भारत का भविष्य: R&D में निजी निवेश का दांव और उसकी चुनौतियां!

   


​भारत, विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक, अपने विकास के अगले चरण के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। इस यात्रा में, शोध एवं विकास (Research & Development) को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। देश के सतत और समावेशी विकास के लिए निजी क्षेत्र का निवेश अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक आवश्यकता बन गया है।

​क्यों आवश्यक है निजी निवेश?

​सरकारी सीमाओं का विस्तार: विकासशील देशों में, सरकार के पास स्वास्थ्य, शिक्षा और रक्षा जैसे प्राथमिक क्षेत्रों पर खर्च करने की अपनी सीमाएं होती हैं। निजी पूंजी R&D को व्यापक और तीव्र गति दे सकती है।

​नवीनता और दक्षता: निजी क्षेत्र बाज़ार की मांग, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और दक्षता-केंद्रित मानसिकता के साथ आता है, जो R&D को अधिक नवीन और व्यावहारिक (market-driven) बनाता है।

​रोजगार सृजन: उच्च-तकनीकी शोध में निवेश से गुणवत्तापूर्ण और कुशल रोज़गार के अवसर पैदा होते हैं, जिससे 'स्किल इंडिया' मिशन को बल मिलता है।

​ चुनौती: जोखिम का गणित

​हालांकि यह योजना सुनने में जितनी आकर्षक है, ज़मीनी स्तर पर इसे सफल बनाना इतना आसान नहीं है। इसकी मुख्य चुनौती इसकी जोखिम-प्रकृति (Risky Nature) में निहित है।

​"शोध एवं विकास एक अनिश्चित परिणाम वाली दीर्घकालिक प्रक्रिया है। अनेक बार ऐसा होता है कि एक बड़ी अपेक्षा के साथ किया गया प्रयोग असफल भी हो जाता है।"

​R&D की प्रक्रिया मूल रूप से जोखिम से परिपूर्ण है। सफलता की कोई गारंटी नहीं होती। एक बड़ा निवेश कई वर्षों की मेहनत के बाद भी शून्य परिणाम दे सकता है। दुर्भाग्यवश, निजी क्षेत्र की प्रत्येक इकाई, विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमों (SMEs) के पास, इस दीर्घकालिक जोखिम को उठाने की क्षमता नहीं होती। वे अक्सर तेज़ और सुनिश्चित रिटर्न की अपेक्षा रखते हैं।

​आगे का रास्ता: प्रोत्साहन और साझेदारी

​इस चुनौती से निपटने के लिए, सरकार और निजी क्षेत्र को मिलकर काम करना होगा:

​कर प्रोत्साहन (Tax Incentives): निजी कंपनियों को R&D पर खर्च के लिए बड़े कर लाभ दिए जाएं, ताकि जोखिम लेने की लागत कम हो सके।

​सरकारी समर्थन: सरकारी प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों को निजी कंपनियों के साथ संयुक्त शोध (Joint Research) के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

​जोखिम साझाकरण कोष (Risk-Sharing Funds): विशेष कोषों का निर्माण किया जाए, जो असफल परियोजनाओं से होने वाले नुकसान को आंशिक रूप से वहन कर सकें।

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