जल संकट: उपलब्धता से बड़ी चुनौती बनती गुणवत्ता!

    


​संयुक्त राष्ट्र की 'विश्व जल रिपोर्ट 2024' ने एक बार फिर मानवता के सामने खड़े सबसे बड़े संकट की ओर इशारा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की लगभग 2.2 अरब आबादी आज भी सुरक्षित पेयजल से वंचित है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक वैश्विक त्रासदी है। भारत के संदर्भ में यह स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है क्योंकि दुनिया की लगभग 18% आबादी वाले इस देश के पास वैश्विक मीठे जल के संसाधनों का मात्र 4% हिस्सा ही उपलब्ध है।

​उपलब्धता बनाम गुणवत्ता

​अक्सर जल संकट की चर्चा केवल पानी की 'कमी' तक सीमित रह जाती है, लेकिन इंदौर जैसी हालिया घटनाएं एक अलग और अधिक गंभीर पहलू की ओर ध्यान खींचती हैं। चुनौती केवल यह नहीं है कि नल में पानी आ रहा है या नहीं, बल्कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो पानी उपलब्ध कराया जा रहा है, वह कितना सुरक्षित है?

​निगरानी का अभाव: आज भी हमारे सिस्टम में घरों तक पहुँचने वाले पानी की गुणवत्ता की निरंतर और वास्तविक समय  निगरानी करने की व्यवस्था का अभाव है।

​स्वास्थ्य पर संकट: असुरक्षित पेयजल केवल प्यास का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हैजा, टायफाइड और हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों का मूल कारण है।

​प्रदूषण के स्रोत: जल स्रोतों में बढ़ता औद्योगिक कचरा, सीवेज का खराब प्रबंधन और पाइपलाइनों में होने वाला लीकेज स्वच्छ पानी को भी विषैला बना रहा है।

​समाधान की राह

​हमें 'जल प्रबंधन' की परिभाषा को विस्तार देना होगा। केवल नए बांध बनाना या पाइपलाइन बिछाना पर्याप्त नहीं है। हमें निम्नलिखित कदम उठाने की आवश्यकता है:

​सशक्त निगरानी तंत्र: जल वितरण केंद्रों और अंतिम उपभोक्ता (घरों) के स्तर पर आधुनिक सेंसर और लैब टेस्टिंग की व्यवस्था अनिवार्य हो।

​सामुदायिक जागरूकता: नागरिकों को जल प्रदूषण के संकेतों और जल शोधन के प्रति जागरूक करना।

​बुनियादी ढांचे में सुधार: पुरानी और जर्जर पाइपलाइनों को बदलना ताकि सीवेज के पानी का उनमें मिश्रण न हो सके।

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