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एक कलाकार की साधना और संघर्ष: उदय कुमार और उनकी कृति 'पचरंगा'! मेरे अनन्य मित्र -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    ​ वे 1988 में राम लखन सिंह यादव कॉलेज (अनीसाबाद, पटना) से स्नातक किये थे।  ​कला के प्रति समर्पित जीवन और समाज के हर रंग को अपनी लेखनी में समेटने वाले खगौल के सुपुत्र उदय कुमार जी का नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक मंझे हुए कलाकार, गायक और नाट्य लेखक के रूप में उन्होंने नाट्य की दुनिया में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। ​कला के प्रति अटूट समर्पण ​1988 में राम लखन सिंह यादव कॉलेज (अनीसाबाद, पटना) से स्नातक करने वाले उदय जी ने अपने कला प्रेम के लिए दानापुर रेलवे की सुरक्षित और प्रतिष्ठित नौकरी को त्याग दिया। उनका पूरा जीवन मंच (Stage) के नाम रहा है। पटना के कालिदास रंगालय, एन.सी. घोष (खगौल) और प्रेमचंद रंगशाला जैसे प्रमुख मंचों से लेकर देश के कई राज्यों तक उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता और नाट्य प्रस्तुतियों से दर्शकों का दिल जीता है। बिहार सरकार ने भी उनके इस अतुल्य योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया है। ​साहित्य की नई कड़ी: 'पचरंगा' ​उनकी नवीनतम कृति 'पचरंगा' समाज के विभिन्न पहलुओं और मानवीय संवेदनाओं का एक जीवंत दस्तावेज है। पुस्तक का आवरण ही यह बयां कर देता है क...

शिक्षा के मंदिर में 'रिश्वत' का धंधा — गुरु नहीं, यह शिक्षा के नाम पर कलंक है !

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  शिक्षा को समाज का तीसरा नेत्र माना गया है और एक शिक्षक को उस नेत्र को खोलने वाला मार्गदर्शक। लेकिन जब ज्ञान के इसी मंदिर का मुख्य पुजारी ही सौदागर बन जाए, तो पूरी व्यवस्था की नींव हिल जाती है।  पटना के संपतचक स्थित उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय, चैनपुर के प्रधानाध्यापक कुणाल प्रियदर्शी को ₹50,000 की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया है। शर्म की बात यह है कि यह रिश्वत कोई बड़ा ठेका पास कराने के लिए नहीं, बल्कि वार्षिक माध्यमिक परीक्षा 2026 में सफल हुए 152 गरीब छात्रों के अंक प्रमाण पत्र (Marksheet) और सी.एल.सी. (CLC) देने के एवज में ₹400 प्रति छात्र के हिसाब से मांगी जा रही थी। 1. छात्रों के भविष्य और अधिकारों का सौदा एक छात्र जब कड़ी मेहनत के बाद परीक्षा पास करता है, तो उसकी मार्कशीट और सर्टिफिकेट उसका कानूनी अधिकार होते हैं। उन दस्तावेजों पर उसकी आगे की पढ़ाई और करियर टिका होता है। एक प्रधानाध्यापक  द्वारा अपने ही स्कूल के उत्तीर्ण छात्रों से उनके वैध कागजात देने के लिए प्रति छात्र ₹400 की डिमांड करना यह दर्शाता है कि शिक्षा का स्तर कितना गिर चुका है। यह ...

भारत में नशा मुक्ति: दंड से उपचार की ओर एक अनिवार्य बदलाव!

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    ​भारत आज दो तरफा नशीली दवाओं की चुनौती के बीच खड़ा है। पश्चिम में स्थित 'गोल्डन क्रिसेंट' और पूर्व में स्थित 'गोल्डन ट्राइएंगल' के बीच भौगोलिक स्थिति ने भारत को तस्करी का एक प्रमुख केंद्र बना दिया है। ड्रोन, डार्कनेट और क्रिप्टोकरेंसी के बढ़ते उपयोग ने इस खतरे को और अधिक जटिल कर दिया है। हालाँकि, इस समस्या का सबसे दुखद पहलू इसका केवल कानूनी और दंडात्मक दृष्टिकोण है। ​वर्तमान में, हमारी नीति नशीली दवाओं की जब्ती और छोटी-मोटी गिरफ्तारियों पर अधिक केंद्रित है। लेकिन यह 'नशा-विरोधी' अभियान जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। सबसे बड़ी विसंगति यह है कि जहाँ छोटे स्तर पर नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले युवा आपराधिक रिकॉर्ड के कारण अपनी आजीविका खो रहे हैं, वहीं बड़े ड्रग-माफियाओं और अवैध दवा निर्माताओं पर नाममात्र की कार्रवाई हो रही है। ​नशा मुक्ति के लिए चल रहे मौजूदा प्रयासों में भी गंभीर खामियाँ हैं। अधिकांश पुनर्वास केंद्र शहरी इलाकों में सिमटे हुए हैं, जबकि समस्या का घनत्व ग्रामीण और सीमावर्ती गाँवों में अधिक है। इसके अतिरिक्त, निजी नशा मुक्ति केंद्रों में होने वाली...

सैन्य पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही!

