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साहब, मेमसाहब और 'टॉमी'! ( कहानी ) - प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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  'कुत्ता' होना खुशनसीबी है, और 'इंसान' बने रहना सबसे बड़ा अभिशाप!" दिल्ली की तपती दोपहर में लुटियंस ज़ोन की चौड़ी सड़कों पर सन्नाटा पसरा था। सड़क के किनारे फुटपाथ पर एक बूढ़ा आदमी पुरानी चादर बिछाए पेट की आग को दबाने की कोशिश कर रहा था। उसकी आँखें सड़क पर चलती गाड़ियों में शायद कुछ ढूँढ रही थीं—शायद एक रोटी, शायद कोई रहम। तभी एक चमचमाती, एअर-कंडीशंड मर्सिडीज़ रेड लाइट पर आकर रुकी। गाड़ी की पिछली सीट पर रेशमी गद्दे पर बैठा था—'टॉमी'। टॉमी कोई साधारण प्राणी नहीं था; वह इस दौर के एक बड़े उद्योगपति का 'कुत्ता' था। टॉमी की दिनचर्या किसी राजा-महाराजा जैसी थी। सुबह-सुबह उसके लिए पर्सनल वेटर उबला हुआ चिकन और पैकेज़्ड न्यूट्रिशन लाता, दोपहर में उसके स्पेशल एसी रूम में तापमान 22 डिग्री फारेनहाइट पर सेट रहता, और महीने में दो बार 'एनिमल डर्मेटोलॉजिस्ट' उसके बालों की चमक चेक करने घर आते। टॉमी की देखभाल के लिए दो नौकर 24 घंटे तैनात रहते थे, जिनकी अपनी तनख्वाह शायद किसी प्राइमरी स्कूल के मास्टर साहब से ज्यादा थी। रेड लाइट पर गाड़ी रुकी तो टॉमी ने अपनी मखम...

थाली से गायब होता संतुलन: खाद्य महंगाई की मार और बेहाल मध्यवर्ग!

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  भारतीय रसोई पर इन दिनों आर्थिक अनिश्चितता का संकट मंडरा रहा है। बाजार में पिछले कुछ महीनों से चीनी, चावल और खाद्य तेल जैसी अनिवार्य वस्तुओं की कीमतों में आया उछाल अब कोई सामान्य मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि एक गहरी संरचनात्मक महंगाई का रूप ले चुका है। खुदरा बाजारों में चीनी का 60 से 65 रुपये प्रति किलो, सरसों और अन्य खाद्य तेलों का 200 से 220 रुपये प्रति लीटर, और अच्छी गुणवत्ता वाले चावल का 75 से 80रुपये प्रति किलो तक पहुंचना सीधे तौर पर यह दर्शाता है कि आम आदमी के दैनिक बजट की नींव हिल चुकी है। आंकड़ों के नजरिए से देखें तो राष्ट्रीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी लगभग 39% से 45% के बीच है। जब खाद्यान्न और खाद्य तेल महंगे होते हैं, तो उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (CFPI) तेजी से ऊपर भागता है।   भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण खाद्य तेल 200 रुपये प्रति लीटर के आंकड़े को पार कर रहे हैं। अनियमित मानसून, जलवायु परिवर्तन और उत्पादन लागत में बढ़ोतरी के कारण चीनी ...

राजनीतिक शब्दावली का विस्तार: 'अर्बन नक्सल' से 'दिमागी नक्सल' तक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता!

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  भारतीय राजनीति में राजनीतिक मुहावरों और शब्दावलियों का उपयोग हमेशा से जनमानस को प्रभावित करने और विमर्श की दिशा तय करने का एक प्रमुख हथियार रहा है। हाल ही में 15 अगस्त को लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस्तेमाल किए गए 'दिमागी नक्सल' शब्द ने देश भर में एक नई राजनीतिक और वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है। इससे पहले राजनीतिक गलियारों में 'अर्बन नक्सल' शब्द की काफी चर्चा रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक लाभ या वैचारिक घेराबंदी के लिए ऐसी शब्दावलियों का प्रयोग किस हद तक उचित है, और इसका भारतीय लोकतंत्र तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर क्या प्रभाव पड़ता है? शब्दावली पर विविध दृष्टिकोण इस बयान के आते ही राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों और सिनेमा जगत की हस्तियों की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं आईं: अनुराग कश्यप: "जो असल मुद्दे उठाते हैं, उन्हें 'दिमागी नक्सल' कहना बंद कीजिए। असली नक्सल विचार नहीं, व्यवस्था में है।" पी. चिदंबरम: "अगर सच बोलना और सरकार से सवाल करना 'दिमागी नक्सल' है, तो मुझे इस पर गर्व है।...

खगौल में ‘अस्सी नब्बे पूरे सौ’ कविता संग्रह का हुआ लोकार्पण।

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     आर्यभट निकेतन में कवयित्री पूर्वी श्रीवास्तव की पुस्तक का विमोचन, वरिष्ठ रंगकर्मी  व पत्रकारों ने रचनात्मक पहल को सराहा।  खगौल। आर्यभट निकेतन स्कूल के सभागार में कवयित्री पूर्वी श्रीवास्तव के कविता संग्रह ‘अस्सी नब्बे पूरे सौ’ का भव्य लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ रंगकर्मी नवाब आलम ने खगौल की साहित्यिक व सांस्कृतिक परंपरा को रेखांकित करते हुए कवयित्री को बधाई दी। "‘अस्सी नब्बे पूरे सौ’ का प्रकाशन खगौल की समृद्ध साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत की परंपरा में एक महत्वपूर्ण कड़ी है।" — नवाब आलम, वरिष्ठ रंगकर्मी समारोह के प्रमुख बिंदु: संयुक्त विमोचन: पुस्तक का विमोचन विद्यालय के निदेशक सत्यकाम सहाय, प्राचार्य विभा सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार सुधीर मधुकर एवं वरिष्ठ रंगकर्मी नवाब आलम ने संयुक्त रूप से किया। पूर्व छात्रा की उपलब्धि पर गर्व: विद्यालय के निदेशक सत्यकाम सहाय ने कहा कि पूर्वी श्रीवास्तव इसी विद्यालय की छात्रा रही हैं और उनका यह प्रयास विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायक है। संवेदनशील मन ही गढ़ता है कविता: विद्यार्थियों से अपने अनुभव साझा क...

