ऊर्जा संकट और आर्थिक विवशता: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चुनौतीपूर्ण विकल्प !
आर्थिक झटका: यदि कच्चे तेल की कीमत $100 प्रति बैरल रहती है, तो यह भारत की जीडीपी (GDP) पर 2% का सीधा प्रभाव डालेगी। यह $80 बिलियन के अतिरिक्त खर्च के बराबर है। राजकोषीय दबाव: सरकार वर्तमान में उत्पाद शुल्क में कटौती और सब्सिडी के माध्यम से इस बोझ का एक बड़ा हिस्सा (जीडीपी का 1.2%) खुद वहन कर रही है। अब समय आ गया है कि सरकार कीमतों को बाजार के अनुरूप बढ़ने दे। कठिन निर्णय: पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹10 प्रति लीटर की वृद्धि करने से राजकोषीय घाटे में 0.4% की कमी आ सकती है। हालांकि यह कदम महंगाई बढ़ा सकता है, लेकिन यह डॉलर की मांग को कम करने और रुपये को स्थिर करने के लिए आवश्यक है। भारत को अब सब्सिडी के बजाय 'नई ऊर्जा वास्तविकताओं' को स्वीकार करना होगा। अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के लिए उपभोक्ताओं को उच्च कीमतों का बोझ उठाना पड़ सकता है, ताकि भविष्य में बड़े आर्थिक संकट से बचा जा सके।