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विलंब का जोखिम ।

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    यदि भारत एक साथ दो मोर्चों पर संकट का सामना करता है (उदा. लद्दाख और सियाचिन में एक साथ तनाव), तो यह निर्णय कौन और कितनी जल्दी लेगा कि राफेल लड़ाकू विमानों या S-400 वायु रक्षा प्रणालियों की सीमित संपत्तियों को कहाँ तैनात किया जाए? थिएटरइजेशन का उद्देश्य भारतीय वायु सेना की स्वायत्तता या लचीलेपन को कम करना नहीं है, बल्कि कमांड संरचना को मजबूत बनाना है ताकि युद्ध की स्थिति में संसाधनों का सही और त्वरित उपयोग हो सके। यदि यह बहस अनसुलझी रहती है, तो विफलता का दायरा केवल वायु सेना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी सैन्य संरचना की तैयारी पर सवाल खड़े करेगा। यह निर्णय केवल वायु सेना का नहीं, बल्कि भारत के राजनीतिक नेतृत्व का है, जिसकी जवाबदेही राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति सबसे अधिक है।

भारत में युवा संकट: परीक्षा सुधार नहीं, रोज़गार का अभाव असली चुनौती!

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  भारत का वर्तमान युवा संकट केवल परीक्षा सुधारों या प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मुख्य कारण अर्थव्यवस्था में गुणवत्तापूर्ण रोज़गार और अवसरों की भारी कमी है।  निजी कोचिंग का खर्च भारतीय परिवारों के शिक्षा बजट का 16% तक पहुंच गया है (जो 2018 में 12.5% था)। उच्च माध्यमिक स्तर पर यह खर्च बजट के लगभग एक-चौथाई हिस्से के बराबर है। 22 लाख से अधिक अभ्यर्थी लगभग 1.4 लाख मेडिकल सीटों के लिए परीक्षा में बैठते हैं, जिनमें से शीर्ष 50 कॉलेजों में 10,000 से भी कम सीटें हैं। यही स्थिति इंजीनियरिंग (JEE) जैसी परीक्षाओं की भी है।  ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) के अनुसार, 2011 के बाद पहली बार 2023-24 में स्नातक (UG) नामांकन में 93,322 की कमी दर्ज की गई, जिसमें उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी गिरावट (1.53 लाख) देखी गई। पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2025 के आंकड़ों के अनुसार, 15 से 29 वर्ष की आयु के प्रति 100 स्नातकों में से केवल 26 के पास नियमित वेतन वाली नौकरी है, और मात्र 4 के पास अनुबंध व सामाजिक सुरक्षा युक्त नौकरी है। 6%-6.5% की जीडीपी वृद्धि के दा...

Spendonomics -: भारत में उपभोग क्रांति और बढ़ती क्रय शक्ति का नया दौर। -प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र विभाग।

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  NielsenIQ-World Data Lab की नई रिपोर्ट के अनुसार, अगले 10 वर्षों में (वर्ष 2036 तक) भारत दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी 'समृद्ध' उपभोक्ता आबादी वाला देश बन सकता है। यद्यपि इस सूची में अमेरिका शीर्ष पर बना रहेगा, लेकिन भारत अपनी तीव्र आर्थिक वृद्धि दर और उच्च क्रय शक्ति के बल पर चीन को पीछे छोड़ देगा। यद्यपि चीन की नामांक जीडीपी भारत की तुलना में लगभग 5 गुना अधिक है, लेकिन भारत में जीवन-यापन की लागत (वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें) काफी कम है। अमेरिका में प्रतिदिन $90 खर्च करने वाले व्यक्ति को 'समृद्ध' माना जाता है। भारत में क्रय शक्ति समानता के आधार पर प्रतिदिन ₹1,800 (या ₹54,000 प्रति माह) का खर्च अमेरिकी $90 के बराबर माना गया है।  अनुमान है कि 2036 तक भारत में लगभग 10.8 करोड़ लोग नियमित रूप से इतना खर्च करने में सक्षम होंगे, जबकि चीन में ऐसे लोगों की संख्या 10.3 करोड़ रहेगी। मांग में उछाल: मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग की आय बढ़ने से हवाई यात्रा , होटल, लग्जरी गाड़ियां, टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएं और रेस्तरां में खान-पान की बिक्री में भारी बढ़ोतरी होगी। निजी उपभोग भारतीय जीडीपी का सब...

