ऊब: एक अभिशाप नहीं, सृजन का संकेत !

 


​अक्सर हम ऊब (Boredom) को एक नकारात्मक भावना मानते हैं। जैसे ही हमारे जीवन में नीरसता आती है, हम बेचैन हो जाते हैं और उसे समय की बर्बादी या अपने स्वभाव का दोष समझने लगते हैं। लेकिन वास्तव में, मनुष्य की ऊब न तो शत्रु है और न ही उसका दोष। यह तो मन का एक अलार्म है जो हमें बताता है कि अब ठहराव को छोड़कर आगे बढ़ने का समय आ गया है।

​ऊब: नए विचारों की जन्मदात्री

​जब हम किसी एक ढर्रे पर चलते-चलते ऊब जाते हैं, तो वह इस बात का संकेत है कि अब कुछ नया सोचा जाए। इतिहास गवाह है कि दुनिया के बड़े आविष्कार और परिवर्तन तभी हुए जब किसी ने अपनी वर्तमान स्थिति से ऊबकर कुछ अलग करने की ठानी। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण चुनाव हमारा होता है—वह 'नया' कैसा हो?

​तोड़ने में नहीं, संवारने में हो शक्ति

​समाज में परिवर्तन के दो रास्ते होते हैं: एक विध्वंस का और दूसरा सृजन का। हमारी नई सोच तोड़ने में नहीं, बल्कि संवारने में होनी चाहिए। * आविष्कार दुनिया के लिए: यदि हम कुछ नया बना रहे हैं, तो उसका उद्देश्य मानवता का कल्याण और दुनिया को बेहतर बनाना होना चाहिए।

​प्रयास रिश्तों के लिए: अक्सर हम बाहर की दुनिया को बदलने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपने सबसे करीबी रिश्तों को भूल जाते हैं। हमें अपने प्रयासों का एक बड़ा हिस्सा रिश्तों में नई जान फूंकने और उन्हें संवारने में लगाना चाहिए।

​दिशा का चुनाव हमारे हाथ में

​यह सच है कि ऊब हमें रास्ता दिखाती है, वह हमें पुराने ढर्रे से बाहर खींचती है, लेकिन दिशा तो हम ही तय करते हैं। ऊब हमें विनाश की ओर भी ले जा सकती है और विकास की ओर भी। यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम उस खालीपन का उपयोग रचनात्मकता के लिए करते हैं या व्यर्थ की गतिविधियों के लिए।

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