भारतीय अर्थव्यवस्था: एक आलोचनात्मक आर्थिक विश्लेषण !-प्रो प्रसिद्ध कुमार , अर्थशास्त्र ,विभाग।
भारत की आर्थिक स्थिति 'दोधारी तलवार' पर खड़ी है। एक ओर जहाँ घरेलू विकास दर सकारात्मक है, वहीं बाहरी कारक 'मैक्रो-इकोनॉमिक' स्थिरता के लिए जोखिम पैदा कर रहे हैं।
निर्यात-आधारित विकास बनाम संरक्षणवाद: भारत ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में विदेशी मुद्रा भंडार और निर्यात में वृद्धि दर्ज की है। हालांकि, अमेरिका की 'संरक्षणवादी' (Protectionist) नीतियां और टैरिफ बाधाएं भारत के 'तुलनात्मक लाभ' को प्रभावित कर रही हैं।
व्यापार घाटा और टैरिफ युद्ध: राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए उच्च शुल्क एक 'टैरिफ युद्ध' जैसी स्थिति पैदा कर रहे हैं। इससे भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों जैसे फार्मास्यूटिकल्स, जेम्स एंड ज्वेलरी और आईटी सेवाओं की 'प्रतिस्पर्धात्मकता' कम हो सकती है।
आपूर्ति श्रृंखला लागत-जन्य मुद्रास्फीति: रूस-यूक्रेन और मध्य पूर्व के युद्धों के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित है। यदि अमेरिका रूस से तेल खरीद पर प्रतिबंध कड़े करता है, तो भारत की 'इनपुट लागत' बढ़ेगी, जिससे घरेलू अर्थव्यवस्था में 'लागत-जन्य मुद्रास्फीति' (Cost-Push Inflation) का खतरा उत्पन्न होगा।
निर्यात लक्ष्य की चुनौतियां: भारत ने 2025-26 के लिए 1 लाख करोड़ डॉलर के निर्यात का जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, वह वैश्विक मांग में कमी और 'व्यापारिक बाधाओं' (Trade Barriers) के कारण संकट में पड़ सकता है।
विदेश नीति और रणनीतिक कूटनीति
भारत को अपने आर्थिक हितों और भू-राजनीतिक संबंधों के बीच एक सूक्ष्म संतुलन साधना होगा:
रणनीतिक स्वायत्तता - भारत 'रणनीतिक स्वायत्तता' की नीति पर चल रहा है, जहाँ वह अमेरिका का रणनीतिक साझेदार भी है और रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल भी खरीद रहा है। अमेरिका का दबाव भारत की इस स्वायत्तता को चुनौती दे रहा है।
ऊर्जा कूटनीति -रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर उसे रिफाइन कर यूरोपीय बाजारों (इंग्लैंड, नीदरलैंड, स्पेन) में निर्यात करना भारत की एक सफल 'आर्थिक कूटनीति' रही है। अमेरिका द्वारा इस पर आपत्ति जताना भारत के 'ऊर्जा सुरक्षा' और 'विदेशी मुद्रा आय' पर सीधा प्रहार है।
बहुपक्षीय व्यापार समझौते (FTAs): अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए भारत को अन्य देशों के साथ 'मुक्त व्यापार समझौतों' (Free Trade Agreements) में तेजी लानी होगी। यह भारत की 'बाजार विविधीकरण' (Market Diversification) रणनीति का हिस्सा होना चाहिए।
प्रतिरोध और वार्ता (Defiance and Dialogue): अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ को "अंतरराष्ट्रीय नियमों के विरुद्ध" मानकर भारत को WTO (विश्व व्यापार संगठन) जैसे मंचों पर अपनी आवाज मुखर करनी होगी, साथ ही द्विपक्षीय वार्ताओं के जरिए 'टैरिफ छूट' प्राप्त करने की कूटनीति अपनानी होगी।

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