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शिक्षा और शिक्षकों की बुलंद आवाज: पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से राजद उम्मीदवार डॉ. संजीव कुमार को अपार समर्थन। -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

  बिहार की राजनीति में सुशिक्षित, ऊर्जावान और जनहित के मुद्दों पर मुखर रहने वाले नेतृत्व की जब भी बात होती है, तो डॉ. संजीव कुमार का नाम अग्रिम पंक्ति में लिया जाता है। अपनी उत्कृष्ट राजनीतिक सूझबूझ, सामाजिक प्रतिबद्धता और जनता के प्रति अटूट समर्पण के कारण वह लगातार हर वर्ग के चहेते बने हुए हैं। इसी कड़ी में, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) द्वारा उन्हें पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार बनाए जाने के बाद शिक्षकों और समर्थकों में भारी उत्साह का माहौल है।   क्यों खास है डॉ. संजीव कुमार का यह राजनीतिक कदम?   मजबूत और बेबाक नेतृत्व: डॉ. संजीव कुमार ने हमेशा से विधानसभा के अंदर और बाहर जनहित, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी अधिकारों से जुड़े मुद्दों को पूरी दमदारी के साथ उठाया है।   शिक्षक वर्ग की उम्मीदों का प्रतीक: शिक्षक समाज का निर्माता होता है, और ऐसे में विधान परिषद (MLC) के पटल पर शिक्षकों की समस्याओं, उनके अधिकारों, और शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए एक ऐसे मुखर चेहरे की जरूरत है जो उनकी आवाज को शासन-प्रशासन तक मजबूती से पहुंचा सके।   विकास...

कर्नाटक: बेंगलुरु से आगे बढ़कर कई आर्थिक इंजनों से सशक्त होता राज्य।

  बेंगलुरु पर अत्यधिक जनसंख्या और बुनियादी ढांचे के दबाव को कम करने के लिए अन्य शहरों और क्षेत्रों को वैकल्पिक विकास केंद्रों के रूप में विकसित करना जरूरी है। बियॉन्ड बेंगलुरु मॉडल: इस मॉडल का उद्देश्य बेंगलुरु की नकल करना नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षेत्र (जैसे तटीय कर्नाटक, मैसूर, हुबली-धारवाड-बेलगावी आदि) की विशिष्ट ताकत और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के आधार पर विकास करना है। जून और अगस्त 2026 के दौरान हजारों करोड़ रुपये की कई औद्योगिक परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिनमें से अधिकांश बेंगलुरु से बाहर योजनाबद्ध हैं और इनसे हजारों नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। स्थानीय अर्थव्यवस्था त्वरक कार्यक्रम (LEAP) के तहत पांच वर्षों में 1,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जिसका लक्ष्य पांच लाख रोजगार के अवसर पैदा करना है। मैसूर को राज्य के दूसरे आईटी शहर के रूप में विकसित करने और अन्य समूहों में एआई, डेटा साइंस, उन्नत विनिर्माण और कृषि-तकनीक जैसी उभरती तकनीकों को जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। औद्योगिक विकास के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, गुणवत्तापूर्ण आवास और कृषि परिवर्तन को जोड़कर ए...

दानापुर दियारा में बाढ़ पीड़ितों की मदद: राजद नेता दीनानाथ यादव और टीम ने पहुंचाई राहत सामग्री।

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  दानापुर दियारा क्षेत्र में बाढ़ के कारण जीवन अस्त-व्यस्त हो चुका है। जलस्तर बढ़ने से कई इलाके पूरी तरह जलमग्न हो गए हैं और प्रभावित परिवारों के सामने भोजन तथा आश्रय का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। इस कठिन परिस्थिति में राजद नेता दीनानाथ यादव और उनकी समर्पित टीम ने बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए एक बड़ी राहत मुहिम की शुरुआत की है। नाव से पहुंचे प्रभावित क्षेत्रों में बाढ़ के पानी के कारण स्थल मार्ग पूरी तरह ठप हो चुके हैं। ऐसे में दीनानाथ यादव और उनकी टीम नाव के जरिए जोखिम उठाते हुए दियारा के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंचे। पानी के बीच उतरकर टीम ने सुनिश्चित किया कि राहत सामग्री सीधे जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचे। बाढ़ पीड़ितों के बीच बांटी गई सामग्री राहत अभियान के दौरान बाढ़ प्रभावित परिवारों और बच्चों की प्राथमिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित सामग्रियों का वितरण किया गया: सूखा राशन: चूड़ा, मीठा (गुड़), और बिस्किट। बच्चों के लिए: पैकेट वाला दूध। सुरक्षा एवं आश्रय: प्लास्टिक के तिरपाल। दैनिक उपयोग वस्तुएं: माचिस और मोमबत्तियां। जनसेवा की मिसाल दियारा के निवासियों ने इस त्वरित स...

वित्तरहित शिक्षकों के वेतनमान के लिए सरकारी पहल का राम लखन सिंह यादव (RLSY) कॉलेज, अनीसाबाद में स्वागत, शिक्षकों में हर्ष !

