दरभंगा राज की अंतिम देदीप्यमान स्मृति: महारानी कामसुंदरी देवी !

   


​भारतीय इतिहास के झरोखों में कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं जो अपनी भव्यता से अधिक अपनी सादगी और त्याग के लिए अमर हो जाते हैं। मिथिला की पावन धरती और दरभंगा राज के गौरवशाली इतिहास का एक ऐसा ही स्वर्णिम अध्याय महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ विश्राम पा गया। वे केवल एक राजघराने की अंतिम महारानी नहीं थीं, बल्कि एक युग की साक्षात साक्षी और मानवीय मूल्यों की प्रतिमूर्ति थीं।

​त्याग की अनुपम मिसाल

​इतिहास के पन्नों में वर्ष 1962 का भारत-चीन युद्ध केवल संघर्ष की गाथा नहीं है, बल्कि राष्ट्रभक्ति की पराकाष्ठा का भी प्रतीक है। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश से सहयोग का आह्वान किया, तब महारानी कामसुंदरी देवी के नेतृत्व में दरभंगा राज परिवार ने 600 किलो सोना भारतीय सेना को दान कर दिया। यह दान केवल धातु का अर्पण नहीं था, बल्कि अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए एक राजसी वैभव का सहर्ष समर्पण था।

​साधारण परिवेश से राजसी गरिमा तक

​22 अक्टूबर 1932 को मधुबनी के मंगरौनी गांव के एक साधारण परिवार में जन्मी कामसुंदरी देवी का जीवन सादगी और शालीनता का संगम था। मात्र आठ वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह दरभंगा के अंतिम महाराज कामेश्वर सिंह के साथ हुआ। राजसी सुख-सुविधाओं के बीच रहते हुए भी उन्होंने कभी अपनी जड़ों और सादगी को नहीं त्यागा। ब्रिटिश काल में जिस दरभंगा राज का प्रभुत्व अंग्रेजों के समानांतर माना जाता था, उसकी अंतिम महारानी ने अपने जीवन के उत्तरार्ध को अत्यंत साधारण तरीके से जीकर यह सिद्ध कर दिया कि बड़प्पन पद में नहीं, बल्कि स्वभाव में होता है।

​समाज सेवा और विरासत का संरक्षण

​1962 में महाराज कामेश्वर सिंह के देहावसान के बाद महारानी ने स्वयं को लोक-कल्याण के कार्यों में झोंक दिया। उन्होंने 'कल्याणी फाउंडेशन' की स्थापना कर शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक उत्थान के क्षेत्र में अनेक अनुकरणीय कार्य किए। उन्होंने महाराज के उन आदर्शों को जीवित रखा, जिनका मानना था कि संपत्ति का संग्रह वास्तव में जनता की अमानत है और उसे जनता की सेवा में ही व्यय होना चाहिए।

​एक युग का अंत

​बीती 12 जनवरी को जब महारानी ने अंतिम सांस ली, तो मिथिला की संस्कृति और दरभंगा की विरासत का एक जीवंत पुस्तकालय बंद हो गया। उन्होंने न केवल राजघराने की मर्यादा को सुरक्षित रखा, बल्कि आधुनिक भारत में एक राजसी व्यक्तित्व की सामाजिक भूमिका को नए अर्थ भी दिए।

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