शर्मसार होती मानवता और खोखले दावे: जमुई से लेकर बिहटा तक सुलगता बिहार।
बिहार की धरती पर हाल ही में घटी घटनाएं सिर्फ कानून-व्यवस्था की नाकामी नहीं हैं, बल्कि यह हमारे पूरे समाज की अंतरात्मा को झकझोर देने वाली मानवीय विफलता हैं। जमुई में सरेराह एक छात्रा के साथ छेड़खानी और दुष्कर्म का प्रयास, और उससे भी ज्यादा खौफनाक पहलू—तमाशबीन बनी भीड़—यह साबित करता है कि संवेदनशीलता किस रसातल में जा चुकी है। दूसरी ओर, बिहटा से अपहृत छात्रा का शव उत्तर प्रदेश से मिलना इस बात का चीख-चीख कर अहसास कराता है कि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का नारा सिर्फ कागजी घोषणा बनकर रह गया है। संवेदनहीन होती भीड़ और गिरता सामाजिक ताना-बाना जमुई की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर अपराधियों के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं? जब सरेराह एक अबोध छात्रा के साथ दरिंदगी की कोशिश हो रही हो और आसपास खड़े लोग सिर्फ मूकदर्शक बनकर वीडियो बनाते रहें, तो यह कानून के इकबाल के साथ-साथ सामाजिक मूल्यों के पतन की पराकाष्ठा है। यह डर सिर्फ अपराधियों का नहीं, बल्कि समाज के उस खोखलेपन का है जो जुर्म होते देख अपनी आंखें मूंद लेता है। खोखले साबित हो रहे सुरक्षा के दावे बढ़ता आपरा...