स्पर्श: आत्मा की मूक अभिव्यक्ति!
मानवीय संवेदनाओं के महासागर में 'स्पर्श' वह मूक लहर है, जो शब्दों के तट को छुए बिना ही हृदय के अंतस तक पहुँच जाती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो स्पर्श केवल त्वचा का त्वचा से मिलन नहीं, बल्कि दो चेतनाओं का एक-दूसरे में विलीन होना है। यह एक ऐसी आदिम भाषा है जिसे बोलने के लिए जिह्वा की नहीं, बल्कि भावों की शुद्धता की आवश्यकता होती है। १. आग्रह और पूर्वाग्रह का विसर्जन अक्सर मनुष्य अपने भीतर अहंकार, ईर्ष्या और दुराग्रह (पूर्वाग्रहों) की ऊँची दीवारें खड़ी कर लेता है। ये दीवारें तर्कों से नहीं ढहतीं, बल्कि संवेदना के एक कोमल स्पर्श से ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती हैं। जब एक मित्र दूसरे के कंधे पर हाथ रखता है या एक माँ अपनी संतान को गले लगाती है, तो वर्षों की कड़वाहट और गलतफहमियां एक क्षण में तिरोहित हो जाती हैं। २. संघर्षों में संबल और मनोवैज्ञानिक शक्ति जीवन निरंतर एक संघर्ष है। जब हम मानसिक रूप से टूट रहे होते हैं, तब किसी प्रियजन का मौन स्पर्श मस्तिष्क में 'ऑक्सीटोसिन' (प्रेम और विश्वास का हार्मोन) का संचार करता है। यह हमें संघर्षों को झेलने की शक्ति प...