विकास की कीमत: सांसों में घुलता धीमा जहर!

 


​आज हम जिस 'आधुनिकता' और 'औद्योगिकीकरण' का उत्सव मना रहे हैं, उसकी एक भयावह कीमत हमारी सांसें चुका रही हैं। पिछले कुछ दशकों में वाहनों की बढ़ती संख्या और अनियंत्रित औद्योगिक विस्तार ने पर्यावरण को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ हवा अब जीवनदायिनी नहीं, बल्कि विषाक्त हो चुकी है।

नीतिगत विफलता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव

​यह एक कड़वी सच्चाई है कि आर्थिक विकास के आंकड़ों (GDP) को चमकाने की होड़ में पर्यावरण को हमेशा हाशिए पर रखा गया। जब तक नीतियां केवल कागजों तक सीमित रहेंगी और उद्योगों के लिए मानक केवल दिखावा होंगे, तब तक 'कार्बन उत्सर्जन' में कमी लाना एक काल्पनिक लक्ष्य ही बना रहेगा।

अदृश्य हत्यारा: वायु प्रदूषण

​अस्पतालों में वायु प्रदूषण के कारण हृदय रोग, अस्थमा और फेफड़ों के कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं।
​विडंबना यह है कि इन मौतों को 'वायु प्रदूषण-जनित' नहीं माना जाता, बल्कि इन्हें सामान्य बीमारी के रूप में दर्ज किया जाता है।
​यही कारण है कि यह एक 'स्वास्थ्य संकट' होने के बावजूद आधिकारिक फाइलों में एक अदृश्य संकट बना हुआ है। जब तक हम मौत के असली कारण को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक समाधान की गंभीरता पैदा नहीं होगी।

भोजन और स्वास्थ्य पर दोहरा प्रहार

​चिंताजनक पहलू यह है कि प्रदूषण अब केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं है। विषाक्त तत्व हमारी खाद्य श्रृंखला (Food Chain) में प्रवेश कर चुके हैं। शोधों से यह भी स्पष्ट है कि प्रदूषित हवा रोगजनकों (Pathogens) के प्रसार में सहायक होती है, जिससे महामारियों का खतरा और अधिक बढ़ जाता है।

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