डिग्रियों की भीड़ और कौशल का अकाल: हमारी शिक्षा व्यवस्था का स्याह सच !

 


​आज के दौर में भारत एक अजीबोगरीब विरोधाभास से जूझ रहा है। एक तरफ लाखों युवा हाथों में ऊँची डिग्रियां लिए रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं, तो दूसरी तरफ उद्योग जगत 'कुशल प्रतिभाओं' की कमी का रोना रो रहा है। यह स्थिति हमारी शैक्षणिक व्यवस्था की जड़ों में छिपे गहरे संकट को उजागर करती है।

​1. किताबी ज्ञान बनाम व्यावहारिक कौशल

​हमारी शिक्षा प्रणाली आज भी 'मैकाले' के उस ढांचे से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है, जिसका उद्देश्य केवल क्लर्क पैदा करना था। कॉलेजों में आज भी वही पुराना पाठ्यक्रम पढ़ाया जा रहा है जो दशकों पहले अप्रासंगिक हो चुका है। जब एक छात्र कैंपस से बाहर कदम रखता है, तो उसे पता चलता है कि उसने जो पढ़ा, वह आधुनिक बाजार की जरूरतों (AI, डेटा साइंस, या आधुनिक प्रबंधन) के सामने नगण्य है।

​2. 'डिग्री फैक्ट्री' बनते विश्वविद्यालय

​प्रतिष्ठित संस्थानों को छोड़ दें, तो देश के अधिकांश निजी और सरकारी कॉलेज केवल 'डिग्री बांटने वाली फैक्ट्रियां' बनकर रह गए हैं। शिक्षा अब एक व्यापार है जहाँ फोकस गुणवत्ता (Quality) पर नहीं, बल्कि संख्या (Quantity) पर है। लाखों रुपये की फीस भरने के बावजूद, छात्र को वह तकनीकी या संचार कौशल (Soft Skills) नहीं मिल पाता, जो उसे एक प्रतिस्पर्धी बाजार में खड़ा कर सके।

​3. कौशल विकास निगम की रिपोर्ट का आईना

​राष्ट्रीय कौशल विकास निगम की रिपोर्टें चीख-चीख कर कह रही हैं कि भारत की एक बड़ी कार्यशील आबादी औपचारिक कौशल प्रशिक्षण से वंचित है। यह विफलता केवल छात्रों की नहीं, बल्कि नीति-निर्धारकों की भी है। 'स्किल इंडिया' जैसे अभियान कागजों पर तो प्रभावशाली दिखते हैं, लेकिन धरातल पर उनका क्रियान्वयन आज भी बेहद सुस्त और दिशाहीन है।

​4. बेरोजगारी और प्रतिभा का पलायन

​जब एक प्रतिभावान युवा अपनी योग्यता के अनुरूप काम नहीं पाता, तो दो स्थितियां पैदा होती हैं: या तो वह अवसाद और हताशा का शिकार होकर भीड़ का हिस्सा बन जाता है, या फिर 'ब्रेन ड्रेन' के जरिए अपनी प्रतिभा दूसरे देशों को सौंप देता है। यह देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए एक बड़ा आघात है।

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