बेड़िया प्रथा: परंपरा, गरीबी और पितृसत्ता की क्रूर त्रासदी !
बेड़िया प्रथा केवल एक सामाजिक रीति नहीं है, बल्कि यह मानवीय अधिकारों और गरिमा का खुला उल्लंघन है। यह प्रथा कैसे महिलाओं और बच्चियों को परंपरा (Tradition) और गरीबी (Poverty) के नाम पर उनके मूल अधिकारों से वंचित कर देती है। यह एक ऐसी सामाजिक विडंबना है जो सदियों पुरानी रूढ़ियों और आर्थिक मजबूरियों के दलदल में फँसी हुई है।
1. महिला को 'आर्थिक साधन' में बदलने की विकृत प्रवृत्ति
इस प्रथा का सबसे जघन्य (Heinous) पहलू यह है कि यह बेटियों को मनुष्य के रूप में नहीं, बल्कि 'आर्थिक साधन (Economic Resource)' के रूप में देखने की विकृत प्रवृत्ति को जन्म देती है। जब परिवार अपनी बेटियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वतंत्रता में निवेश करने के बजाय, उन्हें आय का एक साधन मानने लगते हैं, तो यह सीधे तौर पर उनकी मानवीय पहचान का हनन है। यह विचारधारा पितृसत्तात्मक (Patriarchal) सोच को मजबूत करती है जो महिला के शरीर और श्रम पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहती है।
2. सामाजिक बहिष्कार और आजीविका का संकट
बेड़िया समुदाय की महिलाओं को न तो समाज में पूर्ण स्वीकृति मिलती है और न ही उन्हें स्थायी आजीविका के अवसर मिलते हैं। यह एक दुष्चक्र (Vicious Cycle) है:
प्रथा महिलाओं को एक विशिष्ट (और अक्सर कलंकित) आर्थिक कार्य के लिए मजबूर करती है।
यही कार्य उन्हें मुख्यधारा के समाज से अलग कर देता है।
यह अलगाव उन्हें शिक्षा, कौशल विकास और अन्य सम्मानजनक नौकरियों से वंचित कर देता है।
परिणामस्वरूप, वे गरीबी और उसी प्रथा में बने रहने के लिए मजबूर हो जाती हैं।
यह स्थिति भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार और गरिमामय जीवन के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
एक कुप्रथा, जिसकी 'मौत' ज़रूरी है
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी यह कुप्रथा (Malpractice) "बेहद भयानक रूप में जिंदा है।" इसे केवल गरीबी का मामला कहकर टाल देना उचित नहीं है। यह सरकारी उदासीनता, समाज के नैतिक पतन और कानून के अपर्याप्त प्रवर्तन का भी प्रमाण है।
बेड़िया प्रथा को समाप्त करने के लिए
सख्त कानूनी कार्रवाई: इस प्रथा को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ कठोर और त्वरित कानूनी कार्रवाई की जाए।
आर्थिक सशक्तिकरण: समुदाय की महिलाओं को वैकल्पिक, सम्मानजनक और स्थायी आजीविका के अवसरों के लिए कौशल प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता दी जाए।
शिक्षा का प्रसार: लड़कियों की 100% शिक्षा सुनिश्चित करना, ताकि वे खुद अपनी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकें।
जब तक हम इस समुदाय की महिलाओं और बेटियों को एक 'संसाधन' नहीं, बल्कि 'देश का भविष्य' मानकर कार्य नहीं करेंगे, तब तक यह क्रूर त्रासदी जारी रहेगी। इस प्रथा की जड़ें उखाड़ फेंकना हमारी सामूहिक नैतिक जिम्मेदारी है।

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