सिस्टम की संवेदनहीनता की भेंट चढ़ती बेटियां: पटना हॉस्टल कांड और खाकी पर उठते सवाल !😢😢

 



राजधानी पटना के एक गर्ल्स हॉस्टल में मेडिकल की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत ने एक बार फिर बिहार की कानून-व्यवस्था और 'सुशासन' के दावों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह सिर्फ एक छात्रा की मौत नहीं है, बल्कि उन हजारों सपनों की हत्या है जो बेटियां अपनी आँखों में लेकर दूसरे शहरों के हॉस्टलों में रहने आती हैं।

पुलिसिया थ्योरी बनाम पोस्टमार्टम रिपोर्ट: सच छिपाने की कोशिश?

हैरानी की बात यह है कि घटना के तुरंत बाद पुलिस ने इसे 'आत्महत्या' का जामा पहनाने में ज़रा भी देर नहीं की। बिना किसी पुख्ता जांच के निष्कर्ष पर पहुँच जाना पुलिस की कार्यशैली पर गहरा संदेह पैदा करता है।

अब जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस के शुरुआती दावों के उलट इशारा कर रही है, तो सवाल उठता है कि आखिर पुलिस किसे बचाने की कोशिश कर रही थी? परिजनों द्वारा जताई गई दुष्कर्म की आशंका और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के संकेतों ने इस मामले को एक भयावह मोड़ दे दिया है। जब मेडिकल साक्ष्य कुछ और कह रहे हैं, तो पुलिस का "किसी तरह का दुष्कर्म न होने" का दावा करना क्या पीड़ित परिवार के घावों पर नमक छिड़कना नहीं है?

'बेटी बचाओ' या 'अपराध छिपाओ'?

सरकार और प्रशासन 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के नारों से दीवारों को तो पाट देते हैं, लेकिन धरातल पर बेटियां आज भी असुरक्षित हैं।

हॉस्टलों की सुरक्षा: क्या प्रशासन के पास इन निजी हॉस्टलों की सुरक्षा और वहां के माहौल की निगरानी के लिए कोई तंत्र है?

जांच में ढिलाई: आखिर क्यों संगीन मामलों में भी पुलिस का पहला प्रयास मामले को रफा-दफा करने या उसे आत्महत्या बताने का होता है?

जवाबदेही: यदि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दरिंदगी की पुष्टि होती है, तो उन पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए जिन्होंने बिना जांच के क्लीन चिट दे दी थी?

न्याय की मांग: अब और नहीं

सुशासन का मतलब केवल सड़कों और पुलों का निर्माण नहीं होता, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था होती है जहाँ एक पिता अपनी बेटी को बाहर भेजते समय डरे नहीं। पटना की इस छात्रा का मामला पुलिस की विश्वसनीयता के लिए एक लिटमस टेस्ट है।

"जब रक्षक ही तथ्यों को झुठलाने लगें और जांच की दिशा मोड़ने की कोशिश करें, तो न्याय की उम्मीद दम तोड़ने लगती है।"

इस मामले में अब किसी भी तरह की लीपापोती बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। पुलिस को नए सिरे से, बिना किसी दबाव के और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर जांच करनी चाहिए। अगर इसमें कोई प्रभावशाली व्यक्ति या हॉस्टल प्रबंधन की मिलीभगत है, तो उन्हें सलाखों के पीछे होना चाहिए।

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