महाराज, रॉयल्टी कमाएं, मजदूरी नहीं: भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष मूल चुनौती!
भारत ने बीते एक दशक में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है, लेकिन आर्थिक आंकड़ों के गहराई से विश्लेषण से एक असहज सच सामने आता है। भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक असेंबली लाइन और उपभोक्ता बाजार के रूप में तो उभरा है, लेकिन वास्तविक मूल्य और वैश्विक ब्रांड्स के स्वामित्व के मामले में वह काफी पीछे रह गया है। भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा कमाए गए प्रति ₹100 के लाभ में से केवल ₹56 ही देश में रुकते हैं। इसके विपरीत चीन 91%, इंडोनेशिया 96% और ब्राजील 88% लाभ अपने पास बनाए रखते हैं। FY23 से FY26 के बीच, भारत से लाभांश का बहिर्वाह $118.9 अरब और रॉयल्टी/IP भुगतान $46.6 अरब तक पहुंच गया। कुल $344.4 अरब का बहिर्वाह $230.6 अरब के नए इक्विटी आगमन से अधिक है। भारत बौद्धिक संपदा के मोर्चे पर प्रतिवर्ष लगभग $14.5 अरब के शुद्ध घाटे का सामना कर रहा है। भारत का परिदृश्य: भारत का श्रम, कारखाने और उपभोक्ता मूल्य तो बनाते हैं, लेकिन उच्च लाभांश वाले तत्व जैसे—ब्रांड्स, पेटेंट, प्लेटफॉर्म्स और proprietary टेक्नोलॉजी विदेशी कंपनियों के पास हैं। भारत G...