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फिल्म समीक्षा: महाराज (2024)

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  ​ ऐतिहासिक संदर्भ और सामाजिक आईना,  अंधभक्ति पर प्रहार   ! ​फिल्म 'महाराज' भारत के एक ऐसे काले अध्याय को उजागर करती है जहाँ धर्म की आड़ में सत्ता और वासना का खेल खेला गया। यह फिल्म 1862 के ऐतिहासिक 'बॉम्बे लिबेल केस' पर आधारित है, जो पत्रकार करसनदास मुलजी और एक ताकतवर धर्मगुरु के बीच की कानूनी लड़ाई थी। ​ कहानी का मुख्य आधार: फिल्म की कहानी 1860 के दशक के बॉम्बे के इर्द-गिर्द घूमती है। मुख्य पात्र करसनदास मुलजी (जुनैद खान) एक सुधारवादी पत्रकार हैं, जो तर्क और नैतिकता में विश्वास रखते हैं। उनकी टक्कर जदुनथजी महाराज (जयदीप अहलावत) से होती है, जो एक बेहद प्रभावशाली संप्रदाय के प्रमुख हैं। महाराज खुद को भगवान का प्रतिनिधि बताकर महिला अनुयायियों के साथ 'चरण सेवा' के नाम पर यौन शोषण करते हैं। जब करसनदास की अपनी मंगेतर इस कुप्रथा का शिकार होती है, तो वे इस व्यवस्था के खिलाफ जंग छेड़ देते हैं। ​ फिल्म के मुख्य बिंदु: ​ अंधभक्ति पर प्रहार : फिल्म बखूबी दिखाती है कि कैसे श्रद्धा का दुरुपयोग करके मासूमों और उनके परिवारों का मानसिक शोषण किया जाता है। जैसा कि आपन...

न्याय की चौखट पर 'तालाबंदी': जब रक्षक ही बन जाएं व्यवस्था के लिए चुनौती !

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  "तारीख पर ताला" ! ​दानापुर (पटना) में न्याय की आस लेकर आने वाले फरियादियों के लिए यह हफ्ता किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं रहा। एक तरफ तारीखों का लंबा इंतजार और दूसरी तरफ बार-बार होने वाली कार्यबंदी। बार एसोसिएशन दानापुर द्वारा जारी यह ताजा पत्र (Ref No. 28) इसी अव्यवस्था की जलती हुई मशाल है। ​आखिर कब तक चलेगा यह 'हड़ताली ड्रामा'? ​हैरानी की बात है कि एक ही हफ्ते में छह बार कोर्ट का काम बाधित हुआ है। पत्र में "सुरक्षा की दृष्टि" का हवाला देते हुए आज 12 फरवरी से 15 फरवरी 2026 तक न्यायिक कार्यों से अलग रहने का निर्णय लिया गया है। सवाल यह उठता है कि क्या सुरक्षा के नाम पर न्याय की प्रक्रिया को ही बंधक बना लेना उचित है? ​पीड़ित क्लाइंट: दूर-दराज से अपनी जमा-पूंजी खर्च कर आने वाले मुवक्किलों का क्या? उनकी तारीखें निकल जाती हैं, किराया बर्बाद होता है और न्याय और भी दूर हो जाता है। ​परेशान वकील और मुंशी: यह केवल व्यवस्था की हार नहीं है, बल्कि उन जूनियर वकीलों और मुंशियों की कमर तोड़ने वाला फैसला है जिनका घर दैनिक काम पर निर्भर करता है। ​सिस्टम की विफलता: यदि सुरक...

स्वार्थ से मानवता की ओर: एक वैचारिक यात्रा!

