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बिहार: न्याय की गुहार बनाम प्रतिशोध की गिरफ़्तारी !😢😢

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  ​बिहार की राजनीति में 'न्याय के साथ विकास' का नारा अब एक विडंबना की तरह लगने लगा है। 7 फरवरी 2026 की आधी रात को सांसद पप्पू यादव की गिरफ्तारी ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली और उसकी प्राथमिकताओं पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटनाक्रम केवल एक नेता की गिरफ़्तारी नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि सत्ता जब असुरक्षित महसूस करती है, तो वह कानून को न्याय का औज़ार बनाने के बजाय प्रतिशोध का हथियार बना लेती है। ​ 31 साल पुराने मामले की 'सजगता' और वर्तमान का सन्नाटा ​सरकार की कार्यकुशलता पर सबसे बड़ा सवाल इसकी टाइमिंग को लेकर है। जिस मामले में पप्पू यादव को आधी रात को गिरफ्तार किया गया, वह 31 साल पुराना है—किराए के मकान से जुड़ा एक विवाद। ​सवाल उठता है कि: क्या तीन दशकों से सो रहा प्रशासन अचानक इतना मुस्तैद हो गया कि बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के रात के 12 बजे कार्रवाई करना ज़रूरी हो गया? ​सच्चाई: यह 'मुस्तैदी' कानून के पालन से अधिक, सत्ता की खीझ को दर्शाती है। ​ नीट छात्रा कांड: न्याय कहाँ है? ​एक तरफ प्रशासन 31 साल पुराने छोटे से मामले में 'सुपर एक्टिव' ...

भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट: चुनौतियां और समाधान !

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  ​भारत वर्तमान में एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य आपातकाल का सामना कर रहा है। हालिया आर्थिक सर्वेक्षण और बजट घोषणाओं ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। विशेष रूप से बच्चों और किशोरों में बढ़ती डिजिटल लत (Digital Addiction) और स्क्रीन से जुड़ी समस्याओं ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। ​1. मानसिक स्वास्थ्य का बढ़ता बोझ ​आंकड़े एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं: ​वैश्विक हिस्सेदारी: दुनिया की कुल आत्महत्याओं, अवसाद और नशे की लत के मामलों में भारत की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई है। ​युवाओं पर प्रभाव: 15 से 29 वर्ष की आयु के भारतीयों में मृत्यु का एक प्रमुख कारण आत्महत्या है। ​आर्थिक नुकसान: WHO के अनुसार, 2012 से 2030 के बीच मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के कारण भारत को लगभग $1.03 ट्रिलियन का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है। ​इलाज का अंतर: लगभग 70% से 90% लोगों को जागरूकता की कमी, सामाजिक कलंक और पेशेवरों की कमी के कारण उचित उपचार नहीं मिल पाता है। ​2. बुनियादी ढांचे की कमी ​भारत में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भारी कमी है। भारतीय मनोचिकित्सा जर्नल के अनुसार: ​भारत में प्रति 1,...

सचेत रहें: आपकी सुनने की क्षमता खतरे में है!

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​अक्सर हम बड़े संगीत समारोहों, रैलियों या तेज शोर वाले आयोजनों का आनंद तो लेते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह शोर आपके कानों को स्थायी रूप से बीमार कर रहा है? हालिया शोध और विशेषज्ञों की राय के अनुसार, तेज संगीत से होने वाला नुकसान आपकी जानकारी में आने से बहुत पहले ही शुरू हो जाता है। ​क्या है 'हिडन हियरिंग लॉस'? ​सामान्य तौर पर हम मानते हैं कि अगर हम धीमी आवाजें सुन पा रहे हैं, तो हमारे कान बिल्कुल ठीक हैं। लेकिन वैज्ञानिकों ने कोक्लियर सिनैप्टोपैथी (Cochlear Synaptopathy) नामक स्थिति की पहचान की है, जिसे "छिपी हुई श्रवण हानि" कहा जाता है। ​नुकसान कहाँ होता है?: यह हमारे कान की कोशिकाओं और मस्तिष्क के बीच संपर्क बनाने वाले सिनैप्स (Synapses) को नुकसान पहुँचाता है। ​पकड़ में क्यों नहीं आता?: मानक ऑडियोोग्राम टेस्ट केवल ध्वनि की संवेदनशीलता (कितना धीमा आप सुन सकते हैं) को मापते हैं। चूंकि सिनैप्स का नुकसान शुरुआत में सुनने की क्षमता (Volume) को कम नहीं करता, इसलिए टेस्ट रिपोर्ट 'नॉर्मल' आती है, जबकि नुकसान शुरू हो चुका होता है। ​मुख्य लक्षण और प्रभाव ​यदि आप...

आयुष (AYUSH) क्षेत्र का कायाकल्प: बजट 2026-27 और भविष्य की राह !

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  ​हाल ही में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत बजट 2026-27 में आयुष (आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी) क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं। यह न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़े निवेश का संकेत है, बल्कि भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की एक सोची-समझी रणनीति भी है। ​बजट की प्रमुख घोषणाएं और वित्तीय प्रोत्साहन ​सरकार ने आयुष क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए बजट आवंटन में भारी वृद्धि की है: ​कुल बजट: आयुष का कुल बजट बढ़कर ₹4,408 करोड़ हो गया है (जो पिछले वर्ष ₹3,992 करोड़ था)। ​राष्ट्रीय आयुष मिशन: इसके बजट में 66% की भारी वृद्धि की गई है, जिससे यह अब ₹1,300 करोड़ का हो गया है। ​अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA): एम्स (AIIMS) की तर्ज पर तीन नए संस्थानों की स्थापना की घोषणा की गई है, जो शोध, शिक्षण और उपचार में स्वर्ण मानक स्थापित करेंगे। ​भारत-यूरोपीय संघ (EU) मुक्त व्यापार समझौता और वैश्विक पहुंच ​आयुष के लिए सबसे बड़ा 'गेम-चेंजर' भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA)...

