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​हंगरी का चुनाव: लोकतंत्र की वापसी और तानाशाही का अंत!

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    ​यह  हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन की 16 साल पुरानी सत्ता के पतन और उनके उत्तराधिकारी पीटर मग्यार की जीत का विश्लेषण है। यह चुनाव न केवल हंगरी के लिए, बल्कि वैश्विक लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है।  ​चुनावी निरंकुशता का अंत: हंगरी के मतदाताओं ने इस भ्रम को तोड़ दिया है कि 'अनुदार लोकतंत्र' (Illiberal Democracy) को चुनाव के जरिए नहीं हटाया जा सकता। यह जीत उन देशों के लिए एक मिसाल है जहाँ सत्ता को अजेय मान लिया जाता है। ​लोकतांत्रिक लचीलापन: यह परिणाम उन दावों को खारिज करता है कि उदार लोकतंत्र अब अप्रासंगिक हो गया है। जनता ने साबित किया है कि बहुमत के आधार पर तानाशाही थोपने वाले शासन के खिलाफ बदलाव की इच्छा एक स्वाभाविक मानवीय प्रेरणा है। ​यूक्रेन युद्ध का प्रभाव: ओर्बन ने चुनाव को अपने और जेलेंस्की के बीच के मुकाबले के रूप में पेश किया था। मतदाताओं ने ओर्बन के 'रूसी समर्थक' रुख और आर्थिक संकट के लिए यूक्रेन की मदद को दोष देने वाली थ्योरी को नकार दिया। ​भ्रष्टाचार और विदेशी प्रभाव:  जनता ने ओर्बन के 'क्रोनी कैपिटलिज्म' (सांठगांठ वाली पूंजीवाद) और रूस...

"मूर्खता का महोत्सव" - (कविता) - प्रो प्रसिद्ध कुमार.

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  ​चढ़ा दो थाली, लुटा दो माल, यहाँ अक्ल की विदाई है, बगल में दबाए ढोंग की पोटली, पाखंडियों की तो अब कमाई है। ​समय की होली घंटों कतार में खड़े रहो, पत्थर को अपना 'कल' सौंप दो, जो वक्त बदलना था खुद को तराश कर, उसे बाबा के चरणों में झोंक दो। फुर्सत कहाँ है तुम्हें तरक्की सोचने की, अभी तो शनि और राहु को टोकना है, जिंदगी की दौड़ में पीछे रह गए, पर बिल्ली का रास्ता अभी रोकना है। ​धन का विसर्जन जेब खाली है, घर में तंगी है, पर चंदे की रसीद कटानी है, दवा के पैसे बाबा को दे दिए, अब भभूत से बीमारी भगानी है। सोना चढ़ाया उस मूरत पर, जिसने कभी भूख नहीं देखी, और पड़ोसी भूखा सो गया— पर तुम्हारी भक्ति तो बड़ी 'नेकी' है! ​बुद्धि का दीवाला पढ़े-लिखे गधे घूम रहे हैं, डिग्री को ताबीज बना कर, तर्क को खूंटी पर टांग दिया, अंधविश्वास का सुरमा लगा कर। ईश्वर भी सोचता होगा ऊपर बैठकर, कि मैंने तो 'इंसान' बनाया था, पर इसने तो डर और पाखंड के बीच, खुद का ही 'दिवाला' निकाला था। 