सूचना, सजगता और लोकतांत्रिक चेतना।

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  हर सूचना पर बिना सोचे-समझे तुरंत विश्वास कर लेना जितना खतरनाक है, उतना ही जोखिमपूर्ण किसी बात को बिना ठोस कारण अनदेखा कर देना भी है। एक परिपक्व और सजग लोकतांत्रिक समाज की पहचान यही है कि वहां के नागरिक अंधभक्त या तर्कहीन नहीं होते, बल्कि वे प्रश्न पूछते हैं, ठोस प्रमाण तलाशते हैं और जब तक पर्याप्त तथ्य सामने न आ जाएं, तब तक अपना अंतिम निर्णय सुरक्षित रखने का धैर्य रखते हैं। यही 'बौद्धिक धैर्य' किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होता है। आज के डिजिटल और आभासी दौर में भ्रामक व गलत सूचनाओं की बाढ़ आ चुकी है। इस गंभीर चुनौती का समाधान केवल किसी एक संस्था के बस की बात नहीं है; इसके लिए सरकार, तकनीकी कंपनियों, मीडिया, शिक्षा जगत और स्वयं नागरिकों को मिलकर साझा जिम्मेदारी उठानी होगी। सरकार का दायित्व: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाने वाले पारदर्शी व सख्त कानून निर्मित करे। शिक्षा जगत का कर्तव्य: पाठ्यक्रम में आलोचनात्मक चिंतन  और डिजिटल साक्षरता को प्राथमिकता से शामिल करे, ताकि भावी पीढ़ी सही और गलत सूचना में भेद कर सके। जब तक समाज में विश्लेषणात...

असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती नियमावली में बड़ा बदलाव: उम्र सीमा 55 वर्ष करने पर सहमति, RLSY कॉलेज में खुशी का माहौल।

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  उच्च शिक्षा और असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती प्रक्रिया को लेकर बिहार के शोध छात्रों और अभ्यर्थियों के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर आई है। लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे अभ्यर्थियों और ऑल पीएचडी होल्डर्स एंड रिसर्च एसोसिएशन की राज्यपाल के साथ हुई सकारात्मक वार्ता के बाद आंदोलन खत्म करने का आश्वासन दिया गया है। इस ऐतिहासिक फैसले और सफलता की खुशी में RLSY कॉलेज के प्रो. डॉ. पारस नाथ यादव ने, जिन्होंने इस संघर्ष में शुरू से बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था, कॉलेज परिवार और अपने सहयोगियों को लड्डू खिलाकर खुशियां जाहिर कीं। वार्ता में बने प्रमुख सहमति बिंदु राज्यपाल के साथ हुई वार्ता में कई महत्वपूर्ण निर्णय और बदलावों पर सहमति बनी है: उम्र सीमा में छूट: असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति में अधिकतम उम्र सीमा को 43 वर्ष से बढ़ाकर 55 वर्ष करने का फैसला किया गया है। ऑब्जेक्टिव परीक्षा का प्रस्ताव: लिखित परीक्षा कराने और उसमें वस्तुनिष्ठ (Objective) प्रश्न पूछने के साथ-साथ टीचिंग डेमो (Teaching Demo) को भी शामिल करने पर विचार किया जा रहा है। API स्कोर और अनुभव: API स्कोर में अनुभव और शोध प्रकाशन (...

युवा बेरोजगारी का घरेलू और आर्थिक बोझ: आँकड़ों से परे एक वास्तविक संकट।

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  भारत में युवा बेरोजगारी को प्रायः केवल व्यक्तिगत आंकड़ों और नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं की संख्या के दायरे में देखा जाता है। हालिया 'आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण' (PLFS 2025) के अनुसार, 18-29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में बेरोजगारी दर 14.8% है, जो उच्च शिक्षित (डिप्लोमा, स्नातक या स्नातकोत्तर) युवाओं में बढ़कर 29.4% तक पहुँच जाती है। हालाँकि, यह आँकड़ा पूरे परिदृश्य को उजागर नहीं करता। यदि 'NEET' (रोजगार, शिक्षा या प्रशिक्षण में शामिल न होने वाले) श्रेणी को देखें, तो उच्च शिक्षित युवाओं में यह आंकड़ा 40.1% है, जिसमें 74.7% शिक्षित युवतियाँ श्रम बल से ही बाहर हैं। बेरोजगारी केवल व्यक्तिगत विफलता या प्रतीक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार का एक साझा आर्थिक संकट है। खर्च और बचत पर असर: जिन घरों में शिक्षित बेरोजगार युवा हैं, वे सामान्य परिवारों की तुलना में प्रति माह औसतन ₹1,087 कम उपभोग खर्च करते हैं। कम आय वाले स्रोत: ऐसे परिवारों में औसतन केवल 1.5 कमाने वाले सदस्य होते हैं। लगभग 39.5% परिवार केवल एक व्यक्ति की कमाई पर निर्भर हैं, जबकि 62.5% परिवारों में किसी भी सदस...

श्रम अधिकारों व सामाजिक न्याय की चुनौतियाँ।

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        पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के निरस्त होने और नए औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 लागू होने के बाद श्रम अधिकारों का दायरा सिमटने का जोखिम है। नए कानूनों का ढांचा श्रमिकों को संरक्षण के दायरे से बाहर रखने की प्रवृत्ति दर्शाता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि न्यायपालिका और विधायिका संविधान के भाग IV में निहित सामाजिक न्याय के संकल्प को कमजोर न होने दें, बल्कि श्रमिकों के न्यूनतम अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करें।