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लेबल से आगे: भारत को स्वस्थ खान-पान की ओर कैसे मोड़ें?

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  भारत में पैक्ड खाद्य पदार्थों के सामने वाले हिस्से पर पोषण संबंधी चेतावनी लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत हुई है। हालाँकि, केवल लेबल लगाने से सीमित और जागरूक वर्ग को ही लाभ मिलेगा। व्यापक प्रभाव के लिए भारत को अपनी कर नीतियों, औद्योगिक प्रोत्साहनों , कॉरपोरेट प्राथमिकताओं और स्कूली शिक्षा को स्वास्थ्य उद्देश्यों के साथ एकीकृत करना होगा। FSSAI ने उच्चतम न्यायालय में पैक्ड खाद्य पदार्थों पर अत्यधिक वसा (Fat), चीनी (Sugar), नमक (Salt) या कृत्रिम मिठास होने पर लाल षट्कोणीय (Red Hexagonal) चेतावनी देने का प्रस्ताव रखा है।  चिली और मेक्सिको जैसे देशों में प्रत्येक नुकसानदेह तत्व (नमक, चीनी, संतृप्त वसा) के निर्धारित सीमा से अधिक होने पर अलग-अलग स्पष्ट चेतावनियाँ दी जाती हैं।  भारत को भी 'एक सीमा से अधिक पोषक तत्व = एक चेतावनी', 'दो तत्व = दो चेतावनियाँ' जैसा सरल मॉडल अपनाना चाहिए। इससे उपभोक्ता बिना भ्रमित हुए सही चुनाव कर सकेंगे। स्पष्ट चेतावनियाँ खाद्य निर्माताओं को अपने उत्पादों में चीनी, नमक या वसा की मात्रा घटाने के लिए एक प्रत्यक्ष व्यावसायिक प्रोत्साहन देत...

जब प्रकृति बोले, मानवता को सुनना होगा ।

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  नेपाल-तिब्बत हिमालय क्षेत्र में आई हालिया विनाशकारी बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि भले ही हमने अपनी राजनीतिक और राष्ट्रीय सीमाएं बना ली हों, लेकिन हम सभी एक ही आसमान के नीचे सांस लेते हैं और एक परस्पर जुड़े हुए पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार उच्च तापमान और तेजी से पिघलती बर्फ ने इस विभीषिका में बड़ी भूमिका निभाई है। पिछले तीन दशकों में नेपाल अपने ग्लेशियरों की लगभग एक-तिहाई बर्फ खो चुका है। यहाँ एक गहरा विरोधाभास देखने को मिलता है: नेपाल वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में मात्र 0.05% (2024 के आंकड़ों के अनुसार) का योगदान देता है। फिर भी, न्यूनतम कार्बन उत्सर्जन करने के बावजूद यह देश जलवायु परिवर्तन के सबसे खतरनाक दुष्प्रभावों को झेलने के लिए मजबूर है। प्रकृति किसी राष्ट्रीय सीमा को नहीं मानती। एक जगह उत्सर्जित कार्बन पूरे वातावरण को प्रभावित करता है; नदियों, ग्लेशियरों और हवाओं को पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं होती। इस संकट से निपटने के लिए विभिन्न आध्यात्मिक परंपराएं हमें प्रकृति...

रंगमंच के संवाहक: पद्मश्री सतीश आनंद और 'कला संगम' का स्वर्णिम सफर!