"मृतक भोज': सामाजिक पाखंड और विवशता का जीवंत दस्तावेज़

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  झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा!  ​1. कथानक और विषय-वस्तु ​प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से समाज में व्याप्त उस कुप्रथा को उजागर किया है जहाँ परिवार के सदस्य की मृत्यु के शोक के बीच भी व्यक्ति को समाज (बिरादरी) को भोजन कराने के लिए मजबूर किया जाता है। कहानी का मुख्य पात्र, जो पहले से ही दरिद्रता और अपनों को खोने के गम से जूझ रहा है, समाज के तथाकथित ठेकेदारों के दबाव में आकर कर्ज लेने को विवश हो जाता है। ​2. सामाजिक विडंबना का चित्रण ​प्रेमचंद दिखाते हैं कि किस तरह 'धर्म' के नाम पर शोषण का चक्र चलता है। बिरादरी के लोग सहानुभूति दिखाने के बजाय इस बात पर अधिक ध्यान देते हैं कि भोजन में घी कितना है और पकवान क्या-क्या बने हैं। यह कहानी यह सवाल उठाती है कि: ​क्या किसी की मृत्यु पर किया जाने वाला आडंबरपूर्ण भोज वाकई मृतक की आत्मा को शांति देता है? ​या यह केवल जीवितों के अहंकार और समाज के डर का परिणाम है? ​3. पात्र चित्रण ​कहानी के पात्र अत्यंत सजीव हैं। एक तरफ वह लाचार व्यक्ति है जो लोक-लाज के भय से तिल-तिल मर रहा है, और दूसरी तरफ वे लालची पुरोहित और स्वार्थी बिरादरी के लोग हैं जो ...

प्रदर्शन की राजनीति: आधुनिक पार्टियों का बदलता स्वरूप !

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    आधुनिक पार्टियाँ अब आनंद और गर्मजोशी का माध्यम न रहकर केवल प्रदर्शन और सामाजिक हैसियत का जरिया बन गई हैं। जहाँ पहले पार्टियाँ बौद्धिक विमर्श और वास्तविक संबंधों का केंद्र होती थीं, वहीं अब वे एक व्यवसाय या 'कंटेंट' निर्माण का केंद्र बन चुकी हैं।  जहाँ अलग-अलग क्षेत्रों के दिग्गज केवल एक-दूसरे के साथ समय बिताने और चर्चा करने आते थे। वहाँ मेजबान का व्यक्तित्व और आत्मीयता मुख्य आकर्षण होती थी। आज की पार्टियों को सोशल मीडिया के हिसाब से डिजाइन किया जाता है। मेहमान अब केवल एक 'प्रॉप' की तरह होते हैं, जिनका उद्देश्य केवल तस्वीरों के माध्यम से एक भव्य छवि पेश करना होता है। इसे "सिंबल ओवर एक्सपीरियंस" (अनुभव से ऊपर प्रतीक) कह सकते  हैं।  भारत  में गहरी आर्थिक असमानता  है। जहाँ एक ओर सुपर-रिच वर्ग अपनी शादियों और पार्टियों में करोड़ों खर्च कर रहा है, वहीं दूसरी ओर आंकड़े बताते हैं कि देश का एक बड़ा किसान वर्ग ऋण और गरीबी के कारण आत्महत्या करने को मजबूर है। बड़े आयोजनों के लिए सड़कों को बंद करना और आम जनता को परेशान करना एक प्रकार के "आधुनिक साम्राज्यवा...

'कोटा के भीतर कोटा' की मांग: क्या यही बना महिला आरक्षण बिल के गिरने का मुख्य कारण?

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   ​भारतीय राजनीति के इतिहास में महिला आरक्षण बिल एक बार फिर से सुर्खियों में है। हालिया विधायी कार्यवाही के दौरान सदन में हुई वोटिंग के परिणाम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। हालाँकि बिल के पक्ष में 278 वोट पड़े, लेकिन दो-तिहाई बहुमत की कमी और विशेषकर "कोटा के भीतर कोटा" की मांग पर असहमति ने इस महत्वपूर्ण विधेयक की राह रोक दी। ​क्या है 'कोटा के भीतर कोटा' का विवाद? ​महिला आरक्षण बिल का मूल प्रस्ताव लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने का है। लेकिन, विपक्षी दलों और सामाजिक न्याय के पैरोकारों की यह प्रमुख मांग रही है कि इस 33% आरक्षण के भीतर ही: ​अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं के लिए अलग से कोटा सुनिश्चित किया जाए। ​अल्पसंख्यक (Minority) समुदायों की महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिले। ​तर्क यह दिया जा रहा है कि बिना इस उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) के, आरक्षण का लाभ केवल उच्च वर्ग या साधन संपन्न महिलाओं तक ही सीमित रह जाएगा, और पिछड़े वर्गों की महिलाएं मुख्यधारा से कटी रहेंगी। ​संसद में गतिरोध के प्रमुख बिंदु ​सामाजिक न्याय बनाम लैंगिक समान...

