने की बात है, लेकिन 'राष्ट्रीय गीत' (वंदे मातरम) का उल्लेख जानबूझकर नहीं किया गया है। ​बिजोय इमैनुएल केस (1986): सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण उसे गाता नहीं है, तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता। ​ जब राष्ट्रगान (जिसका उल्लेख संविधान में है) गाने के लिए मजबूर...

संरक्षणवाद से सक्रिय भागीदारी तक का सफर !

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  ​ भारत का व्यापारिक इतिहास स्वाधीनता के बाद "वस्तु विनिमय" (Barter trade) और सोवियत संघ के साथ सीमित व्यापार से शुरू हुआ था। अतीत में भारत अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए संरक्षणवादी नीति अपनाता था, लेकिन वर्तमान सरकार ने इस हिचकिचाहट को छोड़कर अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे बड़े बाजारों के साथ जुड़ने का "साहसिक" निर्णय लिया है। ​वैश्विक व्यापार का बदलता परिदृश्य ​WTO की चुनौतियां: विश्व व्यापार संगठन (WTO) के विवाद निपटान तंत्र के कमजोर होने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में आए तनाव के कारण अब बहुपक्षीय समझौतों के बजाय द्विपक्षीय FTA (मुक्त व्यापार समझौते) अधिक प्रभावी हो गए हैं। ​रणनीतिक स्वायत्तता: भारत अब केवल कागजी सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि लागत-लाभ (Cost-benefit) के व्यावहारिक आकलन पर अपनी विदेश नीति तय कर रहा है। ​भारत-अमेरिका समझौते के मुख्य लाभ ​निर्यात में वृद्धि: भारत ने 2024-25 में अमेरिका को 86.5 बिलियन डॉलर का निर्यात किया। इस समझौते से उन वस्तुओं पर टैरिफ कम होगा जहां भारत की पकड़ मजबूत है (जैसे: जेनेरिक दवाएं, रत्न-आभूषण और विमान के पुर्जे)। ...

फिल्म समीक्षा: महाराज (2024)

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  ​ ऐतिहासिक संदर्भ और सामाजिक आईना,  अंधभक्ति पर प्रहार   ! ​फिल्म 'महाराज' भारत के एक ऐसे काले अध्याय को उजागर करती है जहाँ धर्म की आड़ में सत्ता और वासना का खेल खेला गया। यह फिल्म 1862 के ऐतिहासिक 'बॉम्बे लिबेल केस' पर आधारित है, जो पत्रकार करसनदास मुलजी और एक ताकतवर धर्मगुरु के बीच की कानूनी लड़ाई थी। ​ कहानी का मुख्य आधार: फिल्म की कहानी 1860 के दशक के बॉम्बे के इर्द-गिर्द घूमती है। मुख्य पात्र करसनदास मुलजी (जुनैद खान) एक सुधारवादी पत्रकार हैं, जो तर्क और नैतिकता में विश्वास रखते हैं। उनकी टक्कर जदुनथजी महाराज (जयदीप अहलावत) से होती है, जो एक बेहद प्रभावशाली संप्रदाय के प्रमुख हैं। महाराज खुद को भगवान का प्रतिनिधि बताकर महिला अनुयायियों के साथ 'चरण सेवा' के नाम पर यौन शोषण करते हैं। जब करसनदास की अपनी मंगेतर इस कुप्रथा का शिकार होती है, तो वे इस व्यवस्था के खिलाफ जंग छेड़ देते हैं। ​ फिल्म के मुख्य बिंदु: ​ अंधभक्ति पर प्रहार : फिल्म बखूबी दिखाती है कि कैसे श्रद्धा का दुरुपयोग करके मासूमों और उनके परिवारों का मानसिक शोषण किया जाता है। जैसा कि आपन...

न्याय की चौखट पर 'तालाबंदी': जब रक्षक ही बन जाएं व्यवस्था के लिए चुनौती !

