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संघर्ष से सफलता तक: फुलवारीशरीफ की बेटी प्रिया कुमारी ने UPSC में लहराया परचम (232वीं रैंक) !

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   मेरे लिए यह गर्व की बात है कि मेरे मित्र की  पौत्री व  मेरे पड़ोसी गाँव की बिटिया ने आज सफलता का  पड़चम  लहराई.कहते हैं कि अगर इरादे फौलादी हों और लक्ष्य साफ हो, तो नौकरी की व्यस्तता भी आपकी राह का रोड़ा नहीं बन सकती। बिहार की एक और बेटी, प्रिया कुमारी ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा में 232वीं रैंक हासिल कर इस बात को सच कर दिखाया है। नौकरी के साथ जारी रखा संघर्ष प्रिया की यह सफलता इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने इसे बिना किसी कोचिंग के, सेल्फ स्टडी और नौकरी के साथ हासिल किया है। वर्ष 2021 से वह एक निजी कंपनी में कार्यरत थीं। काम के दबाव के बीच समय निकालकर देश की सबसे कठिन परीक्षा की तैयारी करना उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति को दर्शाता है। मेधावी रहा है शैक्षणिक सफर प्रिया की प्रतिभा के चर्चे नए नहीं हैं। इससे पहले वर्ष 2021 में उन्होंने CS (Company Secretary) फाइनल परीक्षा में ऑल इंडिया 21वीं रैंक हासिल की थी। उनके पास एक सुरक्षित करियर था, लेकिन उनका सपना प्रशासनिक सेवा में जाकर समाज के लिए कुछ बड़ा करने का था, जिसे उन्होंने आज पूरा कर लिया है। एक गौरवान्...

सफलता की कहानी: पटना, बेऊर् के गौरव कुमार ने यूपीएससी 2025 में लहराया परचम (AIR 338) !

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   फुलवारी कुरकुरी में ही इनका ननिहाल है. सपनों को हकीकत में बदलने के लिए केवल आंखों में उम्मीद नहीं, बल्कि इरादों में फौलाद होना चाहिए। पटना, बिहार के रहने वाले गौरव कुमार ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा-2025 में 338वीं रैंक हासिल कर इस बात को साबित कर दिखाया है। एक मेधावी शैक्षणिक सफर गौरव की यह सफलता अचानक मिली उपलब्धि नहीं है, बल्कि सालों की निरंतर मेहनत का परिणाम है। उनके शैक्षणिक बैकग्राउंड पर नज़र डालें तो उनकी काबिलियत साफ झलकती है: प्रारंभिक शिक्षा: गौरव ने अपनी 10वीं की पढ़ाई (ICSE) डॉन बॉस्को एकेडमी और 12वीं (CBSE) सेंट माइकल्स हाई स्कूल से 90% से अधिक अंकों के साथ पूरी की। उच्च शिक्षा: उन्होंने देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIT खड़गपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में B.Tech किया है। उपलब्धियां: वे गूगल हैकाथॉन (IIT खड़गपुर) के विजेता रहे हैं और उनके नाम नेटवर्किंग क्षेत्र में एक पेटेंट भी दर्ज है। संघर्ष और संकल्प गौरव के लिए यह सफर आसान नहीं था। उनके आवेदन पत्र (DAF) के अनुसार, उनके पिता स्वर्गीय अरविंद कुमार घोष अब इस दुनिया में नहीं हैं। पिता को खोन...

नीतीश कुमार का राजनीतिक ढलान: 'चाणक्य' से 'विवशता' तक का सफर! 'सुरक्षित निकास' (Safe Exit) . -प्रो प्रसिद्ध कुमार.

