शिक्षा: केवल जीविका नहीं, जीवन का आधार !-प्रो प्रसिद्ध कुमार ।
आज के दौर में अक्सर शिक्षा को केवल डिग्रियों और अच्छी नौकरी पाने के माध्यम के रूप में देखा जाता है। लेकिन जैसा कि भारतीय दर्शन हमें सिखाता है, शिक्षा का असली उद्देश्य इससे कहीं अधिक व्यापक और गहरा है। शिक्षा केवल मस्तिष्क का विकास नहीं, बल्कि आत्मा का परिष्कार है।
1. विद्या, ज्ञान और प्रज्ञा का संगम
भारतीय दर्शन के अनुसार, शिक्षा प्रणाली के चार मुख्य स्तंभ हैं—विद्या, ज्ञान, मेधा (बुद्धि) और प्रज्ञा। इनका वास्तविक उद्देश्य एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना है जो न केवल बौद्धिक रूप से सक्षम हो, बल्कि नैतिक कसौटी पर भी पूरी तरह खरा उतरे। जब ज्ञान के साथ नैतिकता का समावेश होता है, तभी वह 'सार्थक शिक्षा' कहलाती है।
2. भौतिक सुख से परे: 'सत्, चित्, आनंद'
शिक्षा का अर्थ केवल धनार्जन या सुख-सुविधाओं का संग्रह करना नहीं है। यदि हम केवल भौतिकवाद की दौड़ में शामिल हैं, तो हम शिक्षा के उच्चतम लक्ष्य से दूर हैं। एक आदर्श शिक्षा वह है जो हमें:
सत् (सत्य): जीवन की सच्चाई और नैतिकता से परिचित कराए।
चित् (चेतना): हमारी जागरूकता और सोच को विस्तार दे।
आनंद: हमें आंतरिक शांति और संतोष की अनुभूति कराए।
3. मानवीय मूल्य और राष्ट्र निर्माण
एक सशक्त राष्ट्र की नींव ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र से बनती है। शिक्षा में मानवीय मूल्यों (करुणा, ईमानदारी और सेवा भाव) का होना अनिवार्य है। जब विद्यार्थी इन मूल्यों को आत्मसात करते हैं, तो वे न केवल अपने लिए सफल होते हैं, बल्कि समाज और राष्ट्र की उन्नति में भी अमूल्य योगदान देते हैं।

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