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   कोटि कोटि नमन!   यह विलंबित सम्मान, युद्ध के दौरान परिचालन गोपनीयता और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच के नाजुक संतुलन पर सरकार की अविश्वशनीयता  है।  कैसे एक सरकार 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का नाम लेकर अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए तथ्यों को छुपाई है।  ​पारदर्शिता का अभाव और राजनीतिक नैरेटिव:  सरकार ने 'ऑपरेशन सिंदूर' (2025) के दौरान मारे गए छह सैनिकों के बलिदान को स्वीकार करने में एक साल से अधिक का समय लिया। यह देरी सरकार की उस "अतिशयोक्तिपूर्ण आत्म-प्रशंसा" वाली रणनीति के विपरीत है, जो वह सार्वजनिक रूप से अपनाती रही। ​संसद को गुमराह करना: कैसे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जुलाई 2025 में लोकसभा में दावा किया कि "कोई भारतीय सैनिक हताहत नहीं हुआ"। सरकार द्वारा बाद में इसे "संदर्भ" के नाम पर स्पष्ट करने का प्रयास, उसकी विश्वसनीयता को और कम करता है। ​गोपनीयता बनाम जवाबदेही:  सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह है कि 'परिचालन गोपनीयता' और 'सार्वजनिक जवाबदेही' में अंतर होता है। युद्ध में होने वाली हताहतों को छिपाना शायद सरकार के राजनीतिक हितों क...

बिहार बिजली: ToD टैरिफ का नया नियम - अब बिजली के समय से तय होता आपका बिल!

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     बिहार में बिजली विभाग ने 'टाइम ऑफ डे' (ToD) टैरिफ लागू किया है, जहाँ बिजली की दरें उपयोग करने के समय पर निर्भर करेंगी। ​नया रेट चार्ट: ​सस्ती बिजली: सुबह 9:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक (निर्धारित दर से 20% कम)। ​महंगी बिजली: शाम 5:00 बजे से रात 11:00 बजे तक (पीक ऑवर्स होने के कारण महंगी)। ​सामान्य दर: रात 11:00 बजे से सुबह 9:00 बजे तक (सामान्य रेट)। ​महत्वपूर्ण जानकारी: ​यह नियम स्मार्ट मीटर/प्रीपेड मीटर वाले उपभोक्ताओं पर लागू है। ​कृषि फीडर से जुड़े उपभोक्ताओं को इस नियम से पूरी तरह बाहर रखा गया है। ​बचत का मंत्र: वॉशिंग मशीन, पानी की मोटर, प्रेस और गीजर जैसे भारी बिजली खपत वाले उपकरण सुबह 9 से शाम 5 के बीच चलाएं। इससे आप महीने के बिल में 10% से 15% तक की बचत आसानी से कर सकते हैं।

सत्ता का अहंकार और लोकतंत्र की मर्यादा: एक आत्मचिंतन ! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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     भरत तिवारी की  ह्त्या  'बहादुरी' नहीं, बल्कि 'कायरतापूर्ण' कृत्य है।  सत्ता का यह 'मिजाज' पतन की पटकथा खुद ही लिख रहा है।  ​राजनीति में सत्ता का मद अक्सर व्यक्ति को जमीन से दूर कर देता है। जब सत्ताधारी अपनी जिम्मेदारियों को भूलकर प्रतिशोध की राजनीति में लिप्त हो जाते हैं, तो उसका खामियाजा न केवल समाज को, बल्कि अंततः उस सत्ता को भी भुगतना पड़ता है। बिहार की वर्तमान राजनीति में सम्राट चौधरी के बयानों और कार्यशैली पर उठ रहे सवाल इसी 'अहंकार' और 'बदले की भावना' की ओर इशारा कर रहे हैं। ​सत्ता का मद और प्रतिशोध की राजनीति ​लोकतंत्र में मुख्यमंत्री का पद जनता की सेवा और राज्य के विकास के लिए होता है, न कि किसी विशिष्ट जाति या वर्ग के प्रति द्वेष निकालने के लिए। पिछले कुछ समय में जिस तरह से राजद के नेतृत्व और विशेषकर यादव समाज को लक्ष्य बनाकर कार्रवाई की गई है, वह राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चिंता का विषय रहा है। ​अक्सर यह देखा गया है कि जब सत्ता में बैठे व्यक्ति का भाषा और व्यवहार में संयम नहीं रहता, तो उसके समर्थक भी उसी राह पर चलने लगते हैं। समाज म...

आस्था की रक्षा, भरोसे की वापसी: क्या मंदिर के चंदे में पारदर्शिता जरूरी है?

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    ​अयोध्या का राम मंदिर केवल पत्थरों से बनी एक संरचना नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है। हालांकि, हाल ही में राम मंदिर के दान में कथित हेराफेरी को लेकर जो जांच सामने आई है, उसने इस पावन स्थल की छवि पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। जब आस्था के केंद्रों से भ्रष्टाचार की खबरें आती हैं, तो यह न केवल वित्तीय नुकसान होता है, बल्कि उस नैतिक नींव को भी कमजोर करता है जिस पर लोगों की भक्ति टिकी होती है। ​आस्था और पारदर्शिता का मेल मंदिर, मस्जिद या चर्च—ये सभी केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि ये समुदायों के भरोसे के केंद्र हैं। भक्त अपनी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा ईश्वर के प्रति समर्पण भाव से देते हैं, न कि किसी व्यक्ति विशेष को अमीर बनाने के लिए। जब उस दान का दुरुपयोग होता है, तो यह जनता के साथ एक विश्वासघात के समान है। ​जांच की आवश्यकता: SIT का कदम हाल ही में SIT द्वारा दान की पूरी प्रक्रिया—चंदा इकट्ठा करने से लेकर बैंक में जमा करने तक—की जांच करने का निर्णय एक स्वागत योग्य और आवश्यक कदम है। पारदर्शिता पूरी तरह होनी चाहिए। राम मंदिर जैसे संस्थान, जो दशकों के संघर्ष...