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  1. संघर्ष और उत्थान: शुरुआती राजनीतिक पृष्ठभूमि नीतीश कुमार का शुरुआती राजनीतिक जीवन वास्तव में संघर्षपूर्ण रहा। 1977 और 1980 की लगातार हार ने उन्हें जमीन से जोड़कर रखा। लालू-नीतीश की जुगलबंदी: 1989 में बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से उनकी जीत और लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री बनाने में उनकी भूमिका, बिहार की राजनीति के उस दौर को दर्शाती है जब 'मंडल राजनीति' के दो स्तंभ साथ थे। समता पार्टी का उदय: 1994 में लालू यादव से अलग होकर समता पार्टी बनाना उनके राजनीतिक करियर का सबसे साहसिक मोड़ था, जिसने बिहार में  लालू यादव के विरुद्ध एक नया विकल्प पेश किया। 2. 'सुशासन बाबू' और गठबंधन की राजनीति 2005 से 2013 तक का दौर नीतीश कुमार के स्वर्ण युग के रूप में जाना जाता है। भाजपा के साथ मिलकर उन्होंने जो 'लव-कुश' समीकरण और 'अति पिछड़ा' (EBC) वोट बैंक तैयार किया, उसने लालू के 'MY' (मुस्लिम-यादव) समीकरण को कड़ी टक्कर दी। अस्थिरता का दौर: 2013 के बाद से बार-बार पाला बदलने (U-turns) के कारण उनकी साख ('Credibility') पर सवाल उठे। जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाना और...

वास्तविक स्वतंत्रता: मानवता की ओर बढ़ते कदम !

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  आज के दौर में 'स्वतंत्रता' शब्द को अक्सर केवल नागरिक अधिकारों या भौतिक बंधनों के अभाव तक सीमित कर दिया जाता है।  वास्तविक स्वतंत्रता बाहरी दुनिया से नहीं, बल्कि भीतरी विकारों से मुक्ति का नाम है। भीतरी बेड़ियों से मुक्ति एक मनुष्य तब तक पूर्णतः स्वतंत्र नहीं हो सकता, जब तक वह अज्ञान, भय, अहंकार और स्वार्थ के अधीन है। अज्ञान हमें संकुचित सोच में बांधे रखता है। भय हमें जोखिम लेने और सत्य बोलने से रोकता है। अहंकार हमारे और समाज के बीच एक दीवार खड़ी कर देता है। स्वार्थ हमें केवल 'स्व' (स्वयं) तक सीमित कर देता है। जब हम इन बेड़ियों को तोड़ते हैं, तभी हमें आत्मबोध होता है—अर्थात् स्वयं की शक्तियों और अस्तित्व के वास्तविक कारण का ज्ञान। 'स्व' से 'सर्व' की ओर समाज की प्रगति तभी संभव है जब व्यक्ति "स्वयं के लिए जीना" छोड़कर "मानवता के लिए जीना" सीख ले। इतिहास गवाह है कि समाज में सकारात्मक बदलाव वही लोग ला पाए हैं जिन्होंने अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के दुखों को अपना समझा है। ऐसी स्वतंत्रता व्यक्ति को उदार बनाती है। यह उसे यह समझने की दृष्टि ...

छलावा और विरह की होली! (कविता) -प्रो प्रसिद्ध कुमार.

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   विरह की अग्नि दहक रही, फिर कैसी यह हुड़दंग है? जले पर नमक छिड़कती दुनिया, कैसा फीका रंग है? शब्द-बाण से हृदय बेधकर, कहते "शुभ हो पर्व यह", प्रतिशोध की ज्वाला मन में, होंठों पर झूठा गर्व यह। मुख पर कटु मुस्कान सजी है, भीतर गहरा द्वेष छिपा, दोहरे चरित्र के चोलों में, यहाँ असल इंसान लापता। जब दिल से दिल का मेल नहीं, तो कैसी यह मिलन की बेला? दिखावे की इस भीड़ में, हर शख्स खड़ा है अकेला। ऋतुएँ बदलीं, अंबर बदला, बदले जग के ढंग यहाँ, अपनों के ही चेहरों पर अब, दिखते सौ-सौ रंग यहाँ। महँगाई की मार ने छीनी, निर्धन की थाली की रोटी, अमीरी-गरीबी की ये खाई, नीयत कर देती छोटी। गुणों की अब पहचान कहाँ? हैसियत की बस माया है, इंसान की क्या बिसात भला? बस मिट्टी की एक काया है। मिट जाना है एक दिन सबको, मुट्ठी भर बस राख शेष, फिर क्यों पालें मन में हम, ये बैर-भाव और विषैला द्वेष? दो दिन की है ये ज़िंदगी, हँसकर गले लगाना सीखो, घृणा त्याग कर प्रेम-रंग में, रूह को अपनी भिगो। सच्ची होली वही, जहाँ मन का मैल धुल जाए, इंसानियत के गुलाल से, हर आँगन महक जाए। सभी को शुभ होली!

