तकनीकी प्रगति और प्रशासनिक जड़ता के बीच मरते गजराज !
हाल ही में असम के नागांव जैसी घटनाओं ने एक बार फिर विकास के उस मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहाँ बेजुबान जानवरों की जान की कीमत 'सुपरफास्ट' रफ्तार के नीचे दब गई है। यह विडंबना ही है कि एक तरफ हम आधुनिक भारत में 'सेंसर' और 'डिजिटल इंडिया' का ढोल पीट रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पटरियों पर हाथियों का लहू बहना बदस्तूर जारी है।
1. कागजी नियम और नदारद जवाबदेही
जंगल से गुजरने वाली पटरियों पर 'गति सीमा' के नियम तो हैं, लेकिन धरातल पर उनकी स्थिति शून्य है। क्या यह रेलवे प्रशासन की लापरवाही नहीं है कि संवेदनशील क्षेत्रों में भी ट्रेनें अपनी निर्धारित गति को कम नहीं करतीं? नियमों का उल्लंघन केवल चालक की गलती नहीं, बल्कि उस पूरी निगरानी प्रणाली की विफलता है जो इसे अनदेखा करती है।
2. सेंसर और सूचना तंत्र: एक 'मॉक ड्रिल' बनकर रह गया
आधुनिक तकनीक के नाम पर हमारे पास सेंसर तो हैं जो हाथियों की उपस्थिति की सूचना नियंत्रण कक्ष तक पहुँचाते हैं, लेकिन समस्या 'निर्णय लेने की प्रक्रिया' की सुस्ती है। जब तक सूचना एक विभाग से दूसरे विभाग तक पहुँचती है और ब्रेक लगाने का आदेश मिलता है, तब तक काल की गति से दौड़ती ट्रेन अपना विनाशकारी काम कर चुकी होती है। यह तकनीक का दोष नहीं, बल्कि उस नौकरशाही तंत्र की सुस्ती है जो संकट के समय त्वरित प्रतिक्रिया देने में अक्षम है।
3. रफ़्तार का गणित बनाम जीवन की सुरक्षा
90-100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली ट्रेन को रुकने के लिए लगभग एक किलोमीटर की दूरी चाहिए। जंगल के मोड़दार रास्तों और कम दृश्यता के बीच लोको पायलट के पास प्रतिक्रिया का समय बहुत कम होता है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि:
क्या हम वन्यजीव गलियारों में ओवरपास या अंडरपास बनाने में जानबूझकर देरी कर रहे हैं?
क्या रफ़्तार का जुनून इतना बढ़ गया है कि हम पारिस्थितिकी संतुलन को दांव पर लगा रहे हैं?

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