मोह से मोक्ष तक: अमर फल का वह रहस्यमयी चक्र !
प्रथम दृश्य: श्रृंगार का चरमोत्कर्ष -
उज्जयिनी के न्यायप्रिय और कलाप्रेमी राजा भर्तृहरि का जीवन अपनी रानी पिंगला के सौंदर्य के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ था। रानी का रूप ऐसा था, मानो शरद पूर्णिमा का चंद्रमा धरती पर उतर आया हो। राजा के लिए पिंगला केवल पत्नी नहीं, बल्कि उनके काव्य की प्रेरणा और जीवन का एकमात्र केंद्र थीं। उन्होंने अपनी रानी की सुंदरता और उनके प्रति अपनी आसक्ति को 'श्रृंगार शतक' के रूप में पिरोया, जहाँ प्रेम की पराकाष्ठा थी।
द्वितीय दृश्य: दैवीय उपहार और त्याग की भावना
उसी राज्य के एक तपस्वी ब्राह्मण को उसकी निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर देवताओं ने एक दिव्य 'अमर फल' प्रदान किया। वह फल जिसे खा ले, वह कालजयी और सदैव युवा बना रहे। ब्राह्मण ने विचार किया, "मेरे जैसा भिक्षुक दीर्घजीवी होकर क्या करेगा? यदि हमारा राजा चिरयुवा रहे, तो प्रजा का कल्याण युगों-युगों तक होगा।" परोपकार की इसी भावना से ओतप्रोत होकर उन्होंने वह फल राजा भर्तृहरि को समर्पित कर दिया।
तृतीय दृश्य: मोह का अंतहीन कुचक्र
राजा ने फल हाथ में लिया, पर उनका मन पिंगला के वियोग की कल्पना से काँप उठा। उन्होंने सोचा— "मेरे अमर होने का क्या अर्थ, यदि पिंगला का सौंदर्य ढल जाए? उसके बिना तो स्वर्ग भी शून्य है।" राजा ने वह अमरता अपनी प्रिय पत्नी को सौंप दी।
किंतु नियति का खेल निराला था। रानी पिंगला का हृदय राजा के पास नहीं, बल्कि नगर के कोतवाल के पास गिरवी था। रानी ने अपनी अमरता उस कोतवाल को दे दी। वह कोतवाल, जिसे रानी से नहीं, बल्कि धन और सत्ता से मोह था, वह फल लेकर अपनी प्रिय राज-नर्तकी के पास पहुँचा। उसने सोचा कि नर्तकी का यौवन बना रहेगा तो उसका सुख बना रहेगा।
चतुर्थ दृश्य: सत्य का साक्षात्कार
वह राज-नर्तकी, जो समाज की दृष्टि में पतित थी, भीतर से अत्यंत विवेकशील निकली। उसने फल देख कर विचार किया— "यह घृणित और पापमय जीवन लंबे समय तक जीकर मैं क्या पाऊँगी? यदि यह फल राजा के पास हो, तो धर्म की रक्षा होगी।"
जब नर्तकी ने वही फल राजा को भेंट किया, तो राजा के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह फल घूमकर पुनः वहीं आ गया था जहाँ से चला था, लेकिन इस बार वह अपने साथ धोखे और विश्वासघात की कड़वाहट लेकर आया था।
वैराग्य का उदय: विडंबना का दार्शनिक अंत
राजा भर्तृहरि ने जब इस चक्र की कड़ियाँ जोड़ीं, तो उनका मोहभंग हो गया। उन्होंने प्रसिद्ध श्लोक कहा:
यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता,
साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या,
धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥
(अर्थ: जिसे मैं निरंतर सोचता हूँ, वह मुझमें विरक्त है; वह किसी और को चाहती है, और वह अन्य व्यक्ति किसी और पर आसक्त है। धिक्कार है उस स्त्री को, उस पुरुष को, कामदेव को, इस नर्तकी को और मुझे भी।)
उपसंहार: अपूर्णता से पूर्णता की ओर
संसार की यही सबसे बड़ी विडंबना है कि यहाँ प्रेम की धारा कभी सीधी नहीं बहती। हम जिसे चाहते हैं, वह किसी और की प्रतीक्षा में है। इस 'अपूर्णता' के बोध ने ही भर्तृहरि को राजा से ऋषि बना दिया। उन्होंने वन की राह ली और मोह की राख से 'वैराग्य शतक' की रचना की।

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