Posts

घरेलू हिंसा से विनाशकारी नरसंहार: गोमती नगर हत्याकांड का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण।

Image
  लखनऊ के गोमती नगर में घटित यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि गंभीर मनोविकार, पारिवारिक कलह और असामाजिक कुंठा का एक डरावना उदाहरण है। 1. ईर्ष्या, अधिकार भावना और हिंसा (Toxic Possession & Fragile Ego) वैवाहिक मतभेद और तलाक की प्रक्रिया के दौरान आरोपी का सार्वजनिक रूप से पत्नी की हत्या करना और सोशल मीडिया स्टेटस पर "चीटिंग" का आरोप लगाना यह दर्शाता है कि आरोपी के भीतर ईगो (Ego) और नियंत्रण खोने का अत्यधिक आक्रोश था। संबंधों में अधिकार जताने की मानसिकता (Toxic Masculinity) जब चरम सीमा पर पहुँचती है, तो व्यक्ति साथी को एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में स्वीकार नहीं कर पाता। 2. असहायता का विस्थापन और 'एनिहिलिएटर' मानसिकता (Family Annihilator Syndrome) मनोविज्ञान में इसे "फैमिली एनिहिलिएटर" (पारिवारिक विनाशक) कहा जाता है। माता-पिता की अनुपस्थिति में मानसिक रूप से बीमार बहन की जिम्मेदारी और खुद के असफल वैवाहिक जीवन के तनाव को मानस नियंत्रित नहीं कर सका। अपनी बहन को मारने के पीछे उसकी संभवतः यह विकृत सोच रही होगी कि उसके जाने के बाद बहन अस...

नए करों से पहले, हर रुपये का सही हिसाब आवश्यक। -प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र विभाग।

Image
   राज्य राजकोषीय नीति, बजटीय अनुशासन और राजस्व प्रबंधन।  प्रत्येक बजट सत्र के दौरान राज्यों में प्रायः यही बहस होती है कि लोक कल्याणकारी योजनाओं और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए अधिक धन की आवश्यकता है, इसलिए करों में वृद्धि की जाए। हालांकि, नागरिकों पर नया कर लगाने से पहले यह मौलिक सवाल पूछा जाना आवश्यक है: क्या राज्य अपनी मौजूदा राजस्व वसूली को पूर्णतः कानूनी रूप से हासिल कर पा रहा है और स्वीकृत राशि का कुशल उपयोग कर रहा है? नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के हालिया आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक समस्या नए कर लगाने की नहीं, बल्कि बजटीय अनुशासनहीनता, राजस्व संग्रह में कमियों को दूर करने और जीरो-बेस्ड बजटिंग एवं परफॉर्मेंस-बेस्ड बजटिंग को अपनाने की है। राज्य की वित्तीय स्थिति चुनौतीपूर्ण है—ऋण का भार अधिक है, राजस्व खाता घाटे में है, और वेतन, पेंशन तथा ब्याज भुगतान के कारण बजटीय लचीलापन बहुत कम बचता है। लेकिन CAG की रिपोर्ट (2023-24) निम्नलिखित महत्वपूर्ण तथ्यों को रेखांकित करती है: आवंटन बनाम वास्तविक खर्च: वर्ष 2023-24 में तमिलनाडु ने ₹4.47 लाख करोड़ का बजट रखा ...

विश्वास का मत: निष्पक्ष मतदाता सूची और चुनावी शुचिता की चुनौतियाँ !

Image
  सफ़ाई और पारदर्शिता ज़रूरी है, लेकिन चुनावी सुधारों को राजनीतिक हथियार नहीं बनना चाहिए। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत की निर्वाचन प्रणाली की हालिया सराहना ने विश्व के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों—भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका—में चुनावी शुचिता  पर चल रही बहस को पुनः केंद्र में ला दिया है। ट्रम्प ने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के संदर्भ में टिप्पणी करते हुए अमेरिकी चुनाव प्रणाली में 'वैध फोटो पहचान पत्र' की अनिवार्यता की वकालत की है।  भारत और अमेरिका की निर्वाचन प्रणालियों के ढाँचे में मौलिक अंतर है: भारत का केंद्रीयकृत मॉडल: भारत में 'भारतीय निर्वाचन आयोग' एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है, जो पूरे देश में एकीकृत और राष्ट्रीयकृत प्रणाली के तहत चुनाव संपन्न कराता है। यद्यपि इसकी साख और कार्यप्रणाली ने दशकों तक वैश्विक प्रशंसा पाई है, फिर भी हाल के दिनों में इसकी निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक बहसें तेज़ हुई हैं। अमेरिका का विकेंद्रीकृत मॉडल: अमेरिका में चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह राज्यों और स्थानीय स्तर पर विभाजित  है। वहाँ प्रत्येक राज्य के प...

घटती प्रजनन दर और भविष्य का आर्थिक संकट !

