कबीर की अमर वाणी: आज के युग में भी प्रासंगिक!-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

   


​कबीर कमाई अपनी कभी न निष्फल होय।

रोपे पेड़ बबूल के आम कहाँ से होए।

​भ्रष्टाचार, लोभ और क्षणभंगुर वैभव के इस दौर में, जब मनुष्यता पर स्वार्थ का परदा पड़ गया है, संत कबीरदास की वाणी एक ऐसी मशाल है जो सदियों बाद भी हमारे अंतरंग को प्रकाशित करती है। 

​यह दोहा कर्म और परिणाम के अकाट्य सिद्धांत को दर्शाता है। जिस प्रकार गलत तरीकों, चाटुकारिता, या भ्रष्टाचार से अर्जित धन-सम्पदा क्षणिक सुख और बाहरी वैभव तो दे सकती है, लेकिन आत्मा को स्थायी सकून नहीं मिल सकता। यह एक ऐसा खोखलापन है जिसे बड़े-से-बड़ा भवन या अटारी भी नहीं भर सकती।

​आज के परिवेश को देखें तो कबीर की यह वाणी और भी अधिक समीचीन लगती है। समाज में हर ओर एक ऐसी दौड़ है जहाँ 'येन केन प्रकारेण' (जैसे भी हो) सफलता पाना ही एकमात्र लक्ष्य बन गया है।

 धन, पद और झूठे अभिमान की चाह में व्यक्ति नैतिक मूल्यों को ताक पर रखकर दूसरों का शोषण और दमन करने से भी नहीं हिचकता। चंद सिक्कों की झनक में वह इतना इतराता है कि उसे अपना अंत दिखाई नहीं देता।

कबीर ने इस अभिमान को सबसे बड़ा शत्रु बताया है। जो व्यक्ति गलत तरीके से कमाए हुए धन पर तन कर चलता है, वह भूल जाता है कि यह नश्वर काया और नश्वर सम्पत्ति एक दिन मिट्टी में मिल जाएगी। यही स्व का लोभ मनुष्य को इतना पतित कर देता है कि वह जानवर से भी बदतर होकर अपनी मानवीय पहचान खो देता है।

​कबीर का स्मरण यहाँ सारगर्भित है: "खाली हाथ आये हो, खाली हाथ जाओगे।" जिसके लिए दिन-रात व्यभिचार और शोषण कर रहे हो, वही वैभव एक दिन सर्वनाश का कारण बन सकता है।

​कबीर ने आडंबर, जातिवाद और अज्ञानता पर सीधे प्रहार किए और मनुष्य को सच्चा मार्ग दिखाया। 

​कबीर ने बाहरी भेदों को नकार कर मनुष्य की आंतरिक शुद्धता पर बल दिया:

​कबीर की वाणी का अंतिम लक्ष्य यही है कि मनुष्य बाहरी भाग-दौड़ को छोड़कर अपने भीतर के सकून को पहचाने। जीवन की सच्ची कमाई वह नहीं है जो बैंक खाते में जमा होती है, बल्कि वह है जो हमारे मन को शांति देती है।

​आज के मनुष्य को अपनी स्वार्थ-परता और अहंकार की गगरी को त्यागकर, कबीर की शिक्षाओं को अपनाना होगा। तभी वह बबूल के कांटेदार पेड़ को छोड़कर, आम के मीठे फल की प्राप्ति कर सकेगा।

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