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खाकी पर लगा दाग: मादक पदार्थ के तस्करों को छोड़ने के एवज में रिश्वत लेने का गंभीर मामला।

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   ये है मेरा थाना जहाँ कानून के रखवाले ही बने भक्षक, फुलवारीशरीफ थाने के पुलिसकर्मियों की घिनौनी करतूत बेनकाब! बिहार पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर से बहुत बड़ा और गंभीर सवालिया निशान लग गया है। राजधानी पटना के फुलवारीशरीफ थाने से एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है, जिसने खाकी वर्दी की साख को तार-तार कर दिया है। अपराधियों पर शिकंजा कसने की कसम खाने वाले पुलिसकर्मी खुद भ्रष्टाचार के दलदल में डूबे नजर आ रहे हैं।    दिनांक 26.10.2026 को फुलवारीशरीफ थाना क्षेत्र में गुप्त सूचना के आधार पर मादक पदार्थ (ड्रग्स) की खरीद-बिक्री करने वाले आकिब खान उर्फ मो० साकिब खान को गिरफ्तार किया गया था। लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू होता है!    गिरफ्तारी के बाद साक्ष्यों और आरोपियों को गायब करने का खेल: मुख्य आरोपी के साथ पकड़े गए अन्य दो व्यक्तियों—मो० आफ़ताब आलम और मो० एहसान—को भी पुलिस पकड़कर थाना लाई थी, लेकिन न तो उनका नाम प्राथमिकी (FIR) में दर्ज किया गया और न ही इसकी सूचना वरीय पदाधिकारियों को दी गई।    रिश्वत लेकर छोड़ने का सनसनीखेज मामला: आरोप है कि छापेमारी...

विनम्रता की मिट्टी और जीवन में सीखने की निरंतर प्रक्रिया !

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  हमारे समाज में ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जो घमंड का आवरण ओढ़े रहते हैं और उनका आचार-व्यवहार भी इसी बात को दर्शाता है। चाहे वे सरकारी विभागों के ऊंचे ओहदे पर हों, निजी कंपनियों के संचालक हों या प्रबंधन में शामिल हों, ऐसे लोगों को समाज और देश की प्रगति में कोई रुचि नहीं होती, वे केवल अपने स्वार्थ के बारे में सोचते हैं।    इसके विपरीत, जीवन की असली खूबसूरती विनम्रता और निरंतर सीखने की प्रक्रिया में है। समय की गति को कोई नहीं बांध सकता और कुछ नया सीखने की कोई उम्र नहीं होती। जिस दिन से हम बोलना सीखते हैं, संस्कारवान होने और सीखने की प्रक्रिया उसी दिन से आरंभ हो जाती है। यदि कोई यह सोच ले कि उसने सब सीख लिया है, तो यह उसकी नादानी है। सीखने के लिए पहली शर्त विनम्रता है। शरीर का रंग, रूप या धन-दौलत इंसान के आंतरिक गुणों का परिचय नहीं देते, बल्कि उसका आचरण, धैर्य और शालीनता ही उसके वास्तविक व्यक्तित्व को दर्शाते हैं।    #HumanValues #Humility #LifeLessons #Society #Inspiration #PersonalGrowth   