Image
    प्रजनन दर का वर्तमान स्तर: सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.9 हो गई है, जो जनसंख्या संतुलन के लिए आवश्यक 2.1  के आंकड़े से काफी कम है। ऐतिहासिक गिरावट का क्रम: प्रजनन दर में गिरावट की शुरुआत 1970 के दशक के मध्य से हुई थी। 1990 से 2000 के बीच सबसे तेज गिरावट देखी गई। वर्ष 1991 में जो प्रजनन दर 3.6 थी, वह 2001 तक घटकर 3.1 रह गई। 2001 से अब तक इसमें लगातार तेज गिरावट आई है और यह इतिहास के अपने सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है। आर्थिक प्रभाव और चुनौतियाँ: कार्यबल में भारी कमी: प्रजनन दर में गिरावट से भविष्य में युवा आबादी का अनुपात कम होगा, जिससे देश के मानव संसाधन और श्रम शक्ति  में बड़ी गिरावट का खतरा है। क्षेत्रीय असमानता -देश के विभिन्न राज्यों में प्रजनन दर के असमान स्तरों के कारण भविष्य में आर्थिक और जनसांख्यिकीय असंतुलन पैदा हो सकता है। भविष्य के युवाओं पर आर्थिक बोझ: यदि समय रहते इस डेमोग्राफिक बदलाव और चुनौतियों पर नीतिगत कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में वृद्ध होती आबादी की देखभाल और सामाजिक सुरक्षा का भार देश के सीमित युवा क...

साहब, मेमसाहब और 'टॉमी'! ( कहानी ) - प्रो प्रसिद्ध कुमार।

Image
  'कुत्ता' होना खुशनसीबी है, और 'इंसान' बने रहना सबसे बड़ा अभिशाप!" दिल्ली की तपती दोपहर में लुटियंस ज़ोन की चौड़ी सड़कों पर सन्नाटा पसरा था। सड़क के किनारे फुटपाथ पर एक बूढ़ा आदमी पुरानी चादर बिछाए पेट की आग को दबाने की कोशिश कर रहा था। उसकी आँखें सड़क पर चलती गाड़ियों में शायद कुछ ढूँढ रही थीं—शायद एक रोटी, शायद कोई रहम। तभी एक चमचमाती, एअर-कंडीशंड मर्सिडीज़ रेड लाइट पर आकर रुकी। गाड़ी की पिछली सीट पर रेशमी गद्दे पर बैठा था—'टॉमी'। टॉमी कोई साधारण प्राणी नहीं था; वह इस दौर के एक बड़े उद्योगपति का 'कुत्ता' था। टॉमी की दिनचर्या किसी राजा-महाराजा जैसी थी। सुबह-सुबह उसके लिए पर्सनल वेटर उबला हुआ चिकन और पैकेज़्ड न्यूट्रिशन लाता, दोपहर में उसके स्पेशल एसी रूम में तापमान 22 डिग्री फारेनहाइट पर सेट रहता, और महीने में दो बार 'एनिमल डर्मेटोलॉजिस्ट' उसके बालों की चमक चेक करने घर आते। टॉमी की देखभाल के लिए दो नौकर 24 घंटे तैनात रहते थे, जिनकी अपनी तनख्वाह शायद किसी प्राइमरी स्कूल के मास्टर साहब से ज्यादा थी। रेड लाइट पर गाड़ी रुकी तो टॉमी ने अपनी मखम...

थाली से गायब होता संतुलन: खाद्य महंगाई की मार और बेहाल मध्यवर्ग!

Image
  भारतीय रसोई पर इन दिनों आर्थिक अनिश्चितता का संकट मंडरा रहा है। बाजार में पिछले कुछ महीनों से चीनी, चावल और खाद्य तेल जैसी अनिवार्य वस्तुओं की कीमतों में आया उछाल अब कोई सामान्य मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि एक गहरी संरचनात्मक महंगाई का रूप ले चुका है। खुदरा बाजारों में चीनी का 60 से 65 रुपये प्रति किलो, सरसों और अन्य खाद्य तेलों का 200 से 220 रुपये प्रति लीटर, और अच्छी गुणवत्ता वाले चावल का 75 से 80रुपये प्रति किलो तक पहुंचना सीधे तौर पर यह दर्शाता है कि आम आदमी के दैनिक बजट की नींव हिल चुकी है। आंकड़ों के नजरिए से देखें तो राष्ट्रीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी लगभग 39% से 45% के बीच है। जब खाद्यान्न और खाद्य तेल महंगे होते हैं, तो उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (CFPI) तेजी से ऊपर भागता है।   भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण खाद्य तेल 200 रुपये प्रति लीटर के आंकड़े को पार कर रहे हैं। अनियमित मानसून, जलवायु परिवर्तन और उत्पादन लागत में बढ़ोतरी के कारण चीनी ...

राजनीतिक शब्दावली का विस्तार: 'अर्बन नक्सल' से 'दिमागी नक्सल' तक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता!

Image
  भारतीय राजनीति में राजनीतिक मुहावरों और शब्दावलियों का उपयोग हमेशा से जनमानस को प्रभावित करने और विमर्श की दिशा तय करने का एक प्रमुख हथियार रहा है। हाल ही में 15 अगस्त को लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस्तेमाल किए गए 'दिमागी नक्सल' शब्द ने देश भर में एक नई राजनीतिक और वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है। इससे पहले राजनीतिक गलियारों में 'अर्बन नक्सल' शब्द की काफी चर्चा रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक लाभ या वैचारिक घेराबंदी के लिए ऐसी शब्दावलियों का प्रयोग किस हद तक उचित है, और इसका भारतीय लोकतंत्र तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर क्या प्रभाव पड़ता है? शब्दावली पर विविध दृष्टिकोण इस बयान के आते ही राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों और सिनेमा जगत की हस्तियों की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं आईं: अनुराग कश्यप: "जो असल मुद्दे उठाते हैं, उन्हें 'दिमागी नक्सल' कहना बंद कीजिए। असली नक्सल विचार नहीं, व्यवस्था में है।" पी. चिदंबरम: "अगर सच बोलना और सरकार से सवाल करना 'दिमागी नक्सल' है, तो मुझे इस पर गर्व है।...