आधुनिक समाज में बढ़ता भावनात्मक फासला और 'आंसुओं' की सार्थकता !
आज के युग में हम शारीरिक रूप से एक-दूसरे के जितने करीब आए हैं, भावनात्मक रूप से उतने ही दूर होते जा रहे हैं। "हम एक-दूसरे के सामने होकर भी एक-दूसरे के सुख-दुख से कितने अपरिचित हैं!"—आज के 'डिजिटल एकांत' (Digital Isolation) की कड़वी सच्चाई को बयां करती है। 1. भौतिक निकटता बनाम भावनात्मक दूरी मनोवैज्ञानिक रूप से, हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ 'भीड़ में अकेलापन' एक सामान्य स्थिति बन गई है। सोशल मीडिया पर सैकड़ों मित्र होने के बावजूद, जब कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन के 'सुख-दुख' से गुजरता है, तो उसके पास वास्तविक संवेदना साझा करने वाले लोगों का अभाव होता है। हम एक ही मेज पर बैठकर फोन में व्यस्त रहते हैं, जिससे हमारे बीच की सहानुभूति (Empathy) का स्तर गिरता जा रहा है। 2. आंसुओं का मनोविज्ञान: मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, आंसू केवल दुख की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि ये मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक 'कैथार्सिस' (Catharsis) या भावनात्मक शुद्धिकरण का कार्य करते हैं। तनाव से मुक्ति: आंसू बहाने से शरीर में 'कोर्टिसोल' (तनाव हार्मोन) का स्तर कम ह...