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  "तारीख पर ताला" ! ​दानापुर (पटना) में न्याय की आस लेकर आने वाले फरियादियों के लिए यह हफ्ता किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं रहा। एक तरफ तारीखों का लंबा इंतजार और दूसरी तरफ बार-बार होने वाली कार्यबंदी। बार एसोसिएशन दानापुर द्वारा जारी यह ताजा पत्र (Ref No. 28) इसी अव्यवस्था की जलती हुई मशाल है। ​आखिर कब तक चलेगा यह 'हड़ताली ड्रामा'? ​हैरानी की बात है कि एक ही हफ्ते में छह बार कोर्ट का काम बाधित हुआ है। पत्र में "सुरक्षा की दृष्टि" का हवाला देते हुए आज 12 फरवरी से 15 फरवरी 2026 तक न्यायिक कार्यों से अलग रहने का निर्णय लिया गया है। सवाल यह उठता है कि क्या सुरक्षा के नाम पर न्याय की प्रक्रिया को ही बंधक बना लेना उचित है? ​पीड़ित क्लाइंट: दूर-दराज से अपनी जमा-पूंजी खर्च कर आने वाले मुवक्किलों का क्या? उनकी तारीखें निकल जाती हैं, किराया बर्बाद होता है और न्याय और भी दूर हो जाता है। ​परेशान वकील और मुंशी: यह केवल व्यवस्था की हार नहीं है, बल्कि उन जूनियर वकीलों और मुंशियों की कमर तोड़ने वाला फैसला है जिनका घर दैनिक काम पर निर्भर करता है। ​सिस्टम की विफलता: यदि सुरक...

स्वार्थ से मानवता की ओर: एक वैचारिक यात्रा!

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  ​आज के प्रतिस्पर्धी युग में 'स्वार्थ' शब्द को अक्सर नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन क्या स्वार्थ पूरी तरह वर्जित होना चाहिए? चित्र में दिए गए विचार इस पर एक नई और गहरी रोशनी डालते हैं। ​१. स्वार्थ की प्रकृति: जोड़ना या तोड़ना? —मुद्दा यह नहीं है कि हम स्वार्थी हैं या नहीं, बल्कि यह है कि हमारे स्वार्थ का परिणाम क्या है। ​ सकारात्मक स्वार्थ: यदि हमारा स्वार्थ हमें रिश्तों को बेहतर बनाने और समाज में जुड़ाव पैदा करने के लिए प्रेरित करता है, तो वह सृजनात्मक है। ​ नकारात्मक स्वार्थ: जब स्वार्थ रिश्तों की नींव कमजोर करने लगे और केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित हो जाए, तो वह विनाशकारी बन जाता है। ​२. वह सीमा जहाँ स्वार्थ 'मानवता' बन जाता है ​ मनुष्य को अपने लाभ की खोज वहां रोक देनी चाहिए जहाँ से दूसरों की पीड़ा शुरू होती है। ​"जिस दिन हम अपने लाभ की सीमा वहाँ रोक देंगे जहाँ से दूसरों की पीड़ा शुरू होती है, उसी दिन स्वार्थ मानवता में बदल जाएगा।" ​यह पंक्ति सिखाती है कि आत्म-कल्याण तब तक उचित है जब तक वह पर-कल्याण में बाधक न बने। सहानुभूति और संवेदनशी...

भक्ति या विनाश: धार्मिक आड़ में बढ़ता नशे का मायाजाल!

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  ​भारतीय समाज में एक पुरानी कहावत प्रचलित है— "भांग मांगे दूध मलाई, गांजा मांगे घीउ।" यह कहावत इस भ्रम को पालती है कि गांजा या भांग का सेवन शरीर को बलवान बनाता है। लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है। विज्ञान और वास्तविकता गवाह है कि नशा शरीर को बनाता नहीं, बल्कि 'गलाता' है। आज के समय में, विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच, नशा 'भक्ति' और 'चिल' करने का एक खतरनाक माध्यम बन चुका है। ​1. आस्था की आड़ में अधर्म ​अक्सर मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर 'बम शंकर' के जयकारों के साथ गांजे की चिलम सुलगाई जाती है। लोग इसे भगवान शिव का प्रसाद मानकर जायज ठहराते हैं। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या ब्रह्मांड के रचयिता को प्रसन्न करने के लिए किसी नशे की आवश्यकता है? ​पुराणों के अनुसार, शिव और आदि शक्ति ने पंचतत्वों का निर्माण जीवन को चलाने के लिए किया था, उसे नष्ट करने के लिए नहीं। जिसे लोग 'शिव की बूटी' कहते हैं, वह असल में चेतना को सुन्न करने का साधन है। सच्ची उपासना होश में रहकर की जाती है, बेहोशी में नहीं। धार्मिक स्थलों पर नशे का यह 'खुला खेल' न केवल...