'शांत क्षेत्र': कागजी नियमों और शहरी शोर की कड़वी हकीकत !
विभिन्न शहरों में 'शांत क्षेत्र' (Silence Zones) अधिसूचित करने का वास्तविक मकसद इन संवेदनशील इलाकों को शोर-शराबे से दूर रखना और वहां शांति का वातावरण सुनिश्चित करना था। अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और अदालतों के आसपास के क्षेत्रों को इसी मंशा से 'शांत क्षेत्र' घोषित किया जाता है। लेकिन आज की कड़वी सच्चाई यह है कि केवल कागजों में कानून बना देने से ध्वनि प्रदूषण कम नहीं हो सकता।
समस्या की जड़: पुराने नियम और नई चुनौतियां
आज की सबसे बड़ी समस्या पुराने नियमों की नहीं, बल्कि इस बात की है कि वे समय, आधुनिक विज्ञान और तेजी से बदलती शहरी वास्तविकताओं के साथ विकसित नहीं हो पाए। जैसे-जैसे शहरों का विस्तार हुआ और आबादी बढ़ी, पुराने मानक आज की भीड़भाड़ और तकनीक के सामने बौने साबित हो रहे हैं। ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे निम्नलिखित तीन स्तंभों पर खड़ा करने की जरूरत है:
शहरी नियोजन : शहरों का विकास इस तरह हो कि रिहायशी और शांत क्षेत्रों को शोर वाले मुख्य मार्गों या औद्योगिक क्षेत्रों से अलग रखा जाए।
प्रभावी प्रवर्तन : कानून तो मौजूद हैं, लेकिन उनका सख्ती से पालन कराना और उल्लंघन करने वालों पर त्वरित कार्रवाई करना अनिवार्य है।
सामूहिक जागरूकता - समाज में इस बात की समझ पैदा करनी होगी कि शांति केवल एक जरूरत नहीं, बल्कि एक नागरिक जिम्मेदारी है।
शोर: पर्यावरण से कहीं बढ़कर स्वास्थ्य का संकट
आज शोर केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रह गया है। यह अब एक ऐसा गंभीर संकट बन चुका है जो सीधे तौर पर हमारे स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय गरिमा के अधिकारों से टकरा रहा है।
स्वास्थ्य: निरंतर शोर तनाव, अनिद्रा और हृदय संबंधी बीमारियों का बड़ा कारण बन रहा है।
शिक्षा: शांत वातावरण के अभाव में छात्रों की एकाग्रता और सीखने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है।
मानवीय गरिमा: गरिमा के साथ जीने के अधिकार में शांतिपूर्ण वातावरण भी शामिल है, जिसे आज का शोर-शराबा लगातार छीन रहा है।
हमें समझना होगा कि 'शांत क्षेत्र' केवल बोर्ड लगाने से नहीं, बल्कि एक सचेत नागरिक समाज और आधुनिक दृष्टिकोण वाले शहरी नियोजन से ही हकीकत में बदल सकते हैं।

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