आधुनिक समाज की विडंबना: जीवन से सस्ता भोजन?
आज का दौर तकनीक और गति का दौर है। हम उस युग में जी रहे हैं जहाँ बटन दबाते ही दुनिया की हर सुख-सुविधा हमारे दरवाजे पर होती है। लेकिन इस 'सुविधा' की अंधी दौड़ में हमने जो खोया है, वह है— मानवीय संवेदना।
व्यवस्था का विरोधाभास
यह कितनी शर्मनाक बात है कि जिस शहर में "10 मिनट में पिज्जा" पहुँचाने की गारंटी दी जाती है, उसी सड़क पर एक घायल व्यक्ति तड़प-तड़प कर दम तोड़ देता है क्योंकि एम्बुलेंस को पहुँचने में घंटों लग जाते हैं। यह विरोधाभास हमारी प्राथमिकताओं पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या एक व्यक्ति की भूख मिटाना, किसी की जान बचाने से ज्यादा जरूरी हो गया है?
मानसिकता का पतन
सड़क पर दुर्घटना होने पर लोग मदद के लिए रुकने के बजाय अपनी गति कम करना भी मुनासिब नहीं समझते। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:
उदासीनता: "मुझे क्या लेना-देना" वाली मानसिकता।
कानूनी डर: पुलिसिया कार्रवाई और अदालती चक्करों का भय।
डिजिटल संवेदनहीनता: लोग मदद करने के बजाय मोबाइल से वीडियो बनाना ज्यादा जरूरी समझते हैं।
उपभोक्तावाद बनाम मानवता
आज की व्यवस्था 'उपभोक्ता' को भगवान मानती है, लेकिन 'इंसान' को महज एक संख्या। पिज्जा कंपनियाँ समय पर डिलीवरी न होने पर जुर्माना भरती हैं, क्योंकि वहाँ व्यापारिक हित जुड़े हैं। लेकिन एम्बुलेंस की देरी पर किसी की जवाबदेही तय नहीं होती। यह इस बात का प्रमाण है कि हमारी व्यवस्था पूँजीवाद की गुलाम हो चुकी है, जहाँ मुनाफे की गति जान की कीमत से अधिक है।

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