शांत कला, कोलाहल का मोल !
आज का युग उत्सवों को मात्र 'शोषण और दोहन' का अवसर बनाकर, उन्हें सामाजिक हाशिये पर धकेल रहा है। जो पर्व कभी सामुदायिक आनंद और सृजनशीलता का स्रोत थे, वे अब प्रदर्शन और अहंकार के नए आयामों में ढल गए हैं। 'अपार शोर और बाजार के विराट स्वरूप' के नीचे कहीं हमारी संवेदना, कलात्मकता और वास्तविक आनंद की धारा विलुप्त हो गई है।
मानव मन को शांत करने की कुंजी अक्सर उसी 'धारा' में निहित होती है, जिसे हमने खो दिया है।
कला शांति प्रदान करती है, क्योंकि यह हमें बाहरी कोलाहल से हटाकर आंतरिक संसार में ले जाती है।
संवेदना की पुनरस्थापना: जहाँ बाज़ार का शोर वास्तविक उत्सव की भावना को कुचल देता है, वहीं कला हमें रुककर अपनी भावनाओं और दूसरों के अनुभवों को महसूस करने का मौका देती है।
सृजन और आनंद: कलात्मकता, चाहे वह एक गीत हो, एक चित्र हो, या बस एक कहानी सुनना हो—हमें प्रदर्शन के दबाव से मुक्त करती है और सहज, निस्वार्थ आनंद की ओर ले जाती है।
जब हम किसी कलाकृति में लीन होते हैं, तो प्रदर्शन और अहंकार की भावनाएँ शिथिल पड़ जाती हैं। कला एक विनम्र संवाद है, जो हमें अपने से परे किसी चीज़ से जोड़ता है।
यदि हम अपने उत्सवों को अर्थपूर्ण बनाना चाहते हैं, तो हमें 'शोर' और 'बाज़ार' की शक्ति को कम करके, शांत कला, संवेदना और सामुदायिक रचनात्मकता को केंद्र में लाना होगा। शायद इसी तरह हम उस लुप्त हुई धारा को पुनर्जीवित कर सकेंगे जो जीवन और उत्सवों को वास्तविक शांति और सौंदर्य प्रदान करती है।

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