लोकतंत्र की 'सेल': जहाँ विधायक 'लापता' हैं और नैतिकता 'हफ्ता' वसूल रही है!

  


बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नया 'चमत्कार' घटित हुआ है। यहाँ गणित के सारे नियम फेल हो गए और केवल 'धन-तंत्र' की केमिस्ट्री काम कर गई। राज्यसभा के रण में महागठबंधन की एक सुरक्षित सीट क्या गई, मानो लोकतंत्र के मंदिर में ही 'स्टॉक एक्सचेंज' खुल गया। एनडीए के 'तीसमारखां' बनने की खुशी जायज भी है, क्योंकि जब प्रतिद्वंद्वी के सिपाही ही आपकी भक्ति में लीन होकर 'गायब' होने लगें, तो जीत के लिए युद्ध लड़ने की जरूरत किसे है?

'गायब' होने की कला और 'भक्ति' का नया व्याकरण

कांग्रेस और राजद के विधायकों का गायब होना कोई सामान्य घटना नहीं है। यह एक उच्च स्तर का 'योग' है, जहाँ विधायक अपने दल से तो शरीर से जुड़े होते हैं, लेकिन उनकी आत्मा एनडीए के खेमे में गोते लगा रही होती है। विशेषकर उन 'कुशवाहा' माननीय का क्या कहना, जिन्हें अपनी पार्टी की विचारधारा से ज्यादा सम्राट चौधरी और उपेंद्र कुशवाहा की भक्ति में आनंद मिल रहा है। यह भक्ति भी अद्भुत है—टिकट किसी और का, सिंबल किसी और का, और जय-जयकार किसी और की!

बहुजन राजनीति बनाम 'कुर्सी' की नीति

तेजस्वी यादव के लिए यह कड़ा सबक है। 'बहुजन राजनीति' के नाम पर जो किला खड़ा किया गया था, उसकी ईंटें अब निजी स्वार्थों के सीमेंट से खिसक रही हैं। अनुसूचित जाति के कुछ नेताओं की निष्ठा आज 'विचारधारा' से नहीं, बल्कि 'कुर्सी के पाए' से बंधी है। उन्हें हर हाल में सत्ता की मलाई चाहिए, चाहे उसके लिए उन्हें अपनी ही विरासत का सौदा क्यों न करना पड़े। तेजस्वी को अब 'A to Z' के नारे को केवल पोस्टर से निकालकर धरातल पर उतारना होगा, वरना जातियों के स्वयंभू नेता अपनी-अपनी डफली बजाकर अपनी ही दुकान सजाते रहेंगे।

"व्यवस्था बदलने निकले थे, खुद ही 'अछूत' हो गए; और जो कल तक कौड़ी के तीन भाव थे, आज वे 'महान भविष्यवक्ता' बने बैठे हैं।"

वंशवाद का विलाप और 'बेल' का मोह

सबसे मनोरंजक दृश्य तो उन लोगों का है जो 'वंशवाद' पर छाती पीटते-पीटते थकते नहीं थे। आज वे खुद अपने ही 'वंश-बेल' को सींचने में ऐसे अटके हैं कि उन्हें नैतिकता का चश्मा दिखाई ही नहीं दे रहा। यह राजनीति का वह दौर है जहाँ अवसरवाद को 'मास्टरस्ट्रोक' और दलबदल को 'अंतरात्मा की आवाज' कहा जाता है।

बिहार के इस राज्यसभा चुनाव ने साफ कर दिया है कि यहाँ 'जनमत' केवल कागजों पर है, असली खेल तो 'धन-तंत्र' के गुप्त कमरों में चल रहा है। जहाँ लोकतंत्र हार रहा है और 'नोट-तंत्र' जीत की अट्टहास कर रहा है। 


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