​आभासी संवेदनाएँ: डिजिटल सहानुभूति और शून्य होती सहभागिता !

   



​डिजिटल युग ने न केवल हमारी जीवनशैली को बदला है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के स्वरूप को भी एक नए और अपरिचित साँचे में ढाल दिया है। आज के समय में संवेदनाएँ अब हृदय की गहराई से कम और अंगुलियों के स्पर्श से अधिक संचालित होती हैं।

​सहानुभूति का सतहीकरण

सोशल मीडिया के इस दौर में किसी भी त्रासदी, विमर्श या सामाजिक मुद्दे से जुड़े आंकड़े, हृदयविदारक तस्वीरें और वीडियो क्षण भर में लाखों-करोड़ों आँखों तक पहुँच जाते हैं। सूचना का यह प्रवाह हमें यह आभास तो कराता है कि हम दुनिया से जुड़े हुए हैं, परंतु मनोवैज्ञानिक स्तर पर यह एक 'सतही जुड़ाव' मात्र है। जब हम किसी दुखद तस्वीर पर 'लाइक' करते हैं या 'दुखद' का इमोजी  साझा करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क एक कृत्रिम संतोष का अनुभव करता है। इसे मनोविज्ञान में 'स्लैकटिविज़्म' कहा जा सकता है, जहाँ व्यक्ति को लगता है कि उसने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है, जबकि वास्तविकता में स्थिति अपरिवर्तित रहती है।

​प्रतिक्रिया बनाम सहभागिता

 डिजिटल सहानुभूति हमें 'प्रतिक्रिया'  देना तो सिखाती है, पर 'सहभागिता' (Participation) नहीं। प्रतिक्रिया तात्कालिक होती है, जो एक स्क्रॉल के साथ ही समाप्त हो जाती है। इसके विपरीत, सहभागिता वास्तविक जीवन के धरातल पर समय, श्रम और वास्तविक जुड़ाव की मांग करती है।

​प्रभाव की सीमाएँ

वास्तविक जीवन में इन डिजिटल आंदोलनों का प्रभाव अक्सर सीमित रह जाता है। इसका कारण यह है कि डिजिटल पर्दे पर व्यक्त की गई सहानुभूति में वह 'मानवीय ऊष्मा' और 'निरंतरता' नहीं होती, जो किसी सामाजिक परिवर्तन के लिए अनिवार्य है। हम सूचनाओं से तो लदे हुए हैं, लेकिन उन सूचनाओं को संवेदना में बदलकर धरातल पर उतारने की क्षमता धीरे-धीरे क्षीण हो रही है।

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