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सुशासन की बलिवेदी पर 'सुशासन': जब बिहार में नौकरशाही भी अपराधियों के निशाने पर आ गई!

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  बिहार में 'सुशासन' का दावा लंबे समय से प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक मंचों का मुख्य नारा रहा है। लेकिन जब राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति इस कदर बिगड़ जाए कि जनता की रक्षा और नीति-निर्माण में लगे प्रशासनिक अधिकारी ही सुरक्षित न रहें, तो इस 'सुशासन' की खोखली दीवारों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। औरंगाबाद में कार्यपालक पदाधिकारी (EO) की दिन-दहाड़े या निर्मम हत्या ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि राज्य में कानून का डर लगभग समाप्त हो चुका है और अपराधी बेखौफ होकर अपनी मनमर्जी चला रहे हैं। औरंगाबाद में EO की हत्या केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं है, बल्कि यह राज्य के प्रशासनिक इक़बाल पर करारा तमाचा है। जिस व्यवस्था में अधिकारी अपनी जान की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहें, वहाँ आम जनता न्याय और सुरक्षा की उम्मीद किससे करे? जब विकास योजनाओं को लागू करने वाले और भ्रष्टाचार पर नकेल कसने वाले अफसरों की आवाज गोलियों की गूँज से दबा दी जाती है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि सत्ता का नियंत्रण नेताओं के हाथों से फिसलकर 'समानांतर सत्ता' चलाने वाले अपराधियों के हाथों में चला गया है। और...

हमारी अनदेखी प्रेम कहानी: जहाँ हम जैसे हैं, वैसे ही स्वीकारे जाते हैं! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    रोमांटिक फिल्मों और चर्चित उपन्यासों ने सदियों से हमें यही सिखाया है कि प्रेम में दो लोग एक-दूसरे को ‘पूरा’ करते हैं और एक-दूसरे की ‘दुनिया’ बन जाते हैं। लेकिन किसी की पूरी दुनिया बनने का प्रयास केवल एक मुगालता है—यह मानसिक और भावनात्मक रूप से बेहद थका देने वाला सफ़र है। जीवन के रंगमंच पर हर रिश्ते की अपनी माँगें और शर्तें होती हैं: रोमांटिक प्रेम बराबरी की साझेदारी और निरंतर अपेक्षाओं की माँग करता है। माता-पिता होना आपसे धैर्य का कभी न समाप्त होने वाला महासागर बनने को कहता है। कार्यक्षेत्र आपसे हर पल कुशल, पेशेवर और त्रुटिहीन रहने की उम्मीद रखता है। लेकिन दोस्ती—शायद यह दुनिया का इकलौता ऐसा रिश्ता है, जो एक सक्षम और समझदार वयस्क के मुखौटे के पीछे छिपे हमारे अधूरे, थोड़े सिरफिरे और बेहद कच्चे रूप को बिना किसी शर्त के गले लगा लेता है। मौन को समझने वाला सच्चा निस्वार्थ संबल शास्त्रीय उक्ति—“जो न होइ मित्र  के दुख से  दुखारी...”—आज के आधुनिक युग में भी उतनी ही चरितार्थ होती है जितनी सदियों पहले थी। सच्चा मित्र वह है जो बिना एक शब्द सुने आपकी मनःस्थिति, परिस्थितियों ...

'She Walks in Beauty' . - Lord Byron. Poem.

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  ये अंग्रेजी की कविता आज भी मुझे बहुत रोचक लगती है।  इस प्रसिद्ध कविता के कवि लॉर्ड बायरन हैं, जिनका पूरा नाम जॉर्ज गॉर्डन बायरन (George Gordon Byron) था। वे अंग्रेजी साहित्य के प्रमुख 'रोमांटिक युग' (Romantic Era) के कवियों में से एक हैं।  यह कविता 1814 में लिखी गई थी और बाद में 1815 में उनके संग्रह 'हेब्रू मेलोडीज़' (Hebrew Melodies) में प्रकाशित हुई। यह कविता एक वास्तविक घटना से प्रेरित है। जून 1814 में लॉर्ड बायरन लंदन में एक पार्टी (बॉल डांस) में शामिल हुए थे। वहाँ उनकी मुलाकात अपनी चचेरी बहन (बॉस/रिश्तेदार की पत्नी) श्रीमती जॉन विल्मॉट से हुई। उस समय श्रीमती विल्मॉट एक गहरे रंग की (काली) पोशाक पहने हुई थीं, जिस पर चमकीले सितारे/स्पैंगल्स लगे हुए थे। उनकी यह सुंदरता शांत, सौम्य और अद्वितीय थी। उनके इस रूप और मासूमियत से प्रभावित होकर बायरन ने अगले ही दिन यह कविता लिख दी। इस कविता का मुख्य भाव "आंतरिक और बाह्य सुंदरता का सुंदर सामंजस्य" है। कवि महिला की तुलना साफ़, तारों भरी रात से करता है। जिस तरह रात में अंधेरे और रोशनी का एक संतुलित मिश्रण होता है, उसी...

'लीक' होते पेपर, 'बहती' प्रतिमाएं: क्या इसी 'चमकीले भ्रष्टाचार' पर टिका है नया सिस्टम?