भारत-चीन ऊर्जा सहयोग: कूटनीति से परे एक व्यावहारिक दृष्टिकोण!

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   ​यह  भारत और चीन के बीच के तनावपूर्ण कूटनीतिक और विनिर्माण संबंधों के विपरीत, ऊर्जा क्षेत्र में उनके सफल और दीर्घकालिक सहयोग का विश्लेषण है।  दोनों देशों को अपने आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा के लिए आपसी "साझा भेद्यता" (Shared Vulnerability) को आधार बनाकर हाथ मिलाना चाहिए। ​राजनीतिक बनाम व्यापारिक यथार्थ: जहाँ एक ओर विनिर्माण और सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों में तनाव है (जैसे 'प्रेस नोट 3' और बीवाईडी (BYD) के निवेश प्रस्ताव का खारिज होना), वहीं दूसरी ओर ऊर्जा क्षेत्र में एक अलग ही कहानी दिखती है। ​सूडान का सफल मॉडल: यह  'ग्रेटर नाइल पेट्रोलियम ऑपरेटिंग कंपनी' (GNPOC) का उदाहरण  हैं। दक्षिण सूडान में भारत की ONGC विदेश और चीन की CNPC पिछले दो दशकों से गृहयुद्ध, तख्तापलट और वित्तीय संकट के बावजूद एक साथ काम कर रही हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि व्यावसायिक हित कठिन परिस्थितियों में भी टिके रह सकते हैं। ​वैश्विक भू-राजनीति और दबाव: पश्चिम एशिया में युद्ध और अमेरिकी प्रतिबंधों (ईरान और रूस पर) ने भारत और चीन दोनों के लिए चुनौतियाँ पैदा की हैं। दोनों देशों के...

भारतीय रक्षा बजट और रणनीति: आधुनिकीकरण की चुनौतियाँ!

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    यह भारत की रक्षा तैयारियों, बजटीय आवंटन और रणनीतिक योजना के अंतर्विरोधों का विश्लेषण  है।  भारत को केवल अधिक खर्च करने की नहीं, बल्कि सही दिशा में खर्च करने की आवश्यकता है।  ​रणनीतिक तालमेल का अभाव: भारतीय रक्षा नीति वर्तमान में 'साइलो'  में काम कर रही है। सेना के तीनों अंगों (थल, जल और नभ) के बीच एक एकीकृत 'थिएटर कमान' का अभाव है। इससे संसाधन बिखरे हुए हैं और योजनाएँ 20वीं सदी के युद्धों की धारणा पर आधारित लगती हैं, न कि आधुनिक युद्धों पर। ​आयात पर अत्यधिक निर्भरता: भारत का अधिकांश रक्षा पूंजीगत व्यय (Capex) विदेशी हथियारों और प्लेटफॉर्म्स (जैसे राफेल जेट, जर्मन पनडुब्बियां) पर खर्च होता है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक 'टैक्स' की तरह है, क्योंकि इससे घरेलू रक्षा उद्योगों या अर्थव्यवस्था को वह 'मल्टीप्लायर इफेक्ट' नहीं मिलता जो अमेरिका या चीन जैसे देशों को मिलता है। ​घरेलू अनुसंधान (R&D) की उपेक्षा: विदेशी प्लेटफॉर्म्स को खरीदने और उनके रखरखाव में इतना पैसा खर्च हो जाता है कि भविष्य की तकनीकों जैसे AI, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर ऑपरेशंस क...