मन: अनंत सागर और रहस्यमय यात्रा !
मनुष्य का मन एक अथाह सागर की भाँति है, जिसकी गहराई को मापना असंभव है। यह एक ऐसी अनंत यात्रा है, जहाँ हर पल नए विचार, भावनाएँ और कल्पनाएँ जन्म लेती हैं और विलीन हो जाती हैं।
चंचलता और गति: मन को एक पवन-पुत्र (वायु के पुत्र) के समान चंचल कहा गया है, जो पल भर में त्रिलोक का भ्रमण कर आता है। यह कभी अतीत की स्मृतियों के गलियारों में भटकता है, तो कभी भविष्य के स्वप्निल संसार की रचना करता है।
विचारों का स्रोत: मन विचारों की एक अनवरत सरिता है। यह सरिता कभी शांत, निर्मल जलधारा के समान बहती है (सकारात्मक, आवश्यक विचार) तो कभी तूफानी नदी की तरह उग्र और अशांत हो जाती है (नकारात्मक, व्यर्थ के विचार)। इन विचारों के प्रवाह में ही हमारी चेतना तैरती रहती है।
भावनाओं का उद्गम: मन सिर्फ विचारों का ही नहीं, बल्कि भावनाओं का भी उद्गम स्थल है। यह कभी प्रेम की कोमल वर्षा करता है, तो कभी क्रोध की अग्नि प्रज्वलित करता है। यह हर्ष, विषाद, भय और आशा जैसे अनगिनत रंगों से रंगा एक भाव-पटल है।
बंधन और मुक्ति: मन ही मनुष्य के बंधन का कारण है और मन ही मुक्ति का मार्ग। जब यह इंद्रियों के वश में होता है, तो हमें सांसारिक मोह-माया के जाल में उलझाता है। और जब यह ध्यान और विवेक से वश में होता है, तो यह हमें परम शांति और आनंद की ओर ले जाता है, जैसे एक प्रशिक्षित सारथी रथ को सही दिशा में ले जाता है।
मन एक ऐसा रहस्यमय दर्पण है जिसमें हम स्वयं को और इस पूरे जगत को देखते हैं। इसे समझना स्वयं को समझने की दिशा में पहला कदम है।

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