संप्रभु ऋण का चक्रव्यूह: विकास की आड़ में आम आदमी पर बढ़ता वित्तीय बोझ !
## 1 पूंजीगत व्यय बनाम बाह्य ऋण किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए अवसंरचना का निर्माण अनिवार्य है। इसके लिए जब घरेलू राजस्व कम पड़ता है, तो सरकारें वर्ल्ड बैंक जैसे बहुपक्षीय संस्थानों से दीर्घकालिक ऋण लेती हैं। आर्थिक शब्दावली में इसे राजकोषीय घाटे को पाटने का जरिया माना जाता है। परंतु जब बाह्य ऋण की संचयी राशि अत्यधिक बढ़ जाती है, तो देश का ऋण सेवा अनुपात बिगड़ने लगता है। इसका अर्थ यह है कि देश के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा विकास कार्यों में लगने के बजाय केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च होने लगता है। ## 2. कराधान का प्रतिगामी प्रभाव जब सरकार पर विदेशी कर्ज और ब्याज का दबाव बढ़ता है, तो राजकोषीय समेकन के लिए राजस्व बढ़ाना अनिवार्य हो जाता है। ऐसे में सरकारें प्रत्यक्ष करों जैसे इनकम टैक्स, जो अमीरों पर ज्यादा लगता है) के बजाय अप्रत्यक्ष करों जैसे GST, ईंधन पर वैट/एक्साइज ड्यूटी) पर निर्भरता बढ़ा देती हैं। आर्थिक सिद्धांत के अनुसार, अप्रत्यक्ष कर प्रतिगामी होते हैं। एक गरीब मजदूर और एक अरबपति, दोनों को एक लीटर पेट्रोल या एक पैके...