शीर्षक: आज का यथार्थ ! ( कविता ) -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

 


​आज खड़ा है सच सहमा सा, सीना ताने झूठ खड़ा,

ईमानों की बस्ती में अब, संकट देखो बहुत बड़ा।

निष्ठावान खड़ा है दुखी, और ईमानदार को कष्ट यहाँ,

मेहनतकश तो भूखा सोता, मालामाल है भ्रष्ट यहाँ।

कौड़ी-कौड़ी को तरस रहा, जो करता कठिन परिश्रम है,

मौज उड़ाते वे अपराधी, जिनके दिल में न कोई भ्रम है।

​वही पेड़ अब छाया देता, जिसके बीज हुए हैं नष्ट,

परिश्रमी ही आज जगत में, सबसे ज्यादा झेलें कष्ट।

लुटेरे देखो मस्त खड़े हैं, जैसे उन पर कोई आंच नहीं,

पर बेकसूर की आँखों में तो, बचता कोई भी ख्वाब नहीं।

लोग भले ही आँखें मूँदें, पर सब कुछ बिल्कुल स्पष्ट है,

सच तो मुँह को छुपा रहा है, चारों ओर बस कपट है।

मेहनतकश ही त्रस्त खड़ा है, अपराधी यहाँ आज़ाद हैं,

कैसी ये रीत चली दुनिया में, जहाँ सज्जन ही बर्बाद हैं।

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