भारत में जनसांख्यिकीय संक्रमण: एक आर्थिक विश्लेषण !-प्रो प्रसिद्ध कुमार ,अर्थशास्त्र, विभाग।
1. क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय भिन्नता -भारत एक 'असममित' जनसांख्यिकीय बदलाव से गुजर रहा है। जहाँ केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्य 'एजिंग स्टेट्स' की श्रेणी में आ रहे हैं, वहीं बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अभी भी अपने 'जनसांख्यिकीय लाभांश' के दौर में हैं।
2. राजकोषीय चुनौतियाँ और आरबीआई का परामर्श
भारतीय रिजर्व बैंक ने राज्यों के लिए भिन्न राजकोषीय रणनीतियाँ सुझाई हैं:
एजिंग स्टेट्स: उन्हें अपनी सब्सिडी को 'रेशनलाइज़' करने की सलाह दी गई है ताकि बढ़ते पेंशन बोझ और स्वास्थ्य व्यय को संभाला जा सके।
युवा राज्य: उन्हें 'मानव पूंजी' यानी शिक्षा और कौशल में भारी निवेश करने की आवश्यकता है।
3. दक्षिणी राज्यों की आर्थिक 'दोहरी मार'
दक्षिणी राज्यों को अपनी सफलता की आर्थिक कीमत चुकानी पड़ रही है:
राजकोषीय हस्तांतरण : वित्त आयोग के फॉर्मूले में जनसंख्या को अधिक महत्व दिए जाने के कारण इन राज्यों को केंद्रीय करों में कम हिस्सा मिल सकता है।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व: आगामी 'डिलिमिटेशन' (परिसीमन) अभ्यास से उनकी संसदीय सीटों में कमी आने की संभावना है।
4. श्रम बाजार और भविष्य की चिंताएँ
स्वचालन और एआई -बढ़ती वर्कफोर्स को ऐसे समय में रोजगार की जरूरत है जब उद्योग तेजी से ऑटोमेशन की ओर बढ़ रहे हैं।
देखभाल अर्थव्यवस्था - केवल श्रम-गहन क्षेत्रों पर निर्भर रहने के बजाय 'ग्रीन एनर्जी' और 'केयर इकोनॉमी' जैसे नए क्षेत्रों में औद्योगिक नीति बनाने की आवश्यकता है।
5. सामाजिक सुरक्षा और लैंगिक असमानता
पेंशन गैप: बुजुर्ग आबादी में महिलाओं की संख्या अधिक है, लेकिन उनके पास वित्तीय संपत्तियों की कमी है क्योंकि वे कभी औपचारिक कार्यबल का हिस्सा नहीं रहीं।
पारिवारिक सुरक्षा तंत्र का पतन: प्रवासन और परमाणु परिवारों के बढ़ने से पारंपरिक 'अनौपचारिक सुरक्षा जाल' कमजोर हो गया है, जिससे सार्वजनिक वित्त पोषित जेरियाट्रिक केयर की मांग बढ़ गई है।

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