श्वेत क्रांति के जनकों का खून चूसता तंत्र: बाढ़ की मार, बिचौलियों की लूट और फर्जीवाड़े का शिकार हमारा गोपालक!
देश की अर्थव्यवस्था और हर घर की सेहत को संभालने वाला पशुपालक समाज आज खुद सबसे लाचार अवस्था में छोड़ दिया गया है। अहीर (यादव), गुर्जर और जाट समुदायों की यह पारंपरिक जीवटता ही है कि वे नदियों के कछारों, बीहड़ों और जंगलों की विषम परिस्थितियों में बिना किसी बुनियादी सुविधा के अपने मवेशियों का पेट पाल रहे हैं। जब बाढ़ आती है, तो न पशुओं के लिए सूखा चारा होता है, न इंसान के सिर पर छत। सबकुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। छल और लूट का यह चक्र अब बर्दाश्त के बाहर है: कागजी योजनाएं और फर्जीवाड़े की लूट: सरकार पशुपालन के नाम पर बड़ी-बड़ी सब्सिडी का ढोल पीटती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि असली गोपालक तक फूटी कौड़ी नहीं पहुँचती। दलाल, बिचौलिए और फर्जी कागजी डेयरियां चलाकर रसूखदार लोग पूरी सब्सिडी डकार जाते हैं। मेहनत की कौड़ियों के दाम कीमत: रात-दिन खून-पसीना बहाकर दूध पैदा करने वाले पशुपालक को उसकी लागत का सही मूल्य नहीं मिलता। मुनाफाखोरी का पूरा मलाईदार हिस्सा बिचौलियों की जेब में जाता है। ज़हर बेचने वालों पर मेहरबानी: एक तरफ असली पशुपालक पाई-पाई को मोहताज है, दूसरी तरफ बाजारों में बेधड़क...