'हास' की ओट में 'ह्रास': मानवीय परिपक्वता का मूल्यांकन। सार्वजनिक उपहास: एक सामाजिक व्याधि।

  


 विजय का भ्रम और आत्मिक पराजय।

​"कई बार यह प्रवृत्ति समूहों में, कार्यस्थलों पर, या मित्र मंडली के सहज वातावरण में भी परिलक्षित होती है कि किसी व्यक्ति की निजी कमी को सबके सामने उजागर कर उसे हास्य का विषय बना दिया जाता है। यह कृत्य क्षणिक मनोरंजन की आपूर्ति अवश्य करता है, किंतु इसके गहरे मानवीय निहितार्थ हैं। यह एक ऐसी सामाजिक व्याधि है, जो संवेदनशीलता के मर्म को क्षीण करती है।"

​यह क्षणिक हास्य उत्पन्न करने वाला कृत्य, वास्तव में, संवेदना का अनादर है। जिस क्षण कोई व्यक्ति दूसरे की निजी त्रुटि या दुर्बलता को 'मंच' प्रदान कर उसे हंसी का पात्र बनाता है, वह अहंकार के तुष्टीकरण में संलग्न होता है। यह एक ऐसा नैतिक दरार है, जो समूह के भीतर विश्वास और सम्मान की नींव को कमजोर करता है। उपहास की यह कला, केवल उस व्यक्ति को ही नहीं आहत करती, जिसे निशाना बनाया गया है, बल्कि यह दर्शकों में भी सहानुभूति के बीजों को सुखा देती है। यह एक छिपा हुआ विषाणु है, जो सौहार्दपूर्ण संबंधों को भीतर से खोखला करता चला जाता है।

 उपहास करने वाला व्यक्ति उस क्षण खुद को विजेता समझता है— मानो उसने अपनी वाक्पटुता या तीक्ष्ण बुद्धि से कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली हो। वह स्वयं को श्रेष्ठता के मिथ्या सिंहासन पर आरूढ़ महसूस करता है।

​परंतु, यह 'विजय' केवल भ्रम मात्र है।

​वास्तविकता तो यह है कि वह व्यक्ति अपनी मानवीय परिपक्वता  खो देता है। सच्चा बड़प्पन किसी को झुकाने या नीचा दिखाने में नहीं, बल्कि उसकी निजी त्रुटियों पर पर्दा डालने और उसे सहजता से स्वीकारने में निहित होता है। दूसरों को हँसाने के लिए किसी की आत्मिक गरिमा को दाँव पर लगा देना चरित्र की दुर्बलता का परिचायक है। मानवीय परिपक्वता का अर्थ है— संयम, करुणा और सम्मान की त्रिवेणी में स्वयं को स्नान  करना। जो व्यक्ति दूसरों की कमियों को ढाल बनाकर अपने अहंकार की पूर्ति करता है, वह क्षणिक रूप से विजयी दिख सकता है, पर नैतिक और आत्मिक धरातल पर वह पूर्ण रूप से पराजित हो चुका होता है।

​ अतः, हमें अपनी वाणी की धार को किसी के हृदय को चीरने के बजाय, उसे सहारा देने वाले हाथ की तरह प्रयोग करना चाहिए। सच्ची परिपक्वता, दूसरों की त्रुटियों को अनदेखा कर, उनके गुणों का सम्मान करने में निहित है। इसी मार्ग पर चलकर हम न केवल स्वयं को, बल्कि अपने सामाजिक परिवेश को भी अधिक मानवीय और गरिमामय बना सकते हैं।

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