भोजपुरी लोक कला का 'विद्रोही सितारा': राम सिंगासन उर्फ चाईं ओझा की अनकही दास्तां !

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  ​ लेखक: प्रो प्रसिद्ध कुमार। दिनांक: 8 फरवरी, 2026 श्रेणी: लोक संस्कृति / बिहार की विरासत ​आज बात उस कलाकार की, जिसकी कला की गूँज सात समंदर पार तक जानी चाहिए थी, लेकिन वह अपनों के बीच ही 'अजनबी' बनकर रह गया। यह कहानी है बक्सर के देकुली गाँव के उस ब्राह्मण बेटे की, जिसने समाज की रूढ़ियों को पैरों तले रौंदकर 'लौंडा नाच' के घुंघरू बाँध लिए। ​ कुलीनता की जंजीरें और कला का विद्रोह ​सन् 1942, जब पूरा देश महात्मा गांधी के 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' के आह्वान पर सड़कों पर था, उसी दौर में बक्सर के इटाड़ी थाना स्थित देकुली गाँव में एक किशोर विद्रोह कर रहा था। वह विद्रोह किसी बाहरी सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि सदियों पुरानी उस सामाजिक जंजीर के खिलाफ था जो कला को 'जाति' के चश्मे से देखती थी। ​ राम सिंगासन उर्फ चाईं ओझा । नाम तो था ब्राह्मणों वाला, पर दिल धड़कता था लोक कला के लिए। इंद्र देव ओझा (झक्कड़ बाबा) जैसे जमींदार और रसूखदार पिता की इकलौती संतान होने के बावजूद चाईं ओझा ने 'नचनिया' बनना स्वीकार किया। ​ "बिना नाच और गान के चाईं जिंदा तो रह सकते थे...

घूसखोर पंडत': विवाद और संवेदनशीलता !

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 ​' ​फिल्म का शीर्षक सामने आते ही FWICE और कई सामाजिक संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई है। विरोध का मुख्य स्वर यह है कि 'पंडत' या 'पंडित' जैसे जातिसूचक शब्द के साथ 'घूसखोर' (Corrupt) जोड़ना एक विशेष समुदाय की छवि को धूमिल करता है। ​आलोचनात्मक दृष्टिकोण ​अभिव्यक्ति की आजादी बनाम सामाजिक मर्यादा: सिनेमा समाज का दर्पण होता है, लेकिन जब शीर्षक ही किसी समुदाय को नकारात्मक रूप से लक्षित (Target) करता प्रतीत हो, तो वह रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच की लकीर को धुंधला कर देता है। ​टाइटल का प्रभाव: फिल्म दिल्ली के एक सब-इंस्पेक्टर की कहानी है। फिल्म निर्माण में अक्सर 'कैच-फ्रेज' का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन वर्तमान सामाजिक परिवेश में फिल्मकारों को यह समझना होगा कि शीर्षक केवल ध्यान खींचने का जरिया नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है। ​पुराने उदाहरण: 'पंडित और पठान', 'पंडित जी बताइए न विवाह कब होई' जैसी फिल्में पहले बनी हैं, लेकिन वहां संदर्भ या तो सकारात्मक था या हास्यपूर्ण। 'घूसखोर' शब्द सीधे तौर पर एक नैतिक प्रहार है, ...

नीतीश जनता के नहीं, 'अफसरों के मुख्यमंत्री' हैं; विकास के कार्य पूरी तरह ठप: तेजस्वी यादव !

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  ​ राजद कार्यालय में राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष का भव्य अभिनंदन; तेजस्वी बोले- "लालू जी का बेटा हूं, सांप्रदायिक शक्तियों के आगे झुकूंगा नहीं" ​ पटना | 07 फरवरी, 2026 ​राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नवनियुक्त राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष श्री तेजस्वी प्रसाद यादव के प्रथम बार प्रदेश कार्यालय आगमन पर आज पटना की सड़कें राजद के रंग में रंगी नजर आईं। हजारों की संख्या में उमड़े कार्यकर्ताओं ने अपने नेता का अभूतपूर्व स्वागत किया। इस दौरान तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्र की मोदी सरकार पर जमकर हमला बोला। ​ "लोक हारा है और तंत्र जीता है" ​अभिनंदन समारोह को संबोधित करते हुए तेजस्वी यादव ने बिहार की वर्तमान सरकार को घेरे में लिया। उन्होंने कहा, "बिहार में आज जनतंत्र को धनतंत्र में बदल दिया गया है। फर्जी मुकदमों और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग से चुनाव जीता गया है। नीतीश कुमार अब जनता के नहीं, बल्कि सिर्फ अधिकारियों के मुख्यमंत्री बनकर रह गए हैं। यही कारण है कि 'डबल इंजन' की सरकार में जनता का कोई काम नहीं हो रहा है।" ​ साजिश के खिलाफ संघर्ष का संकल...