आर्थिक असमानता: विलासिता बनाम बुनियादी जरूरतें !
वर्तमान समाज में बढ़ती आर्थिक खाई और नीतिगत विफलताओं का एक संक्षिप्त विश्लेषण है।
1. दो भारत की तस्वीर (The Paradox)
आज हमारी अर्थव्यवस्था में एक गहरा विरोधाभास दिख रहा है। जहाँ एक तरफ खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) के कारण आम आदमी अपनी थाली से दाल और सब्जियां कम करने पर मजबूर है, वहीं दूसरी तरफ लक्जरी वस्तुओं (Luxury Goods) की रिकॉर्ड बिक्री हो रही है। यह दर्शाता है कि समाज का आर्थिक संतुलन बिगड़ चुका है।
2. 'रिसाव के सिद्धांत' की विफलता (Failure of Trickle-down Theory)
पिछले कुछ दशकों में भारत ने जिस आर्थिक ढांचे को अपनाया, वह 'रिसाव के सिद्धांत' (Trickle-down Theory) पर आधारित था।
3. नीतिगत और कर-ढांचा (Policy and Tax Structure)
हमारी नीतियों और कर-प्रणाली (Tax System) में कुछ ऐसी खामियां हैं जो इस अंतर को बढ़ा रही हैं:
किसी भी देश की प्रगति तब तक वास्तविक नहीं मानी जा सकती जब तक कि 'समावेशी विकास' (Inclusive Growth) न हो। केवल जीडीपी के आंकड़े बढ़ना काफी नहीं है; जब तक एक आम आदमी की थाली सुरक्षित नहीं है, तब तक आर्थिक असंतुलन समाज के लिए एक गंभीर चुनौती बना रहेगा।

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