भारतीय अर्थव्यस्था : एक संरचनात्मक विरोधाभास !

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    भारत ने मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिरता (जैसे मुद्रास्फीति नियंत्रण, विदेशी मुद्रा भंडार और राजकोषीय प्रबंधन) में तो महारत हासिल कर ली है, लेकिन माइक्रो-इकोनॉमिक परिवेश (व्यवसाय करने की सुगमता, श्रम और भूमि सुधार) में यह पूरी तरह विफल रहा है। 1. निवेश की कमी और 'उत्पादन विरोधी' संस्कृति पूंजी निर्माण की चुनौती: भारत को स्थायी विकास के लिए 37-38% निवेश दर (Investment Rate) की आवश्यकता है, लेकिन हम 30% पर अटके हुए हैं। इसकी तुलना में चीन और पूर्व एशियाई देशों ने 40% से अधिक की दर बनाए रखी। व्यवसाय विरोधी परिवेश: भारत का तंत्र सूक्ष्म स्तर पर उद्यमियों को हतोत्साहित करता है। निजी निवेश की कमी इस 'नीतिगत विफलता' का सबसे बड़ा प्रमाण है। 2. संस्थागत और संवैधानिक बाधाएं (Concurrent List   'समवर्ती सूची' (Concurrent List) एक "औपनिवेशिक अभिशाप"  है। इसके आर्थिक प्रभाव इस प्रकार हैं: विभाजित क्षेत्राधिकार - उदाहरण के लिए, ब्याज दरें केंद्र तय करता है, लेकिन मजदूरी दरें राज्य के अधीन आती हैं। इसी तरह, पर्यावरण नीति दोनों के बीच उलझी हुई है। नीतिगत पक्षाघात (Policy Pa...

शिक्षा का मंदिर: राजनीति नहीं, उन्नति का मार्ग!

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  कॉलेज केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि वह स्थान है जहाँ भविष्य गढ़ा जाता है। gकॉलेज के उत्सव और गतिविधियाँ विविधता, समावेशन और सहिष्णुता को बढ़ावा देते हैं। जब हम इन मूल्यों को छोड़कर राजनीति और आपसी खींचतान में पड़ जाते हैं, तो शिक्षा का मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाता है। कॉलेज परिसर में एकता की आवश्यकता राजनीति से परे विकास: कॉलेज सीखने की उम्र है। जब परिसर में राजनीति का प्रवेश होता है, तो विद्यार्थियों के बीच वैचारिक मतभेद "दुश्मनी" का रूप ले लेते हैं। कॉलेज को राजनीति का अखाड़ा बनाने के बजाय ज्ञान का केंद्र बने रहना चाहिए। समानता का भाव: किसी को नीचा दिखाना कमजोरी की निशानी है। एक स्वस्थ शैक्षणिक माहौल वही है जहाँ हर छात्र, चाहे वह किसी भी भाषा, क्षेत्र या पृष्ठभूमि से हो, सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे। साझा लक्ष्य की शक्ति: जब विद्यार्थी एक साझा लक्ष्य (जैसे प्रोजेक्ट, सांस्कृतिक कार्यक्रम या खेल) के लिए साथ मिलकर कार्य करते हैं, तो सामाजिक विभाजनों की दीवारें अपने आप गिर जाती हैं। यही वह समय है जब व्यक्तित्व का असली निखार होता है। "महानता किसी को नीचा दिखान...