स्मृतियों की पाथेय और विदाई की वेला: राजकीय मध्य विद्यालय गायघाट का एक स्वर्णिम अध्याय !

 

​'चौदह वर्षों का शैक्षणिक वनवास' और स्नेह की अनमोल पूंजी !

​आज राजकीय मध्य विद्यालय गायघाट, हरसिद्धि की हवाओं में एक अजीब सी भारीपन और आंखों में नमी है। आज हमारे प्रिय साथी, ओजस्वी शिक्षक श्री राजू प्रसाद जी अपनी गौरवशाली सेवा यात्रा को विराम देकर सेवानिवृत्त हो रहे हैं। 31 जनवरी 2026 की यह तिथि विद्यालय के इतिहास में एक भावुक मोड़ के रूप में दर्ज हो गई है।

​सेवा का संकल्प और जन्मभूमि का मोह

​राजू जी की सेवा यात्रा किसी तपस्या से कम नहीं रही। अपनी जन्मभूमि पटना के मोह को त्यागकर, पूर्वी चम्पारण की इस मिट्टी को अपनी कर्मभूमि बनाना और यहाँ के बच्चों के भविष्य को संवारना उनके लिए एक 'शैक्षणिक वनवास' की तरह था। जैसे प्रभु राम ने वनवास को लोक कल्याण का मार्ग बनाया, वैसे ही राजू जी ने इन 14 वर्षों को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करने में व्यतीत किया।

​निष्ठा और ईमानदारी का पर्याय

​एक शिक्षक के रूप में उन्होंने केवल पाठ्यपुस्तकें नहीं पढ़ाईं, बल्कि जीवन जीने के संस्कार रोपे। उनकी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा ऐसी थी कि विद्यार्थियों के लिए वे केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और अभिभावक बन गए।

​"विदाई तो देह की होती है, आत्मीयता के धागे तो ताउम्र जुड़े रहते हैं।"


​स्नेहसिक्त विदाई समारोह

​विदाई की इस घड़ी में विद्यालय परिवार ने उन्हें अंगवस्त्र और उपहारों से सम्मानित किया, जो उनके प्रति हमारे आदर का एक लघु प्रतीक मात्र हैं। इस गरिमामयी क्षण के साक्षी बने:

  • प्रधानाध्यापक: श्री बब्लू कुमार जी (जिनके कुशल नेतृत्व में यह विदाई संपन्न हुई)।
  • सहयोगी शिक्षक: संतोष कुमार, प्रदीप कुमार, जयप्रकाश कुमार कुशवाहा और फिरोज अख्तर।
  • सहयोगी शिक्षिकाएं: रिंकी कुमारी, किरण कुमारी, कामिनी साहनी और शबनम आरा।

​सहकर्मियों का यह असीम स्नेह इस बात का प्रमाण है कि राजू जी ने यहाँ केवल कार्य नहीं किया, बल्कि सबका दिल जीता है।


​राजू प्रसाद जी, आज आप विद्यालय के दायित्वों से मुक्त हो रहे हैं, किंतु उन हज़ारों विद्यार्थियों के हृदय से कभी मुक्त नहीं होंगे जिन्हें आपने गढ़ा है। आपकी द्वितीय पारी (सेवानिवृत्ति के बाद का जीवन) मंगलमय, स्वास्थ्यप्रद और सुखद हो, यही हम सबकी ईश्वर से प्रार्थना है।

लेखक: प्रो. प्रसिद्ध कुमार





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