आधुनिक सफलता में अज्ञानता और आत्मविश्वासी मूर्खता का दौर।

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  आधुनिक समाज में अज्ञानता और आत्मविश्वासी मूर्खता (Confident Ignorance) का एक ऐसा दौर चल रहा है, जहां लोग बिना किसी वास्तविक ज्ञान के भी खुद को विशेषज्ञ समझने का दावा करते हैं। मनोविज्ञान में इसे डनिंग-क्रूगर प्रभाव कहा जाता है। ​स्टीव जॉब्स के 'स्टे हंगरी, स्टे फूलीश' के विचार से दो दशक आगे बढ़कर, आज के आधुनिक समय में 'स्टे एम्प्टी, स्टे स्टुपिड' की सलाह अधिक प्रासंगिक लगने लगी है.   ​ज्ञान और विशेषज्ञता जैसी चीजें आज की सफलता और शक्ति की दौड़ में बाधा प्रतीत होती हैं, जहाँ आत्मविश्वासी मूर्खता और अज्ञानता को अधिक महत्व मिलने लगा है.   ​आज का व्यक्ति संदेह और पुष्टि करने वाले स्मार्ट व्यक्ति से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाता, बल्कि अपनी ही ढिंढोरा पीटने वाले और अपमानजनक बातें करने वाले से आसानी से जुड़ जाता है.   ​मूर्खता ने हमेशा से शक्ति और लोकप्रियता हासिल की है, और नया मोड़ यह है कि आज मूर्खता आकांक्षी (aspirational) बन चुकी है.   #ModernSociety #Ignorance #SuccessMindset #SocialCommentary #StayStupid

मुख्यमंत्री जी का 'भाषा ज्ञान' और बिहार का नया 'क्राइम' शास्त्र!

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    ​बिहार की राजनीति में इन दिनों एक अजीबोगरीब दार्शनिक बहस छिड़ गई है। राजद के मुख्य प्रवक्ता एजाज अहमद ने हमारे यशस्वी (और अब भाषाविद् बन चुके) मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के ताजा बयान पर ऐसा करारा तंज कसा है कि सुनकर हंसी भी आती है और तरस भी आता है! ​मामला यह है कि मुख्यमंत्री जी ने फरमाया—"बिहार में अपराध का कॉन्सेप्ट कम हुआ है और क्राईम बढ़ रहे हैं!" ​अब भला मानुष पूछ बैठे कि भई, अंग्रेजी की डिक्शनरी और हिंदी के शब्दकोश में ऐसा कौन सा नया संशोधन हो गया, जिसकी खबर सिर्फ सरकार को है? एजाज अहमद ने चुटकी लेते हुए ठीक ही कहा कि मुख्यमंत्री जी को शायद यह ज्ञान नहीं था कि देवनागरी में जिसे 'अपराध' कहा जाता है, अंग्रेजी में उसी का पर्यायवाची 'क्राइम' होता है। अब दोनों का मतलब एक ही है, तो फिर सरकार के मुखिया ने कौन से वैज्ञानिक अंतर के आधार पर यह थ्योरी गढ़ी, यह तो वही जानें! ​शायद मुख्यमंत्री जी ने यह मान लिया हो कि हिंदी वाला अपराध  छोटी-मोटी चोरी-चकारी है, और अंग्रेजी वाला 'क्राइम' कोई वीवीआईपी चीज है, जो आजकल बिहार में फल-फूल रही है। ​जब 'अपराध'...

​कामरेड स्वदेश भट्टाचार्य अमर रहें: भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के एक युग का अवसान।

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    ​भाकपा (माले) लिबरेशन के संस्थापक नेता, पोलित ब्यूरो सदस्य और पांच दशकों तक पार्टी संगठन के मुख्य मार्गदर्शक कॉमरेड स्वदेश भट्टाचार्य के निधन पर एक श्रद्धांजलि। ​भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन और क्रांतिकारी राजनीति के लिए 30 अक्टूबर 2026 का दिन एक अपूरणीय क्षति लेकर आया। भाकपा (माले) लिबरेशन के संस्थापक नेताओं में से एक, पोलित ब्यूरो सदस्य और केंद्रीय संगठन विभाग के प्रभारी कॉमरेड स्वदेश भट्टाचार्य अब हमारे बीच नहीं रहे। 84 वर्ष की आयु में, 30 अक्टूबर की रात 11:15 बजे, पटना के रूबन मेमोरियल अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। लंबे समय से वे कैंसर से जूझ रहे थे, लेकिन उनका क्रांतिकारी जज्बा और वैचारिक स्पष्टता अंतिम समय तक अडिग रही। ​1974 के पुनर्गठित केंद्रीय दल के अंतिम जीवित स्तंभ ​कॉमरेड स्वदेश भट्टाचार्य 28 जुलाई 1974 को भाकपा (माले) की पुनर्गठित केंद्रीय कमेटी के अंतिम जीवित सदस्य थे। 1974 में पुनर्गठित इस ऐतिहासिक केंद्रीय कमेटी के अन्य दो सदस्य कॉमरेड जौहर (सुब्रत दत्त) और कॉमरेड विनोद मिश्र थे। ​1974 से 1980 तक पार्टी के बिहार राज्य सचिव रहे कॉमरेड स्वदेश ने राष्ट्रव्या...

