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​कंधे पर कंकाल: व्यवस्था की संवेदनहीनता का क्रूर चेहरा !

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    ​हाल ही में ओडिशा के क्योंझर से आई एक तस्वीर ने मानवता और आधुनिक भारत के दावों को झकझोर कर रख दिया है। एक गरीब आदिवासी, जीतू मुंडा, अपनी मृत बहन के शव को कब्र से निकालकर, उसके कंकाल को कंधे पर लादकर बैंक पहुंच गया। क्यों? क्योंकि उसे अपनी बहन के खाते में जमा महज 19,000 रुपये निकालने थे और बैंक ने बिना 'मृत्यु प्रमाणपत्र'  के पैसा देने से मना कर दिया था। ​यह घटना केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की उस सड़ांध को उजागर करती है जहाँ कागजी औपचारिकताएं इंसान की गरिमा और भूख से बड़ी हो गई हैं। ​लालफीताशाही और गरीब की लाचारी डिजिटल इंडिया और बैंकिंग सुधारों के दावों के बीच, धरातल पर सच्चाई आज भी डरावनी है। एक अनपढ़ और गरीब आदिवासी के लिए मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल करना किसी हिमालय फतह करने से कम नहीं है। बैंक अधिकारियों का अड़ियल रवैया और 'केवाईसी' (KYC) के नाम पर आम जनता का उत्पीड़न यह दर्शाता है कि नीतियां बनाने वाले लोग ज़मीनी हकीकत से कितने दूर हैं। ​विडंबना: जिस देश में अरबों के घोटाले करने वाले बैंक की आंखों में धूल झोंककर विदेश भाग जाते हैं, उसी देश में एक गरीब...

बुद्ध का मार्ग: पर्यटन से परे, एक सभ्यता का पुनर्मिलन !

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   ​अक्सर जब हम पर्यटन की बात करते हैं, तो हमारे मन में केवल सुंदर दृश्य या घूमने-फिरने की जगहें आती हैं। लेकिन भारत के लिए 'बुद्धिस्ट सर्किट' (बौद्ध पथ) केवल एक टूरिस्ट रूट नहीं है—यह हमारी साझा विरासत की एक ऐसी जीवंत महाधमनी (Highway) है, जो हमें दुनिया भर की सभ्यताओं से जोड़ती है। ​हाल ही में बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर भारत ने बुद्ध को करुणा और शांति के शिक्षक के रूप में याद किया। लेकिन अब समय आ गया है कि हम बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर जैसे पवित्र स्थानों को केवल 'अलग-अलग स्टॉप्स' के बजाय एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में देखें। ​क्यों जरूरी है यह 'सिविलाइज़ेशनल हाईवे'? ​बौद्ध धर्म केवल एक मत नहीं, बल्कि अनुभव की परंपरा है। जब दुनिया भर से कोई श्रद्धालु भारत आता है, तो वह केवल एक पर्यटक नहीं होता, वह अपनी जड़ों की ओर लौट रहा होता है: ​जापानी तीर्थयात्री के लिए बोधगया ज़ेन और 'प्योर लैंड' परंपराओं का संगम है। ​श्रीलंकाई श्रद्धालु महावंश और उस बोधिवृक्ष की शाखा के माध्यम से जुड़ाव महसूस करते हैं, जिसे सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा ले गई थीं। ​थाई और दक्षिण कोरिय...

मानिकचंद की विरासत: प्यास से प्यार तक का सफर ! -प्रो प्रसिद्ध कुमार.