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  ​आज के प्रतिस्पर्धी युग में 'स्वार्थ' शब्द को अक्सर नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन क्या स्वार्थ पूरी तरह वर्जित होना चाहिए? चित्र में दिए गए विचार इस पर एक नई और गहरी रोशनी डालते हैं। ​१. स्वार्थ की प्रकृति: जोड़ना या तोड़ना? —मुद्दा यह नहीं है कि हम स्वार्थी हैं या नहीं, बल्कि यह है कि हमारे स्वार्थ का परिणाम क्या है। ​ सकारात्मक स्वार्थ: यदि हमारा स्वार्थ हमें रिश्तों को बेहतर बनाने और समाज में जुड़ाव पैदा करने के लिए प्रेरित करता है, तो वह सृजनात्मक है। ​ नकारात्मक स्वार्थ: जब स्वार्थ रिश्तों की नींव कमजोर करने लगे और केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित हो जाए, तो वह विनाशकारी बन जाता है। ​२. वह सीमा जहाँ स्वार्थ 'मानवता' बन जाता है ​ मनुष्य को अपने लाभ की खोज वहां रोक देनी चाहिए जहाँ से दूसरों की पीड़ा शुरू होती है। ​"जिस दिन हम अपने लाभ की सीमा वहाँ रोक देंगे जहाँ से दूसरों की पीड़ा शुरू होती है, उसी दिन स्वार्थ मानवता में बदल जाएगा।" ​यह पंक्ति सिखाती है कि आत्म-कल्याण तब तक उचित है जब तक वह पर-कल्याण में बाधक न बने। सहानुभूति और संवेदनशी...

भक्ति या विनाश: धार्मिक आड़ में बढ़ता नशे का मायाजाल!

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  ​भारतीय समाज में एक पुरानी कहावत प्रचलित है— "भांग मांगे दूध मलाई, गांजा मांगे घीउ।" यह कहावत इस भ्रम को पालती है कि गांजा या भांग का सेवन शरीर को बलवान बनाता है। लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है। विज्ञान और वास्तविकता गवाह है कि नशा शरीर को बनाता नहीं, बल्कि 'गलाता' है। आज के समय में, विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच, नशा 'भक्ति' और 'चिल' करने का एक खतरनाक माध्यम बन चुका है। ​1. आस्था की आड़ में अधर्म ​अक्सर मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर 'बम शंकर' के जयकारों के साथ गांजे की चिलम सुलगाई जाती है। लोग इसे भगवान शिव का प्रसाद मानकर जायज ठहराते हैं। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या ब्रह्मांड के रचयिता को प्रसन्न करने के लिए किसी नशे की आवश्यकता है? ​पुराणों के अनुसार, शिव और आदि शक्ति ने पंचतत्वों का निर्माण जीवन को चलाने के लिए किया था, उसे नष्ट करने के लिए नहीं। जिसे लोग 'शिव की बूटी' कहते हैं, वह असल में चेतना को सुन्न करने का साधन है। सच्ची उपासना होश में रहकर की जाती है, बेहोशी में नहीं। धार्मिक स्थलों पर नशे का यह 'खुला खेल' न केवल...

तकनीकी संपन्नता और मानवीय संवेदनाओं का ह्रास !

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  ​आज के युग में तकनीकी संसाधनों की प्रचुरता ने ज्ञान के द्वार तो खोल दिए हैं, लेकिन मानवीय संबंधों की गहराई को सोख लिया है। "युवा वर्ग जानकारी से तो भरा है, पर भावनात्मक संचार से शून्य है" , आधुनिक समाज की एक गंभीर व्याधि की ओर इशारा करता है। ​1. सूचना का विस्फोट बनाम संवेदना का अभाव ​इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण आज की युवा पीढ़ी 'इंफॉर्मेशन ओवरलोड' (सूचना के अतिरेक) का शिकार है। उनके पास हर विषय पर डेटा है, लेकिन उस डेटा को संवेदना में बदलने का समय नहीं है। ​डिजिटल दीवार: भौतिक उपस्थिति की जगह इमोजी और टेक्स्ट मैसेज ने ले ली है, जिससे स्पर्श और स्वर की वह गर्माहट खत्म हो गई है जो रिश्तों को जोड़ती है। ​सृजनात्मकता पर चोट: जब मस्तिष्क केवल दूसरों द्वारा परोसी गई जानकारी को "कंज्यूम" करने में लगा रहता है, तो उसकी अपनी मौलिक सोच और सृजनात्मक क्षमता (Creative Ability) कुंद होने लगती है। ​2. उपदेश की निष्फलता  युवाओं को 'उपदेश' से नहीं सुधारा जा सकता। वे तकनीकी रूप से इतने जागरूक हैं कि वे किसी भी तर्क के नकारात्मक और सकारात्मक प्रभाव को पहले से जानते...

