अवसरवाद की विडंबना: 'ठगने' की मनोवृत्ति और नैतिक पतन !-प्रो प्रसिद्ध कुमार।
यह निहित विचार मानव स्वभाव की एक शाश्वत और कटु विडंबना को उजागर करता है। यह उस अवसरवादी चरित्र है जो द्वैतपूर्ण नैतिकता के दलदल में धँसा हुआ है।
ठगने में प्रसन्नता: एक रुग्ण सामाजिक विकृति
कुछ लोग अवसर मिलते ही दूसरों को ठगने या धोखा देने का प्रयत्न करते हैं और इस कृत्य में उन्हें प्रसन्नता की अनुभूति होती है। यह मनोवृत्ति स्वार्थ और अनैतिकता की पराकाष्ठा है। यह व्यक्ति विशेष की उस रुग्ण मानसिकता का परिचायक है जहाँ क्षणिक लाभ और दूसरे की हानि में उसे एक प्रकार का निकृष्ट आत्म-संतोष प्राप्त होता है। यह व्यवहार मानवीय संबंधों के मूल आधार—विश्वास—को जड़ से हिला देता है।
स्वयं ठगे जाने पर आक्रोश: नैतिक पाखंड का चरम
किंतु, इस चरित्र का विरोधाभास तब सामने आता है जब वह स्वयं उसी जाल में फँस जाता है, जब वह किसी दूसरे से ठगा जाता है। यही व्यक्ति जो कल तक दूसरों को छलने में आनंद महसूस कर रहा था, अब वह भड़क उठता है। उसका आक्रोश केवल व्यक्तिगत क्षति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह इसे 'समाज के पतन' के रूप में चित्रित करने लगता है।
यह प्रतिक्रिया उसके नैतिक पाखंड (Moral Hypocrisy) का सबसे बड़ा प्रमाण है। जब वह स्वयं शिकार बनता है, तो उसे समाज की नैतिकता और मूल्यों की चिंता सताने लगती है। वह दूसरों के समक्ष एक पीड़ित और नैतिक प्रहरी के रूप में खड़ा होकर समाज के अधोपतन का विलाप करता है, जबकि इस पतन में उसकी अपनी भूमिका निर्णायक रही है।
द्वैतपूर्ण व्यवहार: 'कोई फर्क नहीं पड़ता' की संवेदनहीनता
"अपने ठगे जाने पर लोग उत्तेजित हो जाते हैं, लेकिन वही व्यवहार जब वे दूसरे के साथ करते हैं तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।"
यह कथन संवेदनहीनता और मानक-द्वैत (Double Standards) की उस खाई को दर्शाता है जिसमें आधुनिक समाज का एक बड़ा हिस्सा गिर चुका है। व्यक्ति आत्म-केंद्रित होकर केवल अपने लिए न्याय और ईमानदारी की अपेक्षा रखता है, लेकिन जब वह स्वयं अन्याय करता है तो उसकी चेतना उसे धिक्कारती नहीं। दूसरे के दुख से प्रभावित न होना और अपने कृत्य के दुष्परिणामों से विमुख रहना, यह दिखाता है कि इस प्रकार के चरित्र में समानुभूति का नितांत अभाव है।

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