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छलावा और विरह की होली! (कविता) -प्रो प्रसिद्ध कुमार.

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   विरह की अग्नि दहक रही, फिर कैसी यह हुड़दंग है? जले पर नमक छिड़कती दुनिया, कैसा फीका रंग है? शब्द-बाण से हृदय बेधकर, कहते "शुभ हो पर्व यह", प्रतिशोध की ज्वाला मन में, होंठों पर झूठा गर्व यह। मुख पर कटु मुस्कान सजी है, भीतर गहरा द्वेष छिपा, दोहरे चरित्र के चोलों में, यहाँ असल इंसान लापता। जब दिल से दिल का मेल नहीं, तो कैसी यह मिलन की बेला? दिखावे की इस भीड़ में, हर शख्स खड़ा है अकेला। ऋतुएँ बदलीं, अंबर बदला, बदले जग के ढंग यहाँ, अपनों के ही चेहरों पर अब, दिखते सौ-सौ रंग यहाँ। महँगाई की मार ने छीनी, निर्धन की थाली की रोटी, अमीरी-गरीबी की ये खाई, नीयत कर देती छोटी। गुणों की अब पहचान कहाँ? हैसियत की बस माया है, इंसान की क्या बिसात भला? बस मिट्टी की एक काया है। मिट जाना है एक दिन सबको, मुट्ठी भर बस राख शेष, फिर क्यों पालें मन में हम, ये बैर-भाव और विषैला द्वेष? दो दिन की है ये ज़िंदगी, हँसकर गले लगाना सीखो, घृणा त्याग कर प्रेम-रंग में, रूह को अपनी भिगो। सच्ची होली वही, जहाँ मन का मैल धुल जाए, इंसानियत के गुलाल से, हर आँगन महक जाए। सभी को शुभ होली!

भारतीय अर्थव्यस्था : एक संरचनात्मक विरोधाभास !

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    भारत ने मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिरता (जैसे मुद्रास्फीति नियंत्रण, विदेशी मुद्रा भंडार और राजकोषीय प्रबंधन) में तो महारत हासिल कर ली है, लेकिन माइक्रो-इकोनॉमिक परिवेश (व्यवसाय करने की सुगमता, श्रम और भूमि सुधार) में यह पूरी तरह विफल रहा है। 1. निवेश की कमी और 'उत्पादन विरोधी' संस्कृति पूंजी निर्माण की चुनौती: भारत को स्थायी विकास के लिए 37-38% निवेश दर (Investment Rate) की आवश्यकता है, लेकिन हम 30% पर अटके हुए हैं। इसकी तुलना में चीन और पूर्व एशियाई देशों ने 40% से अधिक की दर बनाए रखी। व्यवसाय विरोधी परिवेश: भारत का तंत्र सूक्ष्म स्तर पर उद्यमियों को हतोत्साहित करता है। निजी निवेश की कमी इस 'नीतिगत विफलता' का सबसे बड़ा प्रमाण है। 2. संस्थागत और संवैधानिक बाधाएं (Concurrent List   'समवर्ती सूची' (Concurrent List) एक "औपनिवेशिक अभिशाप"  है। इसके आर्थिक प्रभाव इस प्रकार हैं: विभाजित क्षेत्राधिकार - उदाहरण के लिए, ब्याज दरें केंद्र तय करता है, लेकिन मजदूरी दरें राज्य के अधीन आती हैं। इसी तरह, पर्यावरण नीति दोनों के बीच उलझी हुई है। नीतिगत पक्षाघात (Policy Pa...

शिक्षा का मंदिर: राजनीति नहीं, उन्नति का मार्ग!

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  कॉलेज केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि वह स्थान है जहाँ भविष्य गढ़ा जाता है। gकॉलेज के उत्सव और गतिविधियाँ विविधता, समावेशन और सहिष्णुता को बढ़ावा देते हैं। जब हम इन मूल्यों को छोड़कर राजनीति और आपसी खींचतान में पड़ जाते हैं, तो शिक्षा का मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाता है। कॉलेज परिसर में एकता की आवश्यकता राजनीति से परे विकास: कॉलेज सीखने की उम्र है। जब परिसर में राजनीति का प्रवेश होता है, तो विद्यार्थियों के बीच वैचारिक मतभेद "दुश्मनी" का रूप ले लेते हैं। कॉलेज को राजनीति का अखाड़ा बनाने के बजाय ज्ञान का केंद्र बने रहना चाहिए। समानता का भाव: किसी को नीचा दिखाना कमजोरी की निशानी है। एक स्वस्थ शैक्षणिक माहौल वही है जहाँ हर छात्र, चाहे वह किसी भी भाषा, क्षेत्र या पृष्ठभूमि से हो, सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे। साझा लक्ष्य की शक्ति: जब विद्यार्थी एक साझा लक्ष्य (जैसे प्रोजेक्ट, सांस्कृतिक कार्यक्रम या खेल) के लिए साथ मिलकर कार्य करते हैं, तो सामाजिक विभाजनों की दीवारें अपने आप गिर जाती हैं। यही वह समय है जब व्यक्तित्व का असली निखार होता है। "महानता किसी को नीचा दिखान...

देश में विजनहीन कृषि नीति ! ठगा सा रह गये किसान!

