अनुज का स्नेह-स्पर्श: जहाँ मर्यादा ही प्रेम की परिभाषा है!
सम्बन्धों के मरूस्थल में कभी-कभी आत्मीयता की ऐसी फुहारें पड़ती हैं कि हृदय का कोना-कोना तृप्त हो जाता है। आज अपने अनुज छबिला को देखकर मन इसी संतोष से भर उठा है। वह केवल मेरा छोटा भाई नहीं, मेरे लिए 'भरत' जैसा सहोदर है, जिसके भीतर आज के आधुनिक युग में भी त्रेतायुगीन मर्यादाएँ जीवित हैं। मर्यादा, जो डर नहीं... लिहाज है छबिला जेल पुलिस में हवलदार है—एक ऐसा पद जहाँ अनुशासन और कड़ाई उसकी दिनचर्या का हिस्सा है। पर घर की दहलीज लांघते ही वह वही छोटा 'छबिला' बन जाता है। ताज्जुब होता है देखकर कि आज भी वह मेरे सामने सीधे आँखें उठाकर बात नहीं करता। यह डर नहीं है, यह वह 'लिहाज' है जो हमारी संस्कृति की जड़ों को सींचता है। वह जानता है कि बड़ा भाई पिता का प्रतिरूप होता है, और उसी आदर की ओट में वह अपनी आत्मीयता ढूँढता है। एक जादुई स्पर्श: जब थकान ने घुटने टेक दिए विवाह की व्यस्तताओं और भागदौड़ ने देह को शिथिल कर दिया था। थकान हड्डियों तक महसूस हो रही थी। तभी अनुज आया और किसी कुशल पेशेवर की भाँति मेरे पैर दबाने लगा, मालिश करने लगा। उसके हाथों में जैसे कोई जादुई मरहम था। एक घंट...