​सत्ता की देहरी पर दम तोड़ती मासूमियत: पटना हॉस्टल कांड की रूह कंपा देने वाली दास्तां!😢😢😢

   


​विश्वास का कत्ल और रसूख का पहरा !

​जहानाबाद से सपनों का बस्ता लेकर 5 जनवरी को पटना पहुंची उस बच्ची को क्या पता था कि जिस 'शंभू गर्ल्स हॉस्टल' को वह अपना सुरक्षित ठिकाना समझ रही है, वह वास्तव में भेड़ियों की मांद है। हॉस्टल की मालकिन नीलम अग्रवाल और उसके बेटों का रसूख, और उस बिल्डिंग के मालिक मनीष रंजन का संदिग्ध अतीत—जिस पर सांसद पप्पू यादव ने पहले ही सेक्स रैकेट चलाने के गंभीर आरोप लगाए हैं—सब मिलकर एक ऐसा जाल बुन रहे थे जिसमें एक मध्यमवर्गीय परिवार की उम्मीदों की बलि चढ़नी तय थी।

​६ जनवरी: रहस्यमयी खामोशी और षड्यंत्र की शुरुआत

​हॉस्टल प्रशासन की संवेदनहीनता देखिए—बच्ची की तबीयत बिगड़ी, वह पास के डॉक्टर सहजानंद के अस्पताल में भर्ती कराई गई, लेकिन परिजनों को इसकी सूचना हॉस्टल की मालकिन या स्टाफ ने नहीं, बल्कि किसी अनजान शख्स ने दी।

​संदेह का घेरा: आखिर डॉक्टर सहजानंद के अस्पताल से उसे आनन-फानन में प्रभात मेमोरियल क्यों शिफ्ट किया गया?

​पुलिस की संदिग्ध भूमिका: घटना के पहले ही दिन एक महिला सब-इंस्पेक्टर का अस्पताल पहुंचना और अपना नंबर देना, क्या किसी गहरी साजिश की आहट थी या केवल खानापूर्ति?

​८ जनवरी: जब बच्ची ने तोड़ी चुप्पी और व्यवस्था ने फेरा मुंह

​प्रभात मेमोरियल के डॉ. अभिषेक ने जब परिजनों को बताया कि बच्ची के साथ शारीरिक ज्यादती हुई है और उसे गहरी चोटें आई हैं, तब न्याय की उम्मीद जगनी चाहिए थी। 8 जनवरी की शाम जब बच्ची को कुछ पलों के लिए होश आया, तो वह अपनी मां को देखकर फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने सिसकियों के बीच कहा—"मेरे साथ गलत हुआ है।"

​मगर अफ़सोस! जब परिजन न्याय के लिए गुहार लगा रहे थे, हॉस्टल की वॉर्डन सीसीटीवी फुटेज खंगाल कर सुराग मिटाने में व्यस्त थीं। कमरे की सफाई कर दी गई थी, ताकि खून के धब्बे और दरिंदगी के निशान मिटाए जा सकें।

​खाकी और रसूखदारों का 'मैनेजमेंट' का खेल

​9 जनवरी को जब हॉस्टल मालकिन नीलम अग्रवाल अस्पताल पहुंची, तो उसके चेहरे पर पछतावा नहीं, बल्कि अहंकार था। उसने सरेआम कहा—"हॉस्टल का नाम बदनाम होगा, केस वापस ले लो और मामला मैनेज कर लो।"

​पुलिस की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल तब उठता है जब थाना प्रभारी रोशनी कुमारी की मौजूदगी में नीलम अग्रवाल को गिरफ्तार करने का दिखावा किया जाता है और फिर उसे चुपचाप छोड़ दिया जाता है। आखिर वह कौन सा दबाव था जिसने कानून के हाथ बांध दिए?

​अंतिम विदाई पर लाठियों की गूँज

​11 जनवरी को मेदांता में बच्ची ने दम तोड़ दिया। मौत के बाद भी इस बदनसीब बच्ची को सुकून नहीं मिला। पीएमसीएच के एक डॉक्टर ने दबी जुबान में परिजनों से कहा—"बेटी के साथ रेप हुआ है, इसे अभी मत जलाना।"

​जब परिजन न्याय की मांग लेकर कारगिल चौक पर उतरे, तो प्रशासन ने संवेदना दिखाने के बजाय लाठियां बरसाईं। एएसपी कुमार अभिनव का यह कहना कि "आपको बरगलाया गया है, कोई रेप नहीं हुआ," उस पिता के घावों पर नमक छिड़कने जैसा था जिसकी गोद सुनी हो चुकी थी।

​अनुत्तरित प्रश्न: क्या यही हमारा लोकतंत्र है?

​केयर टेकर नीतू और चंचला अब कहाँ गायब हैं?

​मनीष रंजन के गार्ड अस्पताल से लेकर श्मशान तक परिजनों की निगरानी क्यों कर रहे थे?

​थाना प्रभारी रोशनी कुमारी ने परिजनों को 10 साल बाद देख लेने की धमकी क्यों दी?

​हॉस्टल का सीसीटीवी फुटेज अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं हुआ?

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