कल्पना की शक्ति: क्या ख्यालों में खोना वाकई आलस है?


 

​समाज अक्सर उन लोगों को 'आलसी' या 'अवास्तविक' मान लेता है जो अपनी ही सोच की दुनिया में खोए रहते हैं। अक्सर ऐसे लोगों को टोक दिया जाता है कि वे वर्तमान में जीने के बजाय सपने देख रहे हैं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि अगर ये "सपना देखने वाले" न होते, तो दुनिया आज कहाँ होती?

​चिंतन का महत्व

 गहराई से सोचना भी उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है, जितना कि किसी भौतिक लक्ष्य को पूरा करना। जब कोई व्यक्ति विचारों में डूबता है, तो वह केवल समय नहीं बिता रहा होता, बल्कि वह संभावनाओं के नए द्वार खोल रहा होता है।

​नये विचार: हर महान आविष्कार या स्टार्टअप की शुरुआत एक छोटे से 'ख्याल' से ही होती है।

​कला और साहित्य: बिना कल्पना और गहरी सोच के न तो कोई अमर कविता लिखी जा सकती है और न ही कोई कालजयी चित्र बनाया जा सकता है।

​विज्ञान की प्रगति: विज्ञान केवल प्रयोगों का नाम नहीं है; यह उन परिकल्पनाओं (Hypothesis) का परिणाम है जो वैज्ञानिकों के मन में विचारों के रूप में जन्म लेती हैं।

​समाज की संकीर्ण दृष्टि

​आज के भागदौड़ भरे जीवन में हमने 'व्यस्तता' को सफलता का पैमाना मान लिया है। जो व्यक्ति शारीरिक रूप से भागदौड़ नहीं कर रहा, उसे हम समाज के लिए अनुपयोगी मान लेते हैं। यह सोच बदलाव की राह में एक बड़ी बाधा है। बदलाव तभी आता है जब कोई व्यक्ति स्थापित नियमों पर सवाल उठाता है और कुछ नया सोचने का साहस करता है।

​हमें यह समझने की आवश्यकता है कि 'सोच में डूबना' समय की बर्बादी नहीं, बल्कि भविष्य का निर्माण है। एक स्वस्थ समाज के लिए हाथ से काम करने वाले श्रम के साथ-साथ, मस्तिष्क से विचार करने वाले 'विचारकों' का सम्मान करना भी अनिवार्य है।

​"सच्चाई यह है कि इन लोगों के बिना न नए विचार आते हैं, न कला, न विज्ञान और न ही बदलाव की राह खुलती है।"

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