शिक्षा के प्रति सरकारी निद्रा: जब न्यायपालिका को संभालनी पड़े शैक्षणिक कमान !-प्रो प्रसिद्ध कुमार।
किसी भी राष्ट्र के विकास की नींव उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है। लेकिन भारत में उच्च शिक्षा के वर्तमान हालात को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह नींव ही खोखली हो चुकी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में खाली पड़े शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक पदों को चार माह के भीतर भरने का आदेश देना इस बात का प्रमाण है कि सरकार शिक्षा के प्रति गहरी नींद में सोई हुई है। यह विडंबना ही है कि जो काम प्रशासन को अपनी प्राथमिकता में रखना चाहिए था, उसके लिए देश की सर्वोच्च अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है।
आंकड़ों में छिपी बदहाली
देश के विभिन्न राज्यों में स्थिति भयावह है:
मध्य प्रदेश: 19 सरकारी विश्वविद्यालयों में से 15 में 70% से ज्यादा पद खाली हैं।
हरियाणा: कई विश्वविद्यालयों में पिछले 6 से 8 वर्षों से प्रोफेसरों की भर्ती ही नहीं हुई है, जिससे 60% पद रिक्त पड़े हैं।
बिहार: विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के लगभग 4000 पद रिक्त हैं।
इतना ही नहीं, केंद्रीय विश्वविद्यालय भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं। यहाँ तक कि कुलपतियों और रजिस्ट्रार जैसे प्रशासनिक पद भी खाली पड़े हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या योग्य अभ्यर्थियों की कमी है? उत्तर है—बिल्कुल नहीं। समस्या योग्यता की कमी नहीं, बल्कि सरकार की इच्छाशक्ति का अभाव है।
प्राथमिकताओं का भटकाव और प्रचार का मोह
सरकार अक्सर गैर-जरूरी और प्रतीकात्मक चीजों का खूब प्रचार-प्रसार करती है। नई शिक्षा नीति (NEP) को लागू हुए पांच वर्ष बीत चुके हैं, जिसमें छात्र-शिक्षक अनुपात पर विशेष जोर दिया गया है। लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि बिना शिक्षकों के शिक्षा दी जा रही है। जब किसी देश की शिक्षा 'बेपटरी' हो जाए, तो वहां किसी भी प्रकार के आर्थिक या सामाजिक विकास की कल्पना करना बेमानी है। क्या यह देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है?
"जिस देश में ज्ञान के मंदिर (विश्वविद्यालय) बिना पुजारियों (शिक्षकों) के हों, उस देश का भविष्य अंधकारमय होना निश्चित है।"
गंभीर परिणाम
पठन-पाठन पर प्रभाव: शिक्षकों के अभाव में छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पा रही है।
छात्रों की परेशानी: शोध और अकादमिक मार्गदर्शन न मिलने से छात्रों का भविष्य अधर में लटका है।
संस्थागत ढांचा कमजोर: गैर-शैक्षणिक पदों के खाली होने से प्रशासनिक कार्य ठप पड़े हैं।

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