भारतीय रुपये की गिरावट: आर्थिक संकट नहीं, कूटनीतिक चुनौती !-प्रो प्रसिद्ध कुमार ,अर्थशास्त्र विभाग।
भारतीय रुपये के मूल्य में हालिया गिरावट (अप्रैल 2025 से लगभग 6%) बुनियादी आर्थिक कमजोरी के कारण नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी व्यापार नीतियों का परिणाम है।
1. सुदृढ़ आर्थिक आधार बनाम मुद्रा गिरावट
भारत के आर्थिक संकेतक वर्तमान में सकारात्मक हैं:
इन मजबूत आंकड़ों के बावजूद रुपये का गिरना यह दर्शाता है कि समस्या घरेलू अर्थतंत्र में नहीं, बल्कि बाहरी कारकों में है।
2. 'विलेन' कौन? पूंजी का बहिर्वाह (Capital Outflow)
रुपये की कमजोरी का मुख्य कारण व्यापार घाटा नहीं, बल्कि विदेशी पूंजी का तेजी से बाहर निकलना है। इसके पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा भारतीय निर्यात पर लगाए गए भारी शुल्क (जैसे 50% आयात शुल्क) और ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर अतिरिक्त प्रतिबंधों की चेतावनी है। इन कूटनीतिक दबावों ने निवेशकों में डर पैदा किया है, जिससे शुद्ध पूंजी प्रवाह (Net Capital Inflow) नकारात्मक हो गया है।
3. अवमूल्यन (Devaluation) समाधान क्यों नहीं है?
रुपये को गिरने देना अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक हो सकता है क्योंकि:
4. RBI की भूमिका और सीमाएँ
RBI का वर्तमान रुख मुद्रा को एक निश्चित स्तर पर 'पेग' (स्थिर) करने का नहीं, बल्कि अस्थिरता (Volatility) को कम करने का है। RBI हस्तक्षेप के माध्यम से रुपये की गिरावट को पूरी तरह रोक तो नहीं सकता, लेकिन वह गिरावट की गति को 'स्मूथ' (धीमा) कर सकता है ताकि बाजार को अचानक झटका न लगे।

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