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  कहते हैं कि भक्ति में शक्ति होती है, लेकिन हमारी व्यवस्था की भक्ति में गजब की 'कलाकारी' है! यहाँ न तो आस्था अक्षुण्ण है, न युवा का भविष्य सुरक्षित और न ही महापुरुषों का सम्मान। बात चाहे मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम पर आए चढ़ावे की हो या अपनी ही विचारधारा के शीर्षमूर्धन्य नेता भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी की स्मृतियों की—जब नीयत में ही खोट हो, तो आस्था हो या परीक्षा का पर्चा, सब 'लीक' होकर सरेआम नीलाम हो जाता है। जिन्होंने भगवान राम के नाम पर बनी व्यवस्थाओं को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया, उनसे देश के युवाओं या अपने मार्गदर्शकों के प्रति ईमानदारी की उम्मीद रखना ही सबसे बड़ी नासमझी है। एक तरफ तो करोड़ों युवाओं के भविष्य का 'पेपर लीक' करके उनकी बरसों की मेहनत पर पानी फेर दिया जाता है, और दूसरी तरफ 14 लाख रुपये डकार कर तांबे की जगह सीमेंट की मूर्ति पर तांबे का रंग पोत दिया जाता है। बारिश की पहली ही फुहार क्या पड़ी, नकली तांबे का रंग बह गया और प्रतिमा में आई दरारों ने चिल्ला-चिल्लाकर सिस्टम के भ्रष्टाचार की कहानी बयाँ कर दी। यह सिर्फ वाजपेयी जी की प्रतिमा की दरार...

चेतना की ओर: जब बुद्ध ने ढकोसलों को नकार कर दिया सत्य का मार्ग!

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  हमें तर्क, विवेक और करुणा को अपनाना चाहिए। इतिहास के पन्नों में कई विचारकों ने जन्म लिया, लेकिन शाक्यमुनि गौतम बुद्ध का आगमन मानव सभ्यता के इतिहास में एक वैचारिक क्रांति की तरह था। बुद्ध ने अंधभक्ति, ढोंग और कर्मकांड से ग्रसित समाज को तर्क, करुणा और प्रत्यक्ष अनुभव का मार्ग दिखाया। उनका धर्म किसी अदृश्य सत्ता का भय नहीं, बल्कि मन को शुद्ध करने और जीवन को व्यावहारिक रूप से समझने का विज्ञान था। आत्मा और अंधविश्वास पर सीधा प्रहार तत्कालीन समाज में यह धारणा गहरी बैठी थी कि आत्मा अजर, अमर और शाश्वत है जो एक शरीर से निकलकर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। महात्मा बुद्ध ने इस रूढ़िवादी विचार पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिसे लोग अजर-अमर आत्मा कहते हैं, वह केवल मन, विचारों, संवेदनाओं और शरीर के निरंतर बदलते समुच्चय (पंचस्कंध) के अलावा कुछ नहीं है। बुद्ध के अनुसार, ब्रह्मांड में कुछ भी "अमर" या "स्थिर" नहीं है। सब कुछ परिवर्तनशील है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बिना सोचे-समझे अगले जन्म के सुखों के लिए इस जन्म को पाखंड और अनुष्ठानों में गंवा देना एक 'मनग...

प्रेमचंद जयंती पर 'सूत्रधार' का विशेष आयोजन: "वर्तमान में क्यों प्रासंगिक हैं कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद?"

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  महान उपन्यासकार एवं कहानीकार मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती के शुभ अवसर पर खगौल स्थित जमालुद्दीन चक के 'सूत्रधार' कार्यालय में एक भव्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया। नाट्य संस्था 'सूत्रधार' द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में क्षेत्र के प्रमुख कलाकारों, साहित्यकारों और रंगकर्मियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम की शुरुआत मुंशी प्रेमचंद के चित्र पर श्रद्धा-सुमन अर्पित कर पुष्पांजलि के साथ हुई। इस संगोष्ठी का मुख्य विषय "वर्तमान समय में प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता" रखा गया था। वक्ताओं के मुख्य विचार: साहित्य, यथार्थ और सामाजिक चेतना संगोष्ठी के दौरान उपस्थित विद्वानों और वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य और उनके सामाजिक दृष्टिकोण पर अपने विचार साझा किए: प्रेमचंद ने समाज को नई दिशा दी (नवाब आलम, महासचिव): नाट्य संस्था 'सूत्रधार' के महासचिव नवाब आलम ने बताया कि संस्था हर साल प्रेमचंद जयंती मनाती है। इस बार का विषय युवाओं को ध्यान में रखकर चुना गया है, ताकि नई पीढ़ी समकालीन संदर्भों में प्रेमचंद के साहित्य और उनके सामाजिक दृष्टिकोण को बेहतर ढंग से समझ सके। मानवता ...

राम लखन सिंह यादव कॉलेज में "प्रेमचंद का साहित्य और आज का वंचित समाज" विषय पर परिचर्चा आयोजित!

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  पटना, 31 जुलाई: राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनीसाबाद, पटना में मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर एक विशेष परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा का मुख्य विषय "प्रेमचंद का साहित्य और आज का वंचित समाज: दलित, शोषित और हाशिए के स्वर" तथा "21वीं सदी का भारत और प्रेमचंद का यथार्थ: क्या बदला और क्या आज भी वही है?" रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद ने की, जबकि परिचर्चा का विषय प्रवेश प्रो. रोहित कुमार द्वारा कराया गया। पूरे कार्यक्रम का कुशल मंच संचालन प्रो. प्रसिद्ध कुमार ने किया। परिचर्चा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला: प्रो. राय श्री पाल सिंह ने कहा कि प्रेमचंद ने अपने समय की तमाम सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहार किया था। उन्होंने 'निर्मला', 'गोदान' और 'पंच परमेश्वर' जैसी कालजयी कृतियों का उल्लेख करते हुए प्रेमचंद के सामाजिक चिंतन को रेखांकित किया। प्रो. (डॉ.) शंकर प्रसाद शाह ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने केवल साहित्य ही नहीं रचा, बल्कि अपने ल...