राष्ट्र के भविष्य पर मंडराता संकट: छात्र आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी बच्चों की आत्महत्या से जुड़े आंकड़े देश के भविष्य पर एक गंभीर संकट की ओर इशारा कर रहे हैं। वर्ष 2022 में 13,044 बच्चों ने आत्महत्या की, जो न केवल एक हृदयविदारक संख्या है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि हमारे समाज और शिक्षा प्रणाली में कहीं गहरी दरार है। इन दुखद मामलों में से 2,248 छात्र-छात्राओं द्वारा परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर उठाया गया कदम, इस बात का प्रमाण है कि हमने सफलता और असफलता की परिभाषा को कितना संकीर्ण और जानलेवा बना दिया है।
आंकड़ों का गंभीर विश्लेषण
आंकड़ों की तुलना भयावह है। NCRB के वर्ष 2001 के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में 5,425 बच्चों ने आत्महत्या की थी। 2001 से 2022 तक की यह तुलना स्पष्ट रूप से दिखाती है कि 21 वर्षों में बच्चों की आत्महत्या की घटनाओं में लगभग 2.4 गुना की वृद्धि हुई है। यह वृद्धि दर हमें मजबूर करती है कि हम केवल आंकड़ों को न देखें, बल्कि उन कारणों की जड़ तक पहुँचें जिन्होंने हमारे किशोरों को जीवन समाप्त करने पर मजबूर किया है।
परीक्षा का दबाव: 2,248 छात्रों की आत्महत्या सीधे तौर पर हमारी अत्यधिक प्रतिस्पर्धात्मक और परिणाम-केंद्रित शिक्षा प्रणाली पर सवाल उठाती है। क्या हमारी शिक्षा प्रणाली छात्रों को जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार कर रही है, या उन्हें केवल अंकों की दौड़ में झोंक रही है?
मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा: राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, देश में 40 से 90 प्रतिशत किशोर अवसाद से जूझ रहे हैं और कई तरह की परेशानियों का सामना कर रहे हैं। यह व्यापक मानसिक स्वास्थ्य संकट, बच्चों की बढ़ती आत्महत्या के मामलों का एक प्रमुख कारण है। चिंताजनक बात यह है कि शिक्षा संस्थानों और परिवारों में इन परेशानियों को अक्सर 'नाटकीयता' या 'कमजोरी' मानकर खारिज कर दिया जाता है।
बच्चों की बढ़ती आत्महत्या दर एक कानूनी या पुलिस का मसला नहीं है; यह एक सामाजिक और स्वास्थ्य संकट है जिसके लिए तत्काल और संरचनात्मक बदलावों की आवश्यकता है:
शिक्षा प्रणाली का पुनर्गठन: शिक्षा के उद्देश्यों को केवल अकादमिक सफलता तक सीमित न रखते हुए, भावनात्मक बुद्धिमत्ता , तनाव प्रबंधन और विफलता को स्वीकार करने के कौशल को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।
मानसिक स्वास्थ्य सहायता का विकेंद्रीकरण: हर स्कूल, कॉलेज और यहाँ तक कि ग्रामीण स्तर पर प्रशिक्षित परामर्शदाताओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को कलंक-मुक्त और सुलभ बनाना।
पारिवारिक और सामाजिक जागरूकता: अभिभावकों और शिक्षकों को बच्चों पर अत्यधिक अकादमिक दबाव न डालने के लिए संवेदनशील बनाना। बच्चों को यह सिखाना कि उनका मूल्य उनके अंकों से कहीं अधिक है।

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