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   ​पटना के अनीसाबाद की आबोहवा में आज भी एक अजीब सी कशिश है। यहाँ की मिट्टी में परोपकार की पुरानी सुगंध और आधुनिक प्रेम की ताजी धड़कनें एक साथ घुली-मिली हैं। ​अतीत का दर्पण: एक सेठ का संकल्प ​बात उन्नीसवीं सदी के ढलान की है, साल रहा होगा 1890। कोलकाता की व्यस्त गलियों से निकलकर व्यवसायी मानिकचंद जब अनीसाबाद की धरती पर पधारे, तो उन्होंने देखा कि यहाँ की जमीन प्यासी थी। लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए मीलों का सफर तय करते थे। मानवता के प्रति उनके हृदय में जो करुणा जागी, उसी का परिणाम था यह 10.5 एकड़ में फैला विशाल जलाशय। ​मानिकचंद ने केवल मिट्टी नहीं खुदवाई, बल्कि प्यासे कंठों के लिए एक उम्मीद जगाई। तालाब के किनारे महादेव का मंदिर स्थापित किया गया, ताकि देह की प्यास पानी से और आत्मा की प्यास भक्ति से शांत हो सके। दशकों तक यह तालाब स्थानीय लोगों के लिए जीवनरेखा बना रहा। ​वर्तमान की लहरें: प्यास से प्यार का संगम ​समय का चक्र घूमा और आज वही ऐतिहासिक मानिकचंद तालाब, जो कभी 'प्यास' बुझाने के लिए बना था, अब 'प्यार' की नई इबारत लिख रहा है। राम लखन सिंह यादव कॉलेज के प्रांगण में स्...

सुशासन की बलि चढ़ते युवाओं के सपने: बिहार में परीक्षाओं का 'लीक तंत्र'!

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   ​बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) द्वारा सहायक शिक्षा विकास पदाधिकारी (AEDO) की नौ पालियों की परीक्षा रद्द किया जाना कोई इक्की-दुक्की घटना नहीं है, बल्कि यह उस लंबी और शर्मनाक फेहरिस्त का नया अध्याय है जिसने बिहार के प्रतियोगी छात्रों के भविष्य को अधर में लटका रखा है। "सुशासन" का दम भरने वाली सरकार के दौर में परीक्षा प्रणाली का इस कदर खोखला होना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि राज्य की समूची व्यवस्था पर एक गहरा दाग भी है। ​बीते दो दशकों का काला इतिहास: धांधली के प्रमुख पड़ाव ​पिछले बीस वर्षों में बिहार में ऐसी शायद ही कोई बड़ी परीक्षा रही हो, जो विवादों, पेपर लीक या न्यायालय के हस्तक्षेप से न गुजरी हो। यहाँ 'परीक्षा रण' अब प्रतिभा का नहीं, बल्कि 'जुगाड़' और 'तकनीकी सेंधमारी' का रण बन गया है। ​BPSC 67वीं प्रारंभिक परीक्षा (2022): प्रश्नपत्र लीक होने के कारण परीक्षा शुरू होने के कुछ ही समय बाद इसे रद्द करना पड़ा। यह पहली बार था जब BPSC जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की साख सरेआम नीलाम हुई। ​बिहार सिपाही भर्ती परीक्षा (2023): बड़े पैमाने पर धांधली और ब्लूटूथ के इस्तेम...

​युद्ध नहीं, बुद्ध की राह: क्या हम अपनी ही विरासत को भूल रहे हैं?

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   ​"करुणा के सागर महात्मा बुद्ध—जिन्होंने शस्त्र नहीं, शास्त्र और शांति से विश्व को जीता।" ​आज जब हम दुनिया के नक्शे पर नजर डालते हैं, तो भारत की पहचान 'बुद्ध की धरती' के रूप में होती है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि शांति और अहिंसा का जो पाठ पूरी दुनिया पढ़ रही है, उसका केंद्र हमारा देश रहा है। लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि जिस ज्ञान ने विश्व को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया, उसे हम भारतीय कहीं न कहीं ढोंग, पाखंड और अंधविश्वास की धुंध में खोते जा रहे हैं। ​बुद्ध का ज्ञान: जीवन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण ​महात्मा बुद्ध की शिक्षाएं केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तार्किक और वैज्ञानिक तरीका हैं। उन्होंने हमें जो रत्न दिए, वे आज भी प्रासंगिक हैं: ​चार आर्य सत्य: जीवन की वास्तविकता और दुखों से मुक्ति का स्पष्ट रोडमैप। ​अष्टांगिक मार्ग: एक ऐसा संतुलन जो नैतिक आचरण, मानसिक अनुशासन और प्रज्ञा (बुद्धि) का विकास करता है। ​कर्म का सिद्धांत: भाग्य के भरोसे बैठने के बजाय अपने कर्मों के प्रति उत्तरदायी होना। ​अनात्मवाद और शून्यता: अहंकार को त्यागने और संसार की परिवर्तनशीलत...