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  1. विजनहीन कृषि नीति      अभी कृषि नीति में 'स्पष्ट लक्ष्यों' का अभाव है। यह संकेत देता है कि सरकारें योजनाएं तो बनाती हैं, लेकिन उनका उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना है या केवल आंकड़ों का खेल, यह स्पष्ट नहीं हो पाता। बिना ठोस लक्ष्य के कोई भी नीति केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाती है। 2. उचित मूल्य और सरकारी खरीद की विफलता है. जिन फसलों की खरीद केंद्रीय एजेंसियां (जैसे FCI आदि) करती हैं, वहां किसानों को वाजिब दाम (Fair Price) मिलना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। वास्तविकता यह है कि बिचौलियों और जटिल प्रक्रियाओं के कारण किसान अक्सर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के लाभ से वंचित रह जाता है। 3. भंडारण (Warehousing) का गंभीर संकट भंडारण क्षमता का अभाव: किसानों के पास फसल रखने की जगह नहीं है। पुराना स्टॉक: गोदामों में पहले से ही खाद्य वितरण के लिए अनाज भरा पड़ा है। कुप्रबंधन: पिछले सत्र (Session) के अनाज का सही उपयोग नहीं हो पाया और नई फसल आ गई।  भारत में समस्या 'उत्पादन' की नहीं, बल्कि 'प्रबंधन' और 'रखरखाव' की है। जब तक पुराने अनाज के निपटान और नए अनाज के भंडारण के ल...

बिहार: समृद्धि का अभिशाप और 'डंपिंग यार्ड' अर्थव्यवस्था!

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  बिहार की इंडस्ट्री में आज एक ऐसा बदलाव आया है, जहां प्रोडक्ट्स की बिक्री शुरू हो गई है और राज्य में केवल दूसरे उत्पादों के लिए एक 'बाज़ार' उभर कर सामने आई है। 21 साल के "सुशासन" और "डबल इंजन" के बीच की सच्चाई यह है कि बिहार से जाने वाले क्लासिक्स से मिलते-जुलते हैं और आने वाले ट्रकों से मिलते हैं। 1. कच्चे माल का निर्यातक , निर्मित माल का आयातक बिहार की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहां कच्चे माल का जन्म तो होता है, लेकिन उसका "वैल्यू एडिशन" (मूल्य वृद्धि) सामने आता है। मखाना: विश्व का 80-90% मखाना मिथिला  उपजाता है, लेकिन इसकी ब्रांडिंग और बाजार में गुजरात और महाराष्ट्र में बाजी मार ले जाते हैं। फल एवं सब्जी: सब्जी की लीची हो या हाजीपुर का केला, बिहार कंपनी (प्रसंस्करण) के अभाव में औने-सुथरा दाम पर बेचती है, और वही फल 'जूस' या 'चिप्स' पांच गुनी कीमत पर वापस बिहार के उत्पाद में बिकते हैं। आलू: बिहार देश के शीर्ष आलू उत्पादक राज्यों में है, फिर भी चिप्स की एक बड़ी टीम यहां नहीं लग पाई। 2. जल संसाधन के बावजूद 'आंध्र की मछली' प...

चकमुसा -बग्घा टोला में राष्ट्रीय जनता दल का 3 मार्च को भव्य 'होली मिलन समारोह'!

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  होली का त्योहार न केवल रंगों का उत्सव है, बल्कि यह आपसी भाईचारे और मेल-मिलाप का भी प्रतीक है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) द्वारा पटना के फुलवारी शरीफ में एक भव्य 'होली मिलन समारोह' का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य कार्यकर्ताओं और जनता के बीच खुशियां बांटना और एकजुटता को मजबूत करना है। कार्यक्रम की मुख्य जानकारी (Event Details) अगर आप पटना या आस-पास के क्षेत्रों में हैं, तो इस उत्सव का हिस्सा जरूर बनें: तारीख: 03 मार्च 2026 (मंगलवार) समय: दिन के 11:00 बजे से स्थान: नेता जी लाईन होटल, चकमुसा, फुलवारी शरीफ आयोजन के मुख्य चेहरे यह कार्यक्रम राजद के वरिष्ठ नेताओं के मार्गदर्शन और स्थानीय पदाधिकारियों के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।  इस आयोजन में निम्नलिखित प्रमुख व्यक्तियों की भूमिका है: श्रवण कुमार (प्रखंड अध्यक्ष) हरि नारायण यादव (पटना जिला महासचिव) दीनानाथ यादव (जिला अध्यक्ष, पटना) आयोजक टीम: राज किशोर साह, मुन्ना यादव और भरत यादव। क्या होगा खास? इस समारोह में रंगों और गुलाल के साथ-साथ पारंपरिक होली के गीतों और जलपान की व्यवस्...

साम्राज्यवादी युद्ध: अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में 'गुंडागर्दी' के लिए कोई जगह नहीं !

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  हालिया सैन्य कार्रवाइयां अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन हैं और दुनिया को एक खतरनाक संकट की ओर धकेल रही हैं। वादों का टूटना और युद्ध का अगाज.  डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी राष्ट्रपति बनने से पहले 'अंतहीन युद्धों' को समाप्त करने का वादा किया था, लेकिन वर्तमान स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ शुरू हुए युद्ध और उसके सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या ने पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया है। मुख्य बिंदु और आरोप: नेतृत्व पर प्रहार:  जहाँ ट्रंप को एक 'अस्थिर राष्ट्रवादी' बताया गया है, वहीं नेतन्याहू पर युद्ध अपराधों के आरोपों का जिक्र है। कूटनीति की विफलता: यह दावा किया गया है कि ईरान एक परमाणु समझौते के करीब था और ओमान की मध्यस्थता में बातचीत चल रही थी। लेकिन समझौते के बजाय मिसाइल हमलों को चुना गया। वैश्विक आर्थिक खतरा: ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज  को बंद करने की घोषणा से वैश्विक अर्थव्यवस्था, विशेषकर भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए बड़ा संकट पैदा हो सकता है। एक "चुना हुआ" युद्ध  यह कोई 'पूर्व-नियोजित सुरक्षा' कार्रवाई नहीं ...