'बहु-पिता' संस्कृति: एक आधुनिक विमर्श!

 




आज के दौर में 'हैसियत' का पैमाना बदल गया है। अब हैसियत इस बात से नहीं मापी जाती कि आपके बैंक बैलेंस में कितने शून्य हैं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि आपने कितने 'संरक्षक' (बाप) पाल रखे हैं। परसाई जी का इशारा उस चाटुकारिता और अवसरवाद की ओर है, जहाँ व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए अपनी निष्ठा और स्वाभिमान को गिरवी रख देता है।

१. दफ्तर के 'बॉस-बाप'

कॉर्पोरेट जगत में जिसे हम 'नेटवर्किंग' या 'मेंटरशिप' कहते हैं, परसाई की भाषा में वह अक्सर 'दफ्तर वाला बाप' बनाना ही है। यह वो शख्स है जिसकी हर गलत बात पर आप 'जी सर' की जुगाली करते हैं ताकि इंक्रीमेंट का झुनझुना आपको मिलता रहे। यहाँ योग्यता से ज्यादा 'जी-हुजूरी' का महत्व है।

२. बाजार के 'ब्रैंड-बाप'

बाजारवाद के इस दौर में उपभोक्ता खुद एक 'बाप' की तलाश में रहता है—चाहे वो कोई बड़ा उद्योगपति हो या कोई ऐसा बिचौलिया जो कम समय में पैसा दोगुना करने का लालच दे। बाजार में साख बनाने के लिए लोग ऐसे-ऐसे प्रभावशाली लोगों के चरणों में सिर नवाते हैं, जिनसे उनके व्यापार की नैया पार लग सके।

३. राजनीति के 'दलबदलू बाप'

राजनीति तो इस व्यंग्य का सबसे जीवंत उदाहरण है। आज के राजनेता के लिए विचारधारा एक पुराना कुर्ता है जिसे कभी भी बदला जा सकता है। परसाई जी ने सही कहा था—'एक-एक हर राजनीतिक दल में'। आज के समय में नेता सत्ता के साथ रहने के लिए अपने 'राजनीतिक पिताओं' को उतनी ही तेजी से बदलते हैं जितनी तेजी से लोग अपने सोशल मीडिया का स्टेटस बदलते हैं।

४. घर और समाज का दोहरापन

विडंबना देखिए, जो व्यक्ति बाहर सौ जगह सिर झुकाता है, वही घर आकर 'नैतिकता' का पाठ पढ़ाता है। परसाई का व्यंग्य उस खोखलेपन पर चोट करता है जहाँ मनुष्य ने अपनी रीढ़ की हड्डी बेचकर 'हैसियत' खरीदी है।


 क्या हम 'रीढ़' विहीन हो रहे हैं?

आज के दौर में 'बाप' शब्द का अर्थ जैविक नहीं, बल्कि 'पावर सेंटर' (शक्ति का केंद्र) हो गया है। परसाई जी हमें आगाह कर रहे थे कि जब समाज में लोग स्वावलंबन के बजाय 'संरक्षण' की तलाश में दर-दर भटकने लगें, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र और नैतिकता दोनों ही आईसीयू (ICU) में हैं।

वर्तमान परिवेश में यह 'हैसियत' दरअसल हमारी नैतिक दरिद्रता का विज्ञापन है। हम जितने ज्यादा 'बाप' बदलते हैं, हमारा अपना अस्तित्व उतना ही धुंधला होता जाता है। 

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