बेटी ने लिया संकल्प, पूरा हुआ मां का सपना – संघर्ष और अटूट विश्वास की प्रेरणादायक दास्तान।

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    ​सफलता किसी बड़े शहर या मँहगे संसाधनों की मोहताज नहीं होती, बल्कि यह पक्के इरादों और सच्ची मेहनत से तय होती है। इस बात को सच कर दिखाया है बक्सर की गरिमा लोहिया ने, जिन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) सिविल सेवा परीक्षा 2022 में देशभर में दूसरी रैंक हासिल कर इतिहास रच दिया। उनकी यह सफलता महज़ एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी बेटी और माँ के अटूट संघर्ष, त्याग और विश्वास की मिसाल है जो हर किसी को प्रेरित करती है।   ​पिता का साया उठने के बाद टूटा नहीं हौसला ​गरिमा मूल रूप से एक व्यावसायिक परिवार से संबंध रखती हैं। उनके पिता मनोज लोहिया, जो थोक साड़ी के व्यवसाय से जुड़े थे, का वर्ष 2015 में निधन हो गया था। पिता की अचानक मौत के बाद पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और घर की जिम्मेदारियों का स्वरूप बदल गया। ऐसे विकट और मुश्किल हालातों में उनकी माँ सुनीता देवी ने परिवार को संभाला और अपनी बेटी के हौसले को कभी टूटने नहीं दिया। उन्होंने अकेले ही अपने तीनों बच्चों की जिम्मेदारी उठाई और गरिमा की हर कदम पर ढाल बनीं।   ​माँ का सपना और बेटी का ...

जनांदोलन, कारोबार और लोकतंत्र: शिवानंद तिवारी के नजरिए से 1974 से आज तक की एक पड़ताल।

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  पूर्व राज्यसभा सांसद शिवानंद तिवारी द्वारा हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित इंडिया गठबंधन की रैली और 1974 के ऐतिहासिक जेपी आंदोलन के संदर्भ में दिए गए बयान ने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर एक गहरी और विचारणीय बहस छेड़ दी है। आज जब भी कोई बड़ा राजनीतिक आयोजन या जनांदोलन होता है, तो उसका विरोध करने वाले सबसे पहले आर्थिक नुकसान का पैमाना सामने ले आते हैं। लेकिन क्या लोकतंत्र, संविधान और नागरिकों के अधिकारों की कीमत पर व्यापारिक नुकसान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए? आइए इस पूरे वैचारिक परिप्रेक्ष्य को विस्तार से समझें। 1. रामलीला मैदान की रैली और कारोबारी नुकसान का मुद्दा हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई रैली को लेकर यह सवाल उठाया गया कि इसके कारण राजधानी के बाजारों में हजारों करोड़ रुपये का कारोबार प्रभावित हुआ। आलोचकों का तर्क था कि दिवाली और करवाचौथ की खरीदारी के लिए निकले लोग बाजार नहीं पहुंच सके, जिससे व्यापारियों को भारी नुकसान हुआ। शिवानंद तिवारी ने इस दावों पर सवाल उठाते हुए एक बड़ा विरोधाभास उजागर किया है। उन्होंने कहा कि नुकसान का यह अनुमान कितना सही है,...