परमार्थ: आंतरिक प्रकाश का शाश्वत स्रोत !

   


मानव जीवन की सार्थकता बार-बार उस आनंद में खोजी जाती है, जो व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति से प्राप्त होती है। परंतु शास्त्र और अनुभव हमें सिखाते हैं कि जब हम एक बार अध्ययन करते हैं तो आनंद प्राप्त करना सीखते हैं , तब जीवन की दिशा और दृष्टि दोनों बदल जाती हैं। इस अवस्था में, हमें परमार्थ (परोपकार) से आनंद प्राप्त हुआ लगता है।

जब परमार्थ का यह भाव हमारे हृदय में जाग्रत होता है, तो हमारी निजी कंपनियों की नियुक्ति से मिलने वाली क्षणिक खुशी गौण (कम महत्वपूर्ण) हो जाती है। यह आनंद इतना गहरा और तृप्तिकारक होता है कि व्यक्तिगत इच्छाएँ स्वतः ही सीमित हो जाती हैं । यह सीमा किसी दबाव का परिणाम नहीं है, बल्कि आंतरिक संतुष्टि की पराकाष्ठा है।

तुलसीदास जी ने इस भाव को सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है:

परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।

परमार्थ से प्राप्त होने वाला आनंद, भोग-विलास होने से मिलने वाले सुख से अलग है। यह परमार्थ एक स्थिर आनंद है जो कि इसमें शामिल होता है। यह शाश्वत इसलिए होता है क्योंकि यह किसी भी बाहरी वस्तु या परिस्थिति पर प्रतिबंध नहीं लगाता है। यह तो हमारी आत्मा की वह उच्चतम अवस्था से उपजीता है जहाँ हम स्वयं को संपूर्ण सृष्टि का अंश मानते हैं।

कबीरदास जी परमार्थ की महत्ता समझाते हुए कहते हैं:

वृक्ष कहहुं न फल भखै, नदी न सांचै नीर। 

परमार्थ के कारण, साधुन धरा शरीर॥

इस प्रकार, परमार्थ केवल एक क्रिया नहीं है, बल्कि जीवन की एक कला है जो हमें विशेष सुखों से प्रतिष्ठित , आंतरिक शांति और आनंद की ओर ले जाती है।

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