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   पटना। वित्तरहित अनुदानित स्कूल-कॉलेजों के शिक्षकों एवं कर्मियों के लिए वेतनमान और सम्मानजनक वेतन संरचना को लेकर राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई पहल से राम लखन सिंह यादव (RLSY) कॉलेज, अनीसाबाद, पटना के शिक्षक एवं कर्मचारियों में हर्ष का माहौल है। मुख्यमंत्री द्वारा की गई इस ऐतिहासिक घोषणा और इस दिशा में गठित उच्चस्तरीय कमेटी की बैठक के बाद कॉलेज परिवार ने मुख्यमंत्री एवं राज्य सरकार के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया है। कॉलेज परिसर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान प्रमुख प्राध्यापकों एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने सरकार के इस कदम की सराहना करते हुए अपनी प्रतिक्रिया दी: प्रो. सुरेंद्र प्रसाद (प्राचार्य): "यह राज्य सरकार का एक ऐतिहासिक निर्णय है, जो उच्च शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाएगा।" प्रो. वीरेंद्र प्रसाद सिंह (पूर्व प्राचार्य एवं वित्तरहित मोर्चा अध्यक्ष मंडल सदस्य): "पिछले चालीस वर्षों से पीड़ित एवं आर्थिक तंगी झेल रहे शिक्षकों और कर्मचारियों को वेतनमान मिलने की दिशा में सरकार के इस प्रयास से आशा की एक नई किरण जगी है।" प्रो. राय श्रीपाल सिंह (प्राध्यापक): ...

तकनीक का उपभोक्ता नहीं, अब निर्माता बनेगा भारत: AI क्रांति में नया अध्याय ।

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    भारत लंबे समय तक वैश्विक तकनीक का केवल एक उपभोक्ता  रहा है, लेकिन अब समय आ गया है जब हम सीमाओं को तोड़कर तकनीक के जनक और निर्माता  के रूप में उभरें। आज देश का टेक सेक्टर केवल वादों पर नहीं, बल्कि धरातल पर बड़े निवेश और बुनियादी ढांचे के साथ एक ऐतिहासिक छलांग लगाने के लिए तैयार है। इस महा-अभियान की शुरुआत हैदराबाद में TCS की सहायक कंपनी HyperVault द्वारा 1 GW के डेटा सेंटर कैंपस के निर्माण से हो रही है। यह पहल भारत को संप्रभु AI बुनियादी ढांचे (Sovereign AI Infrastructure) में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। इसके साथ ही Reliance (RIL) का 1.5 GW क्षमता वाला डेटा सेंटर प्रोजेक्ट और Adani व Airtel द्वारा Google के साथ मिलकर अमेरिका के बाहर सबसे बड़ा AI hub तैयार करने का प्रयास, यह साबित करता है कि भारत अब गीगावाट  स्तर की वैश्विक AI रेस में मजबूती से कदम रख चुका है। यह बदलाव केवल विशाल इमारतों या सर्वरों तक सीमित नहीं है; यह भारत की आर्थिक उत्पादकता को एक नए शिखर पर ले जाने का जरिया है। स्वदेशी Large Language Models (LLMs) के निर्माण और स्थानीय ...

विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र असंतोष: नियंत्रण के बजाय विश्वास की आवश्यकता।

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    भारतीय विश्वविद्यालयों में जनरेशन-ज़ेड (Gen Z) के छात्र लगातार अपनी स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए आवाज़ उठा रहे हैं। हाल के घटनाक्रम—जैसे कि कानून के छात्रों और बार काउंसिल के बीच विवाद तथा विभिन्न परिसरों में होते विरोध-प्रदर्शन—इस बात का संकेत हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में एक गहरा प्रशासनिक संकट व्याप्त है। विश्वविद्यालयों का मूल आधार अकादमिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वायत्तता है। हालाँकि भारतीय संविधान में इसका प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, लेकिन वैश्विक स्तर पर (जैसे जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन आदि) इसे संवैधानिक अधिकार माना गया है। भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में वैचारिक कारणों से पाठ्यक्रम में बदलाव, शोध पर नियंत्रण और स्वतंत्र चिंतन को दबाने के प्रयास बढ़ रहे हैं, जिससे अकादमिक स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। वर्तमान में अधिकांश विश्वविद्यालय 'कुलपति-केंद्रित' और 'नियंत्रण आधारित' व्यवस्था पर चल रहे हैं। इस व्यवस्था में कुलपति और प्रशासन छात्रों से दूर हो जाते हैं। जब शिकायतों का समय पर निवारण नहीं होता, तो छात्रों में घबराहट और असंतोष प...

बुजुर्गों की सुध: सामाजिक संवेदना और नैतिक जिम्मेदारी का सवाल।

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  किसी भी सभ्य समाज और देश की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों के प्रति कितना संवेदनशील है। यदि जीवन के ढलते पड़ाव में वरिष्ठ नागरिकों को कठिनाइयों और उपेक्षा का सामना करना पड़े, तो यह न केवल कल्याणकारी योजनाओं की विफलता है, बल्कि समाज के नैतिक ताने-बाने पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा देश के सभी राज्यों को वृद्धाश्रमों की स्थिति और बुजुर्गों को मिलने वाली सुविधाओं पर ताजा रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश देना इसी गंभीर स्थिति को रेखांकित करता है। भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों को सदा से सम्मानजनक स्थान दिया जाता रहा है। आज भी कई परिवारों में संतानें अपने माता-पिता के स्वास्थ्य और खुशी के लिए हर संभव प्रयास करती हैं। लेकिन इस तस्वीर का एक दूसरा और दुखी करने वाला पहलू भी है। भौतिकवादी दौर में कई लोग अपने जन्मदाता माता-पिता को 'बोझ' मानने लगे हैं। अपनी निजी सुविधा और स्वच्छंद जीवनशैली के लिए बुजुर्गों को अकेला छोड़ देना या वृद्धाश्रम भेज देना एक आम प्रवृत्ति बनती जा रही है। लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि जिन माता-पिता ने अपने...