आधुनिकता की भीड़ में खोता अकेलापन !

 


​आज का युग सूचना और तकनीक का महासागर है। हमारे पास मनोरंजन के हजारों साधन हैं और दुनिया भर से जुड़ने के लिए उंगलियों के इशारे पर इंटरनेट है। लेकिन विडंबना यह है कि सुविधाओं के इस महासागर में आज का व्यक्ति पहले से कहीं अधिक अकेला और बेचैन है। ### बदलता सामाजिक ढांचा

समय के साथ हमारे सामाजिक ताने-बाने में बड़े बदलाव आए हैं:

​लघु परिवार (Nuclear Families): संयुक्त परिवारों का स्थान छोटे परिवारों ने ले लिया है, जिससे बच्चों और बड़ों के बीच का वह भावनात्मक पुल टूट गया है जो पहले कहानियों और साझा समय से बनता था।
​औपचारिक रिश्ते: अब रिश्तों में वह आत्मीयता कम और औपचारिकता ज्यादा नजर आती है। लोग दिल से मिलने के बजाय 'स्टेटस' और 'दिखावे' को अधिक महत्व देने लगे हैं।

​संवाद बनाम संदेश

संवाद का स्थान संदेशों ने ले लिया है। पहले लोग घंटों बैठकर बातें करते थे, एक-दूसरे के चेहरे के भाव पढ़ते थे। आज हम एक ही घर में, एक ही सोफे पर बैठे होते हैं, लेकिन हमारी नजरें अपनी-अपनी मोबाइल स्क्रीन पर होती हैं। हम "बात" नहीं करते, बस "टेक्स्ट" करते हैं। इमोजीस ने असली मुस्कुराहटों की जगह ले ली है।

​एक छत, अलग दुनिया

​यह आज के हर दूसरे घर की कहानी है—"लोग एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अलग-अलग दुनिया में खोए रहते हैं।" पिता ऑफिस के काम में, माँ सोशल मीडिया पर और बच्चे ऑनलाइन गेमिंग या वीडियो में व्यस्त हैं। हम शारीरिक रूप से साथ होकर भी मानसिक रूप से मीलों दूर हैं। यह 'डिजिटल अलगाव' हमें मानसिक तनाव और अवसाद की ओर धकेल रहा है।

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