​विनाश की नींव पर खड़ा विकास: अरावली का दम घोंटती आधुनिकता !

   

​आज के युग में हमने 'विकास' 


की एक ऐसी परिभाषा गढ़ ली है, जिसका रास्ता विनाश की गलियों से होकर गुजरता है। जिस अरावली पर्वतमाला को हमारे पूर्वज उत्तर भारत का 'कवच' मानते थे, आज वह कंक्रीट के जंगलों और अवैध खनन की भेंट चढ़ रही है।

​एक प्राकृतिक दीवार का अंत

​अरावली केवल पत्थरों का ढेर नहीं है, जैसा कि अक्सर इसे समझा जाता है। यह 650 किलोमीटर लंबी श्रृंखला थार रेगिस्तान को गंगा के उपजाऊ मैदानों की ओर बढ़ने से रोकने वाली एक 'प्राकृतिक दीवार' है। यदि हम अपने क्षणिक आर्थिक लाभ के लिए इस दीवार को ढहाते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब दिल्ली और आसपास के क्षेत्र धूल के गुबार में दफन हो जाएंगे। रेगिस्तान का विस्तार कोई काल्पनिक भय नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है।

​पारिस्थितिक तंत्र बनाम रियल एस्टेट

​विडंबना देखिए, जिस पर्वतमाला से चंबल, साबरमती और लूनी जैसी नदियाँ जीवन पाती हैं, उसी के जलभराव वाले क्षेत्रों पर आज ऊंची इमारतें खड़ी की जा रही हैं। हम भूजल स्तर गिरने की शिकायत तो करते हैं, लेकिन उन पहाड़ों को नष्ट कर रहे हैं जो प्राकृतिक रूप से पानी को जमीन के भीतर सोखने का काम करते हैं। वन्यजीवों के गलियारों को काटकर बनाए गए हाइवे और फार्महाउस 'लक्जरी' तो प्रदान कर सकते हैं, लेकिन 'ऑक्सीजन' और 'सुरक्षा' नहीं।

​क्या यह बुद्धिमत्ता है?

​"विनाश की नींव पर विकास का महल बनाना" बुद्धिमत्ता नहीं, बल्कि आत्मघाती कदम है। हम अक्सर भूल जाते हैं कि:

​प्रकृति का कोई विकल्प नहीं है: हम एयर प्यूरीफायर तो खरीद सकते हैं, लेकिन नष्ट हो चुकी पहाड़ियों को दोबारा नहीं बना सकते।

​दूरगामी प्रभाव: अरावली की क्षति का प्रभाव केवल स्थानीय नहीं है। यह पूरे उत्तर भारत की जलवायु, वर्षा चक्र और जैव-विविधता को असंतुलित कर रहा है।

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