भारतीय अर्थव्यवस्था: वृद्धि की चुनौतियां और नीतिगत विरोधाभास !-प्रो प्रसिद्ध कुमार ,अर्थशास्त्र विभाग।

 


​हालिया आर्थिक सर्वेक्षण भारत की विकास गाथा का एक ऐसा चित्र प्रस्तुत करता है जो आशावाद और गंभीर संरचनात्मक चिंताओं के बीच झूल रहा है। एक ओर हम विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर निवेश, विनिर्माण और मुद्रा स्थिरता जैसे मोर्चों पर कई लाल झंडे दिखाई दे रहे हैं।

​1. विकास दर और 'Viksit Bharat' का लक्ष्य

​FY27 के लिए 6.8-7.2% का अनुमानित GDP विकास दर, विकसित भारत (2047) के लिए आवश्यक 8.2% की निरंतर वृद्धि दर से काफी कम है।

​रियल बनाम नॉमिनल GDP का अंतर: 7.4% रियल GDP और 8% नॉमिनल GDP के बीच का मात्र 0.6% का अंतर (GDP Deflator) यह संकेत देता है कि थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित मुद्रास्फीति अत्यंत कम या नकारात्मक स्तर पर है। यह उत्पादकों के लिए चिंताजनक है क्योंकि कम 'प्राइसिंग पावर' उनके मुनाफे को सीमित करती है।
​डॉलर टर्म्स में विकास: यदि नॉमिनल ग्रोथ 8% है और रुपया 6.5% गिरता है, तो वैश्विक संदर्भ में हमारी क्रय शक्ति और अर्थव्यवस्था का आकार बहुत धीमी गति से बढ़ता है। यह 'मिडिल-इनकम ट्रैप' की ओर इशारा करता है।

​2. रुपये की गिरावट और विदेशी पूंजी का पलायन (FPI & FDI)

​रुपया एशियाई मुद्राओं में कमजोर प्रदर्शन कर रहा है, जिसका मुख्य कारण Capital Outflow है।

​FPI विड्रॉल: अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरें और भारत में उच्च वैल्युएशन के कारण निवेशक पैसा निकाल रहे हैं।
​FDI में कमी: लगातार चार महीनों तक शुद्ध FDI का नकारात्मक होना यह दर्शाता है कि दीर्घकालिक विदेशी निवेशक अभी 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में हैं या अन्य उभरते बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं।
​समाधान: सर्वेक्षण ने सुझाव दिया है कि केवल सेवाओं के निर्यात पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है; हमें व्यापार घाटे को कम करने के लिए विनिर्माण निर्यात बढ़ाना होगा।

​3. विनिर्माण (Manufacturing) और निवेश का संकट

​मेक इन इंडिया और PLI स्कीमों के बावजूद, विनिर्माण का GDP में हिस्सा 12.8% पर सिमटना एक नीतिगत विफलता की ओर संकेत करता है।

​निजी निवेश (Private Capex): भारतीय कॉर्पोरेट्स भारत के बजाय विदेशों में ($14bn से $24bn) निवेश बढ़ा रहे हैं। इसके पीछे घरेलू मांग में कमी, जटिल विनियामक वातावरण और 'व्यापार करने की उच्च लागत' (High cost of doing business) जैसे कारण हो सकते हैं।
​रोजगार और ELI: 2 करोड़ नौकरियों का लक्ष्य और 1 करोड़ इंटर्नशिप के आंकड़े अभी भी कागजों पर अधिक और जमीन पर कम दिख रहे हैं। कौशल की कमी और उद्योगों की सुस्त मांग इस खाई को और चौड़ा कर रही है।

​4. कराधान और सामाजिक असमानता (Taxation & Education)

​सर्वेक्षण में यह स्पष्ट है कि कुल कर संग्रह में कॉर्पोरेट टैक्स की हिस्सेदारी घट रही है और व्यक्तिगत आयकर (Personal Income Tax) की बढ़ रही है। * यह आम आदमी पर बढ़ते कर बोझ और कॉर्पोरेट्स को दी जा रही रियायतों के बीच के असंतुलन को दर्शाता है।

​शिक्षा: कक्षा 8 के बाद छात्रों का ड्रॉप-आउट रेट और सरकारी स्कूलों की घटती संख्या 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' (जनसांख्यिकीय लाभांश) को 'डेमोग्राफिक डिजास्टर' में बदल सकती है। बिना शिक्षित वर्कफोर्स के विनिर्माण और AI के दौर में टिकना असंभव होगा।

​5. कृषि और शहरी बुनियादी ढांचा

​कृषि: दालों और अनाजों की पैदावार का वैश्विक औसत से नीचे होना खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आय के लिए खतरा है। इसके लिए R&D और सिंचाई में बड़े निवेश की आवश्यकता है।
​शहरी गतिरोध: ट्रैफिक जाम और महंगे घर केवल असुविधा नहीं, बल्कि आर्थिक नुकसान हैं। सर्वेक्षण स्वीकार करता है कि यदि हमारे शहर 'Unliveable' (रहने योग्य नहीं) रहेंगे, तो वे आर्थिक विकास के इंजन नहीं बन पाएंगे।

​आर्थिक सर्वेक्षण केवल उपलब्धियों का गुणगान नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण का दस्तावेज है। विदेशी पूंजी पर निर्भरता कम करने, निजी क्षेत्र को भारत में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने और विनिर्माण को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए 'साहसी नीतिगत बदलाव' की आवश्यकता है, न कि केवल प्रोत्साहन योजनाओं (Incentives) की।

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