वृक्षों की गिनती में खोते जंगल: भारत की हरित नीति का वास्तविक विश्लेषण।

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  भारत में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर सरकारी स्तर पर विज्ञापनों और वृक्षारोपण अभियानों की भरमार है। लेकिन क्या महज़ पौधों की गिनती से नष्ट हो रहे प्राचीन जंगलों और समृद्ध पारिस्थिकी तंत्र  की भरपाई की जा सकती है? नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ताज़ा प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट इस कड़वे सच से पर्दा उठाती है कि भारत "जंगलों को पुनर्जीवित करने" के बजाय केवल "पेड़ों की कागज़ी गिनती" में उलझकर रह गया है। 'ग्रीन इंडिया मिशन' (GIM) की शुरुआत भारत के वनों की गुणवत्ता सुधारने और पर्यावरण बहाली के महान उद्देश्यों के साथ की गई थी। यह वर्ष 2008 में घोषित जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) के आठ प्रमुख स्तंभों में से एक था। इसी मिशन के दम पर भारत ने पेरिस समझौते के तहत वर्ष 2030 तक 2.5 से 3 अरब टन अतिरिक्त कार्बन सिंक (Carbon Sink) बनाने का वैश्विक वादा किया था। लेकिन CAG के ऑडिट ने एक दशक के रिपोर्ट कार्ड में इस योजना को लगभग पूरी तरह विफल पाया है: वन गुणवत्ता सुधार में विफलता: 14 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले केवल 1.1 लाख हेक्टेयर (मात्र 8%) पर ही काम हो स...

बुनियादी ढांचे की खामियां और जवाबदेही: क्या विकसित भारत का सपना सिर्फ GDP तक सीमित है?

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  भारतीय रेलवे में पानी का संकट। भारतीय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (Infra) और बुनियादी सुविधाओं की एक कड़वी सच्चाई पेश करती है। यह रिपोर्ट सिर्फ सरकारी योजनाओं या कागजी आंकड़ों की बात नहीं करती, बल्कि आम नागरिक के दैनिक जीवन से जुड़ी उन गंभीर समस्याओं पर प्रकाश डालती है जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। भारतीय रेलवे में पानी का संकट: एक गंभीर लापरवाही CAG की रिपोर्ट के अनुसार, कई प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर पीने के पानी के नमूनों में E. coli और कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए हैं, जो दूषित पानी और सीवेज के रिसाव को दर्शाते हैं। आधे से अधिक नमूनों में अवशिष्ट क्लोरीन के मानक पूरे नहीं पाए गए। कई स्टेशनों पर नियमित रूप से होने वाली जीवाणु जांच  को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। सीवेज पाइपलाइनों का फटना, पानी की टंकियों की महीनों तक सफाई न होना और फिल्टरेशन सिस्टम का सही से काम न करना इसके मुख्य कारण हैं। यह महज एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि बुनियादी देखरेख और प्रशासनिक जवाबदेही की भारी नाकामी है। समस्या केवल रेलवे तक सीमित नहीं है। हा...

लखीसराय के अशोक धाम मंदिर में बड़ा हादसा: तीसरी सोमवारी पर भगदड़ से 7 महिला श्रद्धालुओं की मौत, 19 घायल।

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  स्थान: लखीसराय, बिहार सावन की तीसरी सोमवारी बिहार के लखीसराय जिले में स्थित ऐतिहासिक और प्रसिद्ध अशोक धाम मंदिर (इंद्रदमनेश्वर महादेव मंदिर) में सावन की तीसरी सोमवारी के अवसर पर एक अत्यंत दुखद हादसा घटित हो गया। भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए जुटी भारी भीड़ के दौरान अचानक भगदड़ मच गई। इस हृदयविदारक घटना में 7 महिला श्रद्धालुओं की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि 19 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। सावन महीने के तीसरे सोमवार को सुबह से ही अशोक धाम मंदिर में भोलेनाथ के दर्शन और जलाभिषेक के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु कतारबद्ध थे। श्रद्धालुओं की भारी भीड़: अलसुबह से ही मंदिर परिसर और प्रवेश द्वारों पर जलाभिषेक के लिए श्रद्धालुओं की लंबी लाइनें लगी हुई थीं। अचानक मची अफ़रातफ़री: जल चढ़ाने की होड़ और भीड़ के अत्यधिक दबाव के कारण अचानक श्रद्धालुओं के बीच धक्का-मुक्की और अफ़रातफ़री का माहौल बन गया। भगदड़ का रूप: कतार में खड़ी महिलाएं और बुजुर्ग संतुलन बिगड़ने से नीचे गिर गए, जिसके बाद पीछे से आ रही भीड़ के दबाव से भगदड़ मच गई। हताहत: इस भगदड़ की चपेट में आने से 7 महिला श्रद्धाल...