मानवता की बलि चढ़ाता आधुनिक युद्धोन्माद: नियम बनाम यथार्थ!
आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और अंतरिक्ष अनुसंधान के माध्यम से भविष्य की ओर देख रही है, वहीं दूसरी ओर मध्य-पूर्व से लेकर मध्य-एशिया तक धधकती युद्ध की आग ने पूरी मानवता को पाषाण युग की बर्बरता में धकेल दिया है। हाल ही में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और काबुल के अस्पताल पर हुए हवाई हमले ने एक बार फिर यह कड़वा सच उजागर किया है कि युद्ध के मैदान में नैतिकता और अंतर्राष्ट्रीय नियम केवल किताबों तक सीमित रह गए हैं।
नियमों का चीरहरण और मूक दर्शक दुनिया
जिनेवा कन्वेंशन और अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानूनों के तहत युद्ध के दौरान अस्पताल, स्कूल और रिहायशी इलाकों को निशाना बनाना एक 'युद्ध अपराध' (War Crime) की श्रेणी में आता है।
बावजूद इसके, चाहे वह गाजा हो, यूक्रेन या अब काबुल—हॉस्पिटलों का मलबे में तब्दील होना एक सामान्य प्रक्रिया बनती जा रही है। काबुल के अस्पताल पर हमले में 400 मासूमों की जान जाना केवल एक सैन्य चूक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की सामूहिक हत्या है। यह शर्मनाक है कि रमजान जैसे पवित्र महीने में भी हिंसा का तांडव थमने का नाम नहीं ले रहा।
भू-राजनीति की वेदी पर मासूमों का खून
संस्थानों की विफलता: संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसी संस्थाएं अब केवल निंदा प्रस्ताव पारित करने तक सीमित रह गई हैं। शक्तिशाली राष्ट्रों की मनमानी के आगे अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद पंगु नजर आती है।
पड़ोस की आग: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ता टकराव दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए बड़ा खतरा है। निर्दोष नागरिकों को ढाल बनाना या उन्हें सीधे निशाने पर लेना किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए कायराना कृत्य है।
शरणार्थी संकट और बुनियादी अभाव: युद्ध केवल बमबारी तक सीमित नहीं रहता; यह बिजली, पानी और स्वास्थ्य सेवाओं का अंत कर देता है। लाखों लोग अपने ही देश में बेघर होकर शरणार्थी शिविरों के नारकीय जीवन के लिए अभिशप्त हैं।
भारत का रुख और वैश्विक जिम्मेदारी
भारत ने इस मुद्दे पर जो सवाल उठाए हैं, वे पूरी दुनिया की अंतरात्मा को झकझोरने वाले हैं। जब युद्ध के नियम ही नहीं माने जाएंगे, तो फिर सभ्य समाज और अराजक भीड़ में अंतर क्या रह जाएगा? यह सवाल केवल हमलावर देशों से नहीं, बल्कि उन 'वैश्विक पुलिसकर्मियों' से भी है जो अपनी सुविधानुसार मानवाधिकारों का चश्मा पहनते हैं।

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