बिहार के क्षितिज पर 'तेजस्वी' सूर्य: सामाजिक न्याय की विरासत और युवा संकल्प ! प्रो प्रसिद्ध कुमार ।
बिहार की राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि सदियों से दबे-कुचले समाज की हुंकार रही है। इस हुंकार को स्वर दिया लालू प्रसाद यादव ने, और आज उसी मशाल को थामकर एक युवा नेतृत्व नए इतिहास की इबारत लिख रहा है।
विरासत: संघर्ष की कोख से उपजा विश्वास
कल्पना मात्र से अंतर्मन सिहर उठता है कि यदि भारतीय राजनीति के पटल पर लालू प्रसाद यादव जैसा व्यक्तित्व न होता, तो समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति आज भी अपमान और अभाव की बेड़ियों में जकड़ा होता। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि 'गरीबों की मुखर जिह्वा' बनकर उभरे।
उन्होंने सत्ता के गलियारों के द्वार उन लोगों के लिए खोल दिए, जिन्होंने कभी संसद या विधानसभा की चौखट लांघने का स्वप्न भी नहीं देखा था। जिसे लोग 'वोट' समझते थे, लालू जी ने उसे 'चेतना' बना दिया। हालांकि, समय-समय पर धार्मिक आडंबरों और षड्यंत्रों के द्वारा इस चेतना को कुंद करने के प्रयास हुए, परंतु लोक-शक्ति की जड़ें आज भी अडिग हैं।
तेजस्वी यादव: राजनीति के नव-आकाश का उदय
आज जब हम तेजस्वी यादव को देखते हैं, तो उनमें एक परिपक्व राजनेता और युवाओं की धड़कन का अद्भुत संगम दिखाई देता है। वे केवल विरासत के उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि अपनी कर्मठता से खुद को 'बिहार का भविष्य' सिद्ध कर चुके हैं।
कार्यकारी अध्यक्ष: एक नए युग का शंखनाद
राजद के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका एक 'नए युग का आगमन' है। प्रतिपक्ष के नेता के तौर पर सदन में उनकी वाकपटुता, तार्किक प्रहार और ज्वलंत मुद्दों पर बेबाकी सत्ता पक्ष को निरुत्तर कर देती है। उनके व्यक्तित्व में संघर्ष की प्रबल इच्छाशक्ति, हाजिरजवाबी और गजब का संयम है।
"उनके तेवर में जोश है, जुनून में होश है, और संकल्प में बिहार का नवनिर्माण है।"
उपसंहार
तेजस्वी यादव आज उस मुकाम पर हैं जहां से वे केवल एक दल का नेतृत्व नहीं कर रहे, बल्कि देश की राजनीति में एक नया इतिहास रचने की ओर अग्रसर हैं। उनके कंधों पर न केवल राजद की जिम्मेदारी है, बल्कि उन करोड़ों आंखों के सपने हैं जो एक न्यायपूर्ण और समृद्ध बिहार की आस लगाए बैठे हैं।
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