अगर मुझ से मोहब्बत है: प्रेम, त्याग और पावन समर्पण का अमर गीत!
फ़िल्म 'आपकी परछाइयां' (1964) का वह नगीना, जहाँ धर्मेन्द्र और सुप्रिया चौधरी की सादगी ने राजा मेहंदी अली ख़ां के शब्दों को जीवन दिया।
राजा मेहंदी अली ख़ां द्वारा लिखे गए इस गीत की पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि यह पावन प्रेम (Sacred Love) के उस सर्वोच्च शिखर का वर्णन करती हैं जहाँ 'स्व' का अस्तित्व मिट जाता है और केवल 'तुम' शेष रहता है। यह गीत प्रेम के सबसे शुद्ध और निस्वार्थ रूप को परिभाषित करता है।
गीत में पावन प्रेम के मुख्य भाव
इस गीत में प्रेम का जो दर्शन छिपा है, वह सांसारिक आकर्षण से परे है। यह उस प्रेम की बात करता है जो देने में, त्याग में और अपने प्रिय के दुःख को हर लेने में विश्वास रखता है।
1. संपूर्ण समर्पण और त्याग
"अगर मुझ से मोहब्बत है मुझे सब अपने ग़म दे दो,"
"इन आँखों का हर इक आँसू मुझे मेरी क़सम दे दो।"
यह पंक्ति प्रेम की कसौटी है। सच्चा प्रेम सिर्फ सुख का साथी नहीं होता, बल्कि वह अपने प्रिय के दुःख को भी अपना लेना चाहता है। यहाँ नायक (या नायिका) अपने साथी से उनके सारे आँसू और ग़म मांग रहा है—यह दर्शाता है कि "मैं तुम्हारे दुःख को सहने के लिए तैयार हूँ ताकि तुम सुखी रहो।" यही प्रेम में समर्पण का सबसे बड़ा प्रमाण है।
2. दुःख में साझेदारी
"तुम्हारे ग़म को अपना ग़म बना लूँ तो क़रार आए,"
"तुम्हारा दर्द सीने में छुपा लूँ तो क़रार आए।"
यहाँ प्रेम को केवल भावनाओं का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि आत्माओं का मिलन बताया गया है। प्रेमी को 'क़रार' (शांति) तभी मिलता है जब वह अपने प्रिय के दर्द को अपने अंदर समा लेता है। यह दर्शाता है कि एक सच्चे प्रेमी के लिए अपने साथी का दुःख देखना सबसे बड़ी अशांति है, और उसे दूर करना ही जीवन का लक्ष्य है।
3. दुःख को बाँटकर कम करना
"शरीक-ए-ज़िंदगी को क्यों शरीक-ए-ग़म नहीं करते,"
"दुःखों को बाँट कर क्यों इन दुःखों को कम नहीं करते।"
यह प्रश्न प्रेम की परिभाषा को मजबूत करता है। अगर कोई 'शरीक-ए-ज़िंदगी' (जीवनसाथी) है, तो उसे 'शरीक-ए-ग़म' (दुःख का भागीदार) क्यों नहीं होना चाहिए? प्रेम का उद्देश्य ही यह है कि दो लोग मिलकर जीवन के बोझ को हल्का करें। यह साझेदारी का भाव, प्रेम को एक जिम्मेदारी और पवित्र बंधन बनाता है।
4. प्रिय की ख़ुशी ही परम सुख
"इन आँखों में न अब मुझ को कभी आँसू नज़र आए,"
"सदा हँसती रहें आँखें सदा ये होंट मुस्काएँ।"
इस अंतिम पद में प्रेम की सर्वोच्च कामना व्यक्त होती है। प्रेमी की एकमात्र इच्छा यह है कि उसका प्रिय हमेशा खुश और मुस्कुराता रहे। इसके लिए वह अपने प्रिय की "सभी आहें, सभी दर्द-ओ-अलम (पीड़ा और कष्ट)" खुशी-खुशी लेने को तैयार है। यह भाव बताता है कि प्रिय की प्रसन्नता ही प्रेमी का परम सुख है।
धर्मेन्द्र और सुप्रिया चौधरी का सादा अभिनय
इस गीत में धर्मेन्द्र और सुप्रिया चौधरी का अभिनय अत्यंत सादा, शांत और प्रभावशाली है। उस दौर के गीतों की तरह, यहाँ बहुत अधिक नाट्य रूपांतरण (melodrama) नहीं है। चेहरे के शांत भाव, आँखों में भरी हुई करुणा, और संवादों को सुनते हुए केवल महसूस करने का तरीका—यह दर्शाता है कि अभिनय शब्दों पर नहीं, बल्कि भावनाओं की गहराई पर आधारित था। यह सादगी ही पावन प्रेम के भाव को पर्दे पर और भी विश्वसनीय बनाती है।

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