कंधे पर कंकाल: व्यवस्था की संवेदनहीनता का क्रूर चेहरा !
हाल ही में ओडिशा के क्योंझर से आई एक तस्वीर ने मानवता और आधुनिक भारत के दावों को झकझोर कर रख दिया है। एक गरीब आदिवासी, जीतू मुंडा, अपनी मृत बहन के शव को कब्र से निकालकर, उसके कंकाल को कंधे पर लादकर बैंक पहुंच गया। क्यों? क्योंकि उसे अपनी बहन के खाते में जमा महज 19,000 रुपये निकालने थे और बैंक ने बिना 'मृत्यु प्रमाणपत्र' के पैसा देने से मना कर दिया था। यह घटना केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की उस सड़ांध को उजागर करती है जहाँ कागजी औपचारिकताएं इंसान की गरिमा और भूख से बड़ी हो गई हैं। लालफीताशाही और गरीब की लाचारी डिजिटल इंडिया और बैंकिंग सुधारों के दावों के बीच, धरातल पर सच्चाई आज भी डरावनी है। एक अनपढ़ और गरीब आदिवासी के लिए मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल करना किसी हिमालय फतह करने से कम नहीं है। बैंक अधिकारियों का अड़ियल रवैया और 'केवाईसी' (KYC) के नाम पर आम जनता का उत्पीड़न यह दर्शाता है कि नीतियां बनाने वाले लोग ज़मीनी हकीकत से कितने दूर हैं। विडंबना: जिस देश में अरबों के घोटाले करने वाले बैंक की आंखों में धूल झोंककर विदेश भाग जाते हैं, उसी देश में एक गरीब...