अहं का खंजर: एक अधूरी विदाई ! ( कहानी )
पटखौली का रहने वाला शहबाज, जिसे लोग 'जान मोहम्मद' भी कहते थे, जब सेवरही के दुबौली गांव की ओर बढ़ा, तो उसके कदम प्यार की उम्मीद से नहीं, बल्कि एक अजीब से अधिकार और दबे हुए गुस्से से भरे थे। उसकी शादी राबिया से हुई थी, लेकिन यह रिश्ता प्रेम की नींव पर नहीं, बल्कि डर और कलह की दीवारों पर खड़ा था।
राबिया पिछले एक महीने से अपने मायके में थी। वह विदाई तो चाहती थी, लेकिन उस घर में नहीं जहाँ सम्मान की जगह मारपीट और सुकून की जगह सिसकियाँ मिलती थीं। शहबाज के लिए राबिया एक जीवनसंगिनी नहीं, बल्कि एक ऐसी संपत्ति थी जिसे वह अपनी मर्जी से हांकना चाहता था।
बुधवार की दोपहर जब शहबाज दुबौली पहुँचा, तो घर के आँगन में हवा भारी थी। उसने राबिया की विदाई की मांग की। राबिया के पिता अमीन और माँ आयशा की आँखों में अपनी बेटी के शरीर पर पड़े पुराने नीले निशानों का खौफ तैर गया। उन्होंने ठंडे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, "जब तक तुम अपनी आदतें नहीं सुधारते और राबिया को मारने-पीटने का सिलसिला बंद नहीं करते, हम उसे विदा नहीं करेंगे।"
यही वह क्षण था जहाँ एक 'पति' का अहं एक 'अपराधी' की सनक में बदल गया। शहबाज के लिए यह मनाही केवल एक पिता का फैसला नहीं थी, बल्कि उसके पुरुषवादी अहंकार पर गहरी चोट थी। उसे लगा कि उसकी 'चीज' उसे लौटाने से इनकार किया जा रहा है। बातचीत गाली-गलौज में बदली और फिर जो हुआ, उसने रिश्तों की मर्यादा को लहूलुहान कर दिया।
शहबाज ने अपनी जेब में पहले से ही एक चाकू छिपा रखा था—यह इस बात का प्रमाण था कि वह मिलने नहीं, बल्कि अपनी बात मनवाने के लिए 'हिंसा' का मानसिक खाका खींचकर आया था। जैसे ही अमीन और आयशा ने अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए उसे ले जाने से रोका, शहबाज ने आव देखा न ताव, अपनी सास आयशा और ससुर अमीन पर ताबड़तोड़ वार कर दिए।
चीख-पुकार सुनकर चचेरे ससुर सलाउद्दीन बीच-बचाव करने दौड़े। लेकिन उस वक्त शहबाज पर खून सवार था। मनोवैज्ञानिक रूप से वह उस समय किसी भी तर्क या रिश्ते को समझने की स्थिति में नहीं था; उसके दिमाग में केवल 'बदला' और 'वर्चस्व' हावी था। उसने सलाउद्दीन को भी चाकू मारकर घायल कर दिया।
मिट्टी के उस आँगन में जहाँ विदाई की शहनाइयां गूँजनी चाहिए थीं, वहाँ अब खून के धब्बे और सिसकियाँ थीं।
यह कहानी केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि उस जहरीली मानसिकता का प्रतिबिंब है जहाँ 'विवाह' को स्वामित्व समझा जाता है। शहबाज का जेब में चाकू लेकर आना यह दर्शाता है कि उसका आवेग तात्कालिक नहीं, बल्कि पूर्व-नियोजित था। जब समाज में घरेलू हिंसा को 'निजी मामला' मानकर अनदेखा किया जाता है, तो वह शहबाज जैसे चरित्रों को इस हद तक उग्र बना देता है कि वे अपनों का ही खून बहाने से नहीं हिचकते।
आज दुबौली गांव का वह घर शांत है, लेकिन वहाँ के जख्म चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि जहाँ सम्मान नहीं होता, वहाँ 'विदाई' अक्सर ऐसी ही विनाशकारी परिणति तक पहुँचती है।

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