समझौते की प्रकृति: कूटनीति या दबाव?

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  ​1 ​भारत ने अमेरिकी टैरिफ के डर से रूस से सस्ता तेल खरीदने की अपनी संप्रभुता (Sovereignty) का त्याग किया है। ​अमेरिकी टैरिफ में जो कटौती की गई है, वह वास्तव में कोई 'तोहफा' नहीं बल्कि पूर्व में लगाए गए अनुचित टैरिफ की आंशिक वापसी है। ​डोनाल्ड ट्रंप की "अस्थिरता" इस समझौते को कभी भी खतरे में डाल सकती है, क्योंकि ट्रंप ने पहले भी दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ हुए समझौतों से हाथ पीछे खींचे हैं। ​2. दीर्घकालिक लाभ बनाम तात्कालिक नुकसान ​यह समझौता भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन (जैसे सेमीकंडक्टर और एआई) में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करता है। ​भारत अब केवल 'असेंबली' तक सीमित नहीं है, बल्कि इनोवेशन और अनुसंधान की ओर बढ़ रहा है। ​चंद्रशेखरन के अनुसार, एआई (AI) और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में भारत की बढ़त इस सौदे को भारत के पक्ष में मोड़ती है। ​3. एआई (AI) और मानव संसाधन की शक्ति ​संदेह: हालांकि भारत के पास लाखों स्टेम (STEM) स्नातक हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता पर सवाल हैं। ट्रंप की नीतियां भविष्य में भारतीय आईटी पेशेवरों (H-1B वीजा) के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती ...

विकास की कीमत: सांसों में घुलता धीमा जहर!

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  ​आज हम जिस 'आधुनिकता' और 'औद्योगिकीकरण' का उत्सव मना रहे हैं, उसकी एक भयावह कीमत हमारी सांसें चुका रही हैं। पिछले कुछ दशकों में वाहनों की बढ़ती संख्या और अनियंत्रित औद्योगिक विस्तार ने पर्यावरण को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ हवा अब जीवनदायिनी नहीं, बल्कि विषाक्त हो चुकी है। ​ नीतिगत विफलता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव ​यह एक कड़वी सच्चाई है कि आर्थिक विकास के आंकड़ों (GDP) को चमकाने की होड़ में पर्यावरण को हमेशा हाशिए पर रखा गया। जब तक नीतियां केवल कागजों तक सीमित रहेंगी और उद्योगों के लिए मानक केवल दिखावा होंगे, तब तक 'कार्बन उत्सर्जन' में कमी लाना एक काल्पनिक लक्ष्य ही बना रहेगा। ​ अदृश्य हत्यारा: वायु प्रदूषण ​ ​अस्पतालों में वायु प्रदूषण के कारण हृदय रोग, अस्थमा और फेफड़ों के कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। ​विडंबना यह है कि इन मौतों को 'वायु प्रदूषण-जनित' नहीं माना जाता, बल्कि इन्हें सामान्य बीमारी के रूप में दर्ज किया जाता है। ​यही कारण है कि यह एक 'स्वास्थ्य संकट' होने के बावजूद आधिकारिक फाइलों में एक अदृश्य संकट बना हुआ है। जब तक हम मौ...