मंगल ग्रह की वधू और गोविंद बाबू का 'पुत्र-पुराण' ! ( कहानी )- प्रो प्रसिद्ध कुमार।
जब ईगो के आगे 'वर-वधू स्वयंवर' भी हो जाए भंग !
गोविंद बाबू हमारे कॉलेज के वे नियमित अतिथि हैं, जो अतिथि कम और 'पुत्र-प्रशस्ति' के गायक अधिक जान पड़ते हैं। उनके पास फुर्सत का अपार भंडार है और उस भंडार का एकमात्र उपयोग है—अपने सुपुत्र के लिए ऐसी वधू की खोज, जो शायद विधाता ने अभी तक बनाई ही नहीं।
कुलीनता का बोझ और ईगो का आकाश
गोविंद बाबू के परिचय का दायरा उनके पद और प्रतिष्ठा से शुरू होकर उनके अहंकार पर जाकर समाप्त होता है। वे खुद बीडीओ के दामाद हैं, रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं, और नवादा-कौआकोल के जमींदार भी। पटना में मकानों की कतार है और संतान के नाम पर केवल एक 'पुत्र-रत्न'।
उनकी बातों में बेटा एम्स (AIIMS) का 'पे-लेवल 11' वाला अधिकारी है, लेकिन वास्तविकता की परतों में झांकें तो मामला आउटसोर्सिंग और निजी क्षेत्र की धुंधली गलियों में खो जाता है। सरकारी नौकरी का दावा तो बस उनके ईगो को जिंदा रखने वाली एक ऑक्सीजन है।
भूगोल की बंदिशें और 'चांद-सितारों' की चाहत
गोविंद बाबू का अहंकार भौगोलिक सीमाओं को भी नहीं बख्शता। उनके पास बिहार के उन जिलों की 'ब्लैकलिस्ट' तैयार है, जहाँ वे कदम भी नहीं रखेंगे, चाहे कोई दहेज में पूरा जिला ही क्यों न लिख दे। पटना के कुछ खास गांवों का नाम सुनते ही उनके तेवर ऐसे बदल जाते हैं मानो वहां की हवा उनके कुलीनता के फिल्टर को खराब कर देगी।
कॉलेज के गलियारों में चर्चा आम है—गोविंद बाबू के बेटे की जोड़ी इस मर्त्यलोक (पृथ्वी) पर तो मिलने से रही; इसके लिए उन्हें मंगल ग्रह या चंद्रमा पर ही विज्ञापन देना होगा।
प्रिंसिपल का धैर्य और चौधरी जी का 'नुकीला' व्यंग्य
अभी कल की ही बात है, एक अतिथि प्रिंसिपल साहब अपनी धर्मपत्नी के साथ पधारे। गोविंद बाबू ने अपनी 'पुत्र-महिमा' का टेप रिकॉर्डर फिर से चालू कर दिया। अतिथि महोदया ने शिष्टाचारवश कुछ लड़कियों के पते क्या सुझाए, गोविंद बाबू के ईगो ने वहीं अपनी म्यान से तलवार निकाल ली।
तभी कमरे के बाहर 'पुत्र उवाच' का शोर बढ़ा। हमारे साह सर ने तो उन्हें प्यार से "वायरस" तक की उपाधि दे डाली है। वहीं महफ़िल में मौजूद थे प्रोफेसर संतोष चौधरी—'सरकारी जाति' के अकेले प्रतिनिधि और व्यंग्य के बाण छोड़ने में माहिर।
स्वयंवर का अंत और कड़वा सच
चौधरी जी ने जब गोविंद बाबू के अतिशयोक्तिपूर्ण दावों के बीच अपनी 'चुटीली भांजी' मारी, तो गोविंद बाबू आपे से बाहर हो गए। चौधरी जी का शांत लहजा और सामने वाले का पारा सातवें आसमान पर होना, यह उस महफ़िल का स्थायी दृश्य है।
अंततः चौधरी जी ने भविष्यवक्ता की मुद्रा में कह ही दिया—"लिख कर रख लीजिए, ई जब तक जिंदा रहेंगे, बेटा का ब्याह नहीं होने देंगे।"
इतना सुनते ही मानो 'वर-वधू स्वयंवर' में बिजली गिर गई। गोविंद बाबू का चेहरा तमतमा उठा और पल भर में सजी-सजाई सभा बिखर गई। लोग उठकर चल दिए, और पीछे रह गई वही पुरानी 'पुत्र-महिमा', जो आज भी किसी मंगल ग्रह की अप्सरा की प्रतीक्षा में कॉलेज के बरामदों में गूंज रही है।

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