​युग का निर्माता: मजदूर! ( कविता) - प्रो प्रसिद्ध कुमार.

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    ​वो पसीना बहाकर धरती का श्रृंगार करता है, शून्य से शिखर तक का हर मार्ग तैयार करता है। महल खड़े हों या कारखाने, नीव उसी ने डाली है, उसके ही हाथों की मेहनत से चमन में हरियाली है। ​किंतु विडंबना देखो... ​दफ्तर हो या खेत-खलिहान, शोषण का व्यापार वही, कम दाम और बेबस शाम, थका-हारा संसार वही। फटेहाल जीवन की चादर, भूखे प्यासे दिन बीते, कानूनों की फाइलों में बस चंद अधूरे हित जीते। ​बाजारों की भीड़ में वो 'सामान' बना खड़ा रहता, मांग और पूर्ति के तराजू पर हर दिन जड़वत तुला रहता। न्यूनतम मजदूरी की बातें बस कागजों का गहना हैं, बेरोजगारी के जख्मों को उसे चुपचाप ही सहना है। ​जरा याद रहे... ​जिसमें अथाह शक्ति है, वो धरा बदल सकता है, वो चाहे तो राजा को रंक, और रंक को राजा कर सकता है। ये गगनचुम्बी अट्टालिकाएं उसकी ही तो काया हैं, पर खुद के लिए उसने बस 'धूप' को ही पाया है। ​ऐ मजदूर! तू जाग जरा, अपनी ताकत को पहचान तू, बिखरा हुआ जो श्रम तेरा, उसे बना एक महान तू। एकजुटता की हुंकार भरेगा, तो तकदीर बदल जाएगी, तेरी मेहनत की हर एक बूंद, फिर सही मोल भी पाएगी। ​सलाम उन हाथों को, जो सृजन करते हैं!  ...

जनसांख्यिकीय लाभांश: अवसर या एक गहराता संकट?

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  भारत अक्सर गर्व के साथ अपनी युवा आबादी का ज़िक्र करता है। आंकड़े बताते हैं कि हमारी 65% से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है और औसत आयु मात्र 28 वर्ष है। लेकिन क्या यह 'गोल्डमाइन' (स्वर्ण खदान) वाकई हमें आर्थिक समृद्धि की ओर ले जा रही है, या यह एक दबाव बनता जा रहा है? 1. ज़मीनी हकीकत और बेरोज़गारी का दबाव कागज़ों पर जो 'अवसर' दिखता है, वह ज़मीन पर एक भारी दबाव के रूप में महसूस होता है: भारत की कुल बेरोज़गार आबादी में 83% हिस्सा युवाओं का है। शहरी युवाओं में बेरोज़गारी की दर 18.8% है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि स्नातक पास करने वाले युवाओं में से केवल 51% ही रोज़गार के योग्य (employable) हैं। 2. 'गिग इकोनॉमी' और मज़बूरी का चुनाव आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, गिग वर्कर्स (अस्थायी कर्मचारी) की संख्या में 55% की भारी वृद्धि हुई है। हालांकि इसे अक्सर फ्लेक्सिबिलिटी (लचीलापन) के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि युवा पसंद से नहीं, बल्कि कमज़ोर मांग और कौशल की कमी के कारण इन कामों की ओर रुख कर रहे हैं। यह स्थिति युवाओं को दीर्घकालिक करियर बना...