जीवन का वास्तविक माधुर्य: प्रेम और समन्वय !

   



सृष्टि की समस्त रचनाओं में मनुष्य को श्रेष्ठ माना गया है, किंतु विडंबना यह है कि वह अक्सर जीवन के सबसे सरल और सहज सत्य को विस्मृत कर देता है। हम अक्सर बाहरी उपलब्धियों और भौतिक सुखों की खोज में इतने लीन हो जाते हैं कि यह भूल जाते हैं कि जीवन का वास्तविक रस बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि आंतरिक सद्भाव में निहित है।

​सहयोग और प्रेम: जीवन के आधार स्तंभ

 मनुष्य आज इस लघु किंतु मर्मस्पर्शी सत्य को समझने में असमर्थ है कि सहयोग, सत्कार, प्रेम और आपसी समन्वय ही वे कुंजी हैं, जिनसे आनंद के द्वार खुलते हैं। जब हम एक-दूसरे के प्रति सम्मान (सत्कार) का भाव रखते हैं और मतभेदों के बीच समन्वय स्थापित करते हैं, तब जीवन एक बोझ न रहकर एक उत्सव बन जाता है। प्रेम ही वह तत्व है जो दो अपरिचित हृदयों के बीच अपनत्व का सेतु बनाता है।

​घृणा का अंधकार और समय की रेत

हमारी जीवन अवधि सीमित है। यदि हम इस बहुमूल्य समय का अधिकांश हिस्सा परस्पर घृणा, ईर्ष्या और दूसरों को मानसिक क्लेश पहुँचाने में व्यतीत कर देते हैं, तो हम अनजाने में स्वयं को भी उसी अशांति की अग्नि में झोंक देते हैं। नकारात्मकता एक ऐसा चक्र है जिसमें दूसरों को परेशान करने वाला व्यक्ति अंततः स्वयं की शांति भी खो देता है।

​"यदि हम केवल कांटे बोने और उन्हें चुनने में ही अपना जीवन व्यतीत कर देंगे, तो फूलों की सुगंध का आनंद लेने का अवसर हमें कब मिलेगा?"

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