धन: साधन से संकट तक का सफर !

   


​आज के आधुनिक युग में सफलता का पैमाना बदल गया है। मानवीय मूल्यों की जगह अब बैंक बैलेंस और भौतिक संपदा ने ले ली है। "धन केवल एक साधन है", लेकिन विडंबना यह है कि आज के समाज में यह साधन न रहकर स्वयं में एक 'साध्य' यानी लक्ष्य बन गया है। जब साधन ही लक्ष्य बन जाए, तो सामाजिक और नैतिक पतन निश्चित है।

​तुलना: प्रेरणा नहीं, बेचैनी का कारण

​सामाजिक स्तर पर धन के प्रति यह बढ़ता मोह एक मानसिक रोग की तरह फैल रहा है। जब कोई व्यक्ति अपनी प्रगति की तुलना दूसरे की संपत्ति से करने लगता है—विशेषकर यह सोचकर कि "मुझे फलां से ज्यादा धन चाहिए"—तो वह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि एक गहरी बेचैनी को जन्म देता है। यह तुलना व्यक्ति के संतोष को छीन लेती है और उसे एक ऐसी अंधी दौड़ में धकेल देती है जिसका कोई अंत नहीं है।

​गिरता नैतिक स्तर और 'कैसे' का विस्मरण

​जब धन कमाना ही एकमात्र उद्देश्य बन जाता है, तो व्यक्ति यह भूलने लगता है कि "धन कैसे कमाया जा रहा है।" इसी मोड़ पर समाज में भ्रष्टाचार, अनैतिकता और अपराध का उदय होता है।

​मूल्यों का ह्रास: लोग रिश्तों की गर्माहट से ज्यादा रुपयों की चमक को महत्व देने लगते हैं।

​अनैतिक माध्यम: 'शॉर्टकट' से अमीर बनने की चाह में लोग ईमानदारी और मेहनत के पारंपरिक रास्तों को त्याग रहे हैं।

​सामाजिक विघटन: आज समाज में व्यक्ति का सम्मान उसके चरित्र से नहीं, बल्कि उसकी विलासिता की वस्तुओं से तय हो रहा है, जो एक खोखले समाज की निशानी है।

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