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  भारतीय रंगमंच की बात जब भी होगी, तब बिहार और देश के नाटकीय परिदृश्य को नई पहचान देने वाले वरिष्ठ नाट्य निर्देशक और अभिनेता सतीश आनंद का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाएगा। पांच दशकों से अधिक समय तक थिएटर को समर्पित रहे सतीश आनंद ने न केवल रंगमंच को जिया, बल्कि उसे लोक संस्कृति और आधुनिक चेतना के साथ जोड़कर एक नया विस्तार भी दिया। 'कला संगम' की स्थापना और नाट्य क्रांति सतीश आनंद जी का सबसे ऐतिहासिक योगदान रहा 'कला संगम' नाट्य संस्था की स्थापना। 1970 के दशक में पटना में स्थापित यह संस्था केवल नाटक खेलने का मंच नहीं बनी, बल्कि इसने बिहार में एक सांस्कृतिक क्रांति का रूप ले लिया। प्रतिभाओं को मंच: 'कला संगम' के माध्यम से उन्होंने कई युवा कलाकारों को तराशा, जो आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सिनेमा, टेलीविजन और रंगमंच के बड़े स्तम्भ बने। प्रयोगधर्मी नाट्य शैली: उन्होंने पारंपरिक लोक कलाओं (विशेषकर 'विदेशिया' जैसी बोलियों और शैलियों) को आधुनिक नाट्य सिद्धांतों के साथ पिरोया। उनके निर्देशकीय कौशल ने क्षेत्रीय नाटकों को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। प्रमुख प्रस्तुतिय...

बिहार के गौरव 'राज्यगीत' के रचयिता कवि सत्यनारायण सिंह का निधन: साहित्य जगत का एक युग समाप्त।

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  बिहार की पावन धरती ने हमेशा से साहित्य, ज्ञान और संस्कृति के नए आयाम गढ़े हैं। इन्हीं सांस्कृतिक स्तंभों में से एक, विख्यात साहित्यकार और कवि सत्यनारायण सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन से हिंदी और मैथिली साहित्य जगत में एक गहरी और अपूरणीय क्षति हुई है। राज्यगीत के माध्यम से अमर हुआ योगदान कवि सत्यनारायण जी की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक पहचान उनका रचा हुआ बिहार राज्यगीत ("मेरे भारत के कंठहार, तुझको शत-शत प्रणाम बिहार") है। वर्ष 2012 में बिहार सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर अपनाए गए इस गीत के माध्यम से उन्होंने राज्य की ऐतिहासिक गरिमा, समृद्ध संस्कृति और गौरवशाली अतीत को अद्भुत पंक्तियों में पिरोया। जब भी यह राज्यगीत गूंजेगा, सत्यनारायण जी की शब्द-साधना हर बिहारी के दिल में जीवंत रहेगी। साहित्यिक सफर और प्रमुख योगदान सरल एवं मर्मस्पर्शी शैली: उनकी रचनाओं में जमीन से जुड़ाव, लोक-संस्कृति की सोंधी महक और गहरी मानवीय संवेदनाएं स्पष्ट झलकती हैं। हिंदी-मैथिली काव्य साधना: उन्होंने दोनों भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य का सृजन कर विभिन्न साहित्यिक मंचों को समृद्ध किया। सांस्कृतिक चेतना ...

कवि शैलेन्द्र: संवेदनशीलता, संघर्ष और स्वाभिमान का नाम !

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    वे भूख के अहसास को दबाने के लिए बीड़ी पिया करते थे। मशहूर गीतकार शैलेन्द्र की लेखनी में साधारण इंसान की पीड़ा, गरीबी का दर्द और व्यवस्था के खिलाफ एक खामोश बगावत साफ झलकती है। रेलवे की नौकरी से लेकर सिनेमा के सुनहरे दौर तक, उनके गीत आम आदमी की आवाज़ बने। संघर्ष और अनछुए पहलू भूख और बीड़ी का दौर: अपने शुरुआती दिनों में जब उनके पास भरपेट खाने के पैसे नहीं होते थे, तब वे भूख के अहसास को दबाने के लिए बीड़ी पिया करते थे। यह तंगहाली उनके गीतों में दर्द और सच्चाई बनकर उतरी। स्वाभिमानी स्वभाव: शैलेन्द्र ने कभी अपनी कला से समझौता नहीं किया। जब राज कपूर ने पहली बार उन्हें 'सबका देश' नाटक में सुनकर फिल्म 'आग' के लिए गीत लिखने का न्योता दिया, तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया था कि वे पैसे के लिए नहीं लिखते। बाद में आर्थिक तंगी के कारण जब वे राज कपूर के पास गए, तो राज कपूर ने सहृदयता से उन्हें अपनाया। वामपंथी विचारधारा से जुड़ाव: वे 'इप्टा' (IPTA) से गहराई से जुड़े थे। जन आंदोलनों और मजदूरों के हक में लिखी उनकी कविताएं सीधे दिल को छूती थीं। 'तीसरी कसम' का आर्थिक झट...

