उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता का प्रश्न और यूजीसी के नए दिशा-निर्देश: एक विश्लेषण !

 


हाल के दिनों में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लाए गए 'समता' (Equity) संबंधी प्रावधानों को लेकर समाज में एक बहस छिड़ गई है। कुछ वर्ग इसे "सवर्ण विरोधी" करार दे रहे हैं, लेकिन क्या यह विरोध तथ्यों पर आधारित है या केवल पूर्वाग्रहों का परिणाम? इस विषय की गहराई में जाने के लिए उन परिस्थितियों को समझना अनिवार्य है, जिन्होंने इन नियमों को जन्म दिया।

​1. परिसर की त्रासदी: आँकड़े और वास्तविकता

​केंद्र सरकार द्वारा संसद में साझा किए गए आँकड़े रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। पिछले पाँच वर्षों में IIT, IIM और अन्य राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में लगभग 100 छात्रों ने आत्महत्या की है।

चिंताजनक तथ्य: इन आत्महत्याओं में से लगभग सभी छात्र अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), ओबीसी (OBC) और अल्पसंख्यक समुदायों से थे।

​यह आँकड़ा महज संख्या नहीं है, बल्कि हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों की आंतरिक कार्यप्रणाली और वहाँ व्याप्त सामाजिक वातावरण पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है।

​2. न्यायपालिका का हस्तक्षेप और पृष्ठभूमि

​हैदराबाद विश्वविद्यालय के रोहित वेमुला और मुंबई की डॉ. पायल तड़वी जैसे मेधावी छात्रों की आत्महत्या ने देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था।

​सुप्रीम कोर्ट का रुख: पीड़ित परिवारों की याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए कि परिसरों में जातिगत और अन्य प्रकार के भेदभाव को रोकने के लिए प्रभावी और सख्त नियम बनाए जाएं।
​संसदीय समिति: न्यायालय के निर्देशों के पालन के लिए वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता में एक संसदीय समिति गठित की गई।

​3. 'समता' (Equity) समिति का गठन

​संसदीय समिति की अनुशंसाओं के आधार पर ही UGC ने 'समता समिति' के गठन का निर्णय लिया। इस समिति का प्राथमिक उद्देश्य निम्नलिखित वर्गों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकना है:

​दलित और आदिवासी छात्र
​पिछड़ा वर्ग (OBC) और अल्पसंख्यक
​महिलाएँ और दिव्यांग छात्र

​इसका कार्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि किसी छात्र के साथ उसके मूल या पहचान के आधार पर भेदभाव होता है, तो उसकी तत्काल सुनवाई हो और दोषियों पर जवाबदेही तय की जा सके।

​4. विरोध बनाम संवैधानिक मूल्य

​इस व्यवस्था को "सवर्ण विरोधी" बताकर इसका विरोध करना न केवल तर्कहीन है, बल्कि यह उन छात्रों की सुरक्षा के प्रति संवेदनहीनता भी है जो भेदभाव के कारण अपनी जान गँवा रहे हैं।

​भ्रम और राजनीति: जब भी वंचित वर्गों के हितों की रक्षा के लिए कोई वैधानिक कदम उठाया जाता है, तो अक्सर उसे एक विशेष वर्ग के विरुद्ध मान लिया जाता है। यह सोच समाज और राष्ट्र के विकास में बाधक है।
​समाधान का मार्ग: यदि प्रस्तावित बिल के किसी प्रावधान को लेकर कोई कानूनी शंका या भ्रम है, तो उसके लिए न्यायालय के द्वार हमेशा खुले हैं। लेकिन सड़क पर उतरकर भ्रम फैलाना सामाजिक तनाव को जन्म देता है।

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