शीर्षक: "सुख की बदली परिभाषा" (कविता) - प्रो प्रसिद्ध कुमार.

 







वह मिट्टी की झोपड़ी, वह सादा सा आहार,

अभावों में भी बसता था, खुशियों का संसार।

मीलों पैदल चलना और थककर सो जाना,

छल-कपट से दूर था, वो बीता ज़माना।

मन में कोई शिकवा न कोई शिकायत थी,

हर पड़ोसी के लिए, दिल में मुहब्बत थी।

आज भीड़ तो बहुत है, पर सब अनजाने हैं,

अपने ही अपनों से, आज बेगाने हैं।

साधन तो जुटा लिए, पर आनंद कहीं खो गया,

आदमी 'होशियार' होकर, कितना तन्हा हो गया।

हँसी की गूँज अब, दीवारों में सिमट गई,

सच्ची मुस्कान जैसे, किस्तों में बंट गई।

खुद के बढ़ने की फिक्र से ज़्यादा, दूसरों को गिराने की आस है,

जहाँ चित्त में ही क्लेश हो, वहाँ शांति कहाँ पास है?

ज़ुबाँ पर ज़हर घोलकर, शीतलता को ढूँढते हैं,

खुद की कमियाँ भूलकर, औरों में दोष ढूँढते हैं।

मानव जीवन वरदान है, इसे अभिशाप न बनाओ,

जो लिया है यहीं से, उसे यहीं लौटा कर जाओ।

जी रहे जो स्वार्थ में, उन्हें कौन याद रखेगा?

जो जिएगा परोपकार में, वही इतिहास लिखेगा। 

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