अपूरणीय क्षति: नहीं रहे संपतचक के लोकप्रिय राजद नेता नागेंद्र यादव !

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     संपतचक की माटी ने आज अपना एक सच्चा हितैषी, कुशल सामाजिक कार्यकर्ता और राजद का वरिष्ठ स्तंभ खो दिया। संपतचक प्रखंड के पूर्व बीस सूत्री अध्यक्ष और राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता नागेंद्र यादव जी का असमय निधन हम सभी के लिए अत्यंत पीड़ादायक और स्तब्ध कर देने वाली खबर है। यह मनहूस समाचार सर्वप्रथम मुझे फुलवारी के अशोक यादव जी से मिला। जब मैंने इसकी पुष्टि के लिए उनसे पूछा, तो उन्होंने बताया कि फुलवारी के विधायक एवं पूर्व मंत्री श्याम रजक जी ने फोन पर इसकी जानकारी दी है। इसके बाद मन में एक अनहोनी की आशंका लिए जब कई अन्य मित्रों दिलीप यादव  से पड़ताल की, तो यह हृदयविदारक समाचार सत्य साबित हुआ। यद्यपि मेरे पास नागेंद्र जी का व्यक्तिगत फोन नंबर था, लेकिन इस दुखद घड़ी में उनसे या उनके परिवार से बात करने की मेरी हिम्मत ही नहीं बटोही जा सकी। लगभग सत्तर वर्षीय नागेंद्र जी सहजता, सौम्यता और कुशल व्यवहार के प्रतिमूर्ति थे। वे दूर के रिश्ते में हमारे संबंधी तो थे ही, साथ ही एक आत्मीय मित्र और सच्चे शुभचिंतक भी थे। पूर्व मंत्री श्याम रजक जी के वे अत्यंत करीबी और विश्वसनीय सहयो...

दिखावे की भक्ति और जीते-जी उपेक्षा !

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   जिंदा बाप कोई न पूजे, मरे बाद पुजवाया। मुट्ठी भर चावल लेके, कौवे को बाप बनाया॥ पाखंड और सामाजिक कड़वी सच्चाई पर कबीर का प्रहार कबीरदास जी इस दोहे के माध्यम से समाज में फैले आडंबर, खोखले कर्मकांड और बनावटी परंपराओं पर सीधा प्रहार करते हैं: जीवित माता-पिता का निरादर: जब माता-पिता जीवित होते हैं, तब लोग अक्सर उनकी सेवा नहीं करते, उनकी जरूरतों का ध्यान नहीं रखते और उन्हें शारीरिक व मानसिक कष्ट देते हैं। मृत्यु के बाद का दिखावा: माता-पिता के गुजर जाने के बाद लोग समाज में अपनी झूठी प्रतिष्ठा बनाने के लिए बड़े-बड़े श्राद्ध, भोज और अनुष्ठान आयोजित करते हैं। कर्मकांड का पाखंड: कबीर जी चुटकी लेते हुए कहते हैं कि जो व्यक्ति जीवनभर अपने पिता को एक रोटी के लिए तरसाता रहा, वही मृत्यु के बाद मुट्ठी भर चावल (पिंडदान) छत पर रखकर कौवों को बुलाता है और मानता है कि उसने अपने पिता को तृप्त कर दिया। कबीर का संदेश कबीरदास जी का मानना है कि वास्तविक धर्म और सेवा 'जीवित' रहते की जाती है। मृत्यु के बाद किए जाने वाले दिखावटी कर्मकांड और आडंबर केवल मन को छलने और समाज को दिखाने का जरिया हैं। यदि सच्चा ...