"मृतक भोज': सामाजिक पाखंड और विवशता का जीवंत दस्तावेज़
झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा! 1. कथानक और विषय-वस्तु प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से समाज में व्याप्त उस कुप्रथा को उजागर किया है जहाँ परिवार के सदस्य की मृत्यु के शोक के बीच भी व्यक्ति को समाज (बिरादरी) को भोजन कराने के लिए मजबूर किया जाता है। कहानी का मुख्य पात्र, जो पहले से ही दरिद्रता और अपनों को खोने के गम से जूझ रहा है, समाज के तथाकथित ठेकेदारों के दबाव में आकर कर्ज लेने को विवश हो जाता है। 2. सामाजिक विडंबना का चित्रण प्रेमचंद दिखाते हैं कि किस तरह 'धर्म' के नाम पर शोषण का चक्र चलता है। बिरादरी के लोग सहानुभूति दिखाने के बजाय इस बात पर अधिक ध्यान देते हैं कि भोजन में घी कितना है और पकवान क्या-क्या बने हैं। यह कहानी यह सवाल उठाती है कि: क्या किसी की मृत्यु पर किया जाने वाला आडंबरपूर्ण भोज वाकई मृतक की आत्मा को शांति देता है? या यह केवल जीवितों के अहंकार और समाज के डर का परिणाम है? 3. पात्र चित्रण कहानी के पात्र अत्यंत सजीव हैं। एक तरफ वह लाचार व्यक्ति है जो लोक-लाज के भय से तिल-तिल मर रहा है, और दूसरी तरफ वे लालची पुरोहित और स्वार्थी बिरादरी के लोग हैं जो ...