गरीबी का पैमाना ! प्रो प्रसिद्ध कुमार , अर्थशास्त्र विभाग।

 


1. सरकारी दावा और आंकड़े

​आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, देश की सबसे निचली 5-10% आबादी के उपभोग व्यय (spending) में वृद्धि हुई है। सरकार का मानना है कि सब्सिडी, पेंशन, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और शिक्षा-स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च के कारण गरीबों की स्थिति बेहतर हुई है और उपभोग असमानता में कमी आई है।

2. व्यय बनाम वास्तविक आय का संकट

​: क्या खर्च बढ़ने का अर्थ वास्तव में गरीबी कम होना है?

​महंगाई का प्रभाव: कई बार खर्च में बढ़ोतरी खुशी से नहीं, बल्कि बढ़ती महंगाई और जीवन की अनिवार्य जरूरतों के कारण मजबूरी में होती है।
​कर्ज का जाल: आय कम होने पर भी गंभीर जरूरतों के लिए गरीब परिवार बैंक या साहूकारों से कर्ज लेकर खर्च करते हैं, जिसे आंकड़ों में 'सम्पन्नता' मान लेना भ्रामक हो सकता है।

3. विरोधाभास: मुफ्त राशन की योजना

​ यदि देश में गरीबी वास्तव में कम हो गई है, तो सरकार को आज भी 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? इस योजना को 2024 से अगले पांच साल के लिए बढ़ाना धरातल पर गरीबी की निरंतरता को दर्शाता है।

4. स्थायी समाधान की आवश्यकता

​ गरीबी को केवल कागजी आंकड़ों या उपभोग व्यय से नहीं मापा जाना चाहिए। इसके स्थायी समाधान के लिए निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं:

​आजीविका के स्थायी साधन विकसित करना।
​शिक्षा और रोजगार के सस्ते, सुलभ और पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराना।
​केवल सब्सिडी के बजाय आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित करना।

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