तार्किकता और वैज्ञानिक चेतना: विकसित राष्ट्र की अनिवार्य शर्त।
देश के विकास का पैमाना केवल ऊंचे भवनों या आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नैतिक मूल्यों पर भी निर्भर करता है। आज समाज और राष्ट्र के समक्ष यह एक गंभीर प्रश्न है कि क्या संकीर्णता और धर्मांधता के सहारे किसी देश को प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ाया जा सकता है? शिक्षा का वास्तविक स्वरूप और वर्तमान विसंगतियाँ शिक्षा केवल साक्षर होने या उपाधि प्राप्त करने का नाम नहीं है। एक ऐसी शिक्षा प्रणाली, जिसमें वैज्ञानिक सोच (Scientific Temper), तर्कशक्ति, नैतिकता, मानवीय संस्कृति और अच्छे संस्कार न हों, वह समाज को दिशा देने में असमर्थ है। रूढ़िवादिता और अंधविश्वास: आज खुद को शिक्षित कहने वाला वर्ग भी कई बार तार्किकता से दूर होकर रूढ़िवादिता और अंधी निष्ठा में लिفت दिखाई देता है। नैतिक पतन: जब शिक्षा से मूल्य और विवेक गायब हो जाते हैं, तब समाज केवल उपभोक्तावादी संस्कृति का केंद्र बनकर रह जाता है। जनसंचार और कला जगत की भूमिका पत्रकारिता, सिनेमा, डिजिटल मीडिया (यूट्यूब), साहित्य और कथाकार समाज के दर्पण माने जाते हैं। मुनाफाखोरी बनाम सामाजिक उत्तरदायित्व: आज...