सादगी का 'श्राद्ध' और वीआईपी संस्कृति का 'अश्वमेध'!
आज के युग में 'सादगी' शब्द डिक्शनरी के किसी कोने में दुबक कर अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। विशेषकर हमारे माननीय जनसेवकों के जीवन में सादगी अब केवल चुनाव पूर्व जारी होने वाले 'घोषणापत्र' की शोभा बढ़ाने के काम आती है। जैसे ही मतपेटी से भाग्य का सूर्य उदय होता है, सादगी का 'सूर्यास्त' हो जाता है और 'वीआईपी संस्कृति' का वह अश्वमेध यज्ञ शुरू होता है, जिसके घोड़े आम आदमी की छाती पर दलदल की तरह रेंगते हैं।
खादी की चमक और मखमली मखौल
वह दौर अब 'ब्लैक एंड व्हाइट' फिल्मों की रील के साथ इतिहास हो गया, जब खादी का मतलब त्याग होता था। आज की खादी इतनी 'कड़क' है कि उसमें जनता की चीखें सुनाई ही नहीं देतीं। सादगी को तिलांजलि देना अब केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि एक अनिवार्य 'राजधर्म' बन गया है। अगर नेता के काफिले में हूटरों का शोर न हो, तो उसे लगता है कि उसकी सत्ता को 'लकवा' मार गया है। सड़कों पर घंटों रुकी हुई एम्बुलेंस और पसीने से तर-बतर जनता दरअसल उस 'वीआईपी' महोदय की महानता के लिए दी गई अनिवार्य बलि है।
सुरक्षा का घेरा या जनता से दूरी?
लोकतंत्र की विडंबना देखिए—जिस जनता ने आपको 'अपना' चुनकर भेजा, उसी जनता से बचने के लिए 'जेड प्लस' (Z+) सुरक्षा के अभेद्य दुर्ग बनाए जाते हैं। सादगी का चोला उतारकर अब 'बुलेटप्रूफ' जैकेट और काले चश्मों के पीछे छिपे रहने में ही नेतागिरी की सार्थकता है। जनता के बीच जाने का मतलब अब 'जनसंपर्क' नहीं, बल्कि एक 'इवेंट मैनेजमेंट' है, जहाँ कैमरे के एंगल्स तय करते हैं कि सादगी का विज्ञापन कितना प्रभावशाली होगा।
विलासिता का नया व्याकरण
"सादगी तो अब उन म्यूजियमों की वस्तु है, जहाँ नेताजी कभी-कभी रिबन काटने जाते हैं।"
आज के जनसेवक की परिभाषा बदल चुकी है। अब 'पसीने की महक' से ज्यादा 'पर्फ़्यूम की खुशबू' और 'धूल भरे रास्तों' से ज्यादा 'चार्टर्ड प्लेन' की उड़ानें मायने रखती हैं। सादगी का त्याग करना दरअसल यह घोषित करना है कि हम अब 'शासक' हैं, 'सेवक' नहीं। सेवा का भाव अब सुसज्जित बंगलों और आलीशान सुख-सुविधाओं के नीचे कहीं दबकर कराह रहा है।

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