मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा के ओछे बोल और विकृत मानसिकता: संवैधानिक पदों पर बैठकर समाज बांटने की खुली छूट नहीं मिल सकती।
खुद जैसे खेत की मूली समझते हो यादव को। ये प्रेम की बाँसुरी बजता है और दुष्टों को नरसंहार करने के लिए सुदर्शन चक्र भी। बिहार की राजनीति में राजनेताओं द्वारा अपनी भाषाई मर्यादा भूलकर अमर्यादित और समाज को खंडित करने वाले बयान देने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला बिहार सरकार के मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा के उस बेहद गैर-जिम्मेदाराना और आपत्तिजनक बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने एक पूरे सम्मानित समाज को निशाना बनाते हुए आपत्तिजनक शब्दावली का इस्तेमाल किया। जब सत्ता के गलियारों में बैठे लोग ही इस तरह की ओछी भाषा का प्रयोग करने लगें, तो यह लोकतंत्र के माथे पर एक गहरा कलंक बन जाता है। ऐसी रुग्ण और संकीर्ण मानसिकता रखने वाले व्यक्ति को एक पल भी मंत्रिमंडल में बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है, और उन्हें अविलंब बर्खास्त किया जाना चाहिए। राजनीतिक अवसरवादिता और दोहरे मापदंड यह बेहद विडंबनापूर्ण और हास्यास्पद है कि एक तरफ उन्हीं की पार्टियों और गठबंधनों में यादव समाज के नेता अहम पदों पर काबिज हैं—चाहे भाजपा की ओर से नित्यानंद राय और राम कृपाल यादव हों, या जदयू क...