बाजारवाद की भेंट चढ़ते मानवीय संबंध !

 


​आज के दौर में परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर सत्य है। जैसा कि कहा जाता है, "बदलाव यदि सकारात्मक और मानवीय हो, तो इससे अच्छा क्या हो सकता है।" लेकिन समकालीन समाज में हम जिस बदलाव के साक्षी बन रहे हैं, वह अक्सर मानवीय संवेदनाओं से प्रेरित न होकर 'बाजारवाद'  से संचालित है।

​बाजार का मनोवैज्ञानिक दबाव

​मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो बाजारवाद ने मनुष्य को केवल एक 'उपभोक्ता' बना दिया है। जब यही मानसिकता मानवीय रिश्तों में प्रवेश करती है, तो हम रिश्तों को भी 'उपयोगिता'  के चश्मे से देखने लगते हैं।

​परिणाम: जिस तरह हम पुरानी वस्तुओं को बदलकर नई वस्तुएं लेने के आदी हो गए हैं, वही अधीरता अब हमारे सामाजिक और निजी संबंधों में भी दिखाई देने लगी है।

​विवाह संस्था और अनिश्चितता

 विवाह, जो कभी स्थायित्व और सुरक्षा का प्रतीक था, आज एक जटिल पहेली बन गया है।

​उलझन: व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच फंसे आधुनिक इंसान के लिए यह तय करना कठिन हो गया है कि रिश्ता कब तक टिकेगा।

​असुरक्षा: भविष्य की अनिश्चितता रिश्तों में वह 'गहराई' और 'ठहराव' नहीं आने देती, जो मानसिक शांति के लिए अनिवार्य है।

​मानवीय रिश्तों पर प्रभाव

​बाजार की गिरफ्त में फंसी दुनिया ने सबसे ज्यादा नुकसान संवाद और सहनशीलता को पहुँचाया है।

​प्रतिस्पर्धा: रिश्तों में अब प्रेम से ज्यादा प्रतिस्पर्धा ने जगह ले ली है।

​तुलना: सोशल मीडिया और बाजार द्वारा परोसी गई 'परफेक्ट लाइफ' की छवि वास्तविक रिश्तों में असंतोष पैदा कर रही है।

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