कृषि की असली सूत्रधार: परंपरा और विज्ञान का संगम!

  


​ग्रामीण अंचलों में खेती केवल मिट्टी से अनाज उगाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत संस्कृति है जिसकी धुरी महिलाएं हैं। महिलाओं के पास पारंपरिक कृषि ज्ञान की अपार संपदा है। वे केवल श्रम नहीं करतीं, बल्कि वे बीजों की संरक्षक, मिट्टी की पारखी और मौसम की भविष्यवक्ता भी हैं।

​1. अनुभव से उपजा विज्ञान

​महिलाओं का कृषि ज्ञान 'अनुभव की प्रयोगशाला' से निकला है। वे बादलों की दिशा देखकर बारिश का अनुमान लगा लेती हैं और मिट्टी की महक से उसकी उर्वरता पहचान लेती हैं। यदि इस पारंपरिक बोध को औपचारिक शिक्षा और आधुनिक शोध से जोड़ दिया जाए, तो कृषि नवाचार अधिक मानवीय और टिकाऊ बन सकता है।

​2. लोकगीतों में रची-बसी खेती

​महिलाओं का कृषि में योगदान केवल खेतों तक सीमित नहीं है, उन्होंने इसे कलात्मकता से भी भरा है। फसल बोते समय, निराई करते समय या कटाई के दौरान गाए जाने वाले मौसमी और ऋतु गीत (जैसे कजरी, चैती या सोहर) न केवल थकान मिटाते हैं, बल्कि कृषि चक्र की जानकारी को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाते हैं। ये गीत खेतों में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।

​3. घाघ और भड्डरी की कहावतों की संरक्षक

​ग्रामीण महिलाएं लोक-कवियों जैसे घाघ और भड्डरी की कहावतों और मुहावरों को आज भी कंठस्थ रखती हैं। खेती-बाड़ी से जुड़े ये सूत्र जैसे:

​"शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय, ऐसा बोले घाघ जी, बिन बरसे न जाय।"

​ऐसी पंक्तियाँ उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। इन मुहावरों के माध्यम से वे जानती हैं कि किस नक्षत्र में कौन सी फसल बोनी है और कब पानी देना है। यह 'कंठस्थ ज्ञान' उन्हें एक कुशल कृषि प्रबंधक बनाता है।

​4. भविष्य की रणनीतिक आवश्यकता

​कृषि में महिलाओं की भागीदारी केवल सामाजिक सरोकार नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता है। जब एक महिला शिक्षित और सशक्त होती है, तो वह पूरे परिवार और ग्रामीण समाज के पोषण और स्वास्थ्य में सुधार लाती है। खेती में महिलाओं पर किया गया निवेश वास्तव में एक हरित और समृद्ध भविष्